Adhyaya 28
Sabha ParvaAdhyaya 2823 Versesपाण्डव-पक्ष के लिए निर्णायक रूप से अनुकूल—उत्तर दिशा में सतत विजय और कर-संग्रह।

Adhyaya 28

सहदेव-दक्षिण-दिग्विजयः — Sahadeva’s Southern Conquest and the Māhiṣmatī–Agni Encounter

Upa-parva: Digvijaya (Sahadeva’s Southern Campaign) — Tribute Consolidation for the Rājasūya

Chapter 28 (Book 2, Sabhā-parva) narrates Sahadeva’s southward expedition after being honored by Yudhiṣṭhira. He subdues multiple rulers and regions, converting them into tributaries and collecting wealth and gems, then advances toward the Narmadā and the city of Māhiṣmatī. There he confronts an unusual constraint: Agni (Havyavāhana) is described as residing in Māhiṣmatī and acting as a protective force due to an earlier episode involving King Nīla, where Agni—once restrained and then appeased—granted a boon affecting the city’s security and social conditions. When Sahadeva’s forces become alarmed by the fiery phenomenon, Sahadeva remains steady, performs purification, and addresses Agni with formal praise, identifying Agni as the mouth of the gods and the carrier of oblations, and requesting that the sacrificial purpose not be obstructed. Agni, satisfied, declares he understands Sahadeva’s and Dharmasuta’s intent, will protect Māhiṣmatī for Nīla’s lineage, and will still enable Sahadeva’s objective. Nīla then approaches with honor; Sahadeva proceeds, continuing to bring further polities under submission—some via envoys—before returning with tribute and reporting completion to Yudhiṣṭhira.

Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय को सुनाते हैं—उत्तर दिशा की ओर बढ़ा पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन श्वेतपर्वत-प्रदेश की ओर अग्रसर होता है, जहाँ दुर्गम भूगोल और अनजाने जनपद उसकी परीक्षा लेने को खड़े हैं। → अर्जुन क्षत्रिय-समूहों और दस्यु-समूहों के ‘महता संनिपात’ से टकराता है—ऐसा संग्राम जो ‘क्षत्रियान्तकरेण’ कहा गया है। विजय के बाद वह किम्पुरुष-देश, फिर गुह्यकों द्वारा रक्षित ‘हाटक’ नामक देश की ओर बढ़ता है; द्वारपालों का आगमन संकेत देता है कि आगे का मार्ग केवल शौर्य नहीं, मर्यादा और अनुमति भी माँगता है। → हाटक-देश के द्वारपाल महाबली होकर भी हर्ष से अर्जुन का स्वागत करते हैं और कहते हैं—‘यदि युद्ध के सिवा कुछ और करना चाहते हो, बताओ; हम तुम्हारे वचन से करेंगे।’ यह क्षण अर्जुन की कीर्ति का शिखर है: शत्रु-भूमि में भी उसकी प्रतिष्ठा ऐसी कि द्वारपाल स्वयं सेवा-भाव से प्रस्तुत हैं। → अर्जुन उत्तर दिशा में अनेक संग्राम कर विजयी होता है और विशाल चतुरंगिणी सेना सहित इन्द्रप्रस्थ (शक्रप्रस्थ) लौट आता है। वह समस्त धन-सम्पदा (सवाहन) धर्मराज युधिष्ठिर को समर्पित करता है और आज्ञा लेकर अपने गृह को जाता है—दिग्विजय का फल राजसूय-यज्ञ की तैयारी में जुड़ जाता है। → राजसूय के लिए संचित वैभव और बढ़ती प्रतिष्ठा आगे सभागृह-राजनीति, ईर्ष्या और आने वाले संकटों की भूमिका रचती है।

Shlokas

Verse 1

अपना छा | अ्--#र+ अष्टाविशोश् ध्याय: किम्पुरुष, हाटक तथा उत्तरकुरुपर विजय प्राप्त करके अर्जुनका इन्द्रप्रस्थ लौटना वैशम्पायन उवाच स श्वेतपर्वतं वीर: समतिक्रम्य वीर्यवान्‌ । देशं किम्पुरुषावासं द्रुमपुत्रेण रक्षितम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर पराक्रमी वीर पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन धवलगिरिको लाँघकर द्रुमपुत्रके द्वारा सुरक्षित किम्पुरुषदेशमें गये, जहाँ किन्नरोंका निवास था। वहाँ क्षत्रियोंका विनाश करनेवाले भारी संग्रामके द्वारा उन्होंने उस देशको जीत लिया और कर देते रहनेकी शर्तपर उस राजाको पुनः उसी राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! তখন পরাক্রমশালী বীর অর্জুন শ্বেতপর্বত অতিক্রম করে দ্রুমপুত্র-রক্ষিত কিম্পুরুষ-নিবাস দেশে প্রবেশ করলেন।

Verse 2

महता संनिपातेन क्षत्रियान्तकरेण ह । अजयत्‌ पाण्डवश्रेष्ठ: करे चैनं न्‍नयवेशयत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर पराक्रमी वीर पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन धवलगिरिको लाँघकर द्रुमपुत्रके द्वारा सुरक्षित किम्पुरुषदेशमें गये, जहाँ किन्नरोंका निवास था। वहाँ क्षत्रियोंका विनाश करनेवाले भारी संग्रामके द्वारा उन्होंने उस देशको जीत लिया और कर देते रहनेकी शर्तपर उस राजाको पुनः उसी राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया

মহাসৈন্যসমাবেশে ও ক্ষত্রিয়বিনাশক ভয়ংকর যুদ্ধে পাণ্ডবশ্রেষ্ঠ তাঁকে জয় করলেন এবং তাঁকে করদানে নিয়োজিত করলেন।

Verse 3

त॑ जित्वा हाटकं नाम देशं गुह्मुकरक्षितम्‌ । पाकशासनिरव्यग्र: सहसैन्य: समासदत्‌,किन्नरदेशको जीतकर शान्तचित्त इन्द्रकुमारने सेनाके साथ गुह्लुकोंद्वारा सुरक्षित हाटकदेशपर हमला किया

সে দেশ জয় করে শান্তচিত্ত ইন্দ্রপুত্র গুহ্মুকদের দ্বারা রক্ষিত ‘হাটক’ নামক অঞ্চলের দিকে সেনাসহ অগ্রসর হলেন।

