
Chapter Arc: कुरुक्षेत्र के कोलाहल में कर्ण का रथ फिर से वेग पकड़ता है—सारथि नए, शंखवर्ण तीव्र घोड़े जोत देता है, मानो युद्ध का भाग्य ही पुनः कस दिया गया हो। → धृष्टद्युम्न और कर्ण आमने-सामने होकर बाण-वृष्टि से एक-दूसरे को ढक देते हैं; कर्ण के सायकों से पांचाल-पक्ष में चीख-पुकार उठती है और रथी-समूह बिखरने लगता है। युधिष्ठिर के मन में घबराहट बढ़ती है—कर्ण निर्भय घूमता हुआ भागते रथों पर तीक्ष्ण शर बरसाता दिखता है। → युधिष्ठिर की आशंका चरम पर पहुँचती है और श्रीकृष्ण-अर्जुन के सम्मुख निर्णायक प्रस्ताव उभरता है—‘इस समय महाबली घटोत्कच ही कर्ण का सामना करे’; क्योंकि कर्ण के पास इन्द्रदत्त शक्ति है जो रौद्र रूप धारण करती है। → रणनीति का पलटाव तय होता है: कर्ण को रोकने/उसकी शक्ति को निष्फल कराने हेतु घटोत्कच को अग्रिम मोर्चे पर भेजने का निश्चय बनता है, ताकि पांचालों की टूटती पंक्ति और युधिष्ठिर की डगमगाती धीरता को सहारा मिले। → कर्ण और घटोत्कच का संग्राम आरम्भ होने को है—इन्द्र और प्रह्लाद-सदृश महायुद्ध की आहट के साथ, इन्द्रदत्त शक्ति के प्रयोग का भयावह संकेत हवा में टँगा रह जाता है।
Verse 1
अफ-४#-कात त्रिसप्तत्यांधिकशततमोब<् ध्याय: कर्णद्वारा धृष्टद्युम्न एवं पांचालोंकी पराजय
সঞ্জয় বললেন—তারপর শত্রুবীর-সংহারী কর্ণ রণক্ষেত্রে পৃষতপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্নকে দেখে তার বক্ষে মর্মভেদী দশটি শর নিক্ষেপ করলেন।
Verse 2
प्रतिविव्याध त॑ तूर्ण धृष्टद्युम्नोडपि मारिष | दशभि: सायकै्शष्टस्तिष्ठ तिछेति चाब्रवीत्
হে মান্য নরেশ! তখন ধৃষ্টদ্যুম্নও তৎক্ষণাৎ দশটি শর নিক্ষেপ করে কর্ণকে বিদ্ধ করে প্রতিশোধ নিল এবং বলল—“থাম, থাম!”
Verse 3
तावन्योन्यं शरै: संख्ये संछाद्य सुमहारथै: । पुनः पूर्णायतोत्सूष्टविंव्यघाते परस्परम्
সেই দুই মহারথী সমরে পরস্পরকে শরে আচ্ছাদিত করে, আবার ধনুক পূর্ণ টেনে ছোড়া বাণে একে অপরকে আঘাত-প্রত্যাঘাত করতে লাগল।
Verse 4
ततः: पाज्चालमुख्यस्य धृष्टद्युम्नस्य संयुगे । सारथिं चतुरश्चाश्चान् कर्णो विव्याध सायकै:
তারপর সমরে কর্ণ পাঞ্চালদের প্রধান ধৃষ্টদ্যুম্নের সারথি ও চারটি ঘোড়াকে নিজের শর দিয়ে বিদ্ধ করলেন।
Verse 5
कार्मुकप्रवरं चापि प्रचिच्छेद शितै: शरै: । सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत्
শুধু তাই নয়, কর্ণ তীক্ষ্ণ শর দিয়ে ধৃষ্টদ্যুম্নের উৎকৃষ্ট ধনুক কেটে ফেললেন এবং একটি ভল্ল দিয়ে তার সারথিকে রথাসন থেকে নিচে ফেলে দিলেন।
Verse 6
धृष्टद्युम्नस्तु विरथो हताश्वो हतसारथि: । गृहीत्वा परिघं घोरं कर्णस्याश्वानपीपिषत्,घोड़े और सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुए धृष्टद्युम्नने एक भयंकर परिघ उठाकर उसके द्वारा कर्णके घोड़ोंको पीस डाला
অশ্ব ও সারথি নিহত হওয়ায় রথহীন ধৃষ্টদ্যুম্ন ভয়ংকর পরিঘ তুলে নিয়ে তা দিয়ে কর্ণের ঘোড়াগুলিকে চূর্ণ করে দিলেন।
Verse 7
विद्धश्न बहुभिस्तेन शरैराशीविषोपमै: । ततो युधिष्ठिरानीकं पद्धयामेवान्वपद्यत
তখন কর্ণ বিষধর সাপের মতো ভয়ংকর অসংখ্য বাণে তাঁকে বিদ্ধ ও ক্ষতবিক্ষত করলেন। তারপর তিনি পায়ে হেঁটে যুধিষ্ঠিরের সেনাবিন্যাসের মধ্যে প্রবেশ করলেন।
Verse 8
आरुरोह रथं चापि सहदेवस्य मारिष । प्रयातुकाम: कर्णाय वारितो धर्मसूनुना
