
Mahāprasthānika-parva Adhyāya 2: The Northward March, Sight of Himavat and Meru, and the Sequential Falls
Upa-parva: Mahāprasthānika-parva (Northward Departure and Sequential Falls)
Vaiśaṃpāyana reports that the disciplined travelers proceed northward and behold Himavat, then pass a sandy ocean-like expanse and look upon Meru, the preeminent mountain. As they move swiftly in a yogic frame (yogadharmiṇaḥ), Draupadī (Yājñasenī/Kṛṣṇā) falls first. Bhīma queries Yudhiṣṭhira regarding the cause, and Yudhiṣṭhira attributes her fall to pronounced partiality toward Arjuna (Dhanañjaya). Continuing without turning back, Sahadeva falls; Yudhiṣṭhira explains this as arising from Sahadeva’s belief that none equaled him in wisdom. Seeing both fallen, Nakula collapses; Yudhiṣṭhira links it to a self-conception of unmatched beauty. Arjuna then falls in grief; Yudhiṣṭhira cites Arjuna’s boast about swiftly destroying enemies and his contempt toward other archers as the causal disposition. Finally, Bhīma falls and asks for the reason; Yudhiṣṭhira identifies excess in consumption and self-praise regarding strength and vitality. Yudhiṣṭhira continues onward, accompanied by a single dog that follows him.
Chapter Arc: उत्तर की ओर योगयुक्त पाण्डवों का महाप्रस्थान—मार्ग में हिमालय का प्रथम दर्शन, और उसी पवित्र पथ पर अनहोनी की छाया। → तेज़ गति से चलते हुए भी भीतर के संस्कार और सूक्ष्म दोष पीछा नहीं छोड़ते; पहले द्रौपदी गिरती हैं, फिर क्रमशः सहदेव और नकुल—हर पतन के साथ शेष यात्रियों की निःशब्द परीक्षा कठोर होती जाती है। → भीमसेन स्वयं धरती पर गिर पड़ते हैं और युधिष्ठिर से विनती करते हैं कि कारण बताइए; युधिष्ठिर निर्लिप्त होकर उनके पतन का हेतु बताते हैं—अतिभोजन और बल का गर्व। → युधिष्ठिर करुणा में डूबे बिना, धर्म-नियम के अनुसार पीछे मुड़कर न देखते हुए आगे बढ़ते रहते हैं; पतन को शोक नहीं, कर्मफल की उद्घोषणा मानकर स्वीकार करते हैं। → भीम के पतन के बाद भी यात्रा रुकी नहीं—अब कौन शेष रहेगा, और धर्मराज की अंतिम परीक्षा किस रूप में सामने आएगी?
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्या भारत महाप्रस्थानिकपर्वमें पहला अध्याय पूरा हुआ,पम्प छा अर: द्वितीयो&्ध्याय: मार्ममें द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीमसेनका गिरना तथा युधिष्ठिरद्वारा प्रत्येकके गिरनेका कारण बताया जाना वैशम्पायन उवाच ततस्ते नियतात्मान उदीचीं दिशमास्थिता: । ददृशुर्योगयुक्ताश्व हिमवन्तं महागिरिम्