Verse 4

तांस्तु सान्त्वेन निर्जित्य मानसं सर उत्तमम्‌ | ऋषिकुलल्‍्यास्तथा सर्वा ददर्श कुरुनन्दन:,और उन गुह्कोंको सामनीतिसे समझा-बुझाकर ही वशमें कर लेनेके पश्चात्‌ वे परम उत्तम मानसरोवरपर गये। वहाँ कुरुनन्दन अर्जुनने समस्त ऋषि-कुल्याओं (ऋषियोंके नामसे प्रसिद्ध जल-स्रोतों)-का दर्शन किया

কিন্তু তাদের সান্ত্বনা ও সদুপদেশে বশ করে কুরুনন্দন অর্জুন পরম উৎকৃষ্ট মানস সরোবরের দিকে গেলেন এবং সেখানে সকল ঋষিকুল্যা দর্শন করলেন।

Verse 5

सरो मानसमासाद्य हाटकानभित: प्रभु: । गन्धर्वरक्षितं देशमजयत्‌ पाण्डवस्तत:,मानसरोवरपर पहुँचकर शक्तिशाली पाण्डुकुमारने हाटकदेशके निकटवर्ती गन्धर्वोद्वारा सुरक्षित प्रदेशपर भी अधिकार प्राप्त कर लिया

মানসসরোবরের নিকটে উপস্থিত হয়ে পরাক্রমশালী পাণ্ডব হাটক-সংলগ্ন গন্ধর্ব-রক্ষিত দেশও জয় করে বশে আনলেন।

Verse 6

तत्र तित्तिरिकल्माषान्‌ मण्डूकाख्यान्‌ हयोत्तमान्‌ | लेभे स करमत्यन्तं गन्धर्वनगरात्‌ तदा,वहाँ गन्धर्वनगरसे उन्होंने उस समय करके रूपमें तित्तिरे, कल्माष और मण्डूक नामवाले बहुत-से उत्तम घोड़े प्राप्त किये

সেখানে গন্ধর্বনগর থেকে তিনি কররূপে তিত্তিরি, কল্মাষ ও মণ্ডূক নামে বহু উৎকৃষ্ট অশ্ব প্রচুর পরিমাণে লাভ করলেন।

