Adhyaya 16
Sabha ParvaAdhyaya 1617 Verses

Adhyaya 16

Jarāsandha-prastāvaḥ — Nīti-cintā ca Jarāsandhasya janma-vṛttāntaḥ (The Jarāsandha Prelude: Strategic Counsel and Birth Account)

Upa-parva: Jarāsandha-vadha-nīti (Strategic Counsel on Jarāsandha)

The chapter opens with Vāsudeva endorsing Arjuna’s displayed judgment as appropriate for a Bhārata-lineage prince, then articulates a rationale for timely, disciplined action: the time of death is unknown, and immortality is not attained by non-engagement; therefore, one should proceed with heart-steadying resolve via methodical nīti. The discourse highlights avoiding direct approach to a stronger force when formations are uneven, preferring structured deployment and proximity-based advantage. Yudhiṣṭhira then inquires about Jarāsandha—his strength and extraordinary resilience. Kṛṣṇa responds with a dynastic account beginning with King Bṛhadratha of Magadha, his two wives, and the absence of an heir despite rites. A sage’s boon is mediated through a consecrated mango fruit divided between the queens, leading to pregnancy and the birth of two living halves. The halves are discarded by attendants; the rākṣasī Jarā retrieves and joins them, producing a single, exceptionally strong child. Jarā then presents the child to Bṛhadratha, explaining the circumstances, thereby establishing the etiological basis for Jarāsandha’s name and exceptional constitution.

Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ का स्वप्न सामने है, पर उसके द्वार पर जरासंध का अडिग पर्वत खड़ा है। युधिष्ठिर का मन उत्साहहीन होकर संन्यास की ओर झुकता है—और सभा में एक क्षण को विजय का संकल्प डगमगा जाता है। → युधिष्ठिर अपने प्रियतम सहारों—भीम और अर्जुन को ‘दो नेत्र’ और कृष्ण को ‘मन’ कहकर भी स्वीकारते हैं कि जरासंध की सेना और पराक्रम यम के समान दुर्जेय हैं। वे कहते हैं कि राजसूय ‘दुराहर’ है; आरम्भ करने पर भी विफलता का भय है, और न करने पर भी अयोग्यता का कलंक। → कृष्ण क्षत्रिय-धर्म का कठोर प्रकाश सभा में रखते हैं: शत्रु-विजय ही क्षत्रिय की वृत्ति है; दैन्य और मोह—ये दोनों विनाशक दोष हैं जिन्हें जय चाहने वाले राजा को त्यागना चाहिए। वे बताते हैं कि प्रमाद-रूप छिद्र से बलवान शत्रु भी क्षीण होता है—अर्थात् जरासंध भी अजेय नहीं, अवसर और नीति से जीता जा सकता है। → कृष्ण लक्ष्य को धर्म-रक्षा से जोड़ते हैं: राजसूय की सिद्धि के लिए जरासंध-विनाश और बंदी राजाओं का परिरक्षण—यह यज्ञार्थ कर्म भी है और लोक-रक्षा भी। वे युधिष्ठिर को संन्यास-प्रवृत्ति से हटाकर आरम्भ, पुरुषार्थ और नीति-युक्त अभियान की ओर मोड़ते हैं। → युधिष्ठिर का संकल्प पुनः जागता है—अब प्रश्न यह रह जाता है कि जरासंध तक पहुँचने और उसे गिराने का ‘द्वार’ कौन-सा होगा, और कौन-से वीर इस कार्य के लिए अग्रसर होंगे।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं) ऑपन---ह< बक। ] अत्ऑका:< घोडशो< ध्याय: जरासंधको जीतनेके विषयमें युधिष्ठिरके उत्साहहीन होनेपर अर्जुनका उत्साहपूर्ण उद्गार युधिषछिर उवाच सम्राड्गुणमभीप्सन्‌ वै युष्मान्‌ स्वार्थपरायण: । कथं प्रहिणुयां कृष्ण सो5हं केवलसाहसात्‌,युधिष्ठिर बोले--श्रीकृष्ण! मैं सम्राट्के गुणोंको प्राप्त करनेकी इच्छा रखकर स्वार्थसाधनमें तत्पर हो केवल साहसके भरोसे आपलोगोंको जरासंधके पास कैसे भेज दूँ?

যুধিষ্ঠির বললেন— হে কৃষ্ণ! সম্রাটের উপযুক্ত গুণ অর্জনের বাসনা নিয়ে, নিজের উদ্দেশ্যসিদ্ধিতে প্রবৃত্ত হয়েও, কেবল সাহসের ভরসায় আমি কী করে তোমাদের সকলকে জরাসন্ধের কাছে পাঠাই? তোমাদের নিরাপত্তা বিপন্ন করে রাজ্যলাভের চেষ্টা করা তো স্বার্থপর ও বেপরোয়া কর্ম।

Verse 2

भीमार्जुनावुभौ नेत्रे मनो मन्ये जनार्दनम्‌ | मनश्नक्षुविहीनस्य कीदृशं जीवितं भवेत्‌,भीमसेन और अर्जुन मेरे दोनों नेत्र हैं और जनार्दन आपको मैं अपना मन मानता हूँ। अपने मन और नेत्रोंको खो देनेपर मेरा यह जीवन कैसा हो जायगा?

