
Aśvatthāmā’s Lamentation, Vow of Retaliation, and the Manifestation of the Nārāyaṇāstra (द्रोणपर्व, अध्याय १६६)
Upa-parva: Nārāyaṇāstra-prādurbhāva (Episode of the Manifestation/Deployment of the Nārāyaṇa Weapon)
Dhṛtarāṣṭra asks Saṃjaya what Aśvatthāmā said upon hearing that his aged brāhmaṇa father Droṇa, a master of multiple astras, was killed through stratagem by Dhṛṣṭadyumna. Saṃjaya describes Aśvatthāmā’s grief and rage, his address to Duryodhana, and his moral framing: death in fair combat is endurable, but Droṇa’s disarmament and public humiliation are presented as intolerable injury. Aśvatthāmā pledges to pursue the destruction of the Pāñcālas and specifically to kill Dhṛṣṭadyumna, asserting exceptional martial capacity and claiming access to a weapon unknown even to leading Pāṇḍava figures. He recounts the origin of the Nārāyaṇāstra as a divine boon received through Droṇa’s prior worship and notes cautions regarding its use and the modes by which such a weapon may be pacified or withdrawn. The chapter closes with the Kaurava forces rallying amid loud instruments of war as Aśvatthāmā ritually prepares and brings forth the Nārāyaṇāstra.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को रात्रि-युद्ध का दृश्य सुनाते हैं—दोनों सेनाएँ शस्त्र-प्रास-खड्ग धारण किये, परस्पर अपराध-बोध और प्रतिशोध से भरी दृष्टि से आमने-सामने खड़ी हैं। → हजारों मशालों का प्रकाश, स्वर्ण-दण्ड, रत्न-जटित अलंकरण और गन्ध-तैल से सिक्त दण्डों के बीच युद्धभूमि दिन-सी उजली हो उठती है; फिर दल-दल में संकुल संग्राम छिड़ता है—हाथी हाथियों से, घोड़े घोड़ों से, वीर वीरों से पृथक्-पृथक् भिड़ते हैं। → धृतराष्ट्र की व्याकुल जिज्ञासा के उत्तर में संजय दुर्योधन की मानसिकता उभारते हैं—वह शत्रुओं को ‘अव्यग्र, हृष्ट, अपराजित’ मानकर अपने सूत से शिकायत करता है और निर्णायक आदेश देता है: ‘द्रोण महारथी की रक्षा करो’; इसी आदेश के साथ रात्रि में घोर युद्ध पूर्ण वेग से प्रवर्तित होता है। → अध्याय का अंत युद्ध के ‘प्रवर्तन’ और ‘संकुलता’ पर टिकता है—रात्रि-युद्ध स्थापित हो जाता है, सेनाएँ परस्पर-जिगीषा से उलझ जाती हैं, और द्रोण की रक्षा को केंद्र बनाकर कौरव-रणनीति स्पष्ट हो जाती है। → रात्रि के इस घोर संग्राम में द्रोण की रक्षा हेतु कौन-सा दल किसे रोक पाएगा—और किस वीर का पतन निकट है—यह अगले प्रसंग पर छोड़ दिया जाता है।