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন সেই সংযতচিত্তেরা উত্তর দিক অবলম্বন করে অগ্রসর হলেন; এবং যোগে প্রতিষ্ঠিত হয়ে তাঁরা মহাগিরি হিমবানকে দর্শন করলেন।
Verse 2
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! मनको संयममें रखकर उत्तर दिशाका आश्रय लेनेवाले योगयुक्त पाण्डवोंने मार्गमें महापर्वत हिमालयका दर्शन किया ।। त॑ चाप्यतिक्रमन्तस्ते ददृशुर्वालुकार्णवम् । अवैक्षन्त महाशैलं मेरुं शिखरिणां वरम्,उसे भी लाँधचकर जब वे आगे बढ़े तब उन्हें बालूका समुद्र दिखायी दिया। साथ ही उन्होंने पर्वतोंमें श्रेष्ठ महागिरि मेरुका दर्शन किया यह कहकर महाबाहु युधिष्ठिर उनकी ओर देखे बिना ही आगे चल दिये। एक कुत्ता भी बराबर उनका अनुसरण करता रहा जिसकी चर्चा मैंने तुमसे अनेक बार की है ।। इति श्रीमहाभारते महाप्रस्थानिके पर्वणि द्रौपद्यादिपतने द्वितीयो5ध्याय:
বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! মন সংযত করে ও যোগে প্রতিষ্ঠিত হয়ে পাণ্ডবেরা উত্তর দিক অবলম্বন করে চললেন। পথে তাঁরা মহাপর্বত হিমালয়কে দর্শন করলেন। তা অতিক্রম করে এগোতে এগোতে তাঁরা বালুর সমুদ্র দেখলেন এবং শিখরীদের শ্রেষ্ঠ মহাশৈল মেরুকেও দেখলেন। এ কথা বলে মহাবাহু যুধিষ্ঠির পেছনে না তাকিয়েই অগ্রসর হলেন। আর একটি কুকুরও অবিরত তাঁদের অনুসরণ করছিল—যার কথা আমি তোমাকে বহুবার বলেছি।
Verse 3
तेषां तु गच्छतां शीघ्र सर्वेषां योगधर्मिणाम् । याज्ञसेनी भ्रष्टयोगा निपपात महीतले,सब पाण्डव योगधर्ममें स्थित हो बड़ी शीघ्रतासे चल रहे थे। उनमेंसे ट्रपदकुमारी कृष्णाका मन योगसे विचलित हो गया; अतः वह लड़खड़ाकर पृथ्वीपर गिर पड़ी
তাঁরা সকলেই যোগধর্মে প্রতিষ্ঠিত হয়ে দ্রুত অগ্রসর হচ্ছিলেন। তাঁদের মধ্যে যাজ্ঞসেনী (দ্রৌপদী)-র যোগস্থিতি ভঙ্গ হল; তাই তিনি টলতে টলতে ভূমিতে লুটিয়ে পড়লেন।
Verse 4
तां तु प्रपतितां दृष्टयवा भीमसेनो महाबल: । उवाच धर्मराजानं याज्ञसेनीमवेक्ष्य ह,उसे नीचे गिरी देख महाबली भीमसेनने धर्मराजसे पूछा--
যাজ্ঞসেনী (দ্রৌপদী)কে ভূমিতে পতিত দেখে মহাবলী ভীমসেন তাঁর দিকে চেয়ে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরকে সম্বোধন করে কারণ জিজ্ঞাসা করল।
Verse 5
नाधर्मश्चरित: कश्रिद् राजपुत्र्या परंतप । कारणं कि नु तद् ब्रूहि यत् कृष्णा पतिता भुवि,'परंतप! राजकुमारी द्रौपदीने कभी कोई पाप नहीं किया था। फिर बताइये, कौन-सा कारण है, जिससे वह नीचे गिर गयी?”
“পরন্তপ! রাজকন্যা দ্রৌপদী কখনও অধর্ম করেনি। তবে বলো—কোন কারণে কৃষ্ণা (দ্রৌপদী) ভূমিতে পতিত হল?”