যুধিষ্ঠির বললেন— ভীমসেন ও অর্জুন আমার দুই চোখের মতো, আর জনার্দন কৃষ্ণকে আমি আমার মন বলে মানি। মন ও দৃষ্টিশক্তি হারালে জীবনের আর কী অবশিষ্ট থাকে?

Verse 3

जरासंधबल प्राप्य दुष्पारं भीमविक्रमम्‌ । यमो<पि न विजेता55जौ तत्र वः कि विचेष्टितम्‌,जरासंधकी सेनाका पार पाना कठिन है। उसका पराक्रम भयानक है। युद्धमें उस सेनाका सामना करके यमराज भी विजयी नहीं हो सकते, फिर वहाँ आपलोगोंका प्रयत्न क्या कर सकता है?

যুধিষ্ঠির বললেন— জরাসন্ধের শক্তি অতিক্রম করা দুরূহ; তার পরাক্রম ভয়ংকর। সেই যুদ্ধে তো যমও জয়ী হতে পারবেন না—তবে সেখানে তোমাদের প্রচেষ্টা কীই বা করতে পারবে?

Verse 4

(कथं जित्वा पुनर्यूयमस्मान्‌ सम्प्रति यास्यथ ।) अस्मिंस्त्वर्थान्तिरे युक्तमनर्थ: प्रतिपद्यते तस्मान्न प्रतिपत्तिस्तु कार्या युक्ता मता मम,आपलोग किस प्रकार उसे जीतकर फिर हमारे पास लौट सकेंगे? यह कार्य हमारे लिये इष्ट फलके विपरीत फल देनेवाला जान पड़ता है। इसमें लगे हुए मनुष्यको निश्चय ही अनर्थकी प्राप्ति होती है। इसलिये अबतक हम जिसे करना चाहते थे, उस राजसूययज्ञकी ओर ध्यान देना उचित नहीं जान पड़ता

যুধিষ্ঠির বললেন— তোমরা তাকে জয় করে আবার আমাদের কাছে কীভাবে ফিরে আসবে? এই উদ্যোগটি আমাদের কাম্য ফলের বিপরীত ফল দেবে বলেই মনে হয়। এমন ভিন্ন পথে জড়িয়ে পড়লে অনর্থই অনিবার্য। অতএব আমার মতে, আমরা যে রাজসূয় যজ্ঞের দিকে অগ্রসর হচ্ছিলাম, এখন সে পথে এগোনো সমীচীন নয়।

Verse 5

यथाहं विमृशाम्येकस्तत्‌ तावच्छुयतां मम । संन्यासं रोचये साधु कार्यस्यास्य जनार्दन | प्रतिहन्ति मनो मे5द्य राजसूयो दुराहर:,जनार्दन! इस विषयमें मैं अकेले जैसा सोचता हूँ, मेरे उस विचारको आप सुनें। मुझे तो इस कार्यको छोड़ देना ही अच्छा लगता है। राजसूयका अनुष्ठान बहुत कठिन है। अब यह मेरे मनको निरुत्साह कर रहा है

যুধিষ্ঠির বললেন— হে জনার্দন! আমি একা যেমন ভাবছি, ততটুকু শোনো। আমার কাছে এই উদ্যোগ ত্যাগ করাই শ্রেয় মনে হয়। রাজসূয় যজ্ঞ সম্পাদন করা অত্যন্ত কঠিন; আজ তা আমার সংকল্পকে রুদ্ধ করছে এবং মনে অনীহা জাগাচ্ছে।

Verse 6

वैशग्पायन उवाच पार्थ: प्राप्य धनु: श्रेष्ठमक्षय्ये च महेषुधी । रथं ध्वजं सभां चैव युधिष्ठिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुन्तीनन्दन अर्जुन उत्तम गाण्डीव धनुष, दो अक्षय तूणीर, दिव्य रथ, ध्वजा और सभा प्राप्त कर चुके थे; इससे उत्साहित होकर वे युधिष्ठिरसे बोले

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! পার্থ অর্জুন শ্রেষ্ঠ ধনুক, দুই অক্ষয় মহাতূণীর, রথ, ধ্বজা ও সভাগৃহ লাভ করে উল্লসিত হয়ে যুধিষ্ঠিরকে সম্বোধন করলেন।