হে আর্য, সেখানে ধৃষ্টদ্যুম্ন সহদেবের রথে আরোহণ করে আবার কর্ণের মোকাবিলায় যেতে উদ্যত হলেন; কিন্তু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির তাঁকে নিবৃত্ত করলেন।
Verse 9
कर्णस्तु सुमहातेजा: सिंहनादविमिश्रितम् । धनु:शब्दं महच्चक्रे दथ्मौ तारेण चाम्बुजम्,उधर महातेजस्वी कर्णने सिंहनादके साथ-साथ अपने धनुषकी महती टंकारध्वनि फैलायी और उच्चस्वरसे शंख बजाया
অপরদিকে মহাতেজস্বী কর্ণ সিংহনাদের সঙ্গে মিশিয়ে ধনুকের প্রবল টংকার তুললেন এবং তীক্ষ্ণ উচ্চ স্বরে ‘আম্বুজ’ শঙ্খ ধ্বনিত করলেন।
Verse 10
दृष्टवा विनिर्जित युद्धे पार्षत॑ ते महारथा: । अमर्षवशमापतन्ना: पठचाला: सहसोमका:
যুদ্ধে পৃষতের পুত্র ধৃষ্টদ্যুম্নকে পরাস্ত হতে দেখে পাঞ্চাল ও সোমক মহারথীরা ক্রোধে দগ্ধ হয়ে উঠল। সর্বপ্রকার অস্ত্রশস্ত্র ধারণ করে, যুদ্ধ থেকে নিবৃত্তির সীমা মৃত্যু বলেই স্থির করে, তারা সূতপুত্র কর্ণকে বধ করতে তার দিকে ধাবিত হল।
Verse 11
सूतपुत्रवधार्थाय शस्त्राण्यादाय सर्वश: । प्रययु: कर्णमुद्दिश्य मृत्युं कृत्वा निवर्तनम्
যুদ্ধে ধৃষ্টদ্যুম্ন পরাভূত হয়েছে দেখে ক্রোধে উন্মত্ত পাঞ্চাল ও সোমক মহারথীরা সর্বপ্রকার অস্ত্র-শস্ত্র ধারণ করল। সূতপুত্র কর্ণকে লক্ষ্য করে, প্রত্যাবর্তনের সীমা হিসেবে মৃত্যুকেই স্থির করে, তাঁরা কর্ণবধের সংকল্পে অগ্রসর হল।
Verse 12
कर्णस्यापि रथे वाहानन्यान् सूतो5भ्ययोजयत् | शड्खवर्णान् महावेगान् सैन्धवान् साधुवाहिन:
অন্যদিকে কর্ণের রথেও তার সারথি নতুন ঘোড়া জুড়ে দিল। তারা সিন্ধুদেশীয় অশ্ব—শঙ্খের মতো শুভ্র, মহাবেগী এবং বাহনের কাজে অত্যন্ত নির্ভরযোগ্য।
Verse 13
लब्धलक्ष्यस्तु राधेय: पञ्चालानां महारथान् | अभ्यपीडयदायस्त: शरैमेंघ इवाचलम्
লক্ষ্যভেদে সিদ্ধ রাধেয় কর্ণ পাঞ্চালদের মহারথীদের উপর প্রবল চাপ সৃষ্টি করতে লাগল। যেমন মেঘ পর্বতের উপর ধারাসারে জল বর্ষণ করে, তেমনি সে অক্লান্ত পরিশ্রমে তীরের বৃষ্টি ঝরিয়ে তাদের কষ্ট দিতে লাগল।
Verse 14
सा पीड्यमाना कर्णेन पञ्चालानां महाचमू: । सम्प्राद्रवत् सुसंत्रस्ता सिंहेनेवार्दिता मृगी
কর্ণের আঘাতে পীড়িত হয়ে পাঞ্চালদের সেই বিশাল সেনাবাহিনী ভয়াবহ আতঙ্কে ছত্রভঙ্গ হয়ে দ্রুত পালাতে লাগল—যেমন সিংহের তাড়নায় হরিণী দৌড়ে পালায়।
Verse 15
पतितास्तुरगेभ्यश्व गजेभ्यश्व महीतले | रथेभ्यश्व नरास्तूर्णमदृश्यन्त ततस्तत:,कितने ही मनुष्य वहाँ इधर-उधर घोड़ों, हाथियों और रथोंसे तुरंत ही गिरकर धराशायी हुए दिखायी देने लगे
তারপর সর্বদিকে দেখা গেল মানুষজন দ্রুত মাটিতে লুটিয়ে পড়ছে—কেউ ঘোড়া থেকে, কেউ হাতি থেকে, কেউ বা রথ থেকে পড়ে ছিটকে পড়ল।
Verse 16
धावमानस्य योधस्य क्षुरप्रै: स महामृथे । बाहू चिच्छेद वै कर्ण: शिरश्चनैव सकुण्डलम्,कर्ण उस महासमरमें अपने क्षुरप्रोंद्वारा भागते हुए योद्धाकी दोनों भुजाओं तथा कुण्डलमण्डित मस्तकको भी काट डाला था
সঞ্জয় বললেন—সেই ভয়ংকর মহাযুদ্ধে কর্ণ ক্ষুরধার শরে পলায়মান যোদ্ধার দুই বাহু ছিন্ন করল, এবং কুণ্ডল-সহ তার মস্তকও কেটে ফেলল।
Verse 17
ऊरू चिच्छेद चान्यस्य गजस्थस्य विशाम्पते । वाजिपृष्ठगतस्यापि भूमिष्ठस्थ च मारिष
সঞ্জয় বললেন—হে প্রজাপতি! কর্ণ অন্য এক যোদ্ধার উরুও ছিন্ন করল—সে হাতির পিঠে বসুক, ঘোড়ার পিঠে আরোহী হোক, কিংবা ভূমিতে পদাতিকই হোক।
Verse 18
