
Śiśupāla-nigraha-prastāva: Yudhiṣṭhira’s Conciliation and Bhīṣma’s Defense of Kṛṣṇa (Book 2, Chapter 35)
Upa-parva: Rājasūya–Arghyārhaṇāsaṃvāda (Discourse on Arghya Honor during the Rājasūya)
Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira approaches Śiśupāla after his harsh remarks and addresses him with measured, conciliatory speech. Yudhiṣṭhira argues that Śiśupāla’s words are improper for a king, ethically defective (adharma), and needlessly abrasive; he urges patience by pointing to the presence of many senior rulers who tolerate the assembly’s decision to honor Kṛṣṇa. He further notes that Bhīṣma, as a preeminent elder, understands Kṛṣṇa’s true stature in a way Śiśupāla does not. Bhīṣma then rejects appeasement: one who refuses honor to the most eminent should not be soothed. He frames Kṛṣṇa as worthy of reverence not only for the Pandavas but for all worlds, citing Kṛṣṇa’s martial supremacy, excellence in knowledge and strength, and a comprehensive catalog of virtues. Bhīṣma escalates the claim into a cosmological register, presenting Kṛṣṇa as the ground of elements, directions, luminaries, and worldly order. He concludes that Śiśupāla’s dissent reflects immaturity and misrecognition of dharma, and that the assembly is justified in proceeding with the contested honor.
Chapter Arc: राजसूय-दीक्षा के तेज में युधिष्ठिर पितामह भीष्म और गुरु द्रोण सहित समस्त वरिष्ठों का प्रत्युद्गमन कर विनयपूर्वक उनसे यज्ञ-कार्य में अनुग्रह और सहभागिता की याचना करते हैं। → युधिष्ठिर अपने महान धन-वैभव को ‘प्रणय’ (स्नेह-निवेदन) बनाकर सबको इच्छानुसार ग्रहण करने का आग्रह करते हैं और फिर यथायोग्य अधिकारों में सबको नियुक्त करते हैं—यज्ञ की व्यवस्था, अतिथि-सत्कार, दान-वितरण और सभा की शोभा एक साथ बढ़ती जाती है। → दूर-दूर से आए राजाओं की दृष्टि धर्मराज और उनकी सभा पर टिकती है; कोई भी सत्कार में कमी नहीं रहने देता—‘यज्ञ’ के नाम पर प्रतिस्पर्धा करते हुए प्रत्येक राजा बहुसंख्यक रत्न-धन अर्पित करता है, और युधिष्ठिर का वैभव तथा यज्ञ की श्री चरम पर पहुँचती है। → सभा रत्नों, समृद्ध राजाओं और संतुष्ट ब्राह्मणों/वर्णों से परिपूर्ण होकर देवताओं-सा तृप्ति-भाव रचती है; दक्षिणा, अन्न और महाधन से सब प्रसन्न होते हैं और राजसूय-यज्ञ का आयोजन सुव्यवस्थित रूप से आगे बढ़ता है। → प्रतिस्पर्धी दान और बढ़ती हुई ‘श्री’ के बीच यह संकेत उभरता है कि इतना वैभव और प्रतिष्ठा आगे चलकर ईर्ष्या/द्वेष को भी आमंत्रित कर सकती है।
