ते सर्वतः समकीर्यन्त राजन् पार्थेषव: कर्णरथं विशन्त: । अवाडूमुखा: पक्षिगणा दिनान्ते विशन्ति केतार्थमिवाशु वृक्षम्,राजन! वे अर्जुनके बाण कर्णके रथमें घुसकर सब ओर बिखर जाते थे। ठीक उसी तरह, जैसे संध्याके समय पक्षियोंके झुंड बसेरा लेनेके लिये नीचे मुख किये शीघ्र ही किसी वृक्षपर जा बैठते हैं
te sarvataḥ samakīryanta rājan pārtheṣavaḥ karṇarathaṁ viśantaḥ | avāḍūmukhāḥ pakṣigaṇā dinānte viśanti ketārtham ivāśu vṛkṣam, rājan |
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, পার্থের শর চারদিক থেকে কর্ণের রথে প্রবেশ করে চারদিকে ছড়িয়ে পড়ে গেঁথে যাচ্ছিল। যেমন দিনের শেষে পাখির ঝাঁক ঠোঁট নিচু করে দ্রুত আশ্রয়ের জন্য কোনো গাছে গিয়ে বসে।
संजय उवाच