Mahabharata Adhyaya 195
Drona ParvaAdhyaya 19571 Versesकौरव-पक्ष में मनोबल-भंग और अव्यवस्था; द्रोण का पराक्रम अभी प्रबल, पर उसके अंत की आहट से शक्ति-संतुलन निर्णायक मोड़ पर।

Adhyaya 195

Chapter Arc: कौरव-पक्ष की पंक्तियाँ शत्रुओं के उत्कर्ष को देखकर बार-बार काँप उठती हैं—आँखें आँसुओं से भरी, मन भय से रिक्त, और सेना का धैर्य टूटता हुआ। → हतोत्साह सैनिक आर्तस्वर में अपने नरेश के चारों ओर घिर आते हैं; बचे-खुचे गणों को समेटकर कृतवर्मा जैसे योद्धा अवशिष्ट दलों के साथ आगे बढ़ते हैं, पर रणभूमि पर द्रोणाचार्य का प्रचण्ड पराक्रम सबको दबा देता है—वृद्ध होकर भी सोलह वर्ष के समान रण में विचरते हुए। → द्रोण अपने ‘दैवविहित’ अंत को पहचानकर दिव्यास्त्र त्यागते हैं और रण में प्रायोपवेशन-सा भाव धारण करते हैं; उसी क्षण अश्वत्थामा भीतर-भीतर अग्नि की तरह भड़क उठता है—ईंधन पाकर धधकती ज्वाला के समान। → अध्याय का अंत अश्वत्थामा के क्रोध के उभार और कौरव-सेना की भयाक्रांत विघटन-स्थिति को स्थिर करता है—द्रोण के आसन्न पतन की छाया स्पष्ट हो जाती है, और नेतृत्व का संकट गहराता है। → अश्वत्थामा का यह ज्वलंत क्रोध आगे किस दिव्य प्रतिशोध/अस्त्र-प्रयोग में फूटेगा—यही प्रश्न अगले प्रसंग को खींच ले जाता है।

Shlokas

Verse 1

#5०3८६>- | # (नारायणास्त्रमोक्षपर्व) त्रिनवत्यधिकशततमो< ध्याय: कौरव-सैनिकों तथा सेनापतियोंका भागना

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! দ্রোণাচার্য নিহত হলে অস্ত্রাঘাতে জর্জরিত কৌরবরা, তাদের প্রধান বীরদের পতনে ভীষণভাবে বিধ্বস্ত হয়ে, সম্পূর্ণ শোকে নিমগ্ন হয়ে পড়ল।

Verse 2

उदीर्णाश्व परान्‌ दृष्टवा कम्पमाना: पुन: पुन: । अश्रुपूर्णेक्षणास्त्रस्ता दीनास्त्वासन्‌ विशाम्पते

প্রজানাথ! শত্রুপক্ষকে উত্থিত হতে দেখে তারা দীন ও ভীত হয়ে বারবার কাঁপতে লাগল। তাদের চোখ অশ্রুতে ভরে উঠল; তারা স্তব্ধ হয়ে দাঁড়িয়ে রইল—শত্রুদের প্রাধান্য বাড়তে দেখেই।

Verse 3

विचेतसो हतोत्साहा: कश्मलाभिहतौजस: । आर्तस्वरेण महता पुत्र ते पर्यवारयन्‌

তাদের চেতনা যেন লুপ্ত হয়ে গিয়েছিল; মোহে তাদের তেজ ও বল ক্ষয়প্রাপ্ত হয়েছিল। উৎসাহহীন হয়ে তারা করুণ উচ্চস্বরে বিলাপ করতে করতে আপনার পুত্রকে ঘিরে দাঁড়াল।

Verse 4

रजस्वला वेपमाना वीक्षमाणा दिशो दश । अश्रुकण्ठा यथा दैत्या हिरण्याक्षे पुरा हते

সঞ্জয় বললেন—ধূলিধূসর দেহে ভয়ে কাঁপতে কাঁপতে তারা দশ দিকের দিকে চেয়ে রইল। অশ্রুতে তাদের কণ্ঠ রুদ্ধ হয়ে এল—যেমন প্রাচীন কালে হিরণ্যাক্ষ নিহত হলে দৈত্যদের অবস্থা হয়েছিল।

Verse 5

स तै: परिवृतो राजा त्रस्तैः क्षुद्रमृुगैरिव । अशवनुवन्नवस्थातुमपायात्‌ तनयस्तव,डरे हुए क्षुद्र मृगोंके समान उन सैनिकोंसे घिरा हुआ आपका पुत्र राजा दुर्योधन वहाँ खड़ा न रह सका। वह भागकर अन्यत्र चला गया

সঞ্জয় বললেন—ভীত সৈন্যদের দ্বারা পরিবেষ্টিত হয়ে আপনার পুত্র রাজা সেখানে স্থির থাকতে পারল না। ভয়ে সন্ত্রস্ত ক্ষুদ্র হরিণে ঘেরা মহাপশুর মতো দুর্যোধন স্থৈর্য হারিয়ে অন্যত্র পালিয়ে গেল।