Verse 7

(हेमकूटमथासाद्य न्यविशत्‌ फाल्गुनस्तथा । त॑ हेमकूटं राजेन्द्र समतिक्रम्य पाण्डव: ।। हरिवर्ष विवेशाथ सैन्येन महता55वृतः । तत्र पार्थो दरदर्शाथ बहूनिह मनोरमान्‌ ।। नगरांश्ष वनांश्वैव नदीश्ष विमलोदका: । तत्पश्चात्‌ अर्जुनने हेमकूट पर्वतपर जाकर पड़ाव डाला। राजेन्द्र! फिर हेमकूटको भी लाँघकर वे पाण्डुनन्दन पार्थ अपनी विशाल सेनाके साथ हरिवर्षमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने बहुत-से मनोरम नगर, सुन्दर वन तथा निर्मल जलसे भरी हुई नदियाँ देखीं। पुरुषान्‌ देवकल्पांश्व नारीश्व प्रियदर्शना: ।। तान्‌ सर्वस्तित्र दृष्टवाथ मुदा युक्तो धनंजय: । वहाँके पुरुष देवताओंके समान तेजस्वी थे। स्त्रियाँ भी परम सुन्दरी थीं। उन सबका अवलोकन करके अर्जुनको वहाँ बड़ी प्रसन्नता हुई। वशे चक्रेडथ रत्नानि लेभे च सुबहूनि च ।। ततो निषधमासाद्य गिरिस्थानजयत प्रभु: । अथ राजजन्नतिक्रम्य निषधं शैलमायतम्‌ ।। विवेश मध्यमं वर्ष पार्थो दिव्यमिलावृतम्‌ । उन्होंने हरिवर्षको अपने अधीन कर लिया और वहाँसे बहुतेरे रत्न प्राप्त किये। इसके बाद निषधपर्वतपर जाकर शक्तिशाली अर्जुनने वहाँके निवासियोंको पराजित किया। तदनन्तर विशाल निषधपर्वतको लाँघकर वे दिव्य इलावृतवर्षमें पहुँचे, जो जम्बूद्वीपका मध्यवर्ती भूभाग है। तत्र देवोपमान्‌ दिव्यान्‌ पुरुषान्‌ देवदर्शनान्‌ ।। अदृष्टपूर्वान्‌ सुभगान्‌ स ददर्श धनंजय: । वहाँ अर्जुनने देवताओं-जैसे दिखायी देनेवाले देवोपम शक्तिशाली दिव्य पुरुष देखे। वे सब-के-सब अत्यन्त सौभाग्यशाली और अद्भुत थे। उससे पहले अर्जुनने कभी वैसे दिव्य पुरुष नहीं देखे थे। सदनानि च शुभ्राणि नारी क्षाप्सरसंनिभा: ।। दृष्टवा तानजयद्‌ू रम्यान्‌ स तैश्न ददृशे तदा । वहाँके भवन अत्यन्त उज्ज्वल और भव्य थे तथा नारियाँ अप्सराओंके समान प्रतीत होती थीं। अर्जुनने वहाँके रमणीय स्त्री-पुरुषोंको देखा। इनपर भी वहाँके लोगोंकी दृष्टि पड़ी। जित्वा च तान्‌ महाभागान्‌ करे च विनिवेश्य सः ।। रत्नान्यादाय दिव्यानि भूषणैर्वसनै: सह । उदीचीमथ राजेन्द्र ययौ पार्थो मुदान्वित: ।। तत्पश्चात्‌ उस देशके निवासियोंको अर्जुनने युद्धमें जीत लिया, जीतकर उनपर कर लगाया और फिर उन्हीं बड़भागियोंको वहाँके राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया। फिर वस्त्रों और आभूषणोंके साथ दिव्य रत्नोंकी भेंट लेकर अर्जुन बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँसे उत्तर दिशाकी ओर बढ़ गये। स ददर्श महामेरुं शिखराणां प्रभुं महत्‌ । त॑ काज्चनमयं दिव्यं चतुर्वर्ण दुरासदम्‌ ।। आयतं शतसाहस्रं योजनानां तु सुस्थितम्‌ । ज्वलन्तमचल मेरुं तेजोराशिमनुत्तमम्‌ ।। आक्षिपन्तं प्रभां भानो: स्वशृद्जैः काज्जनोज्ज्वलै: । काउ्चनाभरणं दिव्यं देवगन्धर्वसेवितम्‌ ।। नित्यपुष्पफलोपेतं सिद्धचारणसेवितम्‌ । अप्रमेयमनाधृष्यमधर्मबहुलैर्जनै: ।। आगे जाकर उन्हें पर्वतोंके स्वामी गिरिप्रवर महामेरुका दर्शन हुआ, जो दिव्य तथा सुवर्णमय है। उसमें चार प्रकारके रंग दिखायी पड़ते हैं। वहाँतक पहुँचना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है। उसकी लम्बाई एक लाख योजन है। वह परम उत्तम मेरुपर्वत महान्‌ तेजके पुंज-सा जगमगाता रहता है और अपने सुवर्णमय कान्तिमान्‌ शिखरोंद्वारा सूर्यकी प्रभाको तिरस्कृत करता है। वह सुवर्णभूषित दिव्य पर्वत देवताओं तथा गन्धर्वोंसे सेवित है। सिद्ध और चारण भी वहाँ नित्य निवास करते हैं। उस पर्वतपर सदा फल और फूलोंकी बहुतायत रहती है। उसकी ऊँचाईका कोई माप नहीं है। अधर्मपरायण मनुष्य उस पर्वतका स्पर्श नहीं कर सकते। व्यालैराचरितं घोरैर्दिव्यौषधिविदीपितम्‌ । स्वर्गमावृत्य तिष्ठन्तमुच्छायेण महागिरिम्‌ ।। अगम्यं मनसाप्यन्यैर्नदीवृक्षसमन्वितम्‌ | नानाविहगसड्घैश्न नादितं सुमनोहरै: ।। त॑ दृष्टवा फाल्गुनो मेरुं प्रीतिमानभवत्‌ तदा | बड़े भयंकर सर्प वहाँ विचरण करते हैं। दिव्य ओषधियाँ उस पर्वतको प्रकाशित करती रहती हैं। महागिरि मेरु ऊँचाईद्वारा स्वर्गलोकको भी घेरकर खड़ा है। दूसरे मनुष्य मनसे भी वहाँ नहीं पहुँच सकते। कितनी ही नदियाँ और वृक्ष उस शैल-शिखरकी शोभा बढ़ाते हैं। भाँति-भाँतिके मनोहर पक्षी वहाँ कलरव करते रहते हैं। ऐसे मनोहर मेरुगिरिको देखकर उस समय अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई। मेरोरिलावृतं वर्ष सर्वतः परिमण्डलम्‌ ।। मेरोस्तु दक्षिणे पाश्वे जम्बूर्नाम वनस्पति: । नित्यपुष्पफलोपेत: सिद्धचारणसेवित: ।। मेरुके चारों ओर मण्डलाकार इलावृतवर्ष बसा हुआ है। मेरुके दक्षिण पार्श्वमें जम्बू नामका एक वृक्ष है, जो सदा फल और फूलोंसे भरा रहता है। सिद्ध और चारण उस वृक्षका सेवन करते हैं। आस्वर्गमुच्छिता राजन्‌ तस्य शाखा वनस्पते: । यस्य नाम्ना व्विदं द्वीपं जम्बूद्वीपमिति श्रुतम्‌ ।। राजन! उक्त जम्बूवृक्षकी शाखा ऊँचाईमें स्वर्गगलोकतक फैली हुई है। उसीके नामपर इस द्वीपको जम्बूद्वीप कहते हैं। तां च जम्बूं दरदर्शाथ सव्यसाची परंतप: । तौ दृष्टवाप्रतिमौ लोके जम्बूं मेरुं च संस्थितौ ।। प्रीतिमानभवद्‌ राजन्‌ सर्वतः स विलोकयन्‌ । तत्र लेभे ततो जिष्णु: सिद्धीर्दिव्यैश्न चारणै: ।। रत्नानि बहुसाहसंत्र॑ वस्त्राण्याभरणानि च । अन्यानि च महाहणि तत्र लब्ध्वार्जुनस्तदा ।। आमन्त्रयित्वा तान्‌ सर्वान्‌ यज्ञमुद्दिश्य वै गुरो: । अथादाय बहून्‌ रत्नान्‌ गमनायोपचक्रमे ।। शत्रुओंको संताप देनेवाले सव्यसाची अर्जुनने उस जम्बूवृक्षको देखा। जम्बू और मेरुगिरि दोनों ही इस जगतमें अनुपम हैं। उन्हें देखकर अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई। राजन! वहाँ सब ओर दृष्टिपात करते हुए अर्जुनने सिद्धों और दिव्य चारणोंसे कई सहस्र रत्न, वस्त्र, आभूषण तथा अन्य बहुत-सी बहुमूल्य वस्तुएँ प्राप्त कीं। तदनन्तर उन सबसे विदा ले बड़े भाईके यज्ञके उद्देश्यसे बहुत-से रत्नोंका संग्रह करके वे वहाँसे जानेको उद्यत हुए। मेरुं प्रदक्षिणं कृत्वा पर्वतप्रवरं प्रभु: ययौ जम्बूनदीतीरे नदीं श्रेष्ठां विलोकयन्‌ ।। सतां मनोरमां दिव्यां जम्बूस्वादुरसावहाम्‌ | पर्वतश्रेष्ठ मेरको अपने दाहिने करके अर्जुन जम्बूनदीके तटपर गये। वे उस श्रेष्ठ सरिताकी शोभा देखना चाहते थे। वह मनोरम दिव्य नदी जलके रूपमें जम्बूवृक्षके फलोंका स्वादिष्ट रस बहाती थी ।। हैमपक्षिगणैर्जुष्टां सीवर्णजनलजाकुलाम्‌ ।। हैमपड़कां हैमजलां शुभां सौवर्णवालुकाम्‌ । सुनहरे पंखोंवाले पक्षी उसका सेवन करते थे। वह नदी सुवर्णमय कमलोंसे भरी हुई थी। उसकी कीचड़ भी स्वर्णमय थी। उसके जलसे भी सुवर्णमयी आभा छिटक रही थी। उस मंगलमयी नदीकी बालुका भी सुवर्णके चूर्ण-सी शोभा पाती थी। क्वचित्‌ सौवर्णपद्मैश्व संकुलां हेमपुष्पकै: ।। क्वचित सुपुष्पितै: कीर्णा सुवर्णकुमुदोत्पलै: । क्वचित्‌ तीररुहै: कीर्णा हैमवृक्षै: सुपुष्पितै: ।। कहीं-कहीं सुवर्णमय कमलों तथा स्वर्णमय पुष्पोंसे वह व्याप्त थी। कहीं सुन्दर खिले हुए सुवर्णमय कुमुद और उत्पल छाये हुए थे। कहीं उस नदीके तटपर सुन्दर फूलोंसे भरे हुए स्वर्णमय वृक्ष सब ओर फैले हुए थे। तीर्थश्व रुक्मसोपानै: सर्वतः संकुलां शुभाम्‌ । विमलैर्मणिजालैश्व नृत्यगीतरवैर्युताम्‌ ।। उस सुन्दर सरिताके घाटोंपर सब ओर सोनेकी सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। निर्मल मणियोंके समूह उसकी शोभा बढ़ाते थे। नृत्य और गीतके मधुर शब्द उस प्रदेशको मुखरित कर रहे थे। दीप्तैहेमवितानैश्न समन्ताच्छोभितां शुभाम्‌ तथाविधां नदी दृष्टवा पार्थस्तां प्रशशंस ह ।। अदृष्टपूर्वा राजेन्द्र दृष्टवा हर्षमवाप च । उसके दोनों तटोंपर सुनहरे और चमकीले चँदोवे तने थे, जिनके कारण जम्बूनदीकी बड़ी शोभा हो रही थी। राजेन्द्र! ऐसी अदृष्टपूर्व नदीका दर्शन करके अर्जुनने उसकी भूरि- भूरि प्रशंसा की और वे मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। दर्शनीयान्‌ नदीतीरे पुरुषान्‌ सुमनोहरान्‌ ।। तान्‌ नदीसलिलाहारान्‌ सदारानमरोपमान्‌ | नित्यं सुखमुदा युक्तान्‌ सर्वालंकारशोभितान्‌ ।। उस नदीके तटपर बहुत-से देवोपम पुरुष अपनी स्त्रियोंके साथ विचर रहे थे। उनका सौन्दर्य देखने ही योग्य था। वे सबके मनको मोह लेते थे। जम्बूनदीका जल ही उनका आहार था। वे सदा सुख और आनन्दमें निमग्न रहनेवाले तथा सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थे। तेभ्यो बहूनि रत्नानि तदा लेभे धनंजय: । दिव्यजाम्बूनदं हेमभूषणानि च पेशलम्‌ ।। लब्ध्वा तान्‌ दुर्लभान्‌ पार्थ: प्रतीचीं प्रययौं दिशम्‌ । उस समय अर्जुनने उनसे भी नाना प्रकारके रत्न प्राप्त किये। दिव्य जाम्बूनद नामक सुवर्ण और भाँति-भाँतिके आभूषण आदि दुर्लभ वस्तुएँ पाकर अर्जुन वहाँसे पश्चिम दिशाकी ओर चल दिये। नागानां रक्षितं देशमजयच्चार्जुनस्तत: ।। ततो गत्वा महाराज वारुणीं पाकशासनि: । गन्धमादनमासाद्य तत्रस्थानजयत्‌ प्रभु: ।। त॑ गन्धमादन राजन्नतिक्रम्य ततोडर्जुन: । केतुमालं विवेशाथ वर्ष रत्नसमन्वितम्‌ । सेवितं देवकल्पैश्न नारीभि: प्रियदर्शनै: ।। उधर जाकर अर्जुनने नागोंद्वारा सुरक्षित प्रदेशपर विजय पायी। महाराज! वहाँसे और पश्चिम जाकर शक्तिशाली अर्जुन गन्धमादन पर्वतपर पहुँच गये और वहाँके रहनेवालोंको जीतकर अपने अधीन बना लिया। राजन! इस प्रकार गन्धमादन पर्वतको लाँधघकर अर्जुन रत्नोंसे सम्पन्न केतुमालवर्षमें गये, जो देवोपम पुरुषों और सुन्दरी स्त्रियोंकी निवासभूमि है। त॑ जित्वा चार्जुनो राजन्‌ करे च विनिवेश्य च । आह्त्य तत्र रत्नानि दुर्लभानि तथार्जुन: ।। पुनश्न परिवृत्याथ मध्यं देशमिलावृतम्‌ । राजन्‌! उस वर्षको जीतकर अर्जुनने उसे कर देनेवाला बना दिया और वहाँसे दुर्लभ रत्न लेकर वे पुनः मध्यवर्ती इलावृतवर्षमें लौट आये। गत्वा प्राचीं दिशं राजन्‌ सव्यसाची परंतप: ।। मेरुमन्दरयोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम्‌ । ये ते कीचकवेणूनां छायां रम्यामुपासते ।। खशाज्झपषांश्व नद्योतान्‌ प्रधघसान्‌ दीर्घवेणिकान्‌ | पशुपांश्व कुलिन्दांश्व तड़णान्‌ परतड्रणान्‌ ।। रत्नान्यादाय सर्वेभ्यो माल्यवन्तं ततो ययौ । त॑ माल्यवन्तं शैलेन्द्रे समतिक्रम्य पाण्डव: ।। भद्राश्व॑ प्रविवेशाथ वर्ष स्वर्गोपमं शुभम्‌ | तदनन्तर शत्रुदमन सव्यसाची अर्जुनने पूर्व दिशामें प्रस्थान किया। मेरे और मन्दराचलके बीच शैलोदा नदीके दोनों तटोंपर जो लोग कीचक और वेणु नामक बाँसोंकी रमणीय छायाका आश्रय लेकर रहते हैं, उन खश, झष, नद्योत, प्रघस, दीर्घवेणिक, पशुप, कुलिन्द, तंगण तथा परतंगण आदि जातियोंको हराकर उन सबसे रत्नोंकी भेंट ले अर्जुन माल्यवान्‌ पर्वतपर गये। तत्पश्चात्‌ गिरिराज माल्यवानको भी लाँधकर उन पाण्डुकुमारने भद्राश्ववर्षमें प्रवेश किया, जो स्वर्गके समान सुन्दर है। तत्रामरोपमान्‌ रम्यान्‌ पुरुषान्‌ सुखसंयुतान्‌ ।। जित्वा तान्‌ स्ववशे कृत्वा करे च विनिवेश्य च | आद्त्य सर्वरत्नानि असंख्यानि ततस्तत: ।। नील॑ नाम गिरिं गत्वा तत्रस्थानजयत प्रभु: । उस देशमें देवताओंके समान सुन्दर और सुखी पुरुष निवास करते थे। अर्जुनने उन सबको जीतकर अपने अधीन कर लिया और उनपर कर लगा दिया। इस प्रकार इधर- उधरसे असंख्य रत्नोंका संग्रह करके शक्तिशाली अर्जुनने नीलगिरिकी यात्रा की और वहाँके निवासियोंको पराजित किया। ततो जिष्णुरतिक्रम्य पर्वत॑ं नीलमायतम्‌ ।। विवेश रम्यकं वर्ष संकीर्ण मिथुनै: शुभै: । त॑ देशमथ जित्वा च करे च विनिवेश्य च ।। अजयच्चापि बीभत्सुर्देशं गुह्मुकरक्षितम्‌ । तत्र लेभे च राजेन्द्र सौवर्णान्‌ मृगपक्षिण: ।। अगृह्लवाद्‌ यज्ञभूत्यर्थ रमणीयान्‌ मनोरमान्‌ | तदनन्तर विशाल नीलगिरिको भी लाँघकर सुन्दर नर-नारियोंसे भरे हुए रम्यकवर्षमें उन्होंने प्रवेश किया। उस देशको भी जीतकर अर्जुनने वहाँके निवासियोंपर कर लगा दिया। तत्पश्चात्‌ गुह्ुकोंद्वारा सुरक्षित प्रदेशको जीतकर अपने अधिकारमें कर लिया। राजेन्द्र! वहाँ उन्हें सोनेके मृणग और पक्षी उपलब्ध हुए, जो देखनेमें बड़े ही रमणीय और मनोरम थे। उन्होंने यज्ञ-वैभवकी समृद्धिके लिये उन मृगों और पक्षियोंको ग्रहण कर लिया। अन्यानि लब्ध्वा रत्नानि पाण्डवो5थ महाबल: ।। गन्धर्वरक्षितं देशमजयत्‌ सगणं तदा । तत्र रत्नानि दिव्यानि लब्ध्वा राजन्नथार्जुन: ।। श्वेतपर्वतमासाद्य जित्वा पर्वतवासिन: । स श्वेतं पर्वत॑ं राजन्‌ समतिक्रम्य पाण्डव: ।। वर्ष हिरण्यकं॑ नाम विवेशाथ महीपते । तदनन्तर महाबली पाण्डुनन्दन अन्य बहुत-से रत्न लेकर गन्धर्वोद्वारा सुरक्षित प्रदेशमें गये और गन्धर्वगणोंसहित उस देशपर अधिकार जमा लिया। राजन! वहाँ भी अर्जुनको बहुत-से दिव्य रत्न प्राप्त हुए। तदनन्तर उन्होंने श्वेत पर्वतपर जाकर वहाँके निवासियोंको जीता। फिर उस पर्वतको लाँघकर पाण्डुकुमार अर्जुनने हिरण्यकवर्षमें प्रवेश किया। स तु देशेषु रम्येषु गन्तुं तत्रोपचक्रमे ।। मध्ये प्रासादवृन्देषु नक्षत्राणां शशी यथा । महाराज! वहाँ पहुँचकर वे उस देशके रमणीय प्रदेशोंमें विचरने लगे। बड़े-बड़े महलोंकी पंक्तियोंमें भ्रमण करते हुए श्वेताश्व अर्जुन नक्षत्रोंक बीच चन्द्रमाके समान सुशोभित होते थे। महापथेषु राजेन्द्र सर्वतो यान्तमर्जुनम्‌ ।। प्रासादवरशूड्रस्था: परया वीर्यशो भया । ददृशुस्ता: स्त्रिय: सर्वा: पार्थमात्मयशस्करम्‌ ।। त॑ं कलापधरं शूरं सरथं सानुगं प्रभुम्‌ । सवर्मसुकिरीटं वै संनद्धं सपरिच्छदम्‌ ।। सुकुमारं महासत्त्वं तेजोराशिमनुत्तमम्‌ | शक्रोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम्‌ ।। पश्यन्तः स्त्रीगणास्तत्र शक्तिपार्णिं सम मेनिरे राजेन्द्र! जब अर्जुन उत्तम बल और शोभासे सम्पन्न हो हिरण्यकवर्षकी विशाल सड़कोंपर चलते थे, उस समय प्रासादशिखरोंपर खड़ी हुई वहाँकी सुन्दरी स्त्रियाँ उनका दर्शन करती थीं। कुन्तीनन्दन अर्जुन अपने यशको बढ़ानेवाले थे। उन्होंने आभूषण धारण कर रखा था। वे शूरवीर, रथयुक्त, सेवकोंसे सम्पन्न और शक्तिशाली थे। उनके अंगोंमें कवच और मस्तकपर सुन्दर किरीट शोभा दे रहा था। वे कमर कसकर युद्धके लिये तैयार थे और सब प्रकारकी आवश्यक सामग्री उनके साथ थी। वे सुकुमार, अत्यन्त धैर्यवान्‌, तेजके पुंज परम उत्तम, इन्द्र-तुल्य पराक्रमी, शत्रुहन्ता तथा शत्रुओंके गजराजोंकी गतिको रोक देनेवाले थे। उन्हें देखकर वहाँकी स्त्रियोंने यही अनुमान लगाया कि इस वीर पुरुषके रूपमें साक्षात्‌ शक्तिधारी कार्तिकेय पधारे हैं। अयं स पुरुषव्याप्रो रणे5द्भुतपराक्रम: ।। अस्य बाहुबलं प्राप्य न भवन्त्यसुहृदूगणा: । वे आपसमें इस प्रकार बातें करने लगीं--'सखियो! ये जो पुरुषसिंह दिखायी दे रहे हैं, संग्राममें इनका पराक्रम अद्भुत है। इनके बाहुबलका आक्रमण होनेपर शत्रुओंके समुदाय अपना अस्तित्व खो बैठते हैं।' इति वाचो ब्रुवन्त्यस्ता: स्त्रिय: प्रेमणा धनंजयम्‌ ।। तुष्टवुः पुष्पवृष्टिं च ससृजुस्तस्य मूर्थनि । इस प्रकारकी बातें करती हुई स्त्रियाँ बड़े प्रेमसे अर्जुनकी ओर देखकर उनके गुण गातीं और उनके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा करती थीं। दृष्टवा ते तु मुदा युक्ता: कौतूहलसमन्विता: ।। रल्नैविभूषणैश्वैव अभ्यवर्षन्त पाण्डवम्‌ । वहाँके सभी निवासी बड़ी प्रसन्नताके साथ कौतूहलवश उन्हें देखते और उनके निकट रत्नों तथा आभूषणोंकी वर्षा करते थे। अथ जित्वा समस्तांस्‍्तान्‌ करे च विनिवेश्य च ।। मणिहेमप्रवालानि रत्नान्याभरणानि च । एतानि लब्ध्वा पार्थोडपि शृज्भवन्तं गिरिं ययौ ।। शुज्भवन्तं च कौन्तेय: समतिक्रम्य फाल्गुन: ।।) उत्तरं कुरुवर्ष तु स समासाद्य पाण्डव: । इयेष जेतुं तं देश पाकशासननन्दन:,उन सबको जीतकर तथा उनके ऊपर कर लगाकर वहाँसे मणि, सुवर्ण, मूँगे, रत्न तथा आभूषण ले अर्जुन शुंगवान्‌ पर्वतपर चले गये। वहाँसे आगे बढ़कर पाकशासनपुत्र पाण्डव अर्जुनने उत्तर कुरुवर्षमें पहुँचकर उस देशको जीतनेका विचार किया

