Mahabharata Adhyaya 2
Drona ParvaAdhyaya 238 Versesभीष्म के गिरने से कौरव-पक्ष का पलड़ा डगमगाता है; कर्ण की सन्नद्धता से अस्थायी स्थैर्य और प्रतिरोध की नई लहर उठती है।

Adhyaya 2

Droṇa-parva Adhyāya 2: Karṇa’s lament, vow, and battle preparation after Bhīṣma’s fall

Upa-parva: Bhīṣma-vadha-anantara Karṇa-pravṛtti (Aftermath of Bhīṣma’s fall; Karṇa’s resolve and mobilization)

Saṃjaya reports that Karṇa (Ādhirathi/Rādheya) learns of Bhīṣma’s fall and approaches as if to ‘ferry’ a sinking Kuru cause. Karṇa speaks in praise of Bhīṣma’s virtues—fortitude, truthfulness, discipline, divine weapons, and exemplary speech—then pivots to a reflection on anitya: in a world where action is non-permanent, certainty is elusive. He interprets Bhīṣma’s collapse as a sign of the war’s altered moral and tactical landscape, yet accepts the burden of leadership, framing his response as a duty to protect the Kuru force. Karṇa articulates a program of resolve: he will confront the Pāṇḍava coalition (Yudhiṣṭhira, Bhīma, Arjuna, the twins, with Vāsudeva and allies), either achieving fame through success or meeting death in combat. He condemns unreliable allies as unworthy of the designation ‘friend’ and orders detailed mobilization—armor, helmet, bows, quivers, weapons, chariot, horses, standards, garlands, and victory signals—before mounting his chariot and proceeding toward the battlefield.

Chapter Arc: भीष्म के पतन का समाचार रणभूमि में बिजली-सा गिरता है; कुरु-सेना समुद्र में डूबती नाव-सी डगमगाती दिखती है, और उसी क्षण कर्ण का तेजस्वी उदय संकेत देता है कि कथा अब नए सेनापति-युग में प्रवेश कर रही है। → भीष्म के हत होने पर कौरव-पक्ष की हताशा को कर्ण ‘पिता’ की तरह थामता है—वह शीघ्रता से आगे बढ़कर सेना को ‘संतारने’ (उबारने) का संकल्प करता है। पर सामने वह रणक्षेत्र है जहाँ यमोपम यमौ (नकुल-सहदेव), सात्यकि और स्वयं देवकीसुत कृष्ण उपस्थित हैं—ऐसा स्थल जहाँ कापुरुष टिक नहीं सकता। कर्ण अपने रथ, ध्वज, कवच-आभूषण, अश्व और मालाओं की भव्य तैयारी का आदेश देकर युद्ध-निश्चय को और तीखा करता है। → संजय के वर्णन में कर्ण का ‘अग्नि-सदृश’ रथारोहण चरम बिंदु बनता है—स्वर्ण-रत्न-माला से सुसज्जित ध्वजित रथ पर, वातजव अश्वों से युक्त, वह देव-राज के विमानस्थ-सा दीप्तिमान दिखाई देता है; भीष्म-पतन के बाद कौरव-सेना के लिए यही दृश्य नया ध्रुव-तारा बन जाता है। → कर्ण युद्ध के लिए पूर्णतः सन्नद्ध होकर जय-लक्ष्य से प्रस्थान करता है; कौरव-पक्ष की डूबती मनःस्थिति को क्षणिक स्थैर्य मिलता है—भीष्म के शून्य को कर्ण की प्रतिज्ञा और तैयारी भरने लगती है। → कर्ण का यह प्रस्थान संकेत देता है कि अब उसका सामना उन्हीं अजेय-से प्रतीत योद्धाओं से होगा जिनके बीच टिकना ‘मृत्युमुख’ में प्रवेश जैसा है—अगला अध्याय उसी टकराव की ओर बढ़ता है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वरें धृतराष्ट्र-प्रश्नविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ

সঞ্জয় বললেন— হে রাজন, অধিরথনন্দন সূতপুত্র কর্ণ বুঝতে পেরে যে ভীষ্ম নিপাতিত হওয়ার পর কৌরবসেনা অগাধ সাগরে ভাঙা নৌকার মতো বিপদে পড়েছে, সহোদরের মতো মমতায় আপনার পুত্রের সেনাকে দুর্যোগ থেকে উদ্ধার করতে যুদ্ধযাত্রায় বেরিয়ে পড়লেন।

