
Chapter Arc: रात्रियुद्ध के धुएँ-धूल और राक्षसी मायाओं के बीच पाण्डव-पक्ष घटोत्कच-वध से शोकाकुल है—उसी क्षण संजय धृतराष्ट्र को बताता है कि आश्चर्यतः श्रीकृष्ण हर्ष से भर उठे। → अर्जुन के रथ पर वासुदेव का सिंहनाद, आलिंगन और पीठ थपथपाना पाण्डवों के शोक के विपरीत एक तीखा विरोध रचता है; यह संकेत देता है कि घटोत्कच का पतन केवल हानि नहीं, किसी बड़े संकट के टलने का कारण है। → श्रीकृष्ण का उन्मत्त-हर्ष—घोड़ों की रास रोककर, वृक्ष-सा थरथराते हुए गर्जना करना, अर्जुन को बार-बार परिष्वजित करना—और यह कहना कि आज जो हुआ वह समुद्र के सूखने या मेरु के हिलने जैसा अद्भुत है (अर्थात् कर्ण की शक्ति का लक्ष्य बदल गया)। → कृष्ण का आशय स्पष्ट होता है: कर्ण की एकमात्र अचूक/प्रलयंकारी शक्ति घटोत्कच पर व्यय हो गई; अब अर्जुन-वध का वह ‘एकमात्र योग’ (अवसर) टूट गया, इसलिए भविष्य का निर्णायक द्वंद्व पाण्डवों के लिए संभव हुआ। → रात्रि के रक्त-आवरण के बाद अगला प्रश्न शेष रहता है—अब कर्ण अपने शेष पराक्रम से किसे लक्ष्य करेगा, और अर्जुन-कर्ण का अनिवार्य महासंग्राम किस रूप में फूटेगा?
Verse 1
ऑपनआक्राा बछ। 5 - खंभेके समान आकृतिवाले। अशीर्त्याधिकशततमो<& ध्याय: घटोत्कचके वधसे पाण्डवोंका शोक तथा श्रीकृष्णकी प्रसन्नता और उसका कारण संजय उवाच हैडिम्बिं निहतं दृष्टवा विशीर्णमिव पर्वतम् । बभूवु: पाण्डवा: सर्वे शोकबाष्पाकुलेक्षणा:
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, হিডিম্বের পুত্র ঘটোৎকচকে নিহত দেখে—যেন ভেঙে পড়া পর্বতের মতো—সমস্ত পাণ্ডব শোকে আচ্ছন্ন হলেন; তাঁদের চোখ অশ্রুজলে ভরে উঠল।
Verse 2
वासुदेवस्तु हर्षण महताभिपरिप्लुत: । ननाद सिंहनादं वै पर्यष्वजत फाल्गुनम्,परंतु वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण बड़े हर्षमें मगन होकर सिंहनाद करने लगे। उन्होंने अर्जुनको छातीसे लगा लिया
কিন্তু বাসুদেবনন্দন শ্রীকৃষ্ণ মহাহর্ষে আপ্লুত হয়ে সিংহনাদ করলেন এবং ফাল্গুন (অর্জুন)কে বক্ষের সঙ্গে আলিঙ্গন করলেন।
Verse 3
स विनद्य महानादमभीषून् संनियम्य च । ननर्त हर्षसंवीतो वातोद्धूत इव ट्रुम:,वे बड़े जोरसे गर्जना करके घोड़ोंकी रास रोककर हवाके हिलाये हुए वृक्षके समान हर्षसे झूमकर नाचने लगे