Verse 1
ऑफ -ण क्र पज्चत्रिशो5 ध्याय: राजसूययज्ञका वर्णन वैशम्पायन उवाच पितामहं गुरुं चैव प्रत्युद्गम्य युधिष्ठिर: । अभिवाद्य ततो राजन्निदं वचनमत्रवीत्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पितामह भीष्म तथा गुरु द्रोणाचार्य आदिकी अगवानी करके युधिष्ठिरने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और भीष्म, द्रोण, कृप, अश्व॒त्थामा, दुर्योधन और विविंशतिसे कहा--“'इस यज्ञमें आपलोग सब प्रकारसे मुझपर अनुग्रह करें
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজা জনমেজয়! যুধিষ্ঠির পিতামহ ভীষ্ম ও গুরু দ্রোণাচার্যকে অভ্যর্থনা করতে এগিয়ে গেলেন; তাঁদের প্রণাম করে পরে এই কথা বললেন।
Verse 2
भीष्म द्रोणं कृप॑ द्रौणिं दुर्योधनविविंशती । अस्मिन् यज्ञे भवन्तों मामनुगृह्नन्तु सर्वश:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पितामह भीष्म तथा गुरु द्रोणाचार्य आदिकी अगवानी करके युधिष्ठिरने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और भीष्म, द्रोण, कृप, अश्व॒त्थामा, दुर्योधन और विविंशतिसे कहा--“'इस यज्ञमें आपलोग सब प्रकारसे मुझपर अनुग्रह करें
ভীষ্ম, দ্রোণ, কৃপ, দ্রৌণি (অশ্বত্থামা), দুর্যোধন ও বিবিংশতিকে যুধিষ্ঠির বললেন—“এই যজ্ঞে আপনারা সর্বতোভাবে আমাকে অনুগ্রহ করুন।”
Verse 3
इदं व: सुमहच्चैव यदिहास्ति धनं मम । प्रणयन्तु भवन्तो मां यथेष्टमभिमन्त्रिता:,यहाँ मेरा जो यह महान् धन है, उसे आपलोग मेरी प्रार्थना मानकर इच्छानुसार सत्कर्मोमें लगाइये
এখানে যে আমার এই বিপুল ধন আছে, তা আপনাদেরই জন্য; আমার প্রার্থনা গ্রহণ করে, আপনারা যেমন যথোচিত মনে করেন, তেমনই ইচ্ছামতো ধর্মকার্যে তা নিয়োজিত করুন এবং আমার প্রতি স্নেহ রাখুন।
Verse 4
एवमुक्त्वा स तानू सर्वान् दीक्षित: पाण्डवाग्रज: । युयोज स यथायोगमधिकारेष्वनन्तरम्,यज्ञदीक्षित युधिष्ठिरने ऐसा कहकर उन सबको यथायोग्य अधिकारोंमें लगाया
এ কথা বলে যজ্ঞদীক্ষিত পাণ্ডবদের অগ্রজ যুধিষ্ঠির সঙ্গে সঙ্গে তাঁদের সকলকে যোগ্যতা অনুসারে যথোচিত কর্তব্য ও অধিকারভারে নিয়োজিত করলেন।
Verse 5
भक्ष्यभोज्याधिकारेषु दःशासनमयोजयत् | परिग्रहे ब्राह्मणानामश्च॒त्थामानमुक्तवान्,भक्ष्य-भोज्य आदि सामग्रीकी देख-रेख तथा उसके बाँटने परोसनेकी व्यवस्थाका अधिकार दुःशासनको दिया। ब्राह्मणोंके स्वागत-सत्कारका भार उन्होंने अश्वत्थामाको सौंप दिया
বৈশম্পায়ন বললেন—ভক্ষ্য-ভোজ্য দ্রব্যের রক্ষণ, তত্ত্বাবধান, বণ্টন ও পরিবেশনের দায়িত্ব তিনি দুঃশাসনকে দিলেন। আর ব্রাহ্মণদের অভ্যর্থনা ও যথোচিত সম্মান প্রদর্শনের ভার অশ্বত্থামার হাতে অর্পণ করলেন।
