
अभिमन्योर् दारुणः संमर्दः (Abhimanyu’s fierce melee amid chariot formations)
Upa-parva: Saindhava-niruddha–Saubhadra-raṇa (Episode: Abhimanyu presses the Kaurava host after the Pandavas are checked by Jayadratha)
Saṃjaya reports that, with the Pandavas’ advance checked by Saindhava (Jayadratha), the engagement intensifies into a severe clash between the Kaurava forces and their opponents. Abhimanyu (Saubhadra), described as truthful in resolve and difficult to assail, enters the hostile host and agitates it like a sea-creature churning the ocean. Kuru warriors converge upon him with dense arrow volleys, producing a sustained, close-quarters mêlée. In the exchange, Abhimanyu disables Vṛṣasena’s chariot capability by killing the charioteer and cutting the bow; he is then struck, and his horses carry the chariot away from the immediate press. As the chariot withdraws, opponents acclaim the tactical displacement. A warrior identified as Vasātīya charges and showers Abhimanyu with arrows while issuing a threat; Abhimanyu responds with a swift shot that pierces the attacker’s heart, causing him to fall. Angered Kṣatriya leaders then surround Abhimanyu with intensified combat. The narration shifts to battlefield effects: severed arms with weapons, fallen ornaments, broken standards, damaged chariots, dead elephants, and scattered equipment cover the ground. Abhimanyu’s movement becomes hard to perceive amid the chaos; only flashes of gold and weaponry are visible, and he is likened to the sun standing in the middle, taking down fighters with arrows.
Chapter Arc: द्रोण के व्यूह-द्वार पर एक ही नाम बिजली-सा चमकता है—सैन्धव जयद्रथ। पाण्डवों के लिए मार्ग खुला है, पर हर कदम पर वही द्वारपाल बनकर खड़ा है; और उसके रथ-घोड़े, ध्वजा और साज-सज्जा युद्धभूमि को भी ‘गन्धर्वनगर’ जैसा मायावी वैभव दे देते हैं। → पाण्डव-पक्ष के योद्धा—द्रुपद, शिखण्डी, केकय, द्रौपदेय—अलग-अलग दिशाओं से दबाव बनाते हैं, पर जयद्रथ हर उस वीर को चुन-चुनकर रोकता है जो द्रोण-नीक को भेदने का यत्न करता है। व्यूह का द्वार जैसे एक ही देह में सिमट गया हो। → भीषण धक्कामुक्की के बीच सात्यकि का धनुष कटता है; वह रथ से कूदकर दूसरे रथ पर चढ़ता है—युद्ध की धूल में सिंह-सा उछलता हुआ। उसी क्षण जयद्रथ का ‘अश्रद्धेय’ पराक्रम सब देखते हैं: वह एक-एक करके आने वाले भेदकों को रोककर पाण्डवों का मार्ग बंद कर देता है। → अध्याय का निष्कर्ष यह है कि सौभद्र (अभिमन्यु) द्वारा पहले दिखाया गया पथ अब जयद्रथ द्वारा निवारित हो गया है; द्रोण-व्यूह का द्वार सुरक्षित है और पाण्डवों की गति थम जाती है। → व्यूह-द्वार बंद है, पर पाण्डवों का संकल्प नहीं—अब प्रश्न यह है कि इस ‘द्वारपाल’ को कौन और कैसे हटाएगा, ताकि भीतर फँसे अभिमन्यु तक सहायता पहुँच सके?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं।) ऑपन-आ प्रात | अर: त्रिचत्वारिशो<्ध्याय: पाण्डवोंके साथ जयद्रथका युद्ध और व्यूहद्वारको रोक रखना संजय उवाच यन्मां पृच्छसि राजेन्द्र सिन्धुराजस्य विक्रमम् । शृणु तत् सर्वमाख्यास्थे यथा पाण्डूनयोधयत्
