
दुर्योधन–द्रोणसंवादः (Arjuna-vīrya-prasaṃśā and renewed battle formation)
Upa-parva: Droṇa–Duryodhana Saṃvāda (Arjuna-vīrya-prasaṃśā and Kṣātra-pratijñā episode)
Saṃjaya reports that Duryodhana, provoked by impatience and rivalry, confronts Droṇa: he argues that it is strategically unacceptable to allow the fatigued Pāṇḍavas respite and implies that Droṇa’s protection enables their recovery. He flatters Droṇa’s supremacy in divine weaponry (including brahmāstra-class astras) and questions why such power is not used to secure a decisive advantage. Droṇa, stirred yet controlled, replies that despite age he will exert full strength and will act in accordance with Duryodhana’s instruction, even if the task appears ignoble to a victory-seeker; he further vows intensified action against the Pañcālas. However, Droṇa then redirects the discussion to a sober evaluation of Arjuna: he states that no ordinary beings can easily withstand the enraged Savyasācin and cites Arjuna’s earlier victories over formidable non-human and elite opponents, using these precedents to caution against simplistic plans to “finish” Arjuna. Duryodhana’s camp voices renewed intent—naming allies such as Karṇa, Duḥśāsana, and Śakuni—yet Droṇa dismisses overconfidence as delusion and urges direct encounter with Arjuna as the true test of kṣātra resolve. The chapter closes with Droṇa withdrawing to reposition forces; the army is divided and organized anew, and battle recommences in an intensified phase.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को बताता है कि रणभूमि की घोर घड़ी में दुर्योधन कर्ण से आश्रय और आश्वासन माँगता है—‘अब वही समय आया है, मित्रों के मित्र! कर्ण, समर में हमारे महारथियों की रक्षा करो।’ → दुर्योधन पाण्डव-पक्ष की घेराबंदी और उनके क्रोध का चित्र खींचता है—पाञ्चाल, मत्स्य, कैकेय और पाण्डव महारथी चारों ओर से सर्पों-से फुफकारते हुए दबाव बना रहे हैं। वह कर्ण को उकसाता है कि यदि अर्जुन मारा गया तो उसके भाई वश में आ जाएँगे या वन को चले जाएँगे। कर्ण प्रतिज्ञा-भरे गर्व से कहता है कि उसके जीवित रहते दुर्योधन शोक न करे; वह समस्त पाण्डवों को जीत लेगा। इसी बीच कृपाचार्य कर्ण के दावे पर कठोर आपत्ति करते हैं—अर्जुन को अकेले भी न जीत पाने वाले का कृष्ण सहित सबको जीतने का उत्साह खोखला है—और पाण्डवों के गुण, उनके सहायक-सम्बन्धियों की वीरता तथा कृष्ण की उपस्थिति का भयावह सत्य सामने रखते हैं। → कृपाचार्य का तीखा उपदेश और कर्ण का प्रत्युत्तर टकराते हैं: कृप कर्ण की क्षमता पर प्रश्न उठाकर पाण्डवों की शक्ति का यथार्थ उद्घाटित करते हैं, जबकि कर्ण इसे अपमान मानकर कृप को ही ‘दुर्मति’ कहता है और आरोप लगाता है कि वे कौरव-सेना को भयभीत करने हेतु पाण्डवों के गुण गा रहे हैं। गुरु-शिष्य/वृद्ध-युवा की मर्यादा टूटती-सी दिखती है और सभा-सा वातावरण रण-नीति से अधिक अहं-संघर्ष बन जाता है। → विवाद का निष्कर्ष किसी स्पष्ट समझौते में नहीं, बल्कि दो ध्रुवों की स्थापना में होता है—कृप का यथार्थवादी, सावधान करने वाला दृष्टिकोण और कर्ण का प्रतिज्ञा-प्रधान, अपमान-संवेदनशील आत्मविश्वास। दुर्योधन को क्षणिक आश्वासन तो मिलता है, पर भीतर-भीतर कौरव-पक्ष की रणनीति पर दरार और नेतृत्व-संकट का संकेत गहरा हो जाता है। → कर्ण के अहं और कृप की चेतावनी के बीच प्रश्न लटकता है—क्या कर्ण सचमुच अर्जुन/पाण्डवों के विरुद्ध निर्णायक पराक्रम दिखाएगा, या यह वाक्-युद्ध कौरवों की आगामी पराजय का पूर्वलक्षण बनेगा?