Verse 2

श्र॒ुत्वा तु कर्ण: पुरुषेन्द्रमच्युतं निपातितं शान्तनवं महारथम्‌ । अथोपयायात्‌ सहसारिकर्षणो धनुर्धराणां प्रवरस्तदा नृप

সঞ্জয় বললেন—অচ্যুতের হাতে শান্তনুনন্দন মহারথী ভীষ্ম পতিত হয়েছেন—এ সংবাদ শুনে ধনুর্ধরদের শ্রেষ্ঠ, শত্রুদমনকারী কর্ণ তৎক্ষণাৎ রাজা দুর্যোধনের নিকট দ্রুত গমন করল।

Verse 3

हते तु भीष्मे रथसत्तमे परै- निमज्जतीं नावमिवार्णवे कुरून्‌ । पितेव पुत्रांस्त्वरितो5भ्ययात्‌ ततः संतारयिष्यंस्तव पुत्रस्य सेनाम्‌

সঞ্জয় বললেন—রথীদের শ্রেষ্ঠ ভীষ্ম শত্রুদের হাতে নিহত হলে কুরুসেনা সমুদ্রে ডুবন্ত নৌকার মতো নিমজ্জিত হতে লাগল। তখন সূতপুত্র কর্ণ পিতার মতো পুত্রদের উদ্ধার করতে ছুটে যাওয়ার ন্যায়, তোমার পুত্রের সেনাকে বিপদ থেকে পার করাতে উদ্‌গ্রীব হয়ে দুর্যোধনের কাছে এসে পৌঁছাল।

Verse 4

(सम्मृज्य दिव्यं धनुराततज्यं स रामदत्तं रिपुसंघहन्ता । बाणांश्व कालानलवायुकल्पा- नुल्लालयन्‌ वाक्यमिदं बभाषे ।।

কর্ণ বলল—যাঁর মধ্যে ধৈর্য, বুদ্ধি, পরাক্রম, তেজ, সত্য, স্মৃতি এবং সকল বীরগুণ বিরাজমান; যাঁর মধ্যে দিব্যাস্ত্রের দীপ্তির সঙ্গে বিনয়, লজ্জা, প্রিয় বাক্য ও অনসূয়াও ছিল—যদি শত্রুবীর-হন্তা সেই দেবব্রত চিরতরে নিস্তব্ধ হয়ে যান, তবে আমি সকল যোদ্ধাকেই যেন নিহত বলে গণ্য করি।

Verse 5

सदा कृतज्ञे द्विजशत्रुधातके सनातन चन्द्रमसीव लक्ष्म । स चेत्‌ प्रशान्तः परवीरहन्ता मनन्‍्ये हतानेव च सर्ववीरान्‌

কর্ণ বলল—যিনি সদা কৃতজ্ঞ, ব্রাহ্মণদ্বেষীদের সংহারক, এবং চন্দ্রের ন্যায় প্রাচীন দীপ্তিতে উজ্জ্বল—সেই ভীষ্মে সকল বীরগুণ ও দিব্যাস্ত্রের গৌরব বিরাজমান। যদি শত্রুবীর-হন্তা সেই দেবব্রত এখন চিরতরে শান্ত হন, তবে আমি সকল বীরকেই নিহত বলে মনে করি।

Verse 6

नेह ध्रुवं किंचन जातु विद्यते लोके हास्मिन्‌ कर्मणोडनित्ययोगात्‌ । सूर्योदये को हि विमुक्तसंशयो भावं कुर्वीतार्यमहाव्रते हते

কর্ণ বলল—এই জগতে কর্মের অনিত্য যোগের কারণে কোনো কিছুই কখনো স্থির নয়। আর্য, মহাব্রতধারী ভীষ্ম নিহত হলে কে-ই বা সন্দেহমুক্ত হয়ে বলতে পারে—আগামীকাল সূর্য অবশ্যই উঠবে? (যখন তিনি পতিত, তখন আমাদের জীবনেরই বা কী নিশ্চয়তা?)