नाज्ञासिषुर्धावमाना बहवश्न महारथा: । संछिन्नान्यात्मगात्राणि वाहनानि च संयुगे,भागते हुए बहुत-से महारथी उस युद्धस्थलमें अपने कटे हुए अंगों और वाहनोंको नहीं जान पाते थे
সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধক্ষেত্রে ছুটে চলা বহু মহারথী নিজেদের ছিন্ন অঙ্গপ্রত্যঙ্গ ও ভগ্ন বাহন পর্যন্ত চিনতে পারছিল না।
Verse 19
ते वध्यमाना: समरे पञ्चाला: सृञ्जयै: सह । तृणप्रस्पन्दनाच्चापि सूतपुत्र सम मेनिरे,समरांगणमें मारे जाते हुए पांचाल और सूंजय एक तिनकेके हिल जानेसे भी सूतपुत्र कर्णको ही आया हुआ मानने लगते थे
সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধে নিহত হতে থাকা পাঞ্চালরা সৃঞ্জয়দের সঙ্গে, তৃণখণ্ডের সামান্য কাঁপন দেখলেও সূতপুত্র কর্ণই এসেছে বলে মনে করত।
Verse 20
अपि स्वं समरे योधं धावमानं विचेतसम् । कर्णमेवाभ्यमन्यन्त ततो भीता द्रवन्ति ते,उस रणभूमिमें अचेत होकर भागते हुए अपने योद्धाको भी वे कर्ण ही समझ लेते और उसीसे डरकर भागने लगते थे
সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধক্ষেত্রে নিজেদেরই এক যোদ্ধাকে, যে বিবশ হয়ে ছুটছিল, তারা কর্ণ বলে ভুল করত; আর সেই ভয়ে তারা পালিয়ে যেত।
Verse 21
तान्यनीकानि भग्नानि द्रवमाणानि भारत | अभ्यद्रवद् द्रुतं कर्ण: पृष्ठठो विकिरन् शरान्,भारत! भयभीत होकर भागते हुए उन सैनिकोंके पीछे बाणोंकी वर्षा करता हुआ कर्ण बड़े वेगसे धावा करता था
হে ভারত! যখন সেই যুদ্ধবিন্যাস ভেঙে পড়ল এবং সৈন্যরা ভয়ে পালাতে লাগল, তখন কর্ণ পিছন থেকে শরবর্ষণ করতে করতে দ্রুতগতিতে তাদের পিছু ধাওয়া করল।
Verse 22
अवेक्षमाणास्त्वन्योन्यं सुसम्मूढा विचेतस: । नाशवनुवन्नवस्थातुं काल्यमाना महात्मना
পাঞ্চাল যোদ্ধারা মোহগ্রস্ত ও বিবেকহীন হয়ে পরস্পরের দিকে তাকিয়ে রইল; সেই মহাত্মা (কর্ণ)-এর তাড়নায় ও চাপে তারা কোথাও স্থির হয়ে দাঁড়াতে পারল না।
Verse 23
कर्णेनाभ्याहता राजन् पञ्चाला: परमेषुभि: । द्रोणेन च दिश: सर्वा वीक्षमाणा: प्रदुद्र॒ुवु:
রাজন! কর্ণের উৎকৃষ্ট বাণে এবং দ্রোণাচার্যের শরবিদ্ধ হয়ে পাঞ্চাল সৈন্যরা চারিদিকে তাকাতে তাকাতে পালিয়ে গেল।
Verse 24
ततो युधिष्छिरो राजा स्वसैन्यं प्रेक्ष्य विद्रुतम् । अपयाने मन: कृत्वा फाल्गुनं वाक्यमब्रवीत्
তখন রাজা যুধিষ্ঠির নিজের সেনাকে পালাতে দেখে নিজেও রণক্ষেত্র থেকে সরে যাওয়ার সিদ্ধান্ত নিলেন এবং ফাল্গুন (অর্জুন)-কে এই কথা বললেন।
Verse 25
पश्य कर्ण महेष्वासं धनुष्पाणिमवस्थितम् । निशीथे दारुणे काले तपन्तमिव भास्करम्,'पार्थ! महाधनुर्धर कर्णको देखो; वह हाथमें धनुष लिये खड़ा है और इस भयंकर आधी रातके समय सूर्यके समान तप रहा है
পার্থ! দেখো—মহাধনুর্ধর কর্ণ ধনুক হাতে অটল হয়ে দাঁড়িয়ে আছে; এই ভয়ংকর মধ্যরাত্রিতে সে সূর্যের মতো দগ্ধ করে জ্বলছে।
Verse 26
कर्णसायकनुन्नानां क्रोशतामेष नि:स्वन: । अनिशं श्रूयते पार्थ त्वद्वन्धूनामनाथवत्
সঞ্জয় বললেন—হে পার্থ! কর্ণের বাণে বিদ্ধ হয়ে তোমার আত্মীয় ও সহায়রা অনাথের মতো যে আর্তনাদ করছে, সেই করুণ ক্রন্দন অবিরাম শোনা যাচ্ছে।
Verse 27
यथा विसृजतश्चास्य संदधानस्य चाशुगान् । पश्यामि नान्तरं पार्थ क्षपयिष्यति नो ध्रुवम्
হে পার্থ! কর্ণ কখন ধনুকে বাণ সংযোজিত করে আর কখন তা ছেড়ে দেয়—আমি তাতে বিন্দুমাত্র ফারাক দেখি না; এতে মনে হয়, সে নিশ্চিতই আমাদের সমগ্র সেনাকে ক্ষয় করে দেবে।