Verse 1
भीसस्नआ तन (2) आमने चतुःषष्ट्याधेकशततमो< ध्याय: दोनों सेनाओंका घमासान बुद्ध और दुध और दुर्योधनका द्रोणाचार्यकी रक्षाके लिये [को आदेश संजय उवाच प्रकाशिते तदा लोके रजसा तमसा<<वृते । समाजग्मुरथो वीरा: परस्परवधैषिण:
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! ধূলি ও অন্ধকারে আচ্ছন্ন রণভূমিতে যখন ক্ষণিকের জন্য আলো ফুটল, তখন পরস্পরকে বধ করতে উদ্যত বীরযোদ্ধারা একত্র হয়ে একে অপরের সঙ্গে সংঘর্ষে লিপ্ত হল।
Verse 2
ते समेत्य रणे राजन् शस्त्रप्रासासिधारिण: । परस्परमुदैक्षन्त परस्परकृतागस:
হে মহারাজ! রণাঙ্গণে মুখোমুখি হয়ে অস্ত্র, বর্শা ও খড়্গধারী সেই যোদ্ধারা—যারা পরস্পরকে অপরাধী মনে করত—একে অপরের দিকে তাকিয়ে রইল।
Verse 3
प्रदीपानां सहसैश्ष॒ दीप्यमानै: समनन््तत: । रत्नाचितै: स्वर्णदण्डैर्गन्धतैलावसिज्चितै:
চারদিকে সহস্র সহস্র মশাল জ্বলছিল। তাদের দণ্ড ছিল স্বর্ণের, তাতে রত্ন বসানো ছিল, আর তাতে অবিরত সুগন্ধি তেল ঢালা হচ্ছিল।
Verse 4
देवगन्धर्वदीपाद्यै: प्रभाभिरधिकोज्ज्वलै: । विरराज तदा भूमिग्रहैद्यौरिव भारत
সেখানে দেবতা ও গন্ধর্বদের প্রদীপাদি জ্বলছিল—নিজস্ব বিশেষ দীপ্তিতে আরও উজ্জ্বল হয়ে উঠেছিল। তাদের আলোয় তখন রণভূমি নক্ষত্রখচিত আকাশের মতো শোভিত হচ্ছিল।
Verse 5
उल्काशतै: प्रज्वलितै रणभूमिवव्यराजत । दहामानेव लोकानामभावे च वसुंधरा,सैकड़ों प्रजजलित उल्काओं (मशालों)-से वह रणभूमि ऐसी शोभा पा रही थी, मानो प्रलयकालमें यह सारी पृथ्वी दग्ध हो रही हो
শত শত প্রজ্বলিত উল্কা (মশাল)-এর আলোয় রণভূমি দীপ্ত হয়ে উঠেছিল—যেন প্রলয়কালে সমগ্র পৃথিবী দগ্ধ হচ্ছে এবং প্রাণীদের বিনাশ ঘটছে।
Verse 6
व्यदीप्यन्त दिश: सर्वा: प्रदीपैस्तै: समन््ततः । वर्षाप्रदोषे खद्योतैर्व॒ता वृक्षा इवाबभु:
সেই প্রদীপগুলির আলোয় চারদিকে সব দিকই জ্বলে উঠল—যেন বর্ষাকালের গোধূলিতে জোনাকিতে ঘেরা গাছপালা ঝিলমিল করছে।
Verse 7
असज्जन्त ततो वीरा वीरेष्वेव पृथक् पृथक् नागा नागै: समाजम्मुस्तुरगा हयसादिभि:,उस समय वीरगण विपक्षी वीरोंके साथ पृथक्-पृथक् भिड़ गये। हाथी हाथियोंके और घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ जूझने लगे
তখন বীরেরা বীরদের সঙ্গেই পৃথক পৃথকভাবে সংঘর্ষে লিপ্ত হল। হাতি হাতির সঙ্গে, আর অশ্বারোহী অশ্বারোহীর সঙ্গে যুদ্ধ করতে লাগল।
Verse 8
रथा रथवरैरेव समाजम्मुर्मुदा युता: । तस्मिन् रात्रिमुखे घोरे तव पुत्रस्य शासनात्
সেই ভয়ংকর রাত্রির সূচনায়, তোমার পুত্রের আদেশে, শ্রেষ্ঠ রথীদের নেতৃত্বে রথসমূহ একত্র হল এবং হর্ষে পরিপূর্ণ হয়ে উঠল।
Verse 9