Verse 6
युधिष्ठिर उवाच पक्षपातो महानस्या विशेषेण धनंजये । तस्यैतत् फलमपद्यैषा भुड्क्ते पुरुषसत्तम,युधिष्ठिरने कहा--पुरुषप्रवर! उसके मनमें अर्जुनके प्रति विशेष पक्षपात था; आज यह उसीका फल भोग रही है
যুধিষ্ঠির বললেন—“পুরুষশ্রেষ্ঠ! তার মনে বিশেষ করে ধনঞ্জয় (অর্জুন)-এর প্রতি গভীর পক্ষপাত ছিল; সেই পক্ষপাতেরই ফল আজ সে ভোগ করছে।”
Verse 7
वैशम्पायन उवाच एवमुकक््त्वानवेक्ष्यैनां ययौ भरतसत्तम: । समाधाय मनो धीमान् धर्मात्मा पुरुषर्षभ:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! ऐसा कहकर उसकी ओर देखे बिना ही भरतभूषण नरश्रेष्ठ बुद्धिमान् धर्मात्मा युधिष्ठिर मनको एकाग्र करके आगे बढ़ गये
বৈশম্পায়ন বললেন—“জনমেজয়! এ কথা বলে ভরতশ্রেষ্ঠ, বুদ্ধিমান, ধর্মাত্মা পুরুষর্ষভ যুধিষ্ঠির তার দিকে না তাকিয়েই মন সংযত করে অগ্রসর হলেন।”
Verse 8
सहदेवस्ततो विद्वान् निपपात महीतले । त॑ चापि पतितं दृष्टवा भीमो राजानमब्रवीत्,थोड़ी देर बाद विद्वान् सहदेव भी धरतीपर गिर पड़े। उन्हें भी गिरा देख भीमसेनने राजासे पूछा--
তারপর অল্পক্ষণেই বিদ্বান সহদেবও ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল। তাকেও পতিত দেখে ভীম রাজা যুধিষ্ঠিরকে সম্বোধন করে কারণ জিজ্ঞাসা করল।
Verse 9
यो5यमस्मासु सर्वेषु शुश्रूषुरनहंकृत: । सो<थयं माद्रवतीपुत्र: कस्मान् निपतितो भुवि,“भैया! जो सदा हमलोगोंकी सेवा किया करता था और जिसमें अहंकारका नाम भी नहीं था, यह माद्रीनन्दन सहदेव किस दोषके कारण धराशायी हुआ है?”
বৈশম্পায়ন বললেন—ভাই! যে সর্বদা আমাদের সকলের সেবায় নিবিষ্ট ছিল এবং যার মধ্যে অহংকারের লেশমাত্রও ছিল না, সেই মাদ্রীপুত্র সহদেব কোন দোষে ভূমিতে পতিত হল?
Verse 10
युधिछिर उवाच आत्मन: सदृशं प्राज्ञ नैषो5मन्यत कंचन । तेन दोषेण पतितस्तस्मादेष नृपात्मज:,युधिष्ठिरने कहा--यह राजकुमार सहदेव किसीको अपने-जैसा दविद्दान् या बुद्धिमान् नहीं समझता था; अतः उसी दोषसे इसका पतन हुआ है
যুধিষ্ঠির বললেন—এই রাজপুত্র সহদেব কাউকেই নিজের সমান প্রজ্ঞাবান বলে মনে করত না; সেই দোষের কারণেই সে পতিত হয়েছে—অতএব এই নৃপপুত্রের পতন ঘটল।
Verse 11
वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा तं समुत्सूज्य सहदेवं ययौ तदा । भ्रातृभि: सह कौन्तेय: शुना चैव युधिष्ठिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर सहदेवको भी छोड़कर शेष भाइयों और एक कुत्तेके साथ कुन्तीकुमार युधिष्ठिर आगे बढ़ गये
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! এ কথা বলে তিনি সহদেবকে ত্যাগ করে এগিয়ে গেলেন। কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠির অবশিষ্ট ভ্রাতাদের সঙ্গে এবং একটি কুকুরকে সঙ্গী করে দৃঢ় সংকল্পে অগ্রসর হলেন—শেষ যাত্রাপথে সঙ্গ ক্রমে ঝরে পড়লেও।