Verse 28
यदत्रानन्तरं कार्य प्राप्तकालं च पश्यसि । कर्णस्य वधसंयुक्तं तत् कुरुष्व धनंजय,“धनंजय! अब यहाँ कर्णके वधके सम्बन्धमें तुम्हें जो समयोचित कर्तव्य दिखायी देता हो, उसे करो”
হে ধনঞ্জয়! এখানে এখন যে তৎক্ষণাৎ ও সময়োচিত কর্তব্য তোমার দৃষ্টিতে পড়ে—বিশেষত যা কর্ণবধের সঙ্গে যুক্ত—তা এখনই সম্পন্ন করো।
Verse 29
एवमुक्तो महाराज पार्थ: कृष्णमथाब्रवीत् । भीत: कुन्तीसुतो राजा राधेयस्याद्य विक्रमात्
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! এ কথা শুনে পার্থ অর্জুন তখন কৃষ্ণকে বলল—“প্রভু! আজ কুন্তীপুত্র রাজা যুধিষ্ঠির রাধেয় কর্ণের পরাক্রমে ভীত হয়ে পড়েছেন।”
Verse 30
एवंगते प्राप्तकालं कर्णानीके पुन: पुन: । भवान् व्यवस्यतु क्षिप्रं द्रवते हि वरूथिनी
এমন অবস্থায় কর্ণের বাহিনীর সম্মুখে এখন যা সময়োচিত কর্তব্য, আপনি দ্রুত স্থির করুন; কারণ আমাদের সেনাবিন্যাস বারবার ভেঙে পালিয়ে যাচ্ছে।
Verse 31
द्रोणसायकनुन्नानां भग्नानां मधुसूदन । कर्णेन त्रास्यमानानामवस्थानं न विद्यते,“मधुसूदन! द्रोणाचार्यके बाणोंसे घायल और कर्णसे भयभीत होकर भागते हुए हमारे सैनिक कहीं भी ठहर नहीं पाते हैं
মধুসূদন! দ্রোণের শরবিদ্ধ, মনোবলে ভগ্ন এবং কর্ণের ভয়ে ত্রস্ত আমাদের সৈন্যদের কোথাও দাঁড়াবার স্থান নেই; তারা কোনো অবস্থানেই স্থির থাকতে পারে না।
Verse 32
पश्यामि च तथा कर्ण विचरन्तमभीतवत् । द्रवमाणान् रथोदारान् किरन्तं निशितै: शरै:,“मैं देखता हूँ, कर्ण निर्भय-सा विचर रहा है और भागते हुए श्रेष्ठ रथियोंपर भी पीछेसे तीखे बाणोंकी वर्षा कर रहा है
আমি দেখছি, কর্ণ যেন নির্ভয় হয়ে রণক্ষেত্রে বিচরণ করছে, আর পলায়নরত শ্রেষ্ঠ রথীদের উপরও পিছন দিক থেকে তীক্ষ্ণ শরবর্ষণ করছে।
Verse 33
नैनं शक्ष्यामि संसोढुं चरन्तं रणमूर्थनि । प्रत्यक्ष वृष्णिशार्दूल पादस्पर्शमिवोरग:
হে বৃষ্ণিশার্দূল! যেমন সাপ মানুষের পায়ের স্পর্শ সহ্য করতে পারে না, তেমনি আমার চোখের সামনে রণক্ষেত্রের অগ্রভাগে কর্ণের এভাবে বিচরণ আমি সহ্য করতে পারব না।
Verse 34
स भवांस्तत्र यात्वाशु यत्र कर्णो महारथ: । अहमेनं हनिष्यामि मां वैष मधुसूदन,“मधुसूदन! अतः आप शीघ्र वहीं चलिये, जहाँ महारथी कर्ण है। आज मैं इसे मार डालूँगा या यह मुझे (मार डालेगा)'
মধুসূদন! অতএব আপনি শীঘ্রই সেখানে চলুন, যেখানে মহারথী কর্ণ অবস্থান করছে। আজ আমি নিশ্চয়ই তাকে বধ করব—অথবা সে আমাকে বধ করবে।
Verse 35
श्रीवायुदेव उवाच पश्यामि कर्ण कौन्तेय देवराजमिवाहवे । विचरन्तं नरव्याप्रमतिमानुषविक्रमम्
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—কুন্তীনন্দন! আজ যুদ্ধে আমি নরব্যাঘ্র কর্ণকে দেবরাজ ইন্দ্রের ন্যায়, অতিমানুষিক পরাক্রম প্রকাশ করে বিচরণ করতে দেখছি।
Verse 36
नैतस्यान्यो<स्ति संग्रामे प्रत्युद्याता धनंजय । ऋते त्वां पुरुषव्याप्र राक्षसाद् वा घटोत्कचात्
হে ধনঞ্জয়! এই যুদ্ধে তোমাকে বাদ দিয়ে আর কেউই তার মোকাবিলায় উঠতে পারে না—হে নরসিংহ! অথবা রাক্ষস ঘটোৎকচ ব্যতীত।
Verse 37
न तु तावदहं मन्ये प्राप्तकालं तवानघ । समागमं महाबाहो सूतपुत्रेण संयुगे,निष्पाप महाबाहु अर्जुन! इस समय रणक्षेत्रमें सूतपुत्रके साथ तुम्हारा युद्ध करना मैं उचित नहीं मानता