चतुरजड्भस्य सैन्यस्य सम्पातश्न॒ महानभूत् | इसी प्रकार रथी श्रेष्ठ रथियोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक युद्ध करने लगे। उस भयंकर प्रदोषकालमें आपके पुत्रकी आज्ञासे वहाँ चतुरंगिणी सेनामें भारी मारकाट मच गयी ।।
সঞ্জয় বললেন—সেই চতুরঙ্গিনী সেনায় ভয়ংকর সংঘর্ষ শুরু হল। তেমনি শ্রেষ্ঠ রথীরা অন্য রথীদের সঙ্গে দৃঢ় সংকল্পে ও উদ্দীপনায় যুদ্ধ করতে লাগল। সেই ভয়াল প্রদোষকালে আপনার পুত্রের আদেশে সেখানে চতুরঙ্গিনী বাহিনীর মধ্যে মহা হত্যাযজ্ঞ বেধে গেল। তারপর, মহারাজ, অর্জুন কৌরবদের যুদ্ধবিন্যাসের দিকে অগ্রসর হলেন…
Verse 10
धृतराष्ट्र रवाच तस्मिन् प्रविष्टे संरब्धे मम पुत्रस्य वाहिनीम्
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যখন সে ভেতরে প্রবেশ করে ক্রোধে দগ্ধ হয়ে আমার পুত্রের বাহিনীর ওপর ঝাঁপিয়ে পড়ল…
Verse 11
अमृष्यमाणे दुर्धर्षे कथमासीन्मनो हि व: । धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! क्रोध और अमर्षमें भरे हुए दुर्धर्ष वीर अर्जुन जब मेरे पुत्रकी सेनामें प्रविष्ट हुए, उस समय तुमलोगोंके मनकी कैसी अवस्था हुई? ।।
সঞ্জয় বললেন—অসহ্য ক্রোধে দগ্ধ, দুর্ধর্ষ অর্জুন যখন আপনার পুত্রদের সেনায় প্রবেশ করল, তখন তোমাদের মনের অবস্থা কী ছিল? আর সেই শত্রু-দমনকারী ভেতরে ঢুকতেই সৈন্যদল কী করল?
Verse 12
के चैनं समरे वीरें प्रत्युद्ययुररिंदमा:
আর সেই যুদ্ধে কোন কোন বীর—শত্রু-দমনকারী—তার মোকাবিলায় উঠে দাঁড়াল?
Verse 13
के<रक्षन् दक्षिणं चक्रं के च द्रोणस्य सव्यत:
কে দ্রোণাচার্যের রথের ডান চাকার রক্ষা করছিল, আর কে বাম চাকার? কোন বীরেরা—বীরবধকারী—যুদ্ধে দ্রোণের রথের পশ্চাৎভাগ আগলে রাখত? আর কোন যোদ্ধারা শত্রুসেনা নিধন করে আচার্যের অগ্রভাগে অগ্রদল হয়ে চলত?
Verse 14
के पृष्ठतश्नाप्पयभवन् वीरा वीरान् विनिध्नतः । के पुरस्तादगच्छन्त निध्नन्तः शात्रवान् रणे
সঞ্জয় বললেন—দ্রোণের রথের পশ্চাতে কোন বীরেরা রক্ষা করছিল, যারা বীরদেরই নিধন করছিল? আর রণে শত্রুসেনাকে সংহার করতে করতে আচার্যের অগ্রে কোন যোদ্ধারা অগ্রসর হচ্ছিল? তদুপরি দ্রোণের রথের দক্ষিণ চক্র ও বাম চক্র কে কে রক্ষা করছিল?
Verse 15
यत् प्राविशन्महेष्वास: पज्चालानपराजित: । नृत्यन्निव नरव्याप्रो रथमार्गेषु वीर्यवान्
সঞ্জয় বললেন—অপরাজিত মহাধনুর্ধর, নরব্যাঘ্র দ্রোণ, রথপথে যেন নৃত্য করতে করতে, বীর্য প্রদর্শন করে পাঞ্চালদের সেনাবাহিনীতে প্রবেশ করলেন।
Verse 16
यो ददाह शरैद्रोण: पञ्चालानां रथव्रजान् | धूमकेतुरिव क्रुद्ध: कथं मृत्युमुपेयिवान्
সঞ্জয় বললেন—ক্রুদ্ধ ধূমকেতুর ন্যায় যে দ্রোণ তাঁর শরবৃষ্টিতে পাঞ্চালদের রথসমূহকে দগ্ধ করেছিল, সে কীভাবে মৃত্যুকে প্রাপ্ত হল?
