अविषहा: समुद्रो हि बहुसत्वगणालय: । महासत्त्वशतोद्धासी नभसो5पि विशिष्यते,कौआ सोचने लगा, “मैं थक जानेपर इस जलराशिमें कहाँ उतरूँगा? बहुत-से जल- जन्तुओंका निवासस्थान समुद्र मेरे लिये असहाय है। असंख्य महाप्राणियोंसे उद्धासित होनेवाला यह महासागर तो आकाशसे भी बढ़कर है”
কাক ভাবতে লাগল— “ক্লান্ত হলে এই জলরাশিতে আমি কোথায় নামব? অসংখ্য জলজ প্রাণীর আবাস এই সমুদ্র আমার জন্য আশ্রয়হীন। অগণিত মহাপ্রাণীর কোলাহলে ভরা এই মহাসাগর তো আকাশের চেয়েও বৃহৎ।”
हंस उवाच