Verse 12
कृष्णां निपतितां दृष्टवा सहदेवं च पाण्डवम् | आर्तों बन्धुप्रिय: शूरो नकुलो निपपात ह,कृष्णा और पाण्डव सहदेवको गिरे देख शोकसे आर्त हो बन्धुप्रेमी शूरवीर नकुल भी गिर पड़े
বৈশম্পায়ন বললেন—কৃষ্ণাকে এবং পাণ্ডব সহদেবকে পতিত দেখে, শোকে কাতর, স্বজনপ্রিয় বীর নকুলও ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল।
Verse 13
तस्मिन् निपतिते वीरे नकुले चारुदर्शने । पुनरेव तदा भीमो राजानमिदमब्रवीत्,मनोहर दिखायी देनेवाले वीर नकुलके धराशायी होनेपर भीमसेनने पुनः राजा युधिष्ठिरसे यह प्रश्न किया--
বৈশম্পায়ন বললেন—সুন্দরদর্শন বীর নকুল পতিত হলে, তখন ভীম পুনরায় রাজা যুধিষ্ঠিরকে এই কথা জিজ্ঞাসা করল।
Verse 14
योअड्यमक्षतधथर्मात्मा भ्राता वचनकारक: । रूपेणाप्रतिमो लोके नकुल: पतितो भुवि,'भैया! संसारमें जिसके रूपकी समानता करनेवाला कोई नहीं था तो भी जिसने कभी अपने धर्ममें त्रुटि नहीं आने दी तथा जो सदा हमलोगोंकी आज्ञाका पालन करता था, वह हमारा प्रियबन्धु नकुल क्यों पृथ्वीपर गिरा है?”
বৈশম্পায়ন বললেন—“কেন নকুল ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল? সে আমাদের ভ্রাতা—ধর্মে অকলঙ্ক, সর্বদা আমাদের বাক্য পালনকারী, আর রূপে জগতে যার তুলনা নেই।”
Verse 15
इत्युक्तो भीमसेनेन प्रत्युवाच युधिष्ठिर: । नकुलं प्रति धर्मात्मा सर्वबुद्धिमतां वर:,भीमसेनके इस प्रकार पूछनेपर समस्त बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा युधिष्ठिरने नकुलके विषयमें इस प्रकार उत्तर दिया--
ভীমসেন এভাবে জিজ্ঞাসা করলে ধর্মাত্মা যুধিষ্ঠির—সমস্ত জ্ঞানীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ—নকুলকে লক্ষ্য করে উত্তর দিলেন।
Verse 16
रूपेण मत्समो नास्ति कश्रिदित्यस्य दर्शनम् अधिकश्चाहमेवैक इत्यस्य मनसि स्थितम्,'भीमसेन! नकुलकी दृष्टि सदा ऐसी रही है कि रूपमें मेरे समान दूसरा कोई नहीं है। इसके मनमें यही बात बैठी रहती थी कि “एकमात्र मैं ही सबसे अधिक रूपवानू हूँ।' इसीलिये नकुल नीचे गिरा है। तुम आओ। वीर! जिसकी जैसी करनी है वह उसका फल अवश्य भोगता है
বৈশম্পায়ন বললেন—“ভীমসেন! নকুলের দৃষ্টি সর্বদা এই ছিল—‘রূপে আমার সমান কেউ নেই।’ তার মনে স্থির হয়ে গিয়েছিল—‘আমি একাই সর্বাধিক সুদর্শন।’ সেই কারণেই নকুল পতিত হয়েছে। এসো, বৃকোদর! হে বীর, যেমন কর্ম তেমন ফল—অবশ্যই ভোগ করতে হয়।”
Verse 17
नकुल: पतितस्तस्मादागच्छ त्वं वृकोदर । यस्य यद् विहित॑ वीर सोडवश्यं तदुपाश्षुते,'भीमसेन! नकुलकी दृष्टि सदा ऐसी रही है कि रूपमें मेरे समान दूसरा कोई नहीं है। इसके मनमें यही बात बैठी रहती थी कि “एकमात्र मैं ही सबसे अधिक रूपवानू हूँ।' इसीलिये नकुल नीचे गिरा है। तुम आओ। वीर! जिसकी जैसी करनी है वह उसका फल अवश्य भोगता है