Verse 17
अव्यग्रानेव हि परान् कथयस्यपराजितान् । हृष्टानुदीर्णान् संग्रामे न तथा सूत मामकान्
হে সূত! তুমি আমার শত্রুদেরই অব্যগ্র, অপরাজিত, হর্ষোচ্ছ্বাসে ভরা ও সমরে বেগে অগ্রসরমান বলে বর্ণনা করছ; কিন্তু আমার পক্ষের লোকদের বিষয়ে তেমন বলছ না।
Verse 18
हतांश्वैव विदीर्णाश्ष विप्रकीर्णाक्ष शंससि । रथिनो विरथांश्वैव कृतान् युद्धेषु मामकान्,सभी युद्धोंमें मेरे पक्षके रथियोंको तुम हताहत, छिन्न-भिन्न, तितर-बितर तथा रथहीन हुआ ही बता रहे हो
তুমি তো প্রতিটি যুদ্ধে আমার পক্ষের রথীদের নিহত, বিদীর্ণ, ছত্রভঙ্গ এবং রথহীন হয়ে পড়েছে—এই কথাই জানাও।
Verse 19
संजय उवाच द्रोणस्य मतमाज्ञाय योद्धुकामस्य तां निशाम् | दुर्योधनो महाराज वश्यान् भ्रातृुनुवाच ह
সঞ্জয় বললেন—দ্রোণের অভিপ্রায়, সেই রাত্রি জুড়ে যুদ্ধ করার সংকল্প জেনে মহারাজ দুর্যোধন নিজের অধীনস্থ ভ্রাতৃগণকে সম্বোধন করলেন।
Verse 20
कर्ण च वृषसेनं च मद्रराजं॑ च कौरव । दुर्धर्ष दीर्घबाहुं च ये च तेषां पदानुगा:
হে কৌরব! কর্ণ, বৃষসেন, মদ্ররাজ শল্য, দুর্ধর্ষ, দীর্ঘবাহু এবং তাঁদের পদানুগ সকলেই।
Verse 21
“तुम सब लोग सावधान रहकर पराक्रमपूर्वक पीछेकी ओरसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करो। कृतवर्मा उनके दाहिने पहियेकी और राजा शल्य बायें पहियेकी रक्षा करें!
তোমরা সকলে সতর্ক থেকে বীর্যসহকারে পশ্চাৎ দিক থেকে দ্রোণাচার্যকে রক্ষা করো। কৃতবর্মা ডান চক্র-পার্শ্ব রক্ষা করুক, আর রাজা শল্য বাম চক্র-পার্শ্ব রক্ষা করুন।
Verse 22
त्रिगर्तानां च ये शूरा हतशिष्टा महारथा: । तांश्वैव पुरत: सर्वान् पुत्रस्ते समचोदयत्
হে রাজন! ত্রিগর্তদের যে বীর মহারথীরা হত্যাযজ্ঞে অবশিষ্ট ছিল, আপনার পুত্র তাদের সকলকে অগ্রভাগে অগ্রসর হতে উদ্দীপিত করলেন।
Verse 23
संजय कहते हैं--कुरुनन्दन महाराज! युद्धकी इच्छावाले द्रोणाचार्यका मत जानकर दुर्योधनने उस रातमें अपने वशवर्ती भाइयोंसे तथा कर्ण, वृषसेन, मद्रराज शल्य, दुर्धर्ष, दीर्घबाहु तथा जो-जो उनके पीछे चलनेवाले थे, उन सबसे इस प्रकार कहा-- ।।
সঞ্জয় বললেন—হে কুরুনন্দন মহারাজ! যুদ্ধাকাঙ্ক্ষী দ্রোণাচার্যের অভিপ্রায় জেনে দুর্যোধন সেই রাত্রিতে নিজের অধীন ভ্রাতৃগণ এবং কর্ণ, বৃষসেন, মদ্ররাজ শল্য, দুর্ধর্ষ, দীর্ঘবাহু ও তাঁদের অনুসারীদের এভাবে বললেন—“তোমরা সকলেই সম্পূর্ণ প্রস্তুত ও পরাক্রান্ত হয়ে পশ্চাৎ দিক থেকে দ্রোণকে রক্ষা করো। হার্দিক্য (কৃতবর্মা) ডান চক্র-পক্ষ রক্ষা করুক, আর শল্য উত্তর (বাম) চক্র-পক্ষ রক্ষা করুন। আচার্য সম্পূর্ণ সতর্ক, পাণ্ডবরাও জয়ের জন্য প্রবলভাবে উদ্যত; অতএব তোমরা সুসজ্জিত থেকে রণে শত্রুসেনা নিধন করতে করতে আচার্যকে সর্বতোভাবে রক্ষা করো।”