Verse 7

वसुप्रभावे वसुवीर्यसम्भवे गते वसूनेव वसुन्धराधिपे । वसूनि पुत्रांश्व वसुन्धरां तथा कुरूंश्व॒ शोचध्वमिमां च वाहिनीम्‌

কর্ণ বলল—যাঁর দীপ্তি বসুদের মতো, যাঁর বীর্য বসুদের তুল্য, এবং যিনি রাজা শান্তনুর ঔরসজাত—সেই পৃথিবীপতি ভীষ্ম এখন বসুদেরই কাছে গমন করেছেন। অতএব ভীষ্মহীন হয়ে শোক কর—তোমাদের ধন, তোমাদের পুত্র, এই ভূমি, কুরু ও তাদের রাজ্য, এবং এই সেনাবাহিনীর জন্য।

Verse 8

संजय उवाच महाप्रभावे वरदे निपातिते लोकेश्वरे शास्तरि चामितौजसि । पराजितेषु भरतेषु दुर्मना: कर्णो भृशं न्यश्वसदश्रु वर्तयन्‌

সঞ্জয় বললেন—অতিমহিমাময়, বরদাতা, মানুষের মধ্যে লোকেশ্বরসম শাসক, অপরিমেয় তেজস্বী ভীষ্ম যখন নিপতিত হলেন, আর ভরতবংশীয়েরা পরাভূত হতে লাগল, তখন কর্ণ অন্তরে গভীর দুঃখে ভারাক্রান্ত হয়ে অশ্রু ঝরাতে ঝরাতে দীর্ঘশ্বাস ফেলতে লাগল।

Verse 9

इदं च राधेयवचो निशम्य सुताश्न राजंस्तव सैनिकाश्न ह | परस्परं चुक्रुशुरार्तिजं मुहु- स्तदाश्रु नेत्रैर्मुमुचुश्ष शब्दवत्‌

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, রাধেয় কর্ণের এই বাক্য শুনে আপনার পুত্রেরা ও সৈন্যেরা পরস্পরের দিকে চেয়ে শোকাকুল হয়ে বারবার আর্তনাদ করতে লাগল; উচ্চস্বরে সোবিং করতে করতে তাদের চোখ থেকে অশ্রু ঝরতে লাগল।

Verse 10

प्रवर्तमाने तु पुनर्महाहवे विगाह्यमानासु चमूषु पार्थिव: । अथाब्रवीद्धर्षकरं तदा वचो रथर्षभान्‌ सर्वमहारथर्षभ:

সঞ্জয় বললেন—যখন মহাযুদ্ধ পুনরায় প্রবল হয়ে উঠল এবং সেনাদলগুলি পরস্পরের মধ্যে ঢুকে পড়ল, তখন রাজা সাহস জাগানো বাক্য উচ্চারণ করলেন—রথীদের শ্রেষ্ঠদের উদ্দেশে, যিনি নিজেও সকল মহারথীর মধ্যে শ্রেষ্ঠ।

Verse 11

पाण्डवसेनाके राजालोगोंद्वारा जब कौरव-सेनाका ध्वंस होने लगा और बड़ा भारी संग्राम आरम्भ हो गया, तब सम्पूर्ण महारथियोंमें श्रेष्ठ कर्ण समस्त श्रेष्ठ रथियोंका हर्ष और उत्साह बढ़ाता हुआ इस प्रकार बोला-- ।।

সঞ্জয় বললেন—পাণ্ডব-সেনার রাজারা যখন কৌরব-সেনাকে ভাঙতে শুরু করল এবং ভয়ংকর যুদ্ধ জ্বলে উঠল, তখন সকল মহারথীর মধ্যে শ্রেষ্ঠ কর্ণ, প্রধান রথীদের আনন্দ ও উদ্যম বাড়িয়ে বলল—“এই জগৎ অনিত্য, সদাই ছুটে চলে; আজ বহু চিন্তা করেও আমি কিছু স্থির দেখি না। নইলে, তোমাদের মতো বীরেরা দাঁড়িয়ে থাকতে থাকতে, পর্বতের মতো দীপ্তিমান কুরুপুঙ্গব ভীষ্ম কীভাবে যুদ্ধে পতিত হলেন?”

