भार्गवास्त्रं च पश्यामि ज्वलन्तं कृष्ण सर्वश: । सृष्टं कर्णेन वार्ष्णेय शक्रेणेव यथाशनिम्,“श्रीकृष्ण! वाष्णेय! सब ओरसे प्रज्वलित होनेवाले भार्गवास्त्रपर भी मेरी दृष्टि है, जिसे कर्णने उसी तरह प्रकट किया है, जैसे इन्द्र वज्ञका प्रयोग करते हैं
bhārgavāstraṃ ca paśyāmi jvalantaṃ kṛṣṇa sarvaśaḥ | sṛṣṭaṃ karṇena vārṣṇeya śakreṇeva yathāśanim ||
সঞ্জয় বললেন— হে কৃষ্ণ, হে বার্ষ্ণেয়! আমি সর্বদিকে জ্বলন্ত ভার্গব অস্ত্র দেখছি— কর্ণ তা নিক্ষেপ করেছে, যেন ইন্দ্র বজ্র নিক্ষেপ করেন।
संजय उवाच