Verse 6

क्षुत्पिपासापरिम्लानास्ते योधास्तव भारत । आदित्येनेव संतप्ता भृशं॑ विमनसो5भवन्‌

সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! আপনার যোদ্ধারা ক্ষুধা ও তৃষ্ণায় ক্লান্ত হয়ে পড়েছিল। যেন প্রখর সূর্য তাদের দগ্ধ করেছে—তারা গভীরভাবে বিষণ্ণ ও নিরুৎসাহ হয়ে গেল।

Verse 7

भास्करस्थेव पतन समुद्रस्थेव शोषणम्‌ । विपर्यासं यथा मेरोव[सवस्येव निर्जयम्‌

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! যেমন সূর্যের পতন, সমুদ্রের শুকিয়ে যাওয়া, মেরুর উল্টো পথে চলা, কিংবা ইন্দ্রের পরাজয় অসম্ভব—তেমনি দ্রোণাচার্যের বধও অসম্ভব বলে মনে করা হত। কিন্তু সেই অসহনীয় বধ ঘটেছে দেখে কৌরবরা আতঙ্কে কেঁপে উঠল এবং যুদ্ধক্ষেত্র থেকে পালাতে লাগল।

Verse 8

अमर्षणीयं तद्‌ दृष्टवा भारद्वाजस्य पातनम्‌ | त्रस्तरूपतरा राजन्‌ कौरवा: प्राद्रवन्‌ भयात्‌

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! ভারদ্বাজপুত্র দ্রোণের সেই অসহনীয় পতন দেখে কৌরবরা আরও বেশি আতঙ্কিত হল; তারা কাঁপতে কাঁপতে ভয়ে পালিয়ে গেল।

Verse 9

गान्धारराज: शकुनिस्त्रस्तस्त्रस्ततरैः सह । हतं रुक्मरथं श्रुत्वा प्राद्रवत्‌ सहितो रथै:

রুক্মরথ নিহত হয়েছে—এই সংবাদ শুনে গন্ধাররাজ শকুনি, আগেই ভয়ে কাঁপছিল, আরও আতঙ্কিত রথীদের সঙ্গে রথসমেত দ্রুত পলায়ন করল।

Verse 10

सुवर्णमय रथवाले आचार्य द्रोणके मारे जानेका समाचार सुनकर गान्धारराज शकुनि त्रस्त हो उठा और अत्यन्त डरे हुए अपने रथियोंके साथ युद्धभूमिसे भाग चला ।।

ধ্বজা-পতাকায় চিহ্নিত, ভাঙা বিন্যাসে দ্রুত পলায়মান নিজের মহাসেনাকে সঙ্গে নিয়ে সূতপুত্র কর্ণ ভয়ে সেখান থেকে সরে গেল। আচার্য দ্রোণ নিহত—এই সংবাদ শুনে গন্ধাররাজ শকুনিও আতঙ্কিত হয়ে ভীত রথীদের সঙ্গে যুদ্ধক্ষেত্র থেকে পালাল।

Verse 11

रथनागाश्वकलिलां पुरस्कृत्य तु वाहिनीम्‌ । मद्राणामी श्वर: शल्यो वीक्षमाणो5पयाद्‌ भयात्‌,मद्रराज शल्य भी रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरी हुई अपनी सेनाको आगे करके भयके मारे इधर-उधर देखते हुए भागने लगे

রথ, হাতি ও অশ্বে ঘন নিজের বাহিনীকে সামনে রেখে মদ্ররাজ শল্য ভয়ে চারদিকে তাকাতে তাকাতে সেখান থেকে সরে গেল।

Verse 12

हतप्रवीरैर्भूयिष्ठैर्धजैर्बहुपताकिभि: । वृत:ः शारद्वतोड5गच्छत्‌ कष्ट कष्टमिति ब्रुवन्‌

অসংখ্য ধ্বজ ও বহু পতাকাবাহী সৈন্যে পরিবৃত—যদিও তাঁর বাহিনীর প্রধান বীরেরা নিহত—শারদ্বত (কৃপ) বারবার ‘হায়, কী ভয়ংকর বিপদ! কী ভয়ংকর বিপদ!’ বলতে বলতে যুদ্ধক্ষেত্র থেকে সরে গেলেন।

Verse 13

भोजानीकेन शिष्टेन कलिकड्जारट्टबाह्लिकै: । कृतवर्मा वृतो राजन्‌ प्रायात्‌ सुजवनै्हयै:

হে রাজন! ভোজদের অবশিষ্ট সৈন্য এবং কলিঙ্গ, আরট্ট ও বাহ্লিকদের বাহিনী দ্বারা পরিবৃত কৃতবর্মা অত্যন্ত দ্রুতগামী অশ্বযোজিত রথে চড়ে ত্বরিত সরে গেল।

Verse 14

पदातिगणसंयुक्तस्त्रस्तो राजन्‌ भयार्दित: । उलूकः: प्राद्रवत्‌ तत्र दृष्टवा द्रोणं निपातितम्‌

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! ভয়ে কাতর ও বিচলিত উলূক, পদাতিকদলের দ্বারা পরিবৃত হয়ে, সেখানে দ্রোণকে পতিত দেখে দ্রুত সেই স্থান থেকে পালিয়ে গেল।

Verse 15

दर्शनीयो युवा चैव शौर्येण कृतलक्षण: । दुःशासनो भृशोद्विग्न: प्राद्रवद्‌ गजसंवृत:

সঞ্জয় বললেন—শৌর্যে অর্জিত চিহ্নধারী সেই দর্শনীয় যুবক দুঃশাসনও ভয়ে অতিশয় বিচলিত হয়ে, গজদল দ্বারা পরিবৃত হয়ে, পালিয়ে গেল।

Verse 16

रथानामयुतं गृह त्रिसाहस््रं च दन्तिनाम्‌ । वृषसेनो ययोौ तूर्ण दृष्टवा द्रोणं निपातितम्‌

সঞ্জয় বললেন—দ্রোণকে পতিত দেখে বৃষসেন দশ হাজার রথ ও তিন হাজার হস্তী সঙ্গে নিয়ে তৎক্ষণাৎ দ্রুত অগ্রসর হল।

Verse 17

गजाश्वरथसंयुक्तो वृतश्चवैव पदातिभि: । दुर्योधनो महाराज प्रायात्‌ तत्र महारथ:,महाराज! हाथी, घोड़े और रथोंकी सेनासे युक्त तथा पैदल सैनिकोंसे घिरा हुआ महारथी दुर्योधन भी रणभूमिसे भाग चला

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! গজ, অশ্ব ও রথবাহিনীসহ এবং পদাতিকদের দ্বারা পরিবৃত মহারথী দুর্যোধনও সেখান থেকে অগ্রসর হল।

Verse 18

संशप्तकगणान्‌ गृह हतशेषान्‌ किरीटिना । सुशर्मा प्राद्रवद्‌ राजन्‌ दृष्टवा द्रोणं निपातितम्‌

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! কিরীটী অর্জুনের হাতে নিহত হওয়া থেকে যে সামশপ্তকরা অবশিষ্ট ছিল, তাদের সঙ্গে নিয়ে সুশর্মা, রণক্ষেত্রে দ্রোণকে পতিত দেখে, সেখান থেকে পালিয়ে গেল।

Verse 19

गजान्‌ रथान्‌ समारुहा व्युदस्य च हयाञ्जना: । प्राद्रवन्‌ सर्वतः संख्ये दृष्टवा रुक्मरथं हतम्‌

সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধক্ষেত্রে সোনালি রথের বীর দ্রোণ নিহত হয়েছেন দেখে বহু সৈন্য—কেউ হাতি ও রথে চড়ে, কেউ আবার ঘোড়া পর্যন্ত ত্যাগ করে—রণকোলাহলের মধ্যে চারিদিকে ছুটে পালাল।

Verse 20

त्वरयन्तः पितृनन्ये भ्रातृनन्येड5थ मातुलान्‌ । पुत्रानन्ये वयस्यांश्व प्राद्रवन्‌ कुरवस्तदा

সঞ্জয় বললেন—তখন কৌরবরা রণক্ষেত্র ত্যাগ করে পালাল; কেউ পিতাকে তাড়াতাড়ি করতে বলল, কেউ ভাইকে, কেউ মাতুলকে; আবার কেউ পুত্র ও বন্ধুকে দ্রুত পালাতে তাগিদ দিল।

Verse 21

चोदयन्तश्न सैन्यानि स्वस्त्रीयांश्ष॒ तथापरे । सम्बन्धिनस्तथान्ये च प्राद्रवन्त दिशो दश

সঞ্জয় বললেন—কেউ নিজের সৈন্যদলকে তাড়িয়ে নিয়ে যাচ্ছিল, কেউ নিজের নারীদের ডাকছিল, কেউ আত্মীয়স্বজনকে চিৎকার করে আহ্বান করছিল—এভাবে আতঙ্কে তারা দশ দিকেই ছড়িয়ে পড়ে পালাল।

Verse 22

प्रकीर्णकेशा विध्वस्ता न द्वावेकत्र धावत: । नेदमस्तीति मन्वाना हतोत्साहा हतौजस:

তাদের চুল এলোমেলো, তারা হোঁচট খেতে খেতে ছুটছিল; দু’জনও একসঙ্গে একদিকে দৌড়াচ্ছিল না। ‘এখন আর এই সেনা টিকবে না’—এমন মনে করে তাদের উদ্যম ও শক্তি নিঃশেষ হয়ে গিয়েছিল।

Verse 23

उत्सृज्य कवचानन्ये प्राद्रवंस्तावका विभो । अन्योन्यं ते समाक्रोशन्‌ सैनिका भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! प्रभो! आपके कितने ही सैनिक कवच उतारकर एक-दूसरेको पुकारते हुए भाग रहे थे

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! হে প্রভু! আপনার বহু সৈন্য বর্ম ত্যাগ করে পালিয়ে গেল; আর পালাতে পালাতে তারা একে অন্যকে ডেকে চিৎকার করছিল।

Verse 24

तिष्ठ तिछतेति न च ते स्वयं तत्रावतस्थिरे । धुर्यानिन्मुच्य च रथाद्धतसूतात्‌ स्वलंकृतान्‌ । अधिरुहा हयान्‌ योधा: क्षिप्रं पद्धिरचोदयन्‌

সঞ্জয় বললেন—তারা “থামো, থামো” বলে চিৎকার করলেও নিজেরা সেখানে থামল না। অনেক যোদ্ধা সারথিহীন রথ দেখে ধুর থেকে সুসজ্জিত ঘোড়াগুলি খুলে নিয়ে তাতে চড়ে বসে, পা দিয়েই দ্রুত তাদের তাড়িয়ে নিয়ে যেতে লাগল।