সঞ্জয় বললেন—রাজেন্দ্র! আপনি সিন্ধুরাজ জয়দ্রথের পরাক্রমের কথা যা জানতে চান, তা সব শুনুন। তিনি পাণ্ডবদের সঙ্গে যেভাবে যুদ্ধ করেছিলেন, সেই সমগ্র বিবরণ আমি যথাযথভাবে বলব।
Verse 2
तमूहुवाजिनो वश्या: सैन्धवा: साधुवाहिन: । विकुर्वाणा बृहन्तो5श्वा: श्वसनोपमरंहस:
সঞ্জয় বললেন—সিন্ধুদেশের সেই বৃহৎ অশ্বগুলি, সুপ্রশিক্ষিত, লাগামের বশে থাকা এবং সারথির আদেশ মানতে দক্ষ, জয়দ্রথকে বহন করছিল। নানা ভঙ্গিতে ছুটে, বায়ুর মতো বেগে তারা তাকে রণক্ষেত্রে এগিয়ে নিয়ে যাচ্ছিল।
Verse 3
गन्धर्वनगराकारं विधिवत्कल्पितं रथम् । तस्याभ्यशो भयत् केतुर्वाराहो राजतो महान्
সঞ্জয় বললেন—বিধিমতো নির্মিত তার রথটি গন্ধর্বদের নগরের মতোই দীপ্তিমান মনে হচ্ছিল। তার পাশে রৌপ্যনির্মিত, বরাহ-চিহ্নযুক্ত এক মহাধ্বজা উঁচু হয়ে উঠে রথের শোভা বৃদ্ধি করছিল।
Verse 4
श्वैतच्छत्रपताकाभि क्षामरव्यजनेन च । स बभौ राजलिजड्लैस्तैस्तारापतिरिवाम्बरे,श्वेत छत्र, पताका, चँवर और व्यजन--इन राजचिह्वोंसे वह आकाशकमें चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित हो रहा था
শ্বেত রাজছত্র ও পতাকায়, ফ্যাকাশে চামর ও ব্যজনসহ—রাজচিহ্নে ভূষিত হয়ে তিনি আকাশে নক্ষত্রপতি চন্দ্রের ন্যায় দীপ্তিমান হলেন।
Verse 5
मुक्तावज़मणिस्वर्णर्भूषितं तदयस्मयम् । वरूथं विबभौ तस्य ज्योतिर्भि: खमिवावृतम्,उसके रथका मुक्ता, मणि, सुवर्ण तथा हीरोंसे विभूषित लोहमय आवरण नक्षत्रोंसे व्याप्त हुए आकाशके समान सुशोभित होता था
তার রথের লৌহময় বর্ম (বরূথ), মুক্তা, মণি, স্বর্ণ ও হীরায় ভূষিত হয়ে, দীপ্তিতে নক্ষত্রভরা আকাশের ন্যায় শোভা পেত।
Verse 6
स विस्फार्य महच्चापं किरजन्निषुगणान् बहून् । तत् खण्डं पूरयामास यद् व्यदारयदार्जुनि:
তিনি মহাধনুক টেনে বহু বাণগুচ্ছ বর্ষণ করে, অর্জুন যে ফাঁক বিদীর্ণ করেছিলেন, সেই ভাঙা অংশ পূর্ণ করে দিলেন।
Verse 7
उसने अपना विशाल धनुष फैलाकर बहुत-से बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए व्यूहके उस भागको योद्धाओंद्वारा भर दिया, जिसे अभिमन्युने तोड़ डाला था ।।
তারপর তিনি সাত্যকিকে তিন বাণে, বৃকোদর (ভীম)কে আট বাণে, ধৃষ্টদ্যুম্নকে ষাট বাণে এবং বিরাটকে দশ শরে বিদ্ধ করলেন।
Verse 8
द्रुपदं पज्चभिस्ती3्ष्णै: सप्तभिश्न शिखण्डिनम् | केकयान् पज्चविंशत्या द्रौपदेयांस्त्रिभिस्त्रिभि:
তিনি দ্রুপদকে পাঁচটি তীক্ষ্ণ বাণে, শিখণ্ডীকে সাত বাণে, কেকয়দের পঁচিশ বাণে এবং দ্রৌপদীর পুত্রদের প্রত্যেককে তিনটি করে বাণে আঘাত করলেন।
Verse 9