Verse 24
द्रोणो हि बलवान युद्धे क्षिप्रहस्त: प्रतापवान् । निर्जयेत् त्रिदशान् युद्धे किमु पार्थानू ससोमकान्
সঞ্জয় বললেন—দ্রোণাচার্য যুদ্ধে মহাবলী, দ্রুতহস্ত ও পরাক্রমশালী। তিনি রণে দেবতাদেরও পরাজিত করতে পারেন; তবে পৃথাপুত্রদের সোমকসহ পরাস্ত করা তাঁর পক্ষে কতই বা কঠিন?
Verse 25
ते यूयं सहिता: सर्वे भृशं यत्ता महारथा: । द्रोणं रक्षत पाञ्चालादू धृष्टद्युम्नान्महारथात्
সঞ্জয় বললেন—অতএব তোমরা সকল মহারথী একত্র হয়ে সর্বশক্তি দিয়ে উদ্যত হও। পাঁচালবীর সেই মহারথী ধৃষ্টদ্যুম্নের হাত থেকে দ্রোণাচার্যকে রক্ষা করো।
Verse 26
पाण्डवीयेषु सैन्येषु न तं पश्याम कठ्चन । यो योधयेद् रणे द्रोणं धृष्टद्युम्नादृते नृप:
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, পাণ্ডবদের সেনাবাহিনীতে ধৃষ্টদ্যুম্ন ব্যতীত এমন কাউকেই আমরা দেখি না, যে রণে দ্রোণের সঙ্গে যুদ্ধ করতে পারে।
Verse 27
तस्मात् सर्वात्मना मन्ये भारद्वाजस्य रक्षणम् । सुगुप्त: पाण्डवान् हन्यात् सृञ्जयांश्व ससोमकान्
সঞ্জয় বললেন—অতএব আমি সম্পূর্ণ দৃঢ় বিশ্বাসে বলি, ভারদ্বাজপুত্র দ্রোণকে রক্ষা করা উচিত। তিনি যদি সুদৃঢ়ভাবে রক্ষিত থাকেন, তবে পাণ্ডবদের এবং সোমকসহ সৃঞ্জয়দেরও নিধন করবেন।
Verse 28
“अतः मैं सब प्रकारसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करना ही इस समय आवश्यक कर्तव्य मानता हूँ। वे सुरक्षित रहें तो पाण्डवों, सूंजयों और सोमकोंका भी संहार कर सकते हैं ।।
অতএব আমি মনে করি, এই মুহূর্তে সর্বপ্রকারে দ্রোণাচার্যকে রক্ষা করাই অপরিহার্য কর্তব্য। তিনি নিরাপদ থাকলে পাণ্ডব, সৃঞ্জয় ও সোমক—সকলকেই সংহার করতে সক্ষম হবেন। আর যখন সেনার অগ্রভাগে সকল সৃঞ্জয় নিহত হবে, তখন দ্রৌণি অশ্বত্থামা রণে ধৃষ্টদ্যুম্নকেও নিশ্চয়ই বধ করবে—এতে সন্দেহ নেই।
Verse 29
तथार्जुनं च राधेयो हनिष्यति महारथ: । भीमसेनमहं चापि युद्धे जेष्यामि दीक्षित:
তেমনি মহারথী রাধেয় (কর্ণ) অর্জুনকে বধ করবে; আর আমিও দীক্ষিত প্রতিজ্ঞা নিয়ে যুদ্ধে ভীমসেনকে পরাজিত করব।
Verse 30
सो<यं मम जयो व्यक्तो दीर्घकालं भविष्यति । तस्माद् रक्षत संग्रामे द्रोणमेव महारथम्,“इस प्रकार अवश्य ही मेरी यह विजय चिरस्थायिनी होगी, अत: तुम सब लोग मिलकर संग्राममें महारथी द्रोणकी ही रक्षा करो”
এখন আমার এই জয় স্পষ্টই নিশ্চিত, এবং তা দীর্ঘকাল স্থায়ী হবে। অতএব তোমরা সকলে যুদ্ধে একত্র হয়ে কেবল মহারথী দ্রোণকেই রক্ষা করো।
Verse 31
इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठ पुत्रो दुर्योधनस्तव । व्यादिदेश तथा सैन्यं तस्मिंस्तमसि दारुणे,भरतश्रेष्ठ] ऐसा कहकर आपके पुत्र दुर्योधनने उस भयंकर अन्धकारमें अपनी सेनाको युद्धके लिये आज्ञा दे दी