তিনি মহাগর্জন করে অশ্বদের রাশ টেনে ধরলেন; তারপর হর্ষে অভিভূত হয়ে বায়ুতে দুলতে থাকা বৃক্ষের মতো নৃত্য করতে লাগলেন।
Verse 4
ततः परिष्वज्य पुन: पार्थमास्फोट्य चासकृत् । रथोपस्थगतो धीमान् प्राणदत् पुनरच्युत:
তারপর তিনি আবার পার্থকে আলিঙ্গন করে বারবার পিঠ চাপড়ালেন; রথের পশ্চাৎভাগে আসীন প্রজ্ঞাবান অচ্যুত পুনরায় উচ্চ গর্জন করলেন।
Verse 5
प्रह्ष्टमनसं ज्ञात्वा वासुदेव॑ महाबल: । अर्जुनो<थाब्रवीद् राजन्नातिहृष्टमना इव,राजन! भगवान् श्रीकृष्णके मनमें अधिक प्रसन्नता हुई जानकर महाबली अर्जुन कुछ अप्रसन्न-से होकर बोले--
হে রাজন, বাসুদেবের অন্তরে অতিশয় আনন্দ হয়েছে জেনে মহাবলী অর্জুন যেন অতিরিক্ত উল্লসিত নন—এমন ভঙ্গিতে কথা বললেন।
Verse 6
अतिहर्षोडयमस्थाने तवाद्य मधुसूदन । शोकस्थाने तु सम्प्राप्ते हैडिम्बस्य वधेन तु
হে মধুসূদন, আজ তোমার এই অতিরিক্ত আনন্দ অনুচিত সময়ে। হিডিম্বার পুত্র হৈডিম্ব (ঘটোৎকচ) নিহত হওয়ায় আমাদের জন্য তো এটি শোকের ক্ষণ।
Verse 7
विमुखानीह सैन्यानि हतं दृष्टवा घटोत्कचम् । वयं च भृशमुद्विग्ना हैडिम्बेस्तु निपातनात्
ঘটোৎকচ নিহত হয়েছে দেখে এখানকার সেনারা যুদ্ধ থেকে মুখ ফিরিয়ে বিশৃঙ্খলভাবে সরে যাচ্ছে; আর হিডিম্বার পুত্র পতিত হওয়ায় আমরাও গভীরভাবে বিচলিত।
Verse 8
नैतत्कारणमल्पं हि भविष्यति जनार्दन । तदद्य शंस मे पृष्ट: सत्यं सत्यवतां वर
হে জনার্দন! এমন আনন্দের কারণ তুচ্ছ হতে পারে না। তাই আজ আমি জিজ্ঞাসা করছি—সত্যভাষীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ প্রভু! সত্য করে আমাকে এর প্রকৃত কারণ বলুন।
Verse 9
यद्येतन्न रहस्यं ते वक्तुमर्हस्यरिंदम । धैर्यस्य वैकृतं ब्रूहि त्वमद्य मधुसूदन
হে শত্রুদমন! যদি এটি গোপনীয় না হয় এবং আপনি বলাকে উপযুক্ত মনে করেন, তবে আমাকে অবশ্যই বলুন। হে মধুসূদন! আজ আপনার এই অস্বাভাবিক আনন্দপ্রকাশে আমাদের ধৈর্য টলে যাচ্ছে; অতএব এর কারণ জানান।
Verse 10
समुद्रस्येव संशोष॑ मेरोरिव विसर्पणम् । तथैतदद्य मन्ये5हं तव कर्म जनार्दन
হে জনার্দন! যেমন সমুদ্র শুকিয়ে যাওয়া বা মেরু পর্বতের স্থানচ্যুত হওয়া বিস্ময়কর, তেমনি আজ আপনার এই প্রকাশ্য আনন্দপ্রদর্শনকেও আমি আশ্চর্য বলে মনে করি।
Verse 11
भगवान् श्रीकृष्णने कहा--धनंजय! आज वास्तवमें मुझे यह अत्यन्त हर्षका अवसर प्राप्त हुआ है