युधिष्टिरं तु सप्तत्या तत: शेषानपानुदत् । इषुजालेन महता तदद्धभुतमिवाभवत्
তিনি সত্তরটি বাণে যুধিষ্ঠিরকে রুদ্ধ করলেন, তারপর অবশিষ্টদের পশ্চাদপসরণে বাধ্য করলেন। সেই মহাবাণজালে যুদ্ধক্ষেত্রের দৃশ্য যেন বিস্ময়কর হয়ে উঠল।
Verse 10
उसने सात्यकिको तीन, भीमसेनको आठ, धृष्टद्युम्नको साठ, विराटको दस, ट्रुपदको पाँच, शिखण्डीको सात, केकयराजकुमारोंको पचीस, द्रौपदीपुत्रोंकी तीन-तीन तथा युधिष्ठिरको सत्तर तीखे बाणोंद्वारा घायल कर दिया। तत्पश्चात् बाणोंका बड़ा भारी जाल-सा बिछाकर उसने शेष सैनिकोंकों भी पीछे हटा दिया। यह एक अद्भुत-सी बात थी | ७-- ९ || अथास्य शितपीतेन भल्लेनादिश्य कार्मुकम् चिच्छेद प्रहसन् राजा धर्मपुत्र: प्रतापवान्,तब प्रतापी राजा धर्मपुत्र युधिष्ठिने एक तीखे और पानीदार भल्लके द्वारा उसके धनुषको काटनेकी घोषणा करके हँसते-हँसते काट डाला
তিনি সাত্যকিকে তিনটি, ভীমসেনকে আটটি, ধৃষ্টদ্যুম্নকে ষাটটি, বিরাটকে দশটি, দ্রুপদকে পাঁচটি, শিখণ্ডীকে সাতটি, কেকয়রাজপুত্রদের পঁচিশটি, দ্রৌপদীপুত্রদের প্রত্যেককে তিনটি করে এবং যুধিষ্ঠিরকে সত্তরটি তীক্ষ্ণ বাণে বিদ্ধ করলেন। তারপর বাণের এক বিশাল জাল বিস্তার করে অবশিষ্ট সৈন্যদেরও পিছু হটালেন—দৃশ্যটি ছিল বিস্ময়কর। অতঃপর প্রতাপী ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির হাসতে হাসতে লক্ষ্য ঘোষণা করে উজ্জ্বল, ক্ষুরধার ভল্লে প্রতিপক্ষের ধনুক কেটে ফেললেন।
Verse 11
अक्ष्णोनिमिषमात्रेण सो5न्यदादाय कार्मुकम् | विव्याध दशभि: पार्थ तांश्षैवान्यांस्त्रिभिस्त्रिभि:
চোখের পলক ফেলার মধ্যেই সে আরেকটি ধনুক তুলে নিল এবং যুধিষ্ঠিরকে দশটি বাণে, আর অন্যান্য বীরদেরও তিন-তিনটি বাণে বিদ্ধ করল।
Verse 12
तत् तस्य लाघवं ज्ञात्वा भीमो भल्लैस्त्रिभिस्त्रिभि: | धनुर्ध्वजं च च्छत्र॑ च क्षितौ क्षिप्रमपातयत्
তার ক্ষিপ্রতা বুঝে ভীম তিন-তিনটি ভল্লবাণে তার ধনুক, ধ্বজ ও ছত্র কেটে দ্রুত মাটিতে ফেলে দিলেন।
Verse 13
सोडन्यदादाय बलवान् सज्यं कृत्वा च कार्मुकम् । भीमस्यापातयत् केतु धनुरश्चांश्ष मारिष,आर्य! तब उस बलवान वीरने दूसरा धनुष ले उसपर प्रत्यंचा चढ़ाकर भीमके धनुष, ध्वज और घोड़ोंको धराशायी कर दिया
তখন সেই বলবান বীর আরেকটি ধনুক নিয়ে তাতে জ্যা পরিয়ে ভীমের ধ্বজ ফেলে দিল, তার ধনুক ভেঙে দিল এবং তার ঘোড়াগুলিকেও ভূমিসাৎ করল।
Verse 14
स हताश्चादवप्लुत्य च्छिन्नधन्वा रथोत्तमात् | सात्यकेराप्लुतो यान गिर्यग्रमिव केसरी,धनुष कट जानेपर अपने अश्वहीन उत्तम रथसे कूदकर भीमसेन सात्यकिके रथपर जा बैठे, मानो कोई सिंह पर्वतके शिखरपर जा चढ़ा हो
ধনুক ছিন্ন হয়ে গেলেও হতাশ না হয়ে সে নিজের অশ্বহীন উৎকৃষ্ট রথ থেকে লাফিয়ে নেমে সাত্যকির রথে উঠে বসল—যেন কোনো সিংহ পর্বতশিখরে আরোহন করল।
Verse 15
ततस्त्वदीया: संहृष्टा: साधु साध्विति वादिन: । सिन्धुराजस्य तत् कर्म प्रेक्ष्याश्रद्धेयमद्भुतम्
তখন আপনার সৈন্যরা পরম আনন্দে ‘সাধু! সাধু!’ বলে উঠল; কারণ তারা সিন্ধুরাজার সেই আশ্চর্য, শুনলে অবিশ্বাস্য-প্রায় কীর্তি স্বচক্ষে দেখেছিল।