Verse 25

द्रवमाणे तथा सैन्ये त्रस्तरूपे हतौजसि । प्रतिस्रोत इव ग्राहो द्रोणपुत्र: परानियात्‌

সঞ্জয় বললেন—এভাবে যখন সমগ্র সেনা ভয়ে সন্ত্রস্ত হয়ে শক্তি ও উদ্যম হারিয়ে পালাচ্ছিল, তখন দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা শত্রুর দিকে অগ্রসর হল—যেন স্রোতের বিপরীতে উজানে উঠতে থাকা এক গ্রাহ।

Verse 26

तस्यासीत्‌ सुमहद्‌ युद्ध शिखण्डिप्रमुखैर्गणै: । प्रभद्रकैश्न॒ पाञज्चालैश्लेदिभिश्व॒ सकेकयै:

সঞ্জয় বললেন—সেই সময় শিখণ্ডীকে প্রধান করে প্রভদ্রক, পাঞ্চাল, চেদি ও কেকয় প্রভৃতি গণের সঙ্গে তার এক মহাভয়ংকর যুদ্ধ চলছিল।

Verse 27

हत्वा बहुविधा: सेना: पाण्डूनां युद्धदुर्मदः । कथंचित्‌ संकटान्मुक्तो मत्तद्विरदविक्रम:

সঞ্জয় বললেন—পাণ্ডবদের নানা প্রকার সেনাদল সংহার করে, যুদ্ধোন্মত্ত অশ্বত্থামা—মত্ত হস্তীর ন্যায় পরাক্রমশালী—কোনোমতে সেই ভয়ংকর যুদ্ধ-সঙ্কট থেকে মুক্ত হল।

Verse 28

द्रवमाणं बल॑ दृष्टयवा पलायनकृतक्षणम्‌ । दुर्योधनं समासाद्य द्रोणपुत्रोडब्रवीदिदम्‌

সঞ্জয় বললেন—সে দেখল, সেনাবল ছত্রভঙ্গ হয়ে ছুটে চলেছে এবং সবাই পালানোর জন্য উদ্যত। তখন দ্রোণপুত্র দুর্যোধনের কাছে গিয়ে এই কথা বলল।

Verse 29

किमियं द्रवते सेना त्रस्तरूपेव भारत । द्रवमाणां च राजेन्द्र नावस्थापयसे रणे

সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! এই সেনা কেন ভীতসন্ত্রস্তের মতো পালিয়ে যাচ্ছে? হে রাজেন্দ্র! রণক্ষেত্রে ছুটে-পালানো এই সৈন্যদের তুমি কেন থামাতে চেষ্টা করছ না?

Verse 30

त्वं चापि न यथापूर्व प्रकृतिस्थो नराधिप । कर्णप्रभृतयश्चेमे नावतिष्ठन्ति पार्थिव

সঞ্জয় বললেন—হে নরাধিপ! তুমি আগের মতো স্থিরচিত্ত দেখাচ্ছ না। হে পার্থিব! কর্ণ প্রমুখ এই বীরেরা রণক্ষেত্রে স্থির হয়ে দাঁড়াচ্ছে না—এর কারণ কী?

Verse 31

अन्येष्वपि च युद्धेषु नैव सेनाद्रवत्‌ तदा । कच्चित्‌ क्षेमं महाबाहो तव सैन्यस्थ भारत,“अन्य संग्रामोंमें भी आपकी सेना इस प्रकार नहीं भागी थी। महाबाहु भरतनन्दन! आपकी सेना सकुशल तो है न?

সঞ্জয় বললেন—অন্য যুদ্ধগুলিতেও তখন তোমার সেনা এভাবে পালায়নি। হে মহাবাহু, হে ভারতকুলশ্রেষ্ঠ! তোমার শিবিরে অবস্থানকারী সৈন্যদল কি কুশল আছে?

Verse 32

कस्मिन्निदं हते राजन्‌ रथसिंहे बल॑ तव । एतामवस्थां सम्प्राप्तं तन्ममाचक्ष्व कौरव,“राजन्‌! कुरुनन्दन! किस सिंहके समान पराक्रमी रथीके मारे जानेपर आपकी यह सेना इस दुरवस्थाको पहुँच गयी है। यह मुझे बताइये”

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, হে কুরুনন্দন! কোন সিংহসম বীর রথীর নিহত হওয়ায় তোমার সেনা এই অবস্থায় পতিত হয়েছে? হে কৌরব! তা আমাকে বলো।

Verse 33

तत्तु दुर्योधन: श्रुत्वा द्रोणपुत्रस्य भाषितम्‌ | घोरमप्रियमाख्यातुं नाशक्नोत्‌ पार्थिवर्षभ:,द्रोणपुत्र अश्वत्थामाकी यह बात सुनकर नृपश्रेष्ठ दुर्योधन यह घोर अप्रिय समाचार स्वयं उससे न कह सका

সঞ্জয় বললেন—দ্রোণপুত্রের কথাগুলি শুনে নৃপশ্রেষ্ঠ দুর্যোধন সেই ভয়ংকর ও অপ্রিয় সংবাদ নিজে ঘোষণা করতে পারল না।

