Shloka 20

व्रात्यानां दासमीयानां कृते5प्यशुभकर्मणाम्‌ । ब्रह्मणा निन्दिते धर्मे स त्वं लोके किमब्रवी:,संस्कारहीन, जारज और पापकर्मी पंचनदवासियोंके धर्मकी जब ब्रह्माजीने सत्ययुगमें भी निन्‍दा की, तब तुम उसी देशके निवासी होकर जगत्‌मे क्‍यों धर्मोपदेश करने चले हो?

कर्ण उवाच