Verse 16
संक्रुद्धान् पाण्डवानेको यद् दधारास्त्रतेजसा । तत् तस्य कर्म भूतानि सर्वाण्येवाभ्यपूजयन्
যখন জয়দ্রথ একাই নিজের অস্ত্রের দীপ্তিতে ক্রুদ্ধ পাণ্ডবদের রোধ করল, তখন তার সেই কীর্তিকে সকল প্রাণীই প্রশংসা করতে লাগল।
Verse 17
सौभद्रेण हतै: पूर्व सोत्तरायोधिभिर्दिपै: । पाण्डूनां दर्शित: पन्था: सैन्धवेन निवारित:
পূর্বে সৌভদ্র (অভিমন্যু) সারথিসহ যে হাতিগুলি বধ করেছিল, তাতে পাণ্ডবদের জন্য পথ প্রকাশিত হয়েছিল; কিন্তু সেই পথই পরে সৈন্ধব (জয়দ্রথ) রুদ্ধ করে দিল।
Verse 18
सुभद्राकुमार अभिमन्युने पहले गजारोहियोंसहित बहुत-से गजराजोंको मारकर व्यूहमें प्रवेश करनेके लिये जो पाण्डवोंको मार्ग दिखा दिया था, उसे जयद्रथने बंद कर दिया ।।
সেই বীর মৎস্য, পাঞ্চাল, কেকয় ও পাণ্ডবরা বারবার চেষ্টা করে ব্যূহে আক্রমণ করত; কিন্তু সৈন্ধব (সিন্ধুরাজ)-এর সম্মুখে তারা স্থির থাকতে পারত না।
Verse 19
यो यो हि यतते भेत्तुं द्रोणानीकं तवाहितः । त॑ तमेव वर प्राप्य सैन्धव: प्रत्यवारयत्
তোমার যে-যে শত্রু দ্রোণাচার্যের ব্যূহ ভেদ করতে উদ্যত হতো, সেই-সেই শ্রেষ্ঠ বীরের কাছে পৌঁছে সিন্ধুরাজ জয়দ্রথ তাকে প্রতিহত করত।
Verse 42
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें जयद्रथयुद्धविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত অভিমন্যুবধপর্বে জয়দ্রথ-যুদ্ধবিষয়ক বিয়াল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 43
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि जयद्रथयुद्धे त्रिचत्वारिंशो 5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वरमें जयद्रथका युद्धविषयक तैतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত অভিমন্যুবধপর্বে জয়দ্রথ-যুদ্ধবিষয়ক তেতাল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
The ethical tension is implicit rather than debated: whether extreme, concentrated force used to regain momentum under strategic obstruction remains within kṣātra-dharma, especially when engagements become crowded, perception is degraded, and decisions must be made without full situational clarity.
The chapter underscores that agency operates within constraint: when broader strategy is impeded, disciplined initiative and clarity of resolve can restore local advantage, yet the same intensity amplifies systemic destruction—highlighting the dual-edge of heroic action in contested dharma.
No explicit phalaśruti appears in this unit; its meta-commentary is conveyed through Saṃjaya’s descriptive framing—visibility loss, the sun-simile, and the inventory of shattered matériel—positioning the episode as a study in the costs and opacity of large-scale conflict.
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