Verse 34

भिन्ना नौरिव ते पुत्रो मग्न: शोकमहार्णवे । बाष्पेणापिहितो दृष्ट्वा द्रोणपुत्रं रथे स्थितम्‌

সঞ্জয় বললেন—আপনার পুত্র যেন মাঝধারায় ভেঙে যাওয়া নৌকার মতো শোকের মহাসমুদ্রে ডুবে যাচ্ছিল। রথে স্থিত দ্রোণপুত্রকে দেখে তার চোখ অশ্রুতে আচ্ছন্ন হল, শোকের চাপে তার স্থৈর্য ভেঙে পড়ল।

Verse 35

ततः शारद्वधतं राजा सव्रीडमिदमब्रवीत्‌ । शंसात्र भद्र ते सर्व यथा सैन्यमिदं द्रुतम्‌

তখন রাজা দুর্যোধন লজ্জিত হয়ে শারদ্বত (কৃপাচার্য)-কে বলল—“গুরুদেব, আপনার মঙ্গল হোক। এখানে সব কথা যেমন ঘটেছে তেমনই বলুন—এই সমগ্র সেনা কেন এত দ্রুত পালিয়ে যাচ্ছে?”

Verse 36

अथ शारद्वतो राजन्नार्तिमार्च्छन्‌ पुन: पुनः । शशंस द्रोणपुत्राय यथा द्रोणो निपातित:

হে রাজন, তখন শারদ্বত (কৃপাচার্য) বারবার বেদনায় আচ্ছন্ন হয়ে দ্রোণপুত্রকে জানাতে লাগলেন—কীভাবে আচার্য দ্রোণকে পতিত করা হয়েছিল।

Verse 37

कृप उवाच वयं द्रोणं पुरस्कृत्य पृथिव्यां प्रवरं रथम्‌ । प्रावर्तयाम संग्रामं पडचालैरेव केवलम्‌

কৃপাচার্য বললেন—“বৎস! পৃথিবীর শ্রেষ্ঠ মহারথী দ্রোণকে অগ্রে রেখে আমরা কেবল পাঞ্চালদের সঙ্গেই যুদ্ধ আরম্ভ করেছিলাম।”

Verse 38

ततः प्रवत्ते संग्रामे विमिश्रा: कुरुसोमका: । अन्योन्यमभिगर्जान्त: शस्त्रैदेहानपातयन्‌

যুদ্ধ শুরু হতেই কুরু ও সোমক যোদ্ধারা পরস্পর মিশে গেল। কাছাকাছি এসে একে অন্যের প্রতি গর্জন করতে করতে তারা অস্ত্রাঘাতে শত্রুদের দেহ মাটিতে লুটিয়ে দিতে লাগল।

Verse 39

वर्तमाने तथा युद्धे क्षीयमाणेषु संयुगे । धार्तरिष्टेषु संक़ुद्ध: पिता ते<स्त्रमुदैरयत्‌

যুদ্ধ চলতে থাকলে, সংঘাতে ধৃতরাষ্ট্রপক্ষের যোদ্ধারা যখন ক্ষয়প্রাপ্ত হতে লাগল, তখন তোমার পিতা প্রবল ক্রোধে ব্রহ্মাস্ত্র প্রকাশ করলেন।

Verse 40

ततो द्रोणो ब्राह्ममस्त्रं विकुर्वाणो नरर्षभ: । व्यहनच्छात्रवान्‌ भल्लै: शतशो5थ सहस्रश:

তখন নরশ্রেষ্ঠ দ্রোণ ব্রাহ্মাস্ত্রকে কার্যকর করে তুললেন; ক্ষুরধার ভল্লে শিরস্ত্রাণধারী যোদ্ধাদের শত শত, পরে সহস্র সহস্র করে নিপাত করলেন।

Verse 41

ब्रह्मास्त्र प्रकट करते हुए नरश्रेष्ठ द्रोणने सैकड़ों और हजारों भल्लोंद्वारा शत्रु-सैनिकोंका संहार कर डाला ।।

ব্রহ্মাস্ত্র প্রকাশ করে নরশ্রেষ্ঠ দ্রোণ শত শত ও সহস্র সহস্র তীক্ষ্ণ ভল্লে শত্রুসেনাকে বিনাশ করলেন। পাণ্ডব, কেকয়, মৎস্য এবং বিশেষত পাঞ্চাল—কালের প্রেরণায়—যুদ্ধে দ্রোণের রথের নিকট এসে ধ্বংসপ্রাপ্ত হল।

Verse 42

सहसतं नरसिंहानां द्विसाहस्नं च दन्तिनाम्‌ । द्रोणो ब्रह्मास्त्रयोगेन प्रेषयामास मृत्यवे

ব্রহ্মাস্ত্র প্রয়োগে দ্রোণ মানবসিংহসম এক সহস্র বীরকে এবং দুই সহস্র গজকে মৃত্যুর মুখে পাঠালেন।

Verse 43

आकर्णपलित: श्यामो ववसाशीतिपञ्चक: । रणे पर्यचरद द्रोणो वृद्धः षोडशवर्षवत्‌

কান পর্যন্ত কেশ পাকা, শ্যামবর্ণ, বয়সে বৃদ্ধ হয়েও দ্রোণ রণক্ষেত্রে ষোলো বছরের যুবকের মতো সর্বত্র বিচরণ করলেন।