Verse 12

निपातिते शान्तनवे महारथे दिवाकरे भूतलमास्थिते यथा । न पार्थिवा: सोढुमलं धनंजयं गिरिप्रवोढारमिवानिल द्रुमा:

সঞ্জয় বললেন— মহারথী শান্তনুনন্দন ভীষ্মের রণক্ষেত্রে পতন যেন আকাশ থেকে সূর্য নেমে এসে পৃথিবীতে স্থির হওয়া। তারপর রাজাগণ ধনঞ্জয় (অর্জুন)-এর বেগ সহ্য করতে অক্ষম— যেমন পর্বত বহনকারী প্রবল বায়ুর তেজ সাধারণ বৃক্ষ সহ্য করতে পারে না।

Verse 13

हतप्रधानं त्विदमार्तरूप॑ परैर्हतोत्साहमनाथमद्य वै । मया कुरूणां परिपाल्यमाहवे बल॑ यथा तेन महात्मना तथा

সঞ্জয় বললেন— আজ কুরুসেনা প্রধান সেনাপতির নিহত হওয়ায় অনাথের মতো ও অত্যন্ত ক্লিষ্ট অবস্থায় পড়েছে; শত্রুরা এর উদ্যম ভেঙে দিয়েছে। এখন এই রণভূমিতে আমাকে কুরুদের এই বাহিনীকে সেইভাবেই রক্ষা করতে হবে, যেমন মহাত্মা ভীষ্ম করতেন।

Verse 14

समाहितं चात्मनि भारमीदृशं जगत्‌ तथानित्यमिदं च लक्षये । निपातितं चाहवशौण्डमाहवे कथं नु कुर्यामहमीदृशे भयम्‌

আমি এই ভার নিজের উপর গ্রহণ করেছি। যখন দেখি এই সমগ্র জগৎ অনিত্য, আর যুদ্ধনিপুণ ভীষ্মও রণে পতিত হয়েছেন— তখন এমন সময়ে আমি ভয় করব কেন?

Verse 15

अहं तु तान्‌ कुरुवृषभानजिद्ागै: प्रवेशयन्‌ यमसदनं चरन्‌ रणे । यश: परं जगति विभाव्य वर्तिता परैर्हतो भुवि शयिताथवा पुन:

আমি তো সেই কুরুবৃষভ পাণ্ডব বীরদের অচ্যুত, সোজা ধাবমান বাণে যমসদনে পাঠিয়ে রণক্ষেত্রে বিচরণ করব এবং জগতে পরম যশ বিস্তার করব; নতুবা শত্রুর হাতে নিহত হয়ে যুদ্ধভূমিতে পৃথিবীতেই শুয়ে থাকব।

Verse 16

युधिष्ठिरो धृतिमतिसत्यसत्त्ववान्‌ वृकोदरो गजशततुल्यविक्रम: । तथार्जुनस्त्रिदशवरात्मजो युवा न तद्धलं सुजयमिहामरैरपि

সঞ্জয় বললেন— যুধিষ্ঠির ধৈর্য, বুদ্ধি, সত্য ও সত্ত্বগুণে সমৃদ্ধ; বৃকোদর (ভীম)-এর বিক্রম শত হস্তীর তুল্য; আর অর্জুনও দেবশ্রেষ্ঠ ইন্দ্রের পুত্র ও তরুণ। অতএব পাণ্ডবদের সেই সেনাবাহিনীকে এখানে দেবতারাও সহজে জয় করতে পারেন না।

Verse 17

यमौ रणे यत्र यमोपमौ बले ससात्यकिर्यत्र च देवकीसुत: । न तद्धलं कापुरुषो 5 भ्युपेयिवान्‌ निवर्तते मृत्युमुखान्न चासुभृत्‌

সঞ্জয় বললেন—যেখানে রণক্ষেত্রে যমের তুল্য বলবান যমজ নকুল-সহদেব দাঁড়িয়ে আছেন, যেখানে সাত্যকি ও দেবকীপুত্র শ্রীকৃষ্ণও আছেন—সে সেনাবাহিনীতে যে কাপুরুষ প্রবেশ করে, সে মৃত্যুমুখ থেকে প্রাণ নিয়ে আর ফিরে আসে না।

Verse 18

तपो<भ्युदीर्ण तपसैव बाध्यते बल॑ बलेनैव तथा मनस्विभि: । मनश्न मे शरत्रुनिवारणे ध्रुवं स्वरक्षणे चाचलवद्‌ व्यवस्थितम्‌