ফাল্গুন অর্জুন হেমকূট পর্বতে পৌঁছে শিবির স্থাপন করলেন। তারপর, হে রাজেন্দ্র, হেমকূট অতিক্রম করে তিনি মহাসেনায় পরিবৃত হয়ে হরিবর্ষে প্রবেশ করলেন। সেখানে পার্থ দেখলেন মনোরম নগর, সুন্দর বন ও নির্মল জলের নদী; দেবতুল্য পুরুষ এবং প্রিয়দর্শনা নারী। সব দেখে ধনঞ্জয় আনন্দিত হলেন, দেশকে বশে আনলেন এবং বহু রত্ন লাভ করলেন। পরে নিষধ পর্বতে গিয়ে সেখানকার অধিবাসীদের জয় করলেন; নিষধ অতিক্রম করে মধ্যবর্তী দিব্য ইলাবৃতবর্ষে প্রবেশ করলেন—যেখানে অদৃষ্টপূর্ব দেবোপম পুরুষ, শুভ্র প্রাসাদ ও অপ্সরাসদৃশ নারী ছিল। তাদের জয় করে কর স্থাপন করে দিব্য রত্ন নিয়ে তিনি উত্তরদিকে অগ্রসর হলেন। অগ্রে তিনি স্বর্ণময়, দুরারোহ, তেজোরাশি মহামেরু দর্শন করলেন—যা নিত্য পুষ্প-ফলে সমৃদ্ধ, সিদ্ধ-চারণসেবিত, ভয়ংকর ব্যালে আচারিত ও দিব্য ঔষধিতে দীপ্ত। মেরুর চারদিকে মণ্ডলাকারে ইলাবৃতবর্ষ; দক্ষিণে জম্বু নামক শ্রেষ্ঠ বৃক্ষ, যার নামেই জম্বুদ্বীপ প্রসিদ্ধ। জম্বু ও মেরু দেখে অর্জুন প্রীত হলেন এবং সিদ্ধ-চারণদের নিকট থেকে সহস্র সহস্র রত্ন, বস্ত্র ও অলংকার লাভ করলেন। মেরু প্রদক্ষিণ করে তিনি জম্বুনদীর তীরে গেলেন—দিব্য, মনোরম, পুণ্য, জম্বুফল-রসস্বাদবাহী; স্বর্ণপদ্মে সঙ্কুল, স্বর্ণবালুকায় শোভিত, রুক্মসোপান-তীর্থ ও মণিজালে বিভূষিত। তা দেখে পার্থ বিস্মিত হয়ে প্রশংসা করলেন এবং সেখানকার লোকদের থেকে জাম্বূনদ স্বর্ণসহ রত্ন পেলেন। এরপর তিনি নাগরক্ষিত দেশ, গন্ধমাদন, রত্নসমৃদ্ধ কেতুমালবর্ষ জয় করলেন; কর আরোপ করে পুনরায় ইলাবৃতবর্ষে ফিরলেন। পূর্বদিকে গিয়ে বহু জনপদ দমন করে রত্ন নিয়ে মাল্যবান পর্বতে গেলেন; তা অতিক্রম করে স্বর্গোপম ভদ্রাশ্ববর্ষে প্রবেশ করলেন। পরে রম্যকবর্ষ ও গুহ্যকরক্ষিত দেশও জয় করলেন; শ্বেতপর্বতে গিয়ে হিরণ্যকবর্ষে প্রবেশ করলেন। সেখানেও জয় ও কর স্থাপন করে রত্ন সংগ্রহ করে শৃঙ্গবান পর্বতে গিয়ে তা অতিক্রম করে উত্তর কুরুবর্ষে পৌঁছে তাকে জয় করতে উদ্যত হলেন।