শ্রীভগবান শ্রীকৃষ্ণ বললেন—ধনঞ্জয়! আজ সত্যই আমার পরম আনন্দের উপলক্ষ এসেছে। তার কারণ আমার মুখে শোনো। যে উত্তম কারণ আমার মনকে তৎক্ষণাৎ গভীর প্রসন্নতায় পূর্ণ করে, তা এই।
Verse 12
शक्ति घटोत्कचेनेमां व्यंसयित्वा महाद्युते । कर्ण निहतमेवाजौ विद्धि सद्यो धनंजय
হে মহাতেজস্বী ধনঞ্জয়! ঘটোৎকচের দ্বারা ইন্দ্রপ্রদত্ত শক্তিকে কর্ণের হাতে ব্যর্থ করিয়ে দিয়ে এখন যুদ্ধক্ষেত্রে কর্ণকে অচিরেই নিহত বলেই জেনো।
Verse 13
शक्तिहस्तं पुनः: कर्ण को लोके5स्ति पुमानिह । य एनमभितस्तिछेत् कार्तिकेयमिवाहवे,इस संसारमें कौन ऐसा पुरुष है, जो युद्धस्थलमें कार्तिकेयके समान शक्तिशाली कर्णके सामने खड़ा हो सके
আবার এই জগতে এমন কোন পুরুষ আছে, যে হাতে শক্তি ধারণকারী কর্ণের সম্মুখে যুদ্ধে দাঁড়াতে পারে? রণক্ষেত্রে সে কার্তিকেয়েরই সমান।
Verse 14
दिष्ट्यापनीतकवचो दिष्ट्यापह्तकुण्डल: । दिष्ट्या सा व्यंसिता शक्तिरमोघास्य घटोत्कचे
সৌভাগ্য যে কর্ণের দিব্য কবচ অপসারিত হয়েছে; সৌভাগ্য যে তার কুণ্ডল হরণ করা হয়েছে; আর সৌভাগ্য যে তার সেই অমোঘ শক্তি ঘটোৎকচের উপর নিক্ষিপ্ত হয়ে তার হাত থেকে বেরিয়ে গেছে।
Verse 15
यदि हि स्यात् सकवचस्तथैव स्यात् सकुण्डल: । सामरानपि लोकांस्त्रीनेक: कर्णो जयेद् रणे,यदि कर्ण कवच और कुण्डलोंसे सम्पन्न होता तो वह अकेला ही रणभूमिमें देवताओंसहित तीनों लोकोंको जीत सकता था
যদি কর্ণ কবচ ও কুণ্ডলসহই থাকত, তবে সে একাই রণক্ষেত্রে দেবতাসহ তিন লোক জয় করতে পারত।
Verse 16
वासवो वा कुबेरो वा वरुणो वा जलेश्वर: । यमो वा नोत्सहेत् कर्ण रणे प्रतिसमासितुम्,उस अवस्थामें इन्द्र, कुबेर, जलेश्वर वरुण अथवा यमराज भी रणभूमिमें कर्णका सामना नहीं कर सकते थे
সে অবস্থায় ইন্দ্র (বাসব), কুবের, জলেশ্বর বরুণ কিংবা যমও রণক্ষেত্রে কর্ণের মুখোমুখি হতে সাহস করত না।
Verse 17
गाण्डीवमुद्यम्य भवांश्क्रं चाहं सुदर्शनम् । न शक्तौ स्वो रणे जेतुं तथायुक्त नरर्षभम्
তুমি গাণ্ডীব তুলে আর আমি সুদর্শন চক্র ধারণ করে—আমরা দু’জন একসঙ্গে অগ্রসর হলেও, কবচ-কুণ্ডলধারী সেই নরশ্রেষ্ঠ কর্ণকে রণক্ষেত্রে জয় করতে সক্ষম হতাম না।
Verse 18
त्वद्धितार्थ तु शक्रेण मायापहृतकुण्डल: । विहीनकवचश्चायं कृत: परपुरंजय:,तुम्हारे हितके लिये इन्द्रने शत्रु-नगरीपर विजय पानेवाले कर्णके दोनों कुण्डल मायासे हर लिये और उसे कवचसे भी वंचित कर दिया