উদ্দীপ্ত তপস্যা তপস্যা দ্বারাই দমন হয়, প্রবল বল বল দ্বারাই রুদ্ধ হয়—এমনই করেন দৃঢ়চিত্ত পুরুষেরা। এ কথা জেনে আমার মন শত্রু-নিবারণে স্থিরসংকল্প, আর আত্মরক্ষায় পর্বতের মতো অচল হয়ে প্রতিষ্ঠিত।

Verse 19

एवं चैषां बाधमान: प्रभावं॑ गत्वैवाहं ताञ्जयाम्यद्य सूत । मित्रद्रोहो मर्षणीयो न मे<यं भग्ने सैन्ये यः समेयात्‌ स मित्रम्‌

সঞ্জয় বললেন—হে সূত, এভাবে তাদের চাপিয়ে দেওয়া প্রভাব বুঝে আমি আজ গিয়ে তাদের জয় করব। বন্ধুর প্রতি বিশ্বাসঘাতকতা আমার সহ্য নয়; ভগ্ন সেনায় যে এসে মেশে, সে (সত্য) বন্ধু নয়।

Verse 20

फिर कर्ण अपने सारथिसे कहने लगा--'सूत! इस प्रकार मैं युद्धमें जाकर इन शत्रुओंके बढ़ते हुए प्रभावको नष्ट करते हुए आज इन्हें जीत लूँगा। मेरे मित्रोंक साथ कोई द्रोह करे, यह मुझे सहा नहीं। जो सेनाके भाग जानेपर भी साथ देता है, वही मित्र है ।।

তখন কর্ণ তার সারথিকে বলল—“হে সূত, এভাবে আমি রণে গিয়ে শত্রুদের ক্রমবর্ধমান প্রভাব ধ্বংস করে আজই তাদের জয় করব। বন্ধুদের প্রতি বিশ্বাসঘাতকতা আমি সহ্য করতে পারি না; সেনা ভেঙে পালালেও যে পাশে থাকে, সেই-ই বন্ধু। আমি কী করে সৎপুরুষের যোগ্য আর্যকর্ম ত্যাগ করে প্রাণ ছেড়ে ভীষ্মের পথ অনুসরণ করব? যুদ্ধে শত্রুসংঘ সকলকে আমি নিধন করব, অথবা তাদের হাতে নিহত হয়ে বীরলোক লাভ করব।”

Verse 21

'या तो मैं सत्पुरुषोंके करनेयोग्य इस श्रेष्ठ कार्यको सम्पन्न करूँगा अथवा अपने प्राणोंका परित्याग करके भीष्मजीके ही पथपर चला जाऊँगा। मैं संग्रामभूमिमें शत्रुओंके समस्त समुदायोंका संहार कर डालूँगा अथवा उन्हींके हाथसे मारा जाकर वीरलोक प्राप्त कर लूँगा ।।

সঞ্জয় বললেন—“হে সূত, ধৃতরাষ্ট্রপুত্রের পৌরুষ প্রতিহত হয়েছে; তার স্ত্রী ও শিশুরা আর্তনাদ করে কাঁদছে। এমন সময়ে কী করা কর্তব্য, তা আমি জানি। অতএব আজ আমি অবশ্যই রাজার শত্রুদের জয় করতে উদ্যত হব।”

Verse 22

कुरून्‌ रक्षन्‌ पाण्डुपुत्राञ्जिघांसं- स्त्यक्त्वा प्राणान्‌ घोररूपे रणे5स्मिन्‌ । सर्वान्‌ संख्ये शत्रुसंघान्‌ निहत्य दास्याम्यहं धार्तराष्ट्राय राज्यम्‌

সঞ্জয় বললেন— “কুরুদের রক্ষা করতে এবং পাণ্ডুপুত্রদের বধের সংকল্প নিয়ে, এই ভয়ংকর যুদ্ধে প্রাণকেও তুচ্ছ জ্ঞান করব। সমরে শত্রুসেনার সকল দলকে নিধন করে আমি ধৃতরাষ্ট্রপুত্র (দুর্যোধন)-কে রাজ্য অর্পণ করব।”

Verse 23

निबध्यतां मे कवचं विचित्र हैमं शुभ्रं मणिरत्नावभासि । शिरस्त्राणं चार्कसमानभासं धनु: शरांशक्षाग्नेविषाहिकल्पान्‌