Verse 6
राज्ञां तु प्रतिपूजार्थ संजयं स न्ययोजयत् | कृताकृतपरिज्ञाने भीष्मद्रोणी महामती,राजाओंकी सेवा और सत्कारके लिये धर्मराजने संजयको नियुक्त किया। कौन काम हुआ और कौन नहीं हुआ, इसकी देख-रेखका काम महाबुद्धिमान् भीष्म और द्रोणाचार्यको मिला
বৈশম্পায়ন বললেন—সমবেত রাজাদের যথাযথ সেবা ও সম্মান প্রদর্শনের জন্য তিনি সংজয়কে নিযুক্ত করলেন। আর কোন কাজ সম্পন্ন হয়েছে, কোনটি অসম্পন্ন রইল—এই তত্ত্বাবধানের ভার মহামতি ভীষ্ম ও দ্রোণের উপর অর্পণ করলেন।
Verse 7
हिरण्यस्य सुवर्णस्य रत्नानां चान्ववेक्षणे | दक्षिणानां च वै दाने कृपं राजा न्न्ययोजयत्,उत्तम वर्णके स्वर्ण तथा रत्नोंको परखने, रखने और दक्षिणा देनेके कार्यमें राजाने कृपाचार्यकी नियुक्ति की। इसी प्रकार दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ पुरुषोंको यथायोग्य भिन्न-भिन्न कार्योमें लगाया। नकुलके द्वारा सम्मानपूर्वक बुलाकर लाये हुए बाह्लिक, धृतराष्ट्र, सोमदत्त और जयद्रथ वहाँ घरके मालिककी तरह सुखपूर्वक रहने और इच्छानुसार विचरने लगे
বৈশম্পায়ন বললেন—হিরণ্য, উৎকৃষ্ট স্বর্ণ ও রত্নের পরীক্ষা-নিরীক্ষা, রক্ষণাবেক্ষণ এবং দক্ষিণা-দানকার্যে রাজা কৃপাচার্যকে নিযুক্ত করলেন। এভাবেই যোগ্যতা অনুসারে অন্যান্য শ্রেষ্ঠ পুরুষদেরও নানা কাজে নিয়োজিত করলেন। আর নকুলের দ্বারা সম্মানসহকারে আনা বাহ্লীক, ধৃতরাষ্ট্র, সোমদত্ত ও জয়দ্রথ সেখানে গৃহস্বামীর মতোই স্বচ্ছন্দে বাস করতে লাগলেন এবং ইচ্ছামতো বিচরণ করলেন।
Verse 8
तथान्यान् पुरुषव्याप्रांस्तस्मिंस्तस्मिन् न््ययोजयत् । बाह्निको धृतराष्ट्रश्न सोमदत्तो जयद्रथ: । नकुलेन समानीता: स्वामिवत् तत्र रेमिरे,उत्तम वर्णके स्वर्ण तथा रत्नोंको परखने, रखने और दक्षिणा देनेके कार्यमें राजाने कृपाचार्यकी नियुक्ति की। इसी प्रकार दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ पुरुषोंको यथायोग्य भिन्न-भिन्न कार्योमें लगाया। नकुलके द्वारा सम्मानपूर्वक बुलाकर लाये हुए बाह्लिक, धृतराष्ट्र, सोमदत्त और जयद्रथ वहाँ घरके मालिककी तरह सुखपूर्वक रहने और इच्छानुसार विचरने लगे
বৈশম্পায়ন বললেন—এইভাবেই রাজা অন্যান্য সক্ষম পুরুষদেরও তাদের নিজ নিজ কাজে নিয়োজিত করলেন। নকুলের দ্বারা সম্মানসহকারে আনা বাহ্লীক, ধৃতরাষ্ট্র, সোমদত্ত ও জয়দ্রথ সেখানে গৃহস্বামীর মতো স্বচ্ছন্দে রইলেন।
Verse 9
क्षत्ता व्ययकरस्त्वासीद् विदुर: सर्वधर्मवित् । दुर्योधनस्त्वर्हणानि प्रतिजग्राह सर्वश:,सम्पूर्ण धर्मोके ज्ञाता विदुरजी धनको व्यय करनेके कार्यमें नियुक्त किये गये थे तथा राजा दुर्योधन कर देनेवाले राजाओंसे सब प्रकारकी भेंट स्वीकार करने और व्यवस्थापूर्वक रखनेका काम सँभाल रहे थे