Verse 8

तत एन॑ महावीर्य महाकाया महाबला: । द्वारपाला: समासाद्य हृष्टा वचनमन्रुवन्‌,इतनेहीमें महापराक्रमी अर्जुनके पास बहुत-से विशालकाय महाबली द्वारपाल आ पहुँचे और प्रसन्नतापूर्वक बोले--

এমন সময় মহাপরাক্রমী অর্জুনের কাছে বহু বৃহৎকায় মহাবলী দ্বারপাল এসে আনন্দসহকারে কথা বলল।

Verse 9

पार्थ नेदं त्वया शक्‍्यं पुरं जेतुं कथंचन । उपावर्तस्व कल्याण पर्याप्तमिदमच्युत,'पार्थ! इस नगरको तुम किसी तरह जीत नहीं सकते। कल्याणस्वरूप अर्जुन! यहाँसे लौट जाओ। अच्युत! तुम यहाँतक आ गये, यही बहुत हुआ। जो मनुष्य इस नगरमें प्रवेश करता है, निश्चय ही उसकी मृत्यु हो जाती है। वीर! हम तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। यहाँतक आ पहुँचना ही तुम्हारी बहुत बड़ी विजय है

“হে পার্থ, কোনোভাবেই তুমি এই নগর জয় করতে পারবে না। হে কল্যাণময়, ফিরে যাও। হে অচ্যুত, তুমি এতদূর এসেছ—এটাই যথেষ্ট।”

Verse 10

इदं पुरं यः प्रविशेद्‌ ध्रुवं न स भवेन्नर: । प्रीयामहे त्वया वीर पर्याप्तो विजयस्तव,'पार्थ! इस नगरको तुम किसी तरह जीत नहीं सकते। कल्याणस्वरूप अर्जुन! यहाँसे लौट जाओ। अच्युत! तुम यहाँतक आ गये, यही बहुत हुआ। जो मनुष्य इस नगरमें प्रवेश करता है, निश्चय ही उसकी मृत्यु हो जाती है। वीर! हम तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। यहाँतक आ पहुँचना ही तुम्हारी बहुत बड़ी विजय है