এ কথা বলে, হে ভারতশ্রেষ্ঠ, তোমার পুত্র দুর্যোধন সেই ভয়ংকর অন্ধকারে তার সেনাকে যুদ্ধের জন্য আদেশ দিল।
Verse 32
ततः प्रववृते युद्ध रात्री भरतसत्तम । उभयो: सेनयोर्घोरं परस्परजिगीषया,भरतसत्तम! फिर तो रात्रिके समय दोनों सेनाओंमें एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे घोर युद्ध आरम्भ हो गया
তখন, হে ভারতসত্তম, রাত্রিকালে উভয় সেনার মধ্যে পরস্পরকে জয় করার বাসনায় ভয়ংকর যুদ্ধ শুরু হল।
Verse 33
अर्जुन: कौरवं सैन्यमर्जुनं चापि कौरवा: । नानाशस्त्रसमावायैरन्योन्यं समपीडयन्,अर्जुन कौरव-सेनापर और कौरव-सैनिक अर्जुनपर नाना प्रकारके शस्त्र-समूहोंकी वर्षा करते हुए एक-दूसरेको पीड़ा देने लगे
অর্জুন কৌরব সেনার উপর প্রবল আঘাত হানল, আর কৌরবরাও অর্জুনের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল। নানা প্রকার অস্ত্রের বর্ষা ও সংযোগে তারা পরস্পরকে পীড়িত করতে লাগল।
Verse 34
द्रौणि: पाज्चालराजं च भारद्वाजश्च सूंजयान् । छादयांचक्रतु: संख्ये शरै: संनतपर्वभि:
সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধক্ষেত্রে দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা ও ভারদ্বাজ দ্রোণ একত্রে পাঞ্চালরাজ দ্রুপদ এবং সৃঞ্জয়দের উপর বাঁকানো গাঁটযুক্ত তীরের প্রবল বর্ষণ করে তাদের আচ্ছাদিত করলেন।
Verse 35
पाण्डुपाञज्चालसैन्यानां कौरवाणां च भारत | आसीजक्निष्टानको घोरो निघ्नतामितरेतरम्
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! একদিকে পাণ্ডব ও পাঞ্চাল সৈন্যদল এবং অন্যদিকে কৌরব যোদ্ধারা যখন পরস্পরকে নিধন করছিল, তখন চারিদিকে ভয়ংকর, হৃদয়বিদারক আর্তনাদ উঠেছিল।
Verse 36
नैवास्माभिस्तथा पूर्वर्दृष्टपूर्व तथाविधम् । श्रुतं वा यादृशं युद्धमासीद् रौद्रं भयानकम्
সঞ্জয় বললেন—যেমন রুদ্র ও ভয়ংকর যুদ্ধ তখন চলছিল, তেমন যুদ্ধ আমরা আগে কখনও দেখিনি, পূর্বে কখনও শুনিওনি।
Verse 93
व्यधमत् त्वरया युक्त: क्षपयन् सर्वपार्थिवान् | महाराज! तदनन्तर अर्जुन बड़ी उतावलीके साथ समस्त राजाओंका संहार करते हुए कौरव-सेनाका विनाश करने लगे
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! তারপর তাড়নায় উদ্বুদ্ধ হয়ে তিনি আক্রমণ জোরদার করলেন; সকল রাজাকে নিধন করতে করতে অর্জুন কৌরবসেনাকে ধ্বংস করতে লাগলেন।
Verse 113
दुर्योधनश्व कि कृत्यं प्राप्तकालममन्यत । शत्रुओंको पीड़ा देनेवाले अर्जुनके प्रवेश करनेपर मेरी सेनाओंने क्या किया? तथा दुर्योधनने उस समयके अनुरूप कौन-सा कार्य उचित माना?