বৈশম্পায়ন বললেন—সর্বধর্মজ্ঞ ক্ষত্তা বিদুর ব্যয়-ব্যবস্থার দায়িত্বে নিযুক্ত হলেন। আর করদ রাজাদের প্রদত্ত অর্ঘ্য ও নানা উপহার সর্বতোভাবে গ্রহণ করে সেগুলি যথাবিধি সংরক্ষণ ও বিন্যাস করার ভার দুর্যোধন গ্রহণ করল।
Verse 10
चरणक्षालने कृष्णो ब्राह्मणानां स्वयं हाभूत् । सर्वलोकसमावृत्त: पिप्रीषु: फलमुत्तमम्,सब लोगोंसे घिरे हुए भगवान् श्रीकृष्ण सबको संतुष्ट करनेकी इच्छासे स्वयं ही ब्राह्मणोंके चरण पखारनेमें लगे थे, जिससे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है
সমবেত সকল লোকের দ্বারা পরিবৃত হয়ে, সকলকে তুষ্ট করে উত্তম ফল লাভের ইচ্ছায় শ্রীকৃষ্ণ স্বয়ং ব্রাহ্মণদের চরণ প্রক্ষালনে প্রবৃত্ত হলেন।
Verse 11
द्रष्टकामा: सभां चैव धर्मराजं युधिष्ठिरम् । न कश्चिदाहरत् तत्र सहस्रावरमर्हणम्,धर्मराज युधिष्ठिरको और उनकी सभाको देखनेकी इच्छासे आये हुए राजाओंमेंसे कोई भी ऐसा नहीं था, जो एक हजार स्वर्णमुद्राओंसे कम भेंट लाया हो
ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির ও তাঁর সভা দর্শনের আকাঙ্ক্ষায় আগত রাজাদের মধ্যে সেখানে এমন কেউ ছিল না, যে সহস্র স্বর্ণমুদ্রার কম মূল্যের উপহার এনেছিল।
Verse 12
रत्नैश्व बहुभिस्तत्र धर्मराजमवर्धयत् । कथं तु मम कौरव्यो रत्नदानै: समाप्नुयात्
সেখানে বহু রত্ন দ্বারা সে ধর্মরাজের মান বৃদ্ধি করল; কিন্তু কৌরব (দুর্যোধন) মনে মনে ভাবল—‘শুধু রত্নদানেই বা আমার উদ্দেশ্য কীভাবে সিদ্ধ হবে?’
Verse 13
भवनै: सविमानाग्रै: सोदर्कर्बलसंवृतैः
সেই স্থানটি উচ্চ উচ্চ প্রাসাদশিখরযুক্ত ভবনে পরিপূর্ণ ছিল এবং দৃঢ় প্রাচীর ও দুর্গবেষ্টনী দ্বারা সুরক্ষিতভাবে পরিবৃত ছিল।
Verse 14
लोकराजविमानैश्व ब्राह्मणावसथै: सह । कृतैरावसर्थ्दिव्यर्विमानप्रतिमैस्तथा
সেখানে লোকাধিপতিসদৃশ রাজপ্রাসাদগুলির সঙ্গে সঙ্গে ব্রাহ্মণদের জন্যও আবাস ছিল; আর দেবসম, বিমানসদৃশ ভব্য নিবাসও নির্মিত ছিল।
Verse 15
विचित्रै रत्नवद्धिश्व ऋद्धवा परमया युतै: । राजभिश्च समावृत्तैरतीव श्रीसमृद्धिभि: । अशोभत सदो राजन् कौन्तेयस्य महात्मन:
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! কুন্তীপুত্র মহাত্মা যুধিষ্ঠিরের সভাগৃহ আশ্চর্য রত্নখচিত মহাসমৃদ্ধিতে অলংকৃত ছিল; আর অপরিসীম ঐশ্বর্যবান রাজাদের ভিড়ে সে সভা অতিশয় দীপ্তিময় হয়ে উঠেছিল।
Verse 16