তোমার কল্যাণের জন্য শক্র (ইন্দ্র) মায়া করে শত্রু-নগরজয়ী কর্ণের দুই কুণ্ডল কেড়ে নিলেন, আর তাকে তার জন্মগত কবচ থেকেও বঞ্চিত করলেন।
Verse 19
उत्कृत्य कवचं यस्मात् कुण्डले विमले च ते । प्रादाच्छक्राय कर्णो वै तेन वैकर्तन: स्मृत:
কর্ণ নিজের দেহ থেকে কবচ ও সেই নির্মল কুণ্ডল দুটিও কেটে শক্রকে দান করেছিল; তাই সে ‘বৈকর্তন’ নামে স্মরণীয়।
Verse 20
आशीविष इव क्रुद्धो जृभितो मन्त्रतेजसा । तथाद्य भाति कर्णो मे शान्तज्वाल इवानल:
যেমন ক্রুদ্ধ বিষধর সাপ মন্ত্রের তেজে স্তব্ধ হয়ে যায়, আর যেমন দাউদাউ আগুনের শিখা নিভে গেলে তা নিস্তেজ দেখায়—তেমনি আজ শক্তিহীন কর্ণ আমার কাছে প্রতীয়মান হচ্ছে।
Verse 21
यदाप्रभृति कर्णाय शक्तिर्दत्ता महात्मना । वासवेन महाबाहो क्षिप्ता यासै घटोत्कचे
মহাবাহো! যেদিন থেকে মহাত্মা বাসব (ইন্দ্র) কর্ণকে (কবচ-কুণ্ডলের বিনিময়ে) সেই শক্তি দান করেছিলেন—যা সে ঘটোৎকচের ওপর নিক্ষেপ করেছিল—সেদিন থেকেই কর্ণ তোমাকে রণক্ষেত্রে সর্বদা নিহত বলেই গণ্য করত।
Verse 22
कुण्डलाभ्यां निमायाथ दिव्येन कवचेन च । तां प्राप्पामन्यत वृष: सतत त्वां हतं रणे
কুণ্ডল ও দিব্য কবচ বিনিময় করে সেই শক্তি লাভ করে বৃষ (কর্ণ) হে মহাবাহো, তোমাকে রণক্ষেত্রে সর্বদা নিহত বলেই মনে করত।
Verse 23
एवंगतो5पि शक््यो<यं हन्तुं नान्येन केनचित् । ऋते त्वां पुरुषव्याप्र शपे सत्येन चानघ
পুরুষসিংহ! এমন দুরবস্থাতেও কর্ণকে তোমাকে ছাড়া অন্য কোনো যোদ্ধা বধ করতে পারবে না। অনঘ! সত্যের শপথ করে বলছি—কর্ণের মৃত্যু অন্য কারও হাতে ঘটবে না।
Verse 24
ब्रह्मण्य: सत्यवादी च तपस्वी नियतव्रत:ः । रिपुष्वपि दयावांश्व॒ तस्मात् कर्णो वृष: स्मृत:
কর্ণ ব্রাহ্মণভক্ত, সত্যভাষী, তপস্বী, নিয়ম-সংযমে ব্রতস্থ; শত্রুর প্রতিও দয়াবান। তাই কর্ণ ‘বৃষ’—ধর্মে স্থিত—বলে স্মরণীয়।
Verse 25
युद्धशौण्डो महाबाहुर्नित्योद्यतशरासन: । केसरीव वने नर्दन् मातड़ इव यूथपान्
সে যুদ্ধপ্রিয়, মহাবাহু, সর্বদা ধনুক টানা প্রস্তুত। অরণ্যে সিংহের মতো গর্জে উঠে, মত্ত হাতির ন্যায় শত্রুসেনার নেতাদের ছত্রভঙ্গ করে দেয়।
Verse 26
मध्यं गत इवादित्यो यो न शक्यो निरीक्षितुम्