হে নিষ্পাপ! এখনও তোমার জন্য সময় অনুকূল নয়। হে মহাবাহু! এই মুহূর্তে যুদ্ধে সূতপুত্রের সঙ্গে তোমার সংঘর্ষকে আমি যথোচিত মনে করি না।
Verse 38
दीप्यमाना महोल्केव तिष्ठत्यस्य हि वासवी । त्वदर्थ हि महाबाहों सूतपुत्रेण संयुगे
হে মহাবাহু! তার কাছে বাসবী (ইন্দ্রশক্তি) মহা-উল্কার মতো জ্বলজ্বল করছে; সে তা তোমারই জন্য ধারণ করে আছে, যাতে যুদ্ধে সূতপুত্রের বিরুদ্ধে তা প্রয়োগ করতে পারে।
Verse 39
घटोत्कचस्तु राधेयं प्रत्युद्यातु महाबल:
অতএব এই সময় মহাবলী ঘটোৎকচই রাধেয় (রাধাপুত্র কর্ণ)-এর মোকাবিলায় অগ্রসর হোক।
Verse 40
स हि भीमेन बलिना जात: सुरपराक्रम: । तस्मिन्नस्त्राणि दिव्यानि राक्षसान्यासुराणि च
কারণ সে বলবান ভীমের ঔরসে জন্মেছে এবং দেবতুল্য পরাক্রমশালী। তার মধ্যে রাক্ষস ও অসুর-সম্পর্কিত নানাবিধ দিব্য অস্ত্রও আছে। অতএব এই সময় রাধাপুত্র কর্ণের বিরুদ্ধে সেই মহাবলী ঘটোৎকচকেই পাঠানো উচিত।
Verse 41
सतत चानुरक्तो वो हितैषी च घटोत्कच: । विजेष्यति रणे कर्णमिति मे नात्र संशय:,घटोत्कच तुमलोगोंका हितैषी है और सदा तुम्हारे प्रति अनुराग रखता है। वह रणभूमिमें कर्णको जीत लेगा, इसमें मुझे संशय नहीं है
ঘটোৎকচ সর্বদা তোমাদের প্রতি অনুরক্ত এবং তোমাদের মঙ্গলকামী। সে রণক্ষেত্রে কর্ণকে পরাজিত করবে—এ বিষয়ে আমার কোনো সংশয় নেই।
Verse 42
एवमुक्तो महाबाहु: पार्थ: पुष्करलोचन: । आजुहावाथ तद् रक्षस्तच्चासीत् प्रादुरग्रत:
এভাবে বলা হলে মহাবাহু পদ্মনয়ন পার্থ (অর্জুন) সেই রাক্ষসকে আহ্বান করলেন; আর সে তৎক্ষণাৎ তাঁর সম্মুখে প্রকাশ পেল।
Verse 43
भगवान् श्रीकृष्णफेके ऐसा कहनेपर महाबाहु कमलनयन कुन्तीकुमारने राक्षस घटोत्कचका आवाहन किया और वह तत्काल उनके सामने प्रकट हो गया ।।
ভগবান শ্রীকৃষ্ণ এ কথা বলতেই মহাবাহু পদ্মনয়ন কুন্তীপুত্র (অর্জুন) রাক্ষস ঘটোৎকচকে আহ্বান করলেন, আর সে তৎক্ষণাৎ তাঁর সামনে প্রকাশ পেল। হে রাজন, সে বর্মধারী, শরসহিত, খড়্গধারী ও ধনুর্ধারী ছিল। সে শ্রীকৃষ্ণ ও পাণ্ডব ধনঞ্জয়কে প্রণাম করে তখন শ্রীকৃষ্ণকে বলল—“প্রভু, আমি উপস্থিত; আমাকে আদেশ করুন।”
Verse 44
प्रजानाथ! उसने कवच, धनुष, बाण और खड्ग धारण कर रखे थे। वह श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र धनंजयको प्रणाम करके उस समय भगवान् श्रीकृष्णसे बोला--'प्रभो! यह मैं सेवामें उपस्थित हूँ। मुझे आज्ञा दीजिये, क्या करूँ?” ।।
হে প্রজানাথ! সে বর্ম, ধনুক, বাণ ও খড়্গ ধারণ করেছিল। শ্রীকৃষ্ণ ও পাণ্ডুপুত্র ধনঞ্জয়কে প্রণাম করে সে তখন ভগবান শ্রীকৃষ্ণকে বলল—“প্রভু, আমি সেবায় উপস্থিত; আদেশ করুন, আজ কী করব?” এরপর মেঘসম শ্যাম, দীপ্তমুখ ও দীপ্ত কুণ্ডলধারী হৈডিম্ব (ঘটোৎকচ)-কে দাশার্হ শ্রীকৃষ্ণ যেন হাসিমুখে বললেন।
Verse 45
श्रीवायुदेव उवाच घटोत्कच विजानीहि यत् त्वां वक्ष्यामि पुत्रक प्राप्तो विक्रमकालो5यं तव नान्यस्य कस्यचित्
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—“পুত্র ঘটোৎকচ, আমি যা বলছি তা ভালো করে বুঝে নাও। এই বীরত্ব প্রদর্শনের সময়টি তোমারই জন্য এসেছে, অন্য কারও জন্য নয়।”
Verse 46
स भवान् मज्जमानानां बन्धूनां त्वं प्लवो भव । विविधानि तवास्त्राणि सन्ति माया च राक्षसी
তোমার স্বজনেরা বিপদের সমুদ্রে ডুবে যাচ্ছে—তুমি তাদের জন্য ভেলা হয়ে ওঠো, তাদের পার করো। তোমার কাছে নানা প্রকার অস্ত্র আছে, আর রাক্ষসী মায়ার শক্তিও আছে; সেই শক্তিতেই আপনজনকে উদ্ধার করো।