राजन् ! जिनके शिखर यज्ञ देखनेके लिये आये हुए देवताओंके विमानोंका स्पर्श कर रहे थे, जो जलाशयोंसे परिपूर्ण और सेनाओंसे घिरे हुए थे, उन सुन्दर भवनों, इन्द्रादि लोकपालोंके विमानों, ब्राह्मणोंके निवासस्थानों तथा परम समृद्धिसे सम्पन्न रत्नोंसे परिपूर्ण चित्र एवं विमानके तुल्य बने हुए दिव्य गृहोंसे, समागत राजाओंसे तथा असीम श्रीसमृद्धियोंसे महात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी वह सभा बड़ी शोभा पा रही थी ।। १३-- १५ || ऋद्धया तु वरुण देवं स्पर्थमानो युधिष्ठिर: । षडग्निनाथ यज्ञेन सोडयजद् दक्षिणावता,महाराज युधिष्ठिर अपनी अनुपम समृद्धिद्वारा वरुणदेवताकी बराबरी कर रहे थे। उन्होंने यज्ञमें छः अग्नियोंकी- स्थापना करके पर्याप्त दक्षिणा देकर उस यज्ञके द्वारा भगवान्का यजन किया
হে রাজন! যেসব প্রাসাদের শিখর যজ্ঞ দর্শনে আগত দেবতাদের বিমানকে স্পর্শ করত, যেগুলি জলাশয়ে পরিপূর্ণ ও সেনাবাহিনী দ্বারা পরিবেষ্টিত ছিল—সেই সব মনোরম ভবন, ইন্দ্রাদি লোকপালদের বিমানের ন্যায় দিব্য গৃহ, ব্রাহ্মণদের নিবাসস্থান, পরম সমৃদ্ধিতে রত্নপূর্ণ বিচিত্র প্রাসাদ, সমাগত রাজাদের সমাবেশ এবং সীমাহীন শ্রীঐশ্বর্যে মহাত্মা কুন্তীনন্দন যুধিষ্ঠিরের সভা মহাশোভা লাভ করেছিল। অতুল সমৃদ্ধির জোরে যুধিষ্ঠির যেন বরুণদেবের সঙ্গেও প্রতিদ্বন্দ্বিতা করতেন; তিনি ছয় অগ্নি প্রতিষ্ঠা করে, পর্যাপ্ত দক্ষিণাসহ যজ্ঞ সম্পাদন করে সেই যজ্ঞের দ্বারা ভগবানকে পূজা করলেন।
Verse 17
सवञ्जनान् सर्वकामै: समृद्धैः समतर्पयत् । अन्नवान् बहुभक्ष्यश्न भुक्तवज्जनसंवृत: । रत्नोपहारसम्पन्नो बभूव स समागम:,राजाने उस यज्ञमें आये हुए सब लोगोंको उनकी सभी कामनाएँ पूर्ण करके संतुष्ट किया। वह यज्ञसमारोह अन्नसे भरापूरा था, उसमें खाने-पीनेकी सब सामग्रियाँ पर्याप्त मात्रामें सदा प्रस्तुत रहती थीं। वह यज्ञ खा-पीकर तृप्त हुए लोगोंसे ही पूर्ण था। वहाँ कोई भूखा नहीं रहने पाता था तथा उस उत्सवसमारोहमें सब ओर रत्नोंका ही उपहार दिया जाता था
রাজা সেই যজ্ঞে উপস্থিত সকলকে—তাদের পরিজনসহ—সমৃদ্ধ উপকরণে তাদের সকল কামনা পূর্ণ করে তৃপ্ত করলেন। সেই সমাবেশ অন্ন ও নানাবিধ ভোজ্যে পরিপূর্ণ ছিল; আহার করে তৃপ্ত অতিথিতেই তা ভরে উঠেছিল। আর সে মহোৎসব সর্বদিকে রত্ন-উপহারে সমৃদ্ধ হয়ে উঠেছিল।
Verse 18
इडाज्यहोमाहुतिभिमन्त्रशिक्षाविशारदै: । तस्मिन् हि ततृपुर्देवास्तते यज्ञे महर्षिभि:,मन्त्रशिक्षामें निपुण महर्षियोंद्वारा विस्तारपूर्वक किये जानेवाले उस यज्ञमें इडा (मन्त्र- पाठ एवं स्तुति), घृतहोम तथा तिल आदि शाकल्य पदार्थोंकी आहुतियोंसे देवतालोग तृप्त हो गये
মন্ত্রশিক্ষায় পারদর্শী মহর্ষিদের দ্বারা বিধিপূর্বক বিস্তারে সম্পন্ন সেই যজ্ঞে ইড়া (মন্ত্রপাঠ ও স্তব), ঘৃতাহুতি এবং নানাবিধ আহুতির দ্বারা দেবতারা সম্পূর্ণ তৃপ্ত হলেন।