“অতএব নকুল পতিত হয়েছে। এসো, বৃকোদর! হে বীর, যার জন্য যা বিধিত, সে তা অবশ্যই ভোগ করে।”
Verse 18
तांस्तु प्रपतितान् दृष्टवा पाण्डव: श्वेतवाहन: । पपात शोकसन्तप्तस्ततो नु परवीरहा,द्रौपदी तथा नकुल और सहदेव तीनों गिर गये, यह देखकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले श्वेत-वाहन पाण्डुपुत्र अर्जुन शोकसे संतप्त हो स्वयं भी गिर पड़े
দ্রৌপদী, নকুল ও সহদেবকে ভূমিতে পতিত দেখে শত্রুবীর-সংহারী, শ্বেতবাহন পাণ্ডব অর্জুন শোকে দগ্ধ হয়ে নিজেও লুটিয়ে পড়ল।
Verse 19
तस्मिंस्तु पुरुषव्याप्रे पतिते शक्रतेजसि । ग्रियमाणे दुराधर्षे भीमो राजानमब्रवीत्,इन्द्रके समान तेजस्वी दुर्धर्ष वीर पुरुषसिंह अर्जुन जब पृथ्वीपर गिरकर प्राणत्याग करने लगे उस समय भीमसेनने राजा युधिष्ठिरसे पूछा
ইন্দ্রতুল্য তেজে দীপ্ত, অদম্য বীর পুরুষসিংহ অর্জুন যখন ভূমিতে পতিত হয়ে অন্তিম ক্ষণের দিকে অগ্রসর হলেন, তখন ভীমসেন রাজা যুধিষ্ঠিরকে সম্বোধন করলেন।
Verse 20
अनुतं न स्मराम्यस्य स्वैरेष्वपि महात्मन: । अथ कस्य विकारो<यं येनायं पतितो भुवि,'भैया! महात्मा अर्जुन कभी परिहासमें भी झूठ बोले हों--ऐसा मुझे याद नहीं आता। फिर यह किस कर्मका फल है जिससे इन्हें पृथ्वीपर गिरना पड़ा?”
“ভাই! মহাত্মা অর্জুন কখনও পরিহাসেও মিথ্যা বলেছেন—এমন আমার স্মরণে নেই। তবে এ কোন দোষ, কার কর্মফল যে তিনি ভূমিতে পতিত হলেন?”
Verse 21
युधिछिर उवाच एकाह्ला निर्दहेयं वै शत्रूनित्यर्जुनो 5ब्रवीत् । न च तत् कृतवानेष शूरमानी ततोडपतत्,युधिष्ठिर बोले--अर्जुनको अपनी शूरताका अभिमान था। इन्होंने कहा था कि “मैं एक ही दिनमें शत्रुओंको भस्म कर डालूँगा'; किंतु ऐसा किया नहीं; इसीसे आज इन्हें धराशायी होना पड़ा है
যুধিষ্ঠির বললেন—“অর্জুন নিজের বীরত্বে গর্বিত ছিল। সে বলেছিল—‘একদিনেই শত্রুদের ভস্ম করে দেব’; কিন্তু সে তা সম্পন্ন করতে পারেনি। সেই অপূর্ণ বাক্যের কারণেই আজ সে পতিত হয়েছে।”
Verse 22
अवमेने धरनुग्रहानेष सर्वाश्व॒ फाल्गुन: । तथा चैतन्न तु तथा कर्तव्यं भूतिमिच्छता,अर्जुनने सम्पूर्ण धनुर्धरोंका अपमान भी किया था; अत: अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको ऐसा नहीं करना चाहिये
যুধিষ্ঠির বললেন—“শ্বফাল্গুন (অর্জুন) একদা সকল ধনুর্ধরকে তুচ্ছ জ্ঞান করেছিল। যে ব্যক্তি সত্য কল্যাণ ও স্থায়ী সমৃদ্ধি চায়, তার এমন আচরণ করা উচিত নয়।”
Verse 23
वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा प्रस्थितो राजा भीमो5थ निपपात ह । पतितश्चाब्रवीद् भीमो धर्मराजं युधिष्ठिरम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! यों कहकर राजा युधिष्ठिर आगे बढ़ गये। इतनेहीमें भीमसेन भी गिर पड़े। गिरनेके साथ ही भीमने धर्मराज युधिष्ठिरको पुकारकर पूछा
বৈশম্পায়ন বললেন—এ কথা বলে রাজা যুধিষ্ঠির অগ্রসর হলেন। তখনই ভীমসেনও ভূমিতে লুটিয়ে পড়লেন। পতিত অবস্থায় ভীম ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরকে ডেকে কারণ জিজ্ঞাসা করলেন।
Verse 24
भो भो राजलन्नवेक्षस्व पतितोऊहं प्रियस्तव । कि निमित्तं च पतन ब्रूहि मे यदि वेत्थ ह,“राजन! जरा मेरी ओर तो देखिये, मैं आपका प्रिय भीमसेन यहाँ गिर पड़ा हूँ। यदि जानते हों तो बताइये, मेरे इस पतनका क्या कारण है?”
বৈশম্পায়ন বললেন— “হে রাজন, এদিকে দৃষ্টি দিন! আমি—আপনার প্রিয় ভীমসেন—পতিত হয়েছি। যদি জানেন, তবে বলুন—আমার এই পতনের কারণ কী?”
Verse 25
युधिषछ्िर उवाच अतिभुक्तं च भवता प्राणेन च विकत्थसे । अनवेक्ष्य परं पार्थ तेनासि पतित: क्षितौ
যুধিষ্ঠির বললেন— “তুমি অতিমাত্রায় ভোগ করেছ, আর নিজের প্রাণশক্তির গর্ব করেছ। হে পার্থ, পরম কল্যাণের দিকে না তাকিয়েই—এই কারণেই তুমি ভূমিতে পতিত হয়েছ।”
Verse 26
युधिष्ठिरने कहा--भीमसेन! तुम बहुत खाते थे और दूसरोंको कुछ भी न समझकर अपने बलकी डींग हाँका करते थे; इसीसे तुम्हें भी धराशायी होना पड़ा है ।। इत्युक्त्वा तं महाबाहुर्जगामानवलोकयन् । शध्वाप्येको5नुययौ यस्ते बहुश: कीर्तितो मया
যুধিষ্ঠির বললেন— “ভীমসেন! তুমি অতিরিক্ত খেতে, আর অন্যদের তোয়াক্কা না করে নিজের বলের গর্ব করতে; সেই কারণেই তুমিও ভূমিতে লুটিয়ে পড়েছ।” এ কথা বলে মহাবাহু যুধিষ্ঠির পিছনে না তাকিয়ে এগিয়ে গেলেন। তবু এক সঙ্গী তাঁর পিছু নিল—যার কথা আমি বহুবার কীর্তন করেছি।
The dilemma is interpretive and ethical: how to reconcile the fall of largely righteous figures with dharma. The chapter answers by shifting from judging overt crimes to identifying subtle partialities and self-regarding claims as morally consequential.
The upadeśa is that spiritual and ethical completion requires vigilance over inner dispositions—partiality, pride, boastfulness, and excess—since these can undermine even exemplary lives; renunciatory progress demands non-attachment and self-scrutiny.
No explicit phalaśruti appears in this chapter. Its meta-significance lies in functioning as an internal commentary on karma: the narrative itself becomes the instructional device, preparing the reader for the epic’s final evaluation of merit and justice in the concluding parva.