সে যেন মধ্যাহ্নের সূর্য—যার দিকে তাকানো যায় না। পুরুষসিংহ! তোমার মহামনস্বী শ্রেষ্ঠ যোদ্ধারাও কর্ণের দিকে দৃষ্টি স্থির করতে পারে না, যেমন দগ্ধ মধ্যাহ্নসূর্যের দিকে চেয়ে থাকা যায় না। আর যেমন শরতের নির্মল আকাশে সূর্য সহস্র রশ্মি ছড়ায়, তেমনি কর্ণ যুদ্ধে তীরের জাল বিস্তার করে।
Verse 27
त्वदीयै: पुरुषव्यात्र योधमुख्यैर्महात्मभि: । शरजालसहसांशु: शरदीव दिवाकर:
পুরুষব্যাঘ্র! তোমার মহাত্মা শ্রেষ্ঠ যোদ্ধারাও কর্ণের দিকে দৃষ্টি স্থির করতে পারে না। শরতের নির্মল আকাশে সহস্রকিরণ সূর্য যেমন আলো ছড়ায়, তেমনি কর্ণ রণে তীরের জাল বিস্তার করে।
Verse 28
तपान्ते जलदो यद्धच्छरधारा: क्षरन् मुहुः । दिव्यास्त्रजलद: कर्ण: पर्जन्य इव वृष्टिमान्
যেমন ঋতুর তাপে উত্তপ্ত মেঘ বারবার জলধারা বর্ষণ করে, তেমনই দিব্যাস্ত্র-রূপ জলদানকারী কর্ণ-মেঘ যুদ্ধক্ষেত্রে অবিরাম তীরের প্রবল বর্ষা ঝরাতে থাকে।
Verse 29
त्रिदशैरपि चास्यद्धि: शरवर्ष समन्तत:ः । अशक्यस्तदयं जेतुं स्रवद्धिमासशोणितम्,चारों ओर बाणोंकी वृष्टि करके शत्रुओंके शरीरोंसे रक्त और मांस बहानेवाले देवता भी कर्णको परास्त नहीं कर सकते
যদি দেবতারাও চারদিক থেকে তার ওপর তীরবর্ষণ করেন, তবু এই বীরকে জয় করা অসম্ভব; যুদ্ধ করতে করতে সে শত্রুদের দেহ থেকে মাংস ও রক্তের ধারা প্রবাহিত করে।
Verse 30
कवचेन विहीनश्न कुण्डलाभ्यां च पाण्डव | सोख्द्य मानुषतां प्राप्तो विमुक्त: शक्रदत्तया,पाण्डुनन्दन! कर्ण कवच और कुण्डलसे हीन तथा इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे शून्य होकर अब साधारण मनुष्यके समान हो गया है
হে পাণ্ডব! কর্ণ এখন কবচ ও কুণ্ডলহীন, আর শক্র (ইন্দ্র) প্রদত্ত শক্তি থেকেও বঞ্চিত; তাই সে সাধারণ মানুষের অবস্থায় নেমে এসেছে।
Verse 31
एको हि योगो5स्य भवेद् वधाय च्छिद्रे होनं स्वप्रमत्त: प्रमत्तम् । कृच्छू प्राप्त रथचक्रे विमग्ने हन्या: पूर्व त्वं तु संज्ञां विचार्य
তবু তার বধের একটিই উপায়—যখন সুযোগ মিলবে এবং সে অসতর্ক হবে, তখন তুমি সম্পূর্ণ সতর্ক থেকে আঘাত করো। যুদ্ধের মাঝখানে শাপবশত কর্ণের রথচক্র মাটিতে দেবে গিয়ে সে বিপদে পড়লে, আমার সংকেত মনে রেখে তাকে আগেই নিধন করো।
Verse 32
न हाद्यतास्त्रं युधि हन्यादजय्य- मप्येकवीरो बलभित् सवज्ञ: । जरासंधश्चेदिराजो महात्मा महाबाहुश्वैकलव्यो निषाद:
যুদ্ধে কোনো একক বীর—শক্তিভেদী ও সর্বজ্ঞ হলেও—অস্ত্র দ্বারা সত্যই অজেয়কে বধ করতে পারে না। এমনই ছিলেন জরাসন্ধ, মহাত্মা চেদিরাজ, এবং নিষাদ মহাবাহু একলব্য।