Verse 7

अर्जुन उवाच धनु: शस्त्र शरा वीर्य पक्षो भूमिर्यशो बलम्‌ | प्राप्तमेतन्‍्मया राजन दुष्प्रापं यदभीप्सितम्‌,अर्जुनने कहा--राजन्‌! धनुष, शस्त्र, बाण, पराक्रम, श्रेष्ठ सहायक, भूमि, यश और बलकी प्राप्ति बड़ी कठिनाईसे होती है; किंतु ये सभी दुर्लभ वस्तुएँ मुझे अपनी इच्छाके अनुकूल प्राप्त हुई हैं

অর্জুন বললেন—রাজন! ধনুক, অস্ত্র, বাণ, বীর্য, উত্তম সহায়, ভূমি, যশ ও বল—এসব লাভ করা দুর্লভ; তবু আমি যা কামনা করেছিলাম, তা সবই আমার ইচ্ছামতো প্রাপ্ত হয়েছে।

Verse 8

कुले जन्म प्रशंसन्ति वैद्या: साधु सुनिष्ठिता: । बलेन सदृशं नास्ति वीर्य तु मम रोचते,अनुभवी दिद्वान्‌ उत्तम कुलमें जन्मकी बड़ी प्रशंसा करते हैं; परंतु बलके समान वह भी नहीं है। मुझे तो बल-पराक्रम ही श्रेष्ठ जान पड़ता है

অর্জুন বললেন—সদাচারে সুপ্রতিষ্ঠিত পণ্ডিতেরা উত্তম কুলে জন্মের প্রশংসা করেন; কিন্তু বলের সমান কিছু নেই। আমার কাছে বীর্য ও পরাক্রমই সর্বাধিক প্রিয়।

Verse 9

कृतवीर्यकुले जातो निर्वीर्य: कि करिष्यति | निर्वीर्ये तु कुले जातो वीर्यवांस्तु विशिष्यते,महापराक्रमी राजा कृतवीर्यके कुलमें उत्पन्न होकर भी जो स्वयं निर्बल है, वह क्या करेगा? निर्बल कुलमें जन्म लेकर भी जो बलवान और पराक्रमी है, वही श्रेष्ठ है

অর্জুন বললেন—কৃতবীর্যের বংশে জন্ম নিয়েও যে নিজে নির্বীর্য, সে কীই বা করবে? কিন্তু নির্বীর্য কুলে জন্ম নিয়েও যে বীর্যবান, সে-ই নিজের গুণে বিশিষ্ট হয়।

Verse 10

क्षत्रिय: सर्वशो राजन्‌ यस्य वृत्तिरद्धिषज्जये | सर्वेर्गुणैविह्ीनो5पि वीर्यवान्‌ हि तरेद्‌ रिपून्‌,महाराज! शत्रुओंको जीतनेमें जिसकी प्रवृत्ति हो, वही सब प्रकारसे श्रेष्ठ क्षत्रिय है। बलवान पुरुष सब गुणोंसे हीन हो, तो भी वह शत्रुओंके संकटसे पार हो सकता है

অর্জুন বললেন—মহারাজ! শত্রু-জয়ে যার প্রবৃত্তি, সেই সর্বতোভাবে শ্রেষ্ঠ ক্ষত্রিয়। বলবান পুরুষ অন্য গুণে হীন হলেও শত্রুর সংকট অতিক্রম করতে পারে।

Verse 11

सर्वैरपि गुणैर्युक्तो निर्वीर्य: कि करिष्यति । गुणीभूता गुणा: सर्वे तिष्ठन्ति हि पराक्रमे,जो निर्बल है, वह सर्वगुणसम्पन्न होकर भी क्‍या करेगा? पराक्रममें सभी गुण उसके अंग बनकर रहते हैं

যে দুর্বল, সে সর্বগুণে গুণান্বিত হলেও কীই বা সাধন করবে? পরাক্রমেই সকল গুণের প্রতিষ্ঠা; সাহস ও উদ্যোগ থাকলে অন্য গুণগুলি তার অঙ্গ-উপাঙ্গ হয়ে ওঠে।

Verse 12

जयस्य हेतु: सिद्धिर्हिं कर्म दैवं च संश्रितम्‌ । संयुक्तो हि बलै: कश्रित्‌ प्रमादान्नोपयुज्यते,महाराज! सिद्धि (मनोयोग) और प्रारब्धके अनुकूल पुरुषार्थ ही विजयका हेतु है। कोई बलसे संयुक्त होनेपर भी प्रमाद करे--कर्तव्यमें मन न लगावे, तो वह अपने उद्देश्यमें सफल नहीं हो सकता

মহারাজ! বিজয়ের কারণ সেই সিদ্ধি, যা সৎকর্ম ও দैব—উভয়ের আশ্রয়ে স্থিত। শক্তিসম্পন্ন হয়েও যে অবহেলা করে, কর্তব্যে মন না দেয়, সে নিজের লক্ষ্য লাভ করতে পারে না।