Verse 19
यथा देवास्तथा विप्रा दक्षिणान्नमहा धनै: । ततृपुः सर्ववर्णाश्व॒ तस्मिन् यज्ञे मुदान्विता:,जिस प्रकार देवता तृप्त हुए उसी प्रकार दक्षिणामें अन्न और महान् धन पाकर ब्राह्मण भी तृप्त हो गये। अधिक क्या कहा जाय, उस यज्ञमें सभी वर्णके लोग बड़े प्रसन्न थे, सबको पूर्ण तृप्ति मिली थी
যেমন দেবতারা তৃপ্ত হলেন, তেমনই ব্রাহ্মণরাও দক্ষিণায় অন্ন ও মহাধন পেয়ে তৃপ্ত হলেন। বস্তুত, সেই যজ্ঞে সকল বর্ণের লোক আনন্দে পরিপূর্ণ ছিল; প্রত্যেকে সম্পূর্ণ সন্তোষ লাভ করেছিল।
Verse 34
इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत राजस्यपर्वमें निमन्त्रित राजाओंका आगमनविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত রাজসূয়পর্বে আমন্ত্রিত রাজাদের আগমন-বিষয়ক চৌত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 35
इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि राजसूयपर्वणि यज्ञकरणे पज्चत्रिंशो डध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের রাজসূয়পর্বে যজ্ঞ-সম্পাদন বিষয়ক পঁয়ত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 126
यज्ञमित्येव राजान: स्पर्धमाना ददुर्धनम् प्रत्येक राजा बहुसंख्यक रत्नोंकी भेंट देकर धर्मराज युधिष्ठिरके धनकी वृद्धि करने लगा। सभी राजा यह होड़ लगाकर धन दे रहे थे कि कुरुनन्दन युधिष्ठिर किसी प्रकार मेरे ही दिये हुए रत्नोंके दानसे अपना यज्ञ सम्पूर्ण करें
‘যজ্ঞ, যজ্ঞ’—এই নামেই রাজারা প্রতিযোগিতায় নেমে ধন দান করতে লাগলেন। প্রত্যেক রাজা অসংখ্য রত্ন উপহার দিয়ে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের ধনভাণ্ডার বৃদ্ধি করতে থাকলেন। সকল রাজাই প্রতিদ্বন্দ্বিতায় ধন দিচ্ছিলেন—যেন কুরু-নন্দন যুধিষ্ঠির কোনোভাবে আমারই প্রদত্ত রত্নদানে নিজের যজ্ঞ সম্পূর্ণ করেন।
The dilemma is whether a public insult in a formal assembly should be met with conciliatory tolerance (to preserve decorum) or with firm correction (to protect dharma, protocol, and the legitimacy of collective honor).
Public institutions are sustained by disciplined speech and calibrated authority: patience is virtuous, but legitimizing baseless harshness corrodes dharma; honor is framed as guṇa- and order-based rather than merely personal or factional.
No explicit phalaśruti appears in this excerpt; the meta-function is doctrinal and institutional—establishing a normative rationale for precedence, reverence, and corrective speech within the sabhā.