বৈশম্পায়ন বললেন—যে এই নগরে প্রবেশ করে, সে নিশ্চিতই জীবিত থাকে না; তার মৃত্যু অবশ্যম্ভাবী। হে বীর, আমরা তোমাতে প্রসন্ন; এতটুকুই যথেষ্ট। এখানে এসে পৌঁছানোই তোমার বিজয়।

Verse 11

नचात्र किंचिज्जेतव्यमर्जुनात्र प्रदृश्यते । उत्तरा: कुरवो होते नात्र युद्ध प्रवर्तते,“अर्जुन! यहाँ कोई जीतनेयोग्य वस्तु नहीं दिखायी देती। यह उत्तर कुरुदेश है। यहाँ युद्ध नहीं होता है। कुन्तीकुमार! इसके भीतर प्रवेश करके भी तुम यहाँ कुछ देख नहीं सकोगे, क्योंकि मानव-शरीरसे यहाँकी कोई वस्तु देखी नहीं जा सकती

বৈশম্পায়ন বললেন—অর্জুন, এখানে জয় করার মতো কিছুই দেখা যায় না। এ উত্তর কুরুদেশ; এখানে যুদ্ধের প্রবৃত্তি ওঠে না।

Verse 12

प्रविष्टो5पि हि कौन्तेय नेह द्रक्ष्यसि किंचन । न हि मानुषदेहेन शक्‍्यमत्राभिवीक्षितुम्‌,“अर्जुन! यहाँ कोई जीतनेयोग्य वस्तु नहीं दिखायी देती। यह उत्तर कुरुदेश है। यहाँ युद्ध नहीं होता है। कुन्तीकुमार! इसके भीतर प्रवेश करके भी तुम यहाँ कुछ देख नहीं सकोगे, क्योंकि मानव-शरीरसे यहाँकी कोई वस्तु देखी नहीं जा सकती

বৈশম্পায়ন বললেন—হে কৌন্তেয়, প্রবেশ করলেও তুমি এখানে কিছুই দেখতে পাবে না; কারণ মানবদেহ দিয়ে এ স্থানের বিষয়গুলি প্রত্যক্ষ করা সম্ভব নয়।

Verse 13

अथेह पुरुषव्याप्र किंचिदन्यच्चिकीर्षसि । तत्‌ प्रब्रूहि करिष्यामो वचनात्‌ तव भारत,“भरतकुलभूषण पुरुषसिंह! यदि यहाँ तुम युद्धके सिवा और कोई काम करना चाहते हो तो बताओ, तुम्हारे कहनेसे हम स्वयं ही उस कार्यको पूर्ण कर देंगे”

বৈশম্পায়ন বললেন—হে পুরুষব্যাঘ্র, হে ভারতবংশের গৌরব! যদি এখানে যুদ্ধ ছাড়া অন্য কিছু করতে চাও, তবে বলো; তোমার বাক্য অনুযায়ী আমরা নিজেরাই সে কাজ সম্পন্ন করব।

Verse 14

ततस्तानब्रवीद्‌ राजन्नर्जुन: प्रहसन्निव । पार्थिवत्वं चिकीर्षामि धर्मराजस्य धीमत:,राजन! तब अर्जुनने उनसे हँसते हुए कहा--'मैं अपने भाई बुद्धिमान्‌ धर्मराज युधिष्ठिरको समस्त भूमण्डलका एकमात्र चक्रवर्ती सम्राट्‌ बनाना चाहता हूँ

তখন অর্জুন, যেন মৃদু হাসি হেসে, তাদের বলল—হে রাজন, আমি আমার প্রজ্ঞাবান ধর্মরাজকে সমগ্র ভূ-মণ্ডলের একমাত্র সর্বভৌম সম্রাট করতে চাই।

Verse 15

न प्रवेक्ष्यामि वो देशं विरुद्ध यदि मानुषै: । युधिष्ठिराय यत्‌ किंचित्‌ करपण्यं प्रदीयताम्‌,“आपलोगोंका देश यदि मनुष्योंके विपरीत पड़ता है तो मैं इसमें प्रवेश नहीं करूँगा। महाराज युधिष्ठिरके लिये करके रूपमें कुछ धन दीजिये”

যদি তোমাদের দেশ মানুষের পক্ষে প্রতিকূল (অসুরক্ষিত) হয়, তবে আমি সেখানে প্রবেশ করব না। মহারাজ যুধিষ্ঠিরের জন্য কর-রূপে যা কিছু প্রাপ্য, তা প্রদান করা হোক।

Verse 16

ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च । क्षौमाजिनानि दिव्यानि तस्य ते प्रददु: करम्‌,तब उन द्वारपालोंने अर्जुनको करके रूपमें बहुत-से दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण तथा दिव्य रेशमी वस्त्र एवं मृगचर्म दिये

তখন সেই দ্বাররক্ষীরা কর-রূপে তাকে দিব্য বস্ত্র, দিব্য অলংকার, উৎকৃষ্ট ক্ষৌমবস্ত্র এবং দিব্য মৃগচর্ম প্রদান করল।

Verse 17

एवं स पुरुषव्यात्रो विजित्य दिशमुत्तराम्‌ । संग्रामान्‌ सुबहून्‌ कृत्वा क्षत्रियैर्दस्युभिस्तथा,इस प्रकार पुरुषसिंह अर्जुनने क्षत्रिय राजाओं तथा लुटेरोंक साथ बहुत-सी लड़ाइयाँ लड़ी और उत्तर दिशापर विजय प्राप्त की। राजाओंको जीतकर उनसे कर लेते और उन्हें फिर अपने राज्यपर ही स्थापित कर देते थे। राजन्‌! वे वीर अर्जुन सबसे धन और भाँति- भाँतिके रत्न लेकर तथा भेंटमें मिले हुए वायुके समान वेगवाले तित्तिरि,- कल्माष, सुग्गापंखी एवं मोर-सदृश सभी घोड़ोंको साथ लिये और विशाल चतुरंगिणी सेनासे घिरे हुए फिर अपने उत्तम नगर इन्द्रप्रस्थमें लौट आये

এইভাবে পুরুষব্যাঘ্র অর্জুন উত্তর দিক জয় করে ক্ষত্রিয় রাজা ও দস্যুদের সঙ্গে বহু যুদ্ধ করলেন।

