उत्पातदर्शनम् — Portents and Kāla among the Vṛṣṇis
हन्यमाने तु शैनेये क्रुद्धो रुक्मिणिनन्दन: । तदनन्तरमागच्छन्मोक्षयिष्यन् शिने: सुतम्,जब सात्यकि इस प्रकार मारे जाने लगे तब क्रोधमें भरे हुए रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न उन्हें संकटसे बचानेके लिये स्वयं उनके और आक्रमणकारियोंके बीचमें कूद पड़े
শৈনেয় সাত্যকি যখন এভাবে নিহত হতে লাগলেন, তখন ক্রোধে দগ্ধ রুক্মিণীনন্দন প্রদ্যুম্ন তাঁকে বিপদ থেকে উদ্ধার করতে তাঁর ও আক্রমণকারীদের মাঝখানে ঝাঁপিয়ে পড়লেন।
वैशम्पायन उवाच