Verse 44

क्लिश्यमानेषु सैन्येषु वध्यमानेषु राजसु । अमर्षवशमापतन्ना: पजचला विमुखा5भवन्‌,जब इस प्रकार सेनाएँ कष्ट पाने लगीं तब बहुत-से नरेश कालके गालमें जाने लगे, तब अमर्षमें भरे हुए पांचाल युद्धसे विमुख हो गये

যখন সেনাদল ক্লিষ্ট হচ্ছিল এবং বহু রাজা নিহত হচ্ছিল, তখন অপমানবোধ ও ক্রোধে আচ্ছন্ন পাঞ্চালরা যুদ্ধ থেকে মুখ ফিরিয়ে নিল।

Verse 45

तेषु किंचित्‌ प्रभग्नेषु विमुखेषु सपत्नजित्‌ । दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणो बभूवार्क इवोदित:

তাদের মধ্যে কেউ কেউ ভেঙে পড়ে পশ্চাদপসরণ করলে, শত্রুজয়ী বীর দিব্য অস্ত্র প্রয়োগ করতে লাগল এবং নবোদিত সূর্যের মতো দীপ্ত হয়ে উঠল।

Verse 46

वे कुछ हतोत्साह होकर जब युद्धसे विमुख हो गये, तब दिव्य अस्त्र प्रकट करनेवाले शत्रुविजयी द्रोणाचार्य उदित हुए सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे ।।

তারা যখন উৎসাহ হারিয়ে যুদ্ধ থেকে মুখ ফিরিয়ে নিল, তখন দিব্য অস্ত্রপ্রকাশক শত্রুজয়ী দ্রোণাচার্য উদিত সূর্যের মতো দীপ্ত হলেন। পাণ্ডবসেনার মধ্যভাগে প্রবেশ করে, বাণরশ্মিতে আবৃত তোমার প্রতাপী পিতা দ্রোণ মধ্যাহ্নসূর্যের ন্যায় জ্বলতে লাগলেন; তখন তাঁর দিকে তাকানোই কঠিন হয়ে উঠল।

Verse 47

ते दहामाना द्रोणेन सूर्येणेव विराजता । दग्धवीर्या निरुत्साहा बभूवुर्गतचेतस:

সূর্যের মতো দীপ্ত দ্রোণের দ্বারা দগ্ধ হয়ে তাদের বীর্য-পরাক্রম নিঃশেষ হল; তারা নিরুৎসাহ হয়ে চিত্তবিভ্রান্ত হয়ে পড়ল।

Verse 48

प्रकाशमान सूर्यके समान तेजस्वी द्रोणाचार्यद्वारा दग्ध किये जाते हुए पांचालोंके बल और पराक्रम भी दग्ध हो गये थे। वे उत्साहशून्य तथा अचेत हो गये थे ।।

প্রকাশমান সূর্যের ন্যায় তেজস্বী দ্রোণের দ্বারা দগ্ধ হতে হতে পাঞ্চালদের দেহই নয়, তাদের বল ও পরাক্রমও ভস্মীভূত হল; তারা নিরুৎসাহ ও বিমূঢ়চিত্ত হয়ে পড়ল। দ্রোণের বাণে পীড়িত তাদের দেখে, পাণ্ডুপুত্রদের জয়কামী মধুসূদন শ্রীকৃষ্ণ এই কথা বললেন।

Verse 49

नैष जातु नरै: शक्यो जेतुं शस्त्रभृतां वर: । अपि वृत्रहणा संख्ये रथयूथपयूथप:

কৃপ বললেন—শস্ত্রধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ দ্রোণকে মানুষ কখনও জয় করতে পারে না। যুদ্ধের ঘোর সংঘর্ষে বৃত্রহন্তা ইন্দ্রও—যিনি রথদলের অধিপতিদেরও অধিপতি—তাঁকে পরাভূত করতে অক্ষম হবেন।

Verse 50

ते यूयं धर्ममुत्सृूज्य जयं रक्षत पाण्डवा: । यथा व: संयुगे सर्वान्‌ न हन्याद्‌ रुक्मवाहन:

কৃপ বললেন—হে পাণ্ডবগণ, এই মুহূর্তে ধর্মবিচার এক পাশে রেখে জয়ের রক্ষা করো, যাতে যুদ্ধক্ষেত্রে রুক্মবাহন (সোনার রথারূঢ়) দ্রোণ তোমাদের সকলকে বধ না করেন।

Verse 51

“अतः पाण्डव! तुमलोग धर्मका विचार छोड़कर विजयकी रक्षाका प्रयत्न करो, जिससे सुवर्णमय रथवाले द्रोणाचार्य युद्धस्थलमें तुम सब लोगोंका संहार न कर सकें ।।

কৃপ বললেন—হে পাণ্ডবগণ, ধর্মবিচার ত্যাগ করে জয়ের রক্ষায় উদ্যোগী হও, যাতে সোনার রথারূঢ় দ্রোণ যুদ্ধক্ষেত্রে তোমাদের সকলকে নিধন না করেন। আমার বিশ্বাস, অশ্বত্থামা নিহত হয়েছে—এ কথা বিশ্বাস করলে তিনি আর যুদ্ধ করবেন না; অতএব যুদ্ধে কেউ মিথ্যা করেই তাঁকে বলুক—“অশ্বত্থামা নিহত।”

