हया: ससूता निहता नरेन्द्र चूर्णीकृतश्चास्य रथ: पतन्त्या । दुःशासनं पाण्डवा: प्रेक्ष्य सर्वे हृष्टा: पज्चाला: सिंहनादानमुछ्चन्,नरेन्द्र! उस गदाने गिरते ही दुःशासनके रथको चूर-चूर कर डाला और सारथिसहित उसके घोड़ोंको भी मार डाला। दुःशासनको उस अवस्थामें देखकर समस्त पाण्डव और पांचाल-योधा हर्षमें भरकर सिंहनाद करने लगे
sañjaya uvāca |
hayāḥ sasūtā nihatā narendra cūrṇīkṛtaś cāsya rathaḥ patantyā |
duḥśāsanaṃ pāṇḍavāḥ prekṣya sarve hṛṣṭāḥ pañcālāḥ siṃhanādān amuñcan ||
সঞ্জয় বললেন— হে নরেন্দ্র! সেই গদা পতিত হতেই দুঃশাসনের রথ চূর্ণবিচূর্ণ হলো, আর সারথিসহ তার ঘোড়াগুলিও নিহত হলো। দুঃশাসনকে সেই অবস্থায় দেখে সকল পাণ্ডব ও পাঞ্চাল যোদ্ধারা আনন্দে উল্লসিত হয়ে সিংহনাদ তুলল।
संजय उवाच