Verse 18

स विनिर्जित्य राज्ञस्तान्‌ करे च विनिवेश्य तु । धनान्यादाय सर्वेभ्यो रत्नानि विविधानि च,इस प्रकार पुरुषसिंह अर्जुनने क्षत्रिय राजाओं तथा लुटेरोंक साथ बहुत-सी लड़ाइयाँ लड़ी और उत्तर दिशापर विजय प्राप्त की। राजाओंको जीतकर उनसे कर लेते और उन्हें फिर अपने राज्यपर ही स्थापित कर देते थे। राजन्‌! वे वीर अर्जुन सबसे धन और भाँति- भाँतिके रत्न लेकर तथा भेंटमें मिले हुए वायुके समान वेगवाले तित्तिरि,- कल्माष, सुग्गापंखी एवं मोर-सदृश सभी घोड़ोंको साथ लिये और विशाल चतुरंगिणी सेनासे घिरे हुए फिर अपने उत्तम नगर इन्द्रप्रस्थमें लौट आये

সেই রাজাদের জয় করে তিনি তাদের উপর কর ধার্য করলেন এবং নিজ নিজ রাজ্যে পুনঃস্থাপিত করলেন; তারপর সবার কাছ থেকে ধন ও নানা প্রকার রত্ন গ্রহণ করে অগ্রসর হলেন।

Verse 19

हयांस्तित्तिरिकल्माषाऊछुकपत्रनिभानपि । मयूरसदृशानन्यान्‌ सर्वाननिलरंहस:,इस प्रकार पुरुषसिंह अर्जुनने क्षत्रिय राजाओं तथा लुटेरोंक साथ बहुत-सी लड़ाइयाँ लड़ी और उत्तर दिशापर विजय प्राप्त की। राजाओंको जीतकर उनसे कर लेते और उन्हें फिर अपने राज्यपर ही स्थापित कर देते थे। राजन्‌! वे वीर अर्जुन सबसे धन और भाँति- भाँतिके रत्न लेकर तथा भेंटमें मिले हुए वायुके समान वेगवाले तित्तिरि,- कल्माष, सुग्गापंखी एवं मोर-सदृश सभी घोड़ोंको साथ लिये और विशाल चतुरंगिणी सेनासे घिरे हुए फिर अपने उत्तम नगर इन्द्रप्रस्थमें लौट आये

তিনি তিত্তিরি ও কল্মাষ জাতের, টিয়াপাখির ডানার মতো চিহ্নযুক্ত, এবং ময়ূরসদৃশ আরও নানা ঘোড়া—যারা সকলেই বায়ুর ন্যায় দ্রুত—সঙ্গে নিয়ে এলেন।

Verse 20

वृत: सुमहता राजन्‌ बलेन चतुरक्षिणा: । आजगाम पुनर्वीर: शक्रप्रस्थं पुरोत्तमम्‌,इस प्रकार पुरुषसिंह अर्जुनने क्षत्रिय राजाओं तथा लुटेरोंक साथ बहुत-सी लड़ाइयाँ लड़ी और उत्तर दिशापर विजय प्राप्त की। राजाओंको जीतकर उनसे कर लेते और उन्हें फिर अपने राज्यपर ही स्थापित कर देते थे। राजन्‌! वे वीर अर्जुन सबसे धन और भाँति- भाँतिके रत्न लेकर तथा भेंटमें मिले हुए वायुके समान वेगवाले तित्तिरि,- कल्माष, सुग्गापंखी एवं मोर-सदृश सभी घोड़ोंको साथ लिये और विशाल चतुरंगिणी सेनासे घिरे हुए फिर अपने उत्तम नगर इन्द्रप्रस्थमें लौट आये

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! অতি বৃহৎ চতুরঙ্গিণী সেনায় পরিবৃত সেই বীর পার্থ অর্জুন পুনরায় শ্রেষ্ঠ নগর শক্রপ্রস্থে (ইন্দ্রপ্রস্থে) প্রত্যাবর্তন করলেন। যুদ্ধে রাজাদের পরাভূত করে তিনি কর, রত্ন ও ধন সংগ্রহ করেছিলেন, কিন্তু পরাজিত নৃপতিদের নিজ নিজ রাজ্যে আবার প্রতিষ্ঠিতও করেছিলেন। এইভাবে বহু ধনরত্ন এবং উপহারস্বরূপ প্রাপ্ত বায়ুবেগী তিত্তিরি, কল্মাষ, সুগ্গাপঙ্খী ও ময়ূরসদৃশ অশ্বসহ তিনি ইন্দ্রপ্রস্থে ফিরে এলেন।

Verse 21

धर्मराजाय तत्‌ पार्थों धनं सर्व सवाहनम्‌ | न्यवेदयदनुज्ञातस्तेन राज्ञा गृहान्‌ ययौ,पार्थने घोड़ोंसहित वह सारा धन धर्मराजको सौंप दिया और उनकी आज्ञा लेकर वे महलमें चले गये

তখন পার্থ অর্জুন অশ্ব-যানসহ সেই সমস্ত ধন ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের কাছে নিবেদন করলেন। সেই রাজার অনুমতি পেয়ে তিনি রাজপ্রাসাদে গমন করলেন।

Verse 27

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें अर्जुनविग्विजयके प्रसंगमें अनेक देशोंपर विजयसम्बन्धी सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত দিগ্বিজয়পর্বে অর্জুনের দিগ্বিজয়ের প্রসঙ্গে বহু দেশের বিজয়বর্ণনাসংবলিত সপ্তবিংশ অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 28

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि अर्जुनोत्तरदिग्विजये अष्टाविंशोड ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापववके अन्तर्गत विग्विजयपर्वमें अर्जुनकी उत्तर दिशापर विजयविषयक अद्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত দিগ্বিজয়পর্বে অর্জুনের উত্তর-দিগ্বিজয় বিষয়ক অষ্টাবিংশ অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to pursue a state-mandated campaign for rājasūya legitimacy when confronted by a city under divine protection: Sahadeva must balance kṣātra initiative with reverence for a sacred constraint, choosing procedural purity and respectful petition over coercive escalation.

Power is validated not only by victory but by disciplined conduct: composure under fear, purification, and truthful articulation of purpose can resolve conflict with minimal harm, aligning political action with ritual-ethical order.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s meta-function is archival and programmatic—showing how digvijaya and tribute become instruments of ritual sovereignty, and how divine-local covenants (Agni’s protection of Nīla’s line) delimit legitimate force.