Verse 52

एतन्नारोचयद्‌ वाक्यं कुन्तीपुत्रो धनंजय: । अरोचयंस्तु सर्वेडन्ये कृच्छेण तु युधिष्ठिर:

কৃপার এই প্রস্তাব কুন্তীপুত্র ধনঞ্জয় অর্জুনের ভালো লাগল না। কিন্তু অন্য সকলের কাছে তা গ্রহণযোগ্য মনে হল; কেবল যুধিষ্ঠিরও প্রবল সংকোচ ও কষ্ট নিয়ে অনিচ্ছাসত্ত্বেও সম্মতি দিলেন।

Verse 53

भीमसेनस्तु सव्रीडमब्रवीत्‌ पितरं तव । अश्वत्थामा हत इति तं नाबुध्यत ते पिता,तब भीमसेनने लजाते-लजाते तुम्हारे पितासे कहा--“अश्व॒त्थामा मारा गया!। परंतु उनकी इस बातपर तुम्हारे पिताको विश्वास नहीं हुआ

তখন ভীমসেন লজ্জিত হয়ে তোমার পিতাকে বলল—“অশ্বত্থামা নিহত।” কিন্তু তোমার পিতা সেই কথাকে সত্য বলে গ্রহণ করলেন না।

Verse 54

स शड्कमानस्तन्मि थ्या धर्मराजमपृच्छत । हतं वाप्यहतं वा5<जौ त्वां पिता पुत्रवत्सल:

সংবাদটি মিথ্যা কি না—এই সন্দেহে সে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরকে জিজ্ঞাসা করল। পুত্রস্নেহে আচ্ছন্ন পিতা রণক্ষেত্রে তোমাকে বলল—“অশ্বত্থামা নিহত হয়েছে, না হয়নি?”

Verse 55

तमतथ्यभये मग्नो जये सक्तो युधिष्ठिर: । अश्वत्थामानमायोधे हतं दृष्टया महागजम्‌

অসত্যের ভয়ে নিমগ্ন হয়েও যুধিষ্ঠির জয়ে আসক্ত ছিলেন। রণক্ষেত্রে ‘অশ্বত্থামা’ নামক মহাগজ নিহত হয়েছে দেখে তিনি দ্রোণাচার্যের কাছে গিয়ে উচ্চস্বরে বললেন।

Verse 56

भीमेन गिरिवर्ष्माणं मालवस्यथेन्द्रवर्मण: । उपसृत्य तदा द्रोणमुच्चैरिदमुवाच ह

ভীমসেন মালব-রাজ ইন্দ্রবর্মার পর্বতদেহী গজরাজকে বধ করেছে দেখে যুধিষ্ঠির দ্রোণাচার্যের কাছে গিয়ে উচ্চস্বরে বললেন।

Verse 57

यस्यार्थे शस्त्रमादत्से यमवेक्ष्य च जीवसि । पुत्रस्ते दयितो नित्यं सो5श्वत्थामा निपातित:

“আচার্য! যার জন্য আপনি অস্ত্র ধারণ করেন, আর যার মুখ দেখে আপনি বাঁচেন—আপনার সেই চিরপ্রিয় পুত্র অশ্বত্থামা নিহত হয়েছে।”

Verse 58

शेते विनिहतो भूमौ वने सिंहशिशुर्यथा

“সে ভূমিতে নিহত হয়ে পড়ে আছে—যেমন বনে সিংহশাবক পড়ে থাকে।”

Verse 59

जानन्नप्यनृतस्याथ दोषान्‌ स द्विजसत्तमम्‌ | अव्यक्तमब्रवीद्‌ राजा हत: कुछ्जर इत्युत

অসত্য বলার দোষ জেনেও রাজা যুধিষ্ঠির ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ দ্রোণকে সেইরূপ কথা বললেন। তারপর সত্য যেন স্পষ্ট না শোনা যায়—এই উদ্দেশ্যে অস্পষ্ট স্বরে তিনি যোগ করলেন—“আসলে এই নামেরই এক হাতি নিহত হয়েছে।”

Verse 60

स त्वां निहतमाक्रन्दे श्रुत्वा संतापतापित: । नियम्य दिव्यान्यस्त्राणि नायुध्यत यथा पुरा

রণক্ষেত্রে ‘তুমি নিহত’—এই আর্তনাদ শুনে তিনি শোকের দাহে দগ্ধ হলেন। দিব্যাস্ত্র সংযত করে তিনি পূর্বের মতো আর যুদ্ধ করলেন না।

Verse 61

त॑ दृष्टवा परमोद्धिग्नं शोकातुरमचेतसम्‌ । पांचालराजस्य सुत: क्रूरकर्मा समाद्रवत्‌,उन्हें अत्यन्त उद्विग्न, शोकाकुल और अचेत हुआ देख पांचालराजका क्रूरकर्मा पुत्र धृष्टद्यम्म उनकी ओर दौड़ा

তাঁকে অত্যন্ত বিচলিত, শোকে কাতর ও চেতনাহীনপ্রায় দেখে পাঞ্চালরাজের ক্রূরকর্মা পুত্র ধৃষ্টদ্যুম্ন তাঁর দিকে ধাবিত হল।