Verse 33
अथापरे निहता राक्षसेन्द्रा हिडिम्बकिर्मीरवकप्रधाना: । अलायुध: परचक्रावमर्दी घटोत्कचश्नोग्रकर्मा तरस्वी
বায়ু বললেন—এদের অতিরিক্ত হিড়িম্ব, কির্মীর ও বক প্রমুখ অন্যান্য রাক্ষসরাজও নিহত হয়েছে। শত্রুসেনা-দলনকারী আলায়ুধ এবং ভয়ংকর কর্মে ত্বরিত ঘটোৎকচও তোমাদের কল্যাণের জন্যই হত্যা করতে ও নিহত হতে নিয়োজিত হয়েছিল।
Verse 131
श्रीवायुदेव उवाच अतिहर्षमिमं प्राप्तं शृणु मे त्वं धनंजय । अतीव मनस: सद्य: प्रसादकरमुत्तमम्
শ্রী বায়ুদেব বললেন—হে ধনঞ্জয়, আমার কথা শোনো। আমি মহা-আনন্দ লাভ করেছি—এমন উৎকৃষ্ট হর্ষ, যা মুহূর্তেই মনে প্রসন্নতা ও স্বচ্ছতা আনে।
Verse 180
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे घटोत्कचवधे श्रीकृष्णहर्षेडशीत्यधिकशततमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বে, ঘটোৎকচবধপর্বের অন্তর্গত রাত্রিযুদ্ধে ঘটোৎকচবধ প্রসঙ্গে, শ্রীকৃষ্ণহর্ষ নামে একশো বিরাশি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 326
एकैकशो निहता: सर्व एते योगैस्तैस्तैस्त्वद्धितार्थ मयैव । अन्यथा जब वह युद्धके लिये अस्त्र उठा लेगा
বায়ু বললেন—এরা সকলেই আমার দ্বারাই, তোমাদের কল্যাণের জন্য, নানা উপায়ে একে একে নিহত হয়েছে। নচেৎ, যখন সে যুদ্ধের জন্য অস্ত্র ধারণ করবে, তখন ত্রিলোকের শ্রেষ্ঠ বীর বজ্রধারী ইন্দ্রও সেই অজেয় কর্ণকে বধ করতে সক্ষম হবেন না। মগধরাজ জরাসন্ধ, মহামনা চেদিরাজ শিশুপাল এবং নিষাদজাত মহাবাহু একলব্য—এদের প্রত্যেককে আমি তোমাদের হিতার্থে বিচিত্র কৌশলে ক্রমান্বয়ে নিপাত করেছি।
Verse 2536
विमदान् रथशार्दूलान् कुरुते रणमूर्थनि । महाबाहु कर्ण युद्धमें कुशल है। उसका धनुष सदा उठा ही रहता है। वनमें दहाड़नेवाले सिंहके समान वह सदा गर्जता रहता है। जैसे मतवाला हाथी कितने ही यूथपतियोंको मदरहित कर देता है
বায়ুদেব বললেন—যুদ্ধের শীর্ষস্থানে মহাবাহু কর্ণ, যুদ্ধে নিপুণ, রথশার্দূলদেরও গর্ব ভেঙে দেয়। তার ধনুক সদা উত্তোলিত; অরণ্যের গর্জনকারী সিংহের মতো সে নিরন্তর গর্জে ওঠে। যেমন মত্ত হাতি বহু ইউথপতির মদ নামিয়ে দেয়, তেমনি কর্ণও যুদ্ধের মুখে সিংহসম পরাক্রমে মহারথীদের পর্যন্ত অহংকার চূর্ণ করে।
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