Verse 1
ऑपन-माज बछ। अफि्-"ऋण अष्टपञ्चाशदाधिकशततमो& ध्याय: दुर्योधन और कर्णकी बातचीत
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! পাণ্ডবদের মহাবল বৃদ্ধি পেতে দেখে, তাকে অসহনীয় মনে করে দুর্যোধন কর্ণকে বলল—
Verse 2
अयं स काल: सम्प्राप्तो मित्राणां मित्रवत्सल । त्रायस्व समरे कर्ण सर्वान् योधान् महारथान्
“হে বন্ধুদের প্রতি স্নেহশীল! সেই নির্ণায়ক সময় এসে গেছে। কর্ণ, এই সমরে আমাদের সকল মহারথী যোদ্ধাদের রক্ষা করো।”
Verse 3
पज्चालैर्मत्स्यकैकेयै: पाण्डवैश्व महारथै: । वृतान् समन्तात् संक्ुद्धै्नि:श्वसद्धिरिवोरगै:
পাঞ্চাল, মৎস্য, কৈকেয় ও পাণ্ডব—সেই মহারথীরা ক্রোধে দগ্ধ হয়ে ফোঁসফোঁস করা সর্পের ন্যায় চারদিক থেকে তাদের ঘিরে ফেলেছিল।
Verse 4
“मित्रवत्सल कर्ण! यही मित्रोंके कर्तव्यपालनका उपयुक्त अवसर आया है। क्रोधमें भरे हुए पांचाल, मत्स्य, केकय तथा पाण्डव महारथी फुफकारते हुए सर्पोके समान भयंकर हो उठे हैं। उनके द्वारा चारों ओरसे घिरे हुए मेरे समस्त महारथी योद्धाओंकी आज तुम समरांगणमें रक्षा करो ।।
সঞ্জয় বললেন—“মিত্রবৎসল কর্ণ! আজই বন্ধুধর্ম পালন করার উপযুক্ত সময়। ক্রোধে পূর্ণ পাঞ্চাল, মৎস্য, কৈকেয় ও পাণ্ডব মহারথীরা ফোঁসফোঁস করা সর্পের মতো ভয়ংকর হয়ে উঠেছে। তাদের দ্বারা চারদিক থেকে পরিবেষ্টিত আমার সকল মহারথী যোদ্ধাকে আজ রণাঙ্গনে তুমি রক্ষা করো। দেখো—বিজয়ে দীপ্ত পাণ্ডবেরা এবং ইন্দ্রসম পরাক্রান্ত পাঞ্চালদের অসংখ্য রথদল আনন্দে উন্মত্ত হয়ে গর্জন করছে!”
Verse 5
कर्ण उवाच परित्रातुमिह प्राप्तो यदि पार्थ पुरंदर: । तमप्याशु पराजित्य ततो हन्तास्मि पाण्डवम्
কর্ণ বললেন—“রাজন! যদি স্বয়ং পুরন্দর ইন্দ্রও এখানে পার্থ অর্জুনকে রক্ষা করতে এসে থাকেন, তবে তাকেও আমি শীঘ্রই পরাজিত করে, তারপর পাণ্ডব অর্জুনকে অবশ্যই বধ করব।”
Verse 6
सत्य॑ ते प्रतिजानामि समाश्चसिहि भारत । हन्तास्मि पाण्डुतनयान् पज्चालांश्व समागतान्
কর্ণ বললেন—“হে ভারত! স্থির হও। আমি সত্য প্রতিজ্ঞা করছি—রণভূমিতে সমাগত পাণ্ডুপুত্রদের এবং একত্রিত পাঞ্চালদের আমি অবশ্যই বধ করব।”
Verse 7
जयं ते प्रतिदास्थामि वासवस्थेव पावकि: । प्रियं तव मया कार्यमिति जीवामि पार्थिव
কর্ণ বললেন—“যেমন পাৱকি কার্ত্তিকেয় তারকাসুরকে বিনাশ করে বাসব ইন্দ্রকে জয় এনে দিয়েছিলেন, তেমনই আজ আমি তোমাকে জয় প্রদান করব। হে পার্থিব! তোমার প্রিয় সাধন করাই আমার কর্তব্য—এই কারণেই আমি জীবন ধারণ করি।”
Verse 8
सर्वेषामेव पार्थानां फाल्गुनो बलवत्तर: | तस्यामोघां विमोक्ष्यामि शक्ति शक्रविनिर्मिताम्,कुन्तीके सभी पुत्रोंमें अर्जुन ही अधिक शक्तिशाली हैं, अतः मैं इन्द्रकी दी हुई अमोघ शक्तिको अर्जुनपर ही छोड़ूँगा
পৃথার সকল পুত্রের মধ্যে ফাল্গুন (অর্জুন)ই সর্বাধিক বলবান; অতএব শক্র (ইন্দ্র) নির্মিত অমোঘ শক্তি আমি তারই বিরুদ