Verse 47
पश्य कर्णेन हैडिम्बे पाण्डवानामनीकिनी । काल्यमाना यथा गाव: पालेन रणमूर्थनि
হে হৈডিম্বী! দেখো—যেমন রাখাল গরুগুলোকে হাঁকায়, তেমনই রণমুখে দাঁড়িয়ে কর্ণ পাণ্ডবদের এই বিশাল সেনাকে তাড়িয়ে নিয়ে যাচ্ছে।
Verse 48
एष कर्णों महेष्वासो मतिमान् दृढविक्रम: । पाण्डवानामनीकेषु निहन्ति क्षत्रियर्षभान्
এই কর্ণ—মহাধনুর্ধর, বুদ্ধিমান ও অটল পরাক্রমী—পাণ্ডবদের ব্যূহবদ্ধ সেনার মধ্যে ক্ষত্রিয়দের বৃষভসম বীরদের নিধন করছে।
Verse 49
यह कर्ण महाथधनुर्धर, बुद्धिमान् और दृढ़तापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाला है। यह पाण्डवोंकी सेनाओंमें जो श्रेष्ठ क्षत्रिय वीर हैं, उनका विनाश कर रहा है ।।
এই কর্ণ মহাধনুর্ধর, বুদ্ধিমান ও দৃঢ় পরাক্রমী; পাণ্ডবসেনার মধ্যে শ্রেষ্ঠ ক্ষত্রিয় বীরদের সে বিনাশ করছে। তার বাণের অগ্নিতাপে দগ্ধ হয়ে, যারা মহাবর্ষার মতো তীর নিক্ষেপ করে এমন দৃঢ়ধন্বী বীরেরাও রণক্ষেত্রে দাঁড়াতে পারে না—শর-জ্যোতিতে পীড়িত হয়ে স্থির থাকতে অক্ষম হয়।
Verse 50
निशीथे सूतपुत्रेण शरवर्षेण पीडिता: । एते द्रवन्ति पञ्चाला: सिंहेनेवार्दिता मृगा:
নিশীথে সূতপুত্রের তীরবৃষ্টিতে পীড়িত হয়ে এই পাঞ্চালরা পালাচ্ছে—যেমন সিংহে তাড়িত হরিণ পালায়।
Verse 51
देखो, जैसे सिंहसे पीड़ित हुए मृग भागते हैं, उसी प्रकार इस आधी रातके समय सूतपुत्रके द्वारा की हुई बाण-वर्षासे व्यथित हो ये पांचाल सैनिक भागे जा रहे हैं ।।
বায়ু বললেন—“দেখো, যেমন সিংহের তাড়নায় হরিণেরা আতঙ্কে পালায়, তেমনি এই মধ্যরাত্রে সূতপুত্র কর্ণের নিক্ষিপ্ত বাণবৃষ্টিতে পীড়িত পাঞ্চাল সৈন্যেরা প্রাণ বাঁচাতে ছুটে পালাচ্ছে। যুদ্ধে কর্ণের এই প্রবল অগ্রযাত্রাকে রোধ করার মতো তোমাকে ছাড়া আর কেউ নেই—হে ভীমবিক্রম, ভয়ংকর পরাক্রান্ত বীর! এই রণক্ষেত্রে তোমার ব্যতীত আর কোনো যোদ্ধাই নেই যে এভাবে অগ্রসরমান কর্ণকে থামাতে সক্ষম।”
Verse 52
स त्वं कुरु महाबाहो कर्म युक्तमिहात्मन: । मातुलानां 4 तेजसोअस्त्रबलस्य च
অতএব, হে মহাবাহু, এখানে তোমার কর্তব্য ও উদ্দেশ্যের উপযুক্ত কর্ম করো—যে কর্ম তোমার মামাদের তেজ এবং অস্ত্রবলের মর্যাদারও যোগ্য।
Verse 53
महाबाहो! तुम अपने पिता, मामा, तेज, अस्त्रबल तथा अपनी प्रतिष्ठके अनुरूप युद्धमें पराक्रम करो ।।
হে মহাবাহু! তোমার পিতা, তোমার মামারা, তোমার তেজ, অস্ত্রবল এবং প্রতিষ্ঠার মর্যাদা অনুযায়ী যুদ্ধে পরাক্রম দেখাও। হে হৈডিম্বীর পুত্র! মানুষ এই কারণেই পুত্র কামনা করে—যেন সে কোনোভাবে আমাদের দুঃখ থেকে উদ্ধার করবে; অতএব, হিডিম্বার কুমার, তুমি তোমার স্বজন-পরিজনকে বিপদ থেকে উদ্ধার করো।
Verse 54
इच्छन्ति पितर: पुत्रान् स्वार्थहेतोर्घटोत्कच । इहलोकात् परे लोके तारयिष्यन्ति ये हिता:
হে ঘটোৎকচ! পিতারা নিজেদের স্বার্থেই পুত্র কামনা করেন—এই বিশ্বাসে যে হিতৈষী পুত্রেরা তাদের এ লোক থেকে পরলোকে পার করে দেবে।
Verse 55
तव हद्वात्र बल॑ भीम॑ मायाश्व तव दुस्तरा: । संग्रामे युध्यमानस्य सततं भीमनन्दन,भीमनन्दन! संग्रामभूमिमें युद्ध करते समय सदा तुम्हारा भयंकर बल बढ़ता है और तुम्हारी मायाएँ दुस्तर होती हैं
হে ভীম! রণক্ষেত্রে যুদ্ধ করতে করতে তোমার ভয়ংকর বল সদাই বৃদ্ধি পায়, আর তোমার মায়াশক্তি অতিক্রম করা ক্রমে দুরূহ হয়ে ওঠে—হে ভীমনন্দন!