সঞ্জয় বললেন—“সেই সংকটক্ষণ উপস্থিত হলে দুর্যোধন কোন কর্মকে যথাযথ মনে করল? শত্রুদের দুঃখদাতা অর্জুন প্রবেশ করলে আমার সৈন্যরা কী করল? আর তখন দুর্যোধন কোন কাজকে উপযুক্ত বলে স্থির করল?”
Verse 123
द्रोणं च के व्यरक्षन्त प्रविष्टे श्वेतवाहने । समरांगणमें शत्रुओंका दमन करनेवाले कौन-कौन-से योद्धा वीर अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े। श्वेतवाहन अर्जुनके कौरव-सेनाके भीतर घुस आनेपर किन लोगोंने द्रोणाचार्यकी रक्षा की
সঞ্জয় বললেন—শ্বেত অশ্ববাহিত রথে আরোহী অর্জুন কৌরবসেনার গভীরে প্রবেশ করলে, শত্রুদমনকারী সেই বীরের মোকাবিলায় কোন কোন যোদ্ধা অগ্রসর হল? আর সেই মুহূর্তে দ্রোণাচার্যের রক্ষায় কারা দৃঢ়ভাবে অবস্থান করল?
Verse 163
इस प्रकार श्रीमह्ााभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें यात्रियुद्धके अवसरपर प्रदीपोंका प्रकाशविषयक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত ঘটোৎকচবধপর্বে রাত্রিযুদ্ধের উপলক্ষে প্রদীপের আলোকবিষয়ক একশো তেষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 164
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे संकुलयुद्धे चतुःषष्ट्यधिकशततमो<ध्याय:
ইতি শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বে ঘটোৎকচবধপর্বের অন্তর্গত রাত্রিযুদ্ধ ও সংকুলযুদ্ধ-বিষয়ক একশো চৌষট্টিতম অধ্যায়।
Verse 296
शेषांश्ष॒ पाण्डवान् योधा: प्रसभं हीनतेजस: । 'योद्धाओ! इसी प्रकार महारथी कर्ण अर्जुनका वध कर डालेगा तथा रणयज्ञकी दीक्षा लेकर युद्ध करनेवाला मैं भीमसेनको और तेजोहीन हुए दूसरे पाण्डवोंको भी बलपूर्वक जीत लूँगा
সঞ্জয় বললেন—তখন যোদ্ধারা অবশিষ্ট পাণ্ডবদের, যাদের তেজ ও শক্তি ক্ষীণ হয়ে গেছে, বলপ্রয়োগে পরাভূত করবে।
The dilemma is whether battlefield outcomes remain morally intelligible when a revered teacher is neutralized through stratagem and humiliation—raising the question of how far wartime necessity can override norms of fair combat and respect for the disarmed.
The chapter underscores that grief and honor-injury can rapidly convert duty into vengeance, and it juxtaposes this escalation with the idea that even supreme power (mahāstra) is governed by rules of initiation, limitation, and cessation.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is structural and ethical—positioning the Nārāyaṇāstra discourse as a warning about regulated power and as a narrative mechanism intensifying the war’s moral and strategic crisis.
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