Verse 62

त॑ं दृष्टवा विहितं मृत्युं लोकतत्त्वविचक्षण: । दिव्यान्यस्त्राण्यथोत्सज्य रणे प्रायमुपाविशत्‌

লোকতত্ত্বে বিচক্ষণ আচার্য নিজের জন্য বিধিত মৃত্যুরূপ ধৃষ্টদ্যুম্নকে সামনে দেখে দিব্যাস্ত্র ত্যাগ করলেন এবং রণক্ষেত্রেই প্রায়—অর্থাৎ আমরণ উপবাসের ব্রত—গ্রহণ করে বসে পড়লেন।

Verse 63

ततो<सस्‍्य केशान्‌ सव्येन गृहीत्वा पाणिना तदा । पार्षतः क्रोशमानानां वीराणामच्छिनच्छिर:

তখন পার্ষত (ধৃষ্টদ্যুম্ন) বীরদের চিৎকার ও নিবৃত্তির আহ্বান উপেক্ষা করে বাম হাতে আচার্যের কেশ ধরে ডান হাতে তাঁর মস্তক ছিন্ন করল।

Verse 64

न हन्तव्यो न हन्तव्य इति ते सर्वतो<ब्रुवन्‌ । तथैव चार्जुनो वाहादवरुहनैनमाद्रवत्‌,वे सब वीर चारों ओरसे यही कह रहे थे कि “न मारो, न मारो”। अर्जुन भी यही कहते हुए अपने रथसे उतरकर उसकी ओर दौड़ पड़े

চারদিক থেকে বীরেরা চিৎকার করল—“মারো না, মারো না!” অর্জুনও সেই কথাই বলতে বলতে রথ থেকে নেমে তাকে থামাতে তার দিকে ছুটে গেল।

Verse 65

उद्यम्य त्वरितो बाहुं ब्रुवाणश्व॒ पुनः पुन: । जीवन्तमानयाचार्य मा वधीरिति धर्मवित्‌

ধর্মজ্ঞ কৃপ দ্রুত হাত তুলে বারবার বললেন—“আচার্যকে জীবিত ধরে নিয়ে এসো; তাঁকে হত্যা কোরো না।”

Verse 66

तथा निवार्यमाणेन कौरवैरर्जुनेन च । हत एव नृशंसेन पिता तव नरर्षभ,नरश्रेष्ठ) इस प्रकार कौरवों तथा अर्जुनके रोकनेपर भी उस नृशंसने तुम्हारे पिताकी हत्या कर ही डाली

এভাবে কৌরবদের ও অর্জুনের বাধা সত্ত্বেও সেই নিষ্ঠুর ব্যক্তি তোমার পিতাকে হত্যা করেই ফেলল, হে নরশ্রেষ্ঠ।

Verse 67

सैनिकाश्न ततः सर्वे प्राद्रवन्त भयार्दिता: । वयं चापि निरुत्साहा हते पितरि तेडनघ

তারপর তোমার পিতা নিহত হওয়ায় সব সৈন্য ভয়ে কাতর হয়ে পালিয়ে গেল; আর হে নিষ্পাপ, আমরাও উৎসাহহীন হয়ে পড়েছি।

Verse 68

संजय उवाच तच्छुत्वा द्रोणपुत्रस्तु निधनं पितुराहवे । क्रोधमाहारयत्‌ तीव्रं पदाहत इवोरग:

সঞ্জয় বললেন—রাজন! যুদ্ধে পিতার নিহত হওয়ার সংবাদ শুনে দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা পদদলিত সাপের মতো প্রবল ক্রোধে জ্বলে উঠল।

Verse 69

ततः क्रुद्धो रणे द्रौणिभभृशं जज्वाल मारिष । यथेन्धनं महत्‌ प्राप्य प्राज्वलद्धव्यवाहन:

তখন রণক্ষেত্রে দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা ক্রোধে ভীষণভাবে জ্বলে উঠল, হে মান্যবর; যেমন প্রচুর ইন্ধন পেলে হব্যবাহন যজ্ঞাগ্নি প্রবলভাবে প্রজ্বলিত হয়।

Verse 70

माननीय नरेश! जैसे अग्निदेव सूखे काठकी बहुत बड़ी राशि पाकर प्रचण्डरूपसे प्रज्वलित हो उठते हैं, उसी प्रकार रणभूमिमें अश्वत्थामा अत्यन्त क्रोधसे जलने लगा ।।

হে মান্য নৃপতি! যেমন অগ্নিদেব শুকনো কাঠের বিরাট স্তূপ পেয়ে প্রচণ্ডভাবে প্রজ্বলিত হন, তেমনি রণভূমিতে অশ্বত্থামা প্রবল ক্রোধে দগ্ধ হতে লাগল। সে তালুর সঙ্গে তালু ঘষে, দাঁতে দাঁত চেপে ধরল; আর সাপের মতো ফোঁসফোঁস করতে করতে দীর্ঘ নিশ্বাস টানল—তখন তার চোখ রক্তিম হয়ে উঠল।

Verse 193

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वण्यश्रवृत्थामक्रो थे त्रिनवत्यधिकशततमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বে নারায়ণাস্ত্র-মোক্ষণপর্বের অন্তর্গত অশ্বত্থামার ক্রোধবর্ণক একশ তিরানব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

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