Verse 56
पाण्डवानां प्रभग्नानां कर्णेन निशि सायकै: । मज्जतां धार्तराष्ट्रेषु भव पारं परंतप
বায়ু বললেন—রাত্রিতে কর্ণের শরবৃষ্টিতে পাণ্ডবদের সেনা ভেঙে পড়েছে। তারা ধার্তরাষ্ট্রদের মধ্যে ডুবে যাচ্ছে; হে শত্রুদাহক, হে শত্রুদাহক! তুমি তাদের জন্য পারের তীর হয়ে ওঠো।
Verse 57
रात्रौ हि राक्षसा भूयो भवन्त्यमितविक्रमा: । बलवन्त: सुदुर्धर्षा: शूरा विक्रान्तचारिण:
বায়ুদেব বললেন—রাত্রিতে রাক্ষসদের পরাক্রম আরও বেড়ে যায়। তখন তারা অতিশয় বলবান, অতি দুর্ধর্ষ, বীর এবং দুঃসাহসী পরাক্রমে বিচরণকারী হয়।
Verse 58
जहि कर्ण महेष्वासं निशीथे मायया रणे । पार्था द्रोणं वधिष्यन्ति धृष्टद्युम्नपुरोगमा:
বায়ু বললেন—মধ্যরাতে রণক্ষেত্রে তোমার মায়াবলে মহাধনুর্ধর কর্ণকে বধ করো। তারপর ধৃষ্টদ্যুম্নকে অগ্রে রেখে পৃথাপুত্রেরা দ্রোণাচার্যকে বধ করবে।
Verse 59
संजय उवाच केशवस्य वच: श्रुत्वा बीभत्सुरपि राक्षसम् | अभ्यभाषत कौरव्य घटोत्कचमरिंदमम्,संजय कहते हैं--कुरुगज! भगवान् श्रीकृष्फका यह वचन सुनकर अर्जुनने भी शत्रुओंका दमन करनेवाले राक्षस घटोत्कचसे कहा--
সঞ্জয় বললেন—হে কৌরব! কেশবের বাক্য শুনে বিভৎসু অর্জুনও শত্রুদমনকারী রাক্ষস ঘটোৎকচকে সম্বোধন করলেন।
Verse 60
घटोत्कच भवांश्वैव दीर्घबाहुश्व सात्यकि: । मतो मे सर्वसैन्येषु भीमसेनश्न पाण्डव:,'घटोत्कच! मेरी सम्पूर्ण सेनाओंमें तीन ही वीर श्रेष्ठ माने गये हैं--तुम, महाबाहु सात्यकि तथा पाण्डुनन्दन भीमसेन
সঞ্জয় বললেন—হে ঘটোৎকচ! আমার মতে সমস্ত সেনার মধ্যে কেবল তিনজন বীরই শ্রেষ্ঠ—তুমি, দীর্ঘবাহু সাত্যকি এবং পাণ্ডুপুত্র ভীমসেন।
Verse 61
तद्भधवान् यातु कर्णेन द्वैरथं युध्यतां निशि । सात्यकि: पृष्ठगोपस्ते भविष्यति महारथ:
তখন সেই পূজনীয় বীর কর্ণের সঙ্গে অগ্রসর হোন; রাত্রিতে দু’জন রথযুদ্ধে দ্বৈরথে প্রবৃত্ত হোন। মহারথী সাত্যকি আপনার পশ্চাৎরক্ষক ও রক্ষাকর্তা হবে।
Verse 62
“अतः तुम इस निशीथकालमें कर्णके साथ द्वैरथ युद्ध करो और महारथी सात्यकि तुम्हारे पृष्ठरक्षक होंगे ।। जहि कर्ण रणे शूरं सात्वतेन सहायवान् । यथेन्द्रस्तारकं पूर्व स्कन्देन सह जध्निवान्
অতএব নিশীথকালে কর্ণের সঙ্গে দ্বৈরথ রথযুদ্ধ কর; মহারথী সাত্যকি তোমার পশ্চাৎরক্ষক হবে। সাত্বত (সাত্যকি)-কে সহায় করে রণে বীর কর্ণকে বধ কর—যেমন পূর্বকালে ইন্দ্র স্কন্দের সঙ্গে মিলিত হয়ে তারককে বধ করেছিলেন।
Verse 63
'जैसे पूर्वकालमें स्कन्दके साथ रहकर इन्द्रने तारकासुरका वध किया था, उसी प्रकार तुम भी सात्यकिकी सहायता पाकर रणभूमिमें शूरवीर कर्णको मार डालो” ।।
যেমন পূর্বকালে স্কন্দের সঙ্গে থেকে ইন্দ্র তারকাসুরকে বধ করেছিলেন, তেমনই তুমি সাত্যকির সহায়তা পেয়ে রণভূমিতে বীর কর্ণকে বধ কর। ঘটোৎকচ বলল—মহাবাহো, প্রভু! আপনি যেমন বলছেন, তেমনই। আপনার আদেশে আমি কর্ণবধের সংকল্প নিয়ে যাচ্ছি। হে ভারত! কর্ণের মোকাবিলা করতে আমি সক্ষম; দ্রোণাচার্যকেও আমি ভালোভাবে প্রতিহত করতে পারি; আর অস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী সেই অন্যান্য মহাত্মা ক্ষত্রিয়দের সঙ্গেও আমি লড়তে পারি।
