कृष्णां सभागतां दृष्टवा मूढेनादीर्घदर्शिना । अस्मांस्तथावहसता क्षिपता च पुनः पुन:,“आप निश्चय ही, आज कर्णकी स्त्रियोंको विधवा हुई देखेंगे। इस अदूरदर्शी मूर्खने सभामें द्रौपदीको आयी देख बारंबार उसकी तथा हमलोगोंकी हँसी उड़ायी और हम सब लोगोंपर आक्षेप किया। ऐसा करते हुए इस कर्णने पहले जो कुकृत्य किया है, उसे याद करके मेरा क्रोध शान्त नहीं होता है
sañjaya uvāca |
kṛṣṇāṃ sabhāgatāṃ dṛṣṭvā mūḍhenādīrghadarśinā |
asmāṃs tathāvahasatā kṣipatā ca punaḥ punaḥ |
সঞ্জয় বললেন—“যখন সেই মূঢ়, স্বল্পদর্শী ব্যক্তি সভায় আনা কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)-কে দেখল, তখন সে বারবার তাকে বিদ্রূপ করল এবং আমাদেরও উপহাস করে পুনঃপুনঃ অপমানজনক কথা ছুড়ে দিল। কর্ণের সেই পূর্ব কুকর্ম স্মরণ করলে আমার ক্রোধ প্রশমিত হয় না; আর আজ নিশ্চয়ই তুমি কর্ণের নারীদের বিধবা হতে দেখবে।”
संजय उवाच