Verse 13

तेन द्वारेण शत्रुभ्य: क्षीयते सबलो रिपु:,प्रमादरूप छिद्रके कारण बलवान शत्रु भी अपने शत्रुओंद्वारा मारा जाता है

সেই ‘দ্বার’—অর্থাৎ অবহেলার ফাঁক—দিয়ে শক্তিসম্পন্ন শত্রুও প্রতিপক্ষের হাতে ক্ষয়প্রাপ্ত হয়ে বিনষ্ট হয়।

Verse 14

दैन्यं यथा बलवति तथा मोहो बलान्विते । तावुभौ नाशकौ हेतू राज्ञा त्याज्यौ जयार्थिना,बलवान पुरुषमें जैसे दीनताका होना बड़ा भारी दोष है, वैसे ही बलिष्ठ पुरुषमें मोहका होना भी महान्‌ दुर्गुण है। दीनता और मोह दोनों विनाशके कारण हैं; अतः विजय चाहनेवाले राजाके लिये वे दोनों ही त्याज्य हैं

যেমন শক্তিমান পুরুষের মধ্যে দীনতা মহাদোষ, তেমনি পরাক্রান্তের মধ্যে মোহও মহাদুর্গুণ। দীনতা ও মোহ—উভয়ই বিনাশের কারণ; অতএব বিজয়কামী রাজাকে দুটিই ত্যাগ করতে হবে।

Verse 15

जरासंधविनाशं च राज्ञां च परिरक्षणम्‌ | यदि कुर्याम यज्ञार्थ कि ततः: परमं भवेत्‌,यदि हम राजसूययज्ञकी सिद्धिके लिये जरासंधका विनाश तथा कैदमें पड़े हुए राजाओंकी रक्षा कर सकें तो इससे उत्तम और क्या हो सकता है?

যদি রাজসূয় যজ্ঞের সিদ্ধির জন্য আমরা জরাসন্ধকে বিনাশ করতে পারি এবং বন্দী রাজাদের রক্ষা (উদ্ধার) করতে পারি, তবে এর চেয়ে শ্রেয় আর কী হতে পারে?

Verse 16

अनारम्भे हि नियतो भवेदगुणनिश्चय: । गुणान्नि:संशयाद्‌ राजन्‌ नैर्गुण्यं मन्यसे कथम्‌,यदि हम यज्ञका आरम्भ नहीं करते हैं तो निश्चय ही हमारी अयोग्यता एवं दुर्बलता प्रकट होती है; अतः राजन! सुनिश्चित गुणकी उपेक्षा करके आप निर्गुणताका कलंक क्‍यों स्वीकार कर रहे हैं? इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरासंधवधमन्त्रणे षोडशो<ध्याय:

অর্জুন বললেন— যদি আমরা যজ্ঞের আরম্ভ না করি, তবে নিশ্চিতই স্থির হবে যে আমাদের গুণ ও সামর্থ্য নেই। অতএব, হে রাজন, নিশ্চিত উৎকর্ষকে উপেক্ষা করে আপনি কেন ‘নির্গুণ’—অর্থাৎ কর্তব্যকালে কর্ম না করার—কলঙ্ক গ্রহণ করছেন?

Verse 17

काषायं सुलभ पश्चान्मुनीनां शममिच्छताम्‌ । साम्राज्यं तु भवेच्छक्यं वयं योत्स्यामहे परान्‌,ऐसा करनेपर तो शान्तिकी इच्छा रखनेवाले संन्यासियोंका गेरुआ वस्त्र ही हमें सुलभ होगा, परंतु हमलोग साम्राज्यको प्राप्त करनेमें समर्थ हैं; अतः हमलोग शत्रुओंसे अवश्य युद्ध करेंगे

অর্জুন বললেন— যদি আমরা অন্যথা করি, তবে পরে শান্তি-অন্বেষী মুনিদের গেরুয়া বসনই আমাদের জন্য সহজ হবে। কিন্তু আমরা সাম্রাজ্য অর্জনে সক্ষম; অতএব আমরা শত্রুদের সঙ্গে অবশ্যই যুদ্ধ করব।

Frequently Asked Questions

Whether to delay action due to risk and uncertainty versus proceeding with a method-governed plan: the chapter argues for timely engagement guided by disciplined formations and targeted objectives rather than indiscriminate escalation.

Sound policy combines resolve with procedure: act without paralysis over uncertain outcomes, avoid approaching superior strength without advantageous configuration, and prioritize decisive levers of power while maintaining moral coherence.

No explicit phalaśruti is presented in the supplied passage; the chapter’s meta-value is primarily etiological and instructional—linking political strategy to a narrative explanation of Jarāsandha’s exceptional nature.