Verse 64
अद्य दास्यामि संग्रामं सूतपुत्राय तं निशि । यं जना: सम्प्रवक्ष्यन्ति यावद् भूमिर्धरिष्यति
আজ এই রাত্রিতে আমি সূতপুত্র কর্ণের সঙ্গে এমন এক মহাসংগ্রাম করব, যার কথা পৃথিবী যতদিন থাকবে ততদিন লোকেরা বলে যাবে।
Verse 65
नचात्र शूरान् मोक्ष्यामि न भीतान्न कृताञज्जलीन् । सवनिव वधिष्यामि राक्षसं धर्ममास्थित:
এই যুদ্ধে আমি কাউকেই রেহাই দেব না—না বীরদের, না ভীতদের, না করজোড়ে প্রার্থনাকারীদের। রাক্ষসধর্ম অবলম্বন করে আমি সকলকে যজ্ঞবলির ন্যায় নিধন করব।
Verse 66
संजय उवाच एवमुक््त्वा महाबाहुहैंडिम्बिर्वरवीरहा । अभ्ययात् तुमुले कर्ण तव सैन्यं विभीषयन्
সঞ্জয় বললেন—রাজন! শ্রেষ্ঠ বীরসংহারী মহাবাহু হিডিম্বপুত্র এই কথা বলে সেই ভয়ংকর যুদ্ধে তোমার সেনাকে ত্রস্ত করে কর্ণের সম্মুখে অগ্রসর হল।
Verse 67
तमापतत्तं संक्रुद्धं दीप्तास्यं दीप्तमूर्थजम् । प्रहसन् पुरुषव्यात्र: प्रतिजग्राह सूतज:
ক্রোধে উন্মত্ত, দীপ্ত মুখ ও জ্বলন্ত কেশধারী সেই রাক্ষসকে ধেয়ে আসতে দেখে পুরুষসিংহ সূতপুত্র কর্ণ হাসতে হাসতে তাকে প্রতিদ্বন্দ্বী রূপে গ্রহণ করল।
Verse 68
तयो: समभवद् युद्ध कर्णराक्षसयोर्मधे । गर्जतो राजशार्दूल शक्रप्रहादयोरिव
তখন কর্ণ ও সেই রাক্ষসের মধ্যে ভয়ংকর যুদ্ধ শুরু হল। রাজশার্দূল কর্ণ গর্জন করতে করতে তার সঙ্গে তেমনই লড়ল, যেমন একদা শক্র প্রহ্লাদের সঙ্গে লড়েছিল।
Verse 172
इस प्रकार श्रीमह्ाा भारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें यात्रियुद्धके अवसरपर संकुलयुद्धविषयक एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত ঘটোৎকচবধপর্বে রাত্রিযুদ্ধ-প্রসঙ্গে সংকুলযুদ্ধ-বিষয়ক একশ বাহাত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 173
नृपश्रेष्ठ! संग्रामभूमिमें गर्जना करते हुए कर्ण और राक्षस दोनोंमें इन्द्र और प्रह्नलादके समान युद्ध होने लगा ।।
নৃপশ্রেষ্ঠ! রণভূমিতে গর্জন করতে করতে কর্ণ ও রাক্ষসের মধ্যে ইন্দ্র ও প্রহ্লাদের ন্যায় যুদ্ধ আরম্ভ হল। ইতি শ্রীমহাভারতে দ্রোণপর্বণি ঘটোৎকচবধপর্বণি রাত্রিযুদ্ধে ঘটোৎকচপ্রোৎসাহনে ত্রিসপ্তত্যধিকশততমোऽধ্যায়ঃ।
Verse 386
रक्ष्यते शक्तिरेषा हि रौद्रें रूपं बिभर्ति च । क्योंकि उसके पास इन्द्रकी दी हुई शक्ति है
বায়ু বললেন—এই শক্তি সত্যই সংরক্ষিত রাখা হয়েছে, আর তা রৌদ্র, ভয়ংকর রূপ ধারণ করে। ইন্দ্রপ্রদত্ত এই দিব্য শক্তি জ্বলন্ত উল্কার মতো দীপ্তিমান; মহাবাহো, সূতপুত্র কর্ণ যুদ্ধক্ষেত্রে বিশেষত তোমার উপর নিক্ষেপ করবার জন্যই একে আগলে রেখেছে।
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