गान्धारिभिरसम्भ्रान्तै: पर्वतीयैश्न दुर्जयै: शलभानामिव व्रातैः पिशाचैरिव दुर्दशै:,उनके साथ कभी घबराहटमें न पड़नेवाले गान्धारदेशीय सैनिक और दुर्जय पर्वतीय वीर भी थे। पिशाचोंके समान उन योद्धाओंकी ओर देखना कठिन हो रहा था और वे टिड्डीदलोंके समान यूथ बनाकर चलते थे
তাদের সঙ্গে ছিল অচঞ্চল গান্ধারদেশীয় সৈন্য এবং অজেয় পার্বত্য বীরেরা; তারা পঙ্গপালের মতো দলে দলে অগ্রসর হচ্ছিল, আর পিশাচের ন্যায় ভয়ংকর দেখাচ্ছিল।
संजय उवाच