Karṇa’s advance against the Pāṇḍava host; Arjuna’s clash with the Saṃśaptakas (कर्णस्य पाण्डवसेनाप्रवेशः—अर्जुनस्य संशप्तकसंप्रहारः)
पुराणि वरदत्तानि धात्रा तेन नराधिप । तदा भीत: सुरपतिर्मुक्त्वा तानि पुराण्यथ,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे शत्रुदमननरेश्वर! जब देवराज इन्द्र ब्रह्माजीका वर पाये हुए उन अभेद्य पुरोंका भेदन न कर सके, तब वे भयभीत हो उन पुरोंको छोड़कर उन्हीं देवताओंके साथ ब्रह्माजीके पास उन दैत्योंका अत्याचार बतानेके लिये गये
purāṇi varadattāni dhātrā tena narādhipa | tadā bhītaḥ surapatir muktvā tāni purāṇy atha | tapa ugraṃ samāsthāya niyame parame sthitāḥ ||
দুর্যোধন বলল—হে নরাধিপ, সেই পুরাতন পুরীগুলি ধাতা (ব্রহ্মা) কর্তৃক তাকে বররূপে দত্ত ছিল। তখন সুরপতি (ইন্দ্র) ভীত হয়ে সেই পুরীগুলি ত্যাগ করে দেবতাদের সঙ্গে ব্রহ্মার কাছে গেল। আর তারা (অসুরাধিপেরা) উগ্র তপস্যার আশ্রয় নিয়ে পরম নিয়মে স্থিত হল।
दुर्योधन उवाच