সঞ্জয় বললেন— “আমার দেহে মণি-রত্নের জ্যোতিতে দীপ্ত সেই সুন্দর, বিচিত্র, স্বর্ণময় কবচ বেঁধে দাও। মস্তকে সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান শিরস্ত্রাণ পরিয়ে দাও। আমার ধনুক এবং অগ্নি, বিষ ও সর্পসম ভয়ংকর বাণও নিয়ে এসো।”

Verse 24

उपासज्रान्‌ षोडश योजयन्तु धनूंषि दिव्यानि तथा55हरन्तु । असींश्व शक्तीश्व गदाश्न गुर्वी: शड्खं च जाम्बूनदचित्रनालम्‌

সঞ্জয় বললেন— “আমার পরিচারকেরা বাণে পূর্ণ ষোলোটি তূণীর সাজিয়ে রাখুক, এবং দিব্য ধনুকও নিয়ে আসুক। আরও আনুক বহু খড়্গ, শক্তি (বল্লম), ভারী গদা, এবং জাম্বূনদ স্বর্ণখচিত বিচিত্র নলবিশিষ্ট শঙ্খটিও এখানে স্থাপন করুক।”

Verse 25

इमां रौक्‍्मीं नागकक्ष्यां विचित्रां ध्वजं चित्र दिव्यमिन्दीवराड्कम्‌ | श्लक्ष्णैवस्त्रैविप्रमृज्यानयन्तु चित्रां मालां चारुबद्धां सलाजाम्‌

সঞ্জয় বললেন— “হাতি বাঁধার জন্য নির্মিত এই বিচিত্র স্বর্ণময় দড়ি এবং নীলপদ্মচিহ্নিত সেই দিব্য, আশ্চর্য ধ্বজ—মসৃণ, নির্মল বস্ত্রে মুছে এনে উপস্থিত করো। সঙ্গে সুন্দরভাবে গাঁথা বিচিত্র মালা এবং খই প্রভৃতি মঙ্গলদ্রব্যও আনো।”

Verse 26

अश्वानग्रयान्‌ पाण्डुराभ्रप्रकाशान्‌ पुष्टान्‌ सनातान्‌ मन्त्रपूताभिरद्धि: । तप्तैर्भाण्डै: काउचनैरभ्युपेतान्‌ शीघ्रान्‌ शीघ्र सूतपुत्रानयस्व

সঞ্জয় বললেন— “হে সূতপুত্র! শীঘ্র, অতি শীঘ্র আমার জন্য শ্রেষ্ঠ, দ্রুতগামী ও স্থিতিশীল অশ্ব নিয়ে এসো—যারা ফ্যাকাশে মেঘের ন্যায় উজ্জ্বল, মন্ত্রপূত জলে স্নাত, বলবান ও সুপুষ্ট, এবং উত্তপ্ত স্বর্ণালঙ্কারে সজ্জিত।”

Verse 27

रथं चाग्रयं हेममालावनद्ध रल्नैश्षित्रं सूर्यचन्द्रप्रकाशै: । द्रव्यैर्युक्ते सम्प्रहारोपपन्नै- वहिर्युक्त तूर्णमावर्तयस्व

সঞ্জয় বললেন—ঐ একই অশ্বে যুক্ত সেই শ্রেষ্ঠ রথটি দ্রুত নিয়ে এসো—যা স্বর্ণমালায় অলংকৃত, সূর্য-চন্দ্রের ন্যায় দীপ্তিমান বিচিত্র রত্নে খচিত, এবং সমরের সংঘর্ষের উপযোগী সকল দ্রব্য ও উপকরণে সম্পূর্ণ সজ্জিত।

Verse 28

चित्राणि चापानि च वेगवन्ति ज्याक्षोत्तमा: संनहनोपपन्ना: । तूणांश्न पूर्णानू महतः शराणा- मासाद्य गात्रावरणानि चैव

সঞ্জয় বললেন—বিচিত্র ও বেগবান ধনুকগুলি তুলে নাও, শ্রেষ্ঠ ধনুর্জ্যা পরিয়ে সম্পূর্ণ সজ্জিত হও। তীরভরা বৃহৎ তূণীর বেঁধে নাও, আর দেহরক্ষাকারী বর্মও পরিধান করো—বিলম্ব না করে প্রস্তুত হও।

Verse 29

प्रायात्रिकं चानयताशु सर्व दध्ना पूर्ण वीर कांस्यं च हैमम्‌ आनीय मालामवबध्य चाडज़े प्रवादयन्त्वाशु जयाय भेरी:

সঞ্জয় বললেন—যাত্রার জন্য প্রয়োজনীয় সব সামগ্রী দ্রুত নিয়ে এসো। দইয়ে পূর্ণ কাঁসার ও স্বর্ণের পাত্রও তৎক্ষণাৎ আনো। সব এনে আমার গলায় মালা পরিয়ে দাও, আর বিজয়যাত্রার জন্য অবিলম্বে ভেরী-নগাড়া বাজাও।

Verse 30

प्रयाहि सूताशु यत: किरीटी वृकोदरो धर्मसुतो यमौ च । तान्‌ वा हनिष्यामि समेत्य संख्ये भीष्माय गच्छामि हतो द्विषद्धिः

সঞ্জয় বললেন—হে সূত! এসব সম্পন্ন করে দ্রুত রথ নিয়ে সেখানে চলো, যেখানে কিরীটধারী অর্জুন, বৃকোদর ভীম, ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির এবং যমজ নকুল-সহদেব দাঁড়িয়ে আছে। রণক্ষেত্রে তাদের সঙ্গে মুখোমুখি হয়ে হয় আমি তাদের বধ করব, নয়তো শত্রুর হাতে নিহত হয়ে ভীষ্মের নিকট গমন করব।

Verse 31

यस्मिन्‌ राजा सत्यधृतिर्युधिष्ठिर: समास्थितो भीमसेनार्जुनौ च । वासुदेव: सात्यकि: सूंजयाश्च मनन्‍्ये बल॑ तदजय्यं महीपै:

সঞ্জয় বললেন—যে বাহিনীতে সত্যে অবিচল রাজা যুধিষ্ঠির দৃঢ়ভাবে অবস্থান করছেন, সঙ্গে ভীমসেন ও অর্জুন; আর যেখানে বাসুদেব (কৃষ্ণ), সাত্যকি এবং সঞ্জয়ের পুত্রগণও রয়েছেন—সে শক্তিকে আমি পৃথিবীর রাজাদের পক্ষে অজেয় বলে মনে করি।

Verse 32

“जिस सेनामें सत्यधृति राजा युधिष्ठिर खड़े हों, भीमसेन, अर्जुन, वासुदेव, सात्यकि तथा सूंजय मौजूद हों, उस सेनाको मैं राजाओंके लिये अजेय मानता हूँ ।।

সঞ্জয় বললেন—যে সেনায় সত্যধৃত রাজা যুধিষ্ঠির দৃঢ়ভাবে দাঁড়িয়ে আছেন, আর যেখানে ভীমসেন, অর্জুন, বাসুদেব (কৃষ্ণ), সাত্যকি ও সঞ্জয় উপস্থিত—সে সেনাকে আমি রাজাদের পক্ষে অজেয় মনে করি। তবু আমি রণক্ষেত্রে সদা সতর্ক হয়ে যুদ্ধ করব; সর্বসংহারী মৃত্যু নিজে এসে যদি মুকুটধারী অর্জুনকে রক্ষা করে, তবুও আমি প্রকাশ্য সমরে তাঁর মুখোমুখি হয়ে হয় তাঁকে বধ করব, নয়তো ভীষ্মের পথ ধরে যমের দর্শনে চলে যাব।

Verse 33

>> # रद - कक कपल कक पक क्ान्च ग्प्ष्फ्म्ण्ट्ा *हष्यशे कर के) अर्जुनका जयद्रथके मस्तकको काटकर समन्त-पज्चक क्षेत्रसे बाहर फेंकना व्यासजी अर्जुनको शंकरजीकी महिमा कह रहे हैं भगवान्‌के द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा हा गोरखपुर युधिष्ठिरकी ललकारपर दुर्योधनका पानीसे बाहर निकल आना आय क अ भीमसेन अश्॒त्थामासे प्राप्त हुई मणि द्रौपदीको दे रहे हैं | त्रिपुर-विनाशके लिये देवताओंद्वारा शंकरजीकी स्तुति श्रीकृष्णद्वारा अर्जुनके अश्वोंकी परिचर्या न त्वेवाहं न गमिष्यामि तेषां मध्ये शूराणां तत्र चाहं ब्रवीमि । मित्रद्रुहो दुर्बलभक्तयो ये पापात्मानो न ममैते सहाया:

সঞ্জয় বললেন—এমন হতে পারে না যে আমি সেই বীরদের মাঝখানে যাব না। তবে আমি এটুকুই বলি—যারা বন্ধুদ্রোহী, যাদের প্রভুভক্তি দুর্বল, আর যাদের অন্তর পাপে ভরা—তারা আমার সহায় নয়।

Verse 34

संजय उवाच समृद्धिमन्तं रथमुत्तमं दृढं सकूबरं हेमपरिष्कृतं शुभम्‌ । पताकिनं वातजवैहयोत्तमै- युक्त समास्थाय ययौ जयाय

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! এ কথা বলে কর্ণ কूबर ও পতাকাসহ, স্বর্ণে সুশোভিত, মঙ্গলময়, সুন্দর, সমৃদ্ধ ও দৃঢ় সেই উৎকৃষ্ট রথে আরোহণ করল। বায়ুর মতো বেগবান শ্রেষ্ঠ অশ্বে যুক্ত সেই রথে চড়ে সে যুদ্ধে জয়ের উদ্দেশ্যে অগ্রসর হল।

Verse 35

सम्पूज्यमान: कुरुभिर्महात्मा रथर्षभो देवगण्णर्यथेन्द्र: । ययौ तदायोधनमुग्रधन्वा यत्रावसानं भरतर्षभस्य

সঞ্জয় বললেন—সেই সময় সকল কৌরবের দ্বারা পূজিত, দেবগণের মধ্যে ইন্দ্রের ন্যায় রথীদের শ্রেষ্ঠ, ভয়ংকর ধনুর্ধর মহাত্মা কর্ণ সেই যুদ্ধক্ষেত্রে গেল, যেখানে ভরতশ্রেষ্ঠ ভীষ্মের দেহাবসান ঘটেছিল।

Verse 36

ह | ७०७५. है 9 क्र 527 4 व /ध “3.7० ४ "१५५ 3 7 २५ कक £िए 2/ "पी ३६०४४ 086: हे हु; वरूथिना महता सध्वजेन सुवर्णमुक्तामणिरत्नमालिना । सदश्वयुक्तेन रथेन कर्णो मेघस्वनेनार्क इवामितौजा:

সঞ্জয় বললেন—বৃহৎ বাহিনীসহ কর্ণ অগ্রসর হল; তার রথ ছিল সুন্দর ধ্বজে শোভিত, স্বর্ণ, মুক্তা, মণি ও রত্নের মালায় অলংকৃত, উৎকৃষ্ট অশ্বে যুক্ত, আর মেঘগর্জনের মতো গভীর শব্দ তুলত। অপরিমেয় তেজস্বী কর্ণ সূর্যের ন্যায় দীপ্ত হয়ে রণভূমির দিকে যাত্রা করল।

Verse 37

हुताशनाभ: स हुताशनप्रभे शुभ: शुभे वै स्वरथे धनुर्धर: । स्थितो रराजाधिरथिर्महारथ: स्वयं विमाने सुरराडिवास्थित:

সঞ্জয় বললেন—অধিরথপুত্র মহারথী কর্ণ শুভ ও মনোহর রথে ধনুর্ধর হয়ে অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান হয়ে দাঁড়িয়েছিলেন। তিনি সেখানে এমনই শোভা পাচ্ছিলেন, যেন দেবরাজ ইন্দ্র নিজ দিব্য বিমানে অধিষ্ঠিত।

Verse 445

सु # 9 प् | है ५ 44 ५

সু # 9 প্ | হৈ ৫ 44 ৫

Frequently Asked Questions

Karṇa confronts the tension between grief and duty: acknowledging the instability of worldly outcomes (anitya) while still choosing decisive action to protect his side, even when moral clarity and certainty of success are unavailable.

The chapter underscores that impermanence does not negate responsibility; rather, awareness of uncertainty can sharpen ethical resolve—acting according to one’s role-obligations while accepting that results are not fully controllable.

No explicit phalaśruti is presented here; the meta-level significance is conveyed indirectly through the narrator-speaker structure (Saṃjaya reporting to Dhṛtarāṣṭra) and through thematic framing of anitya and leadership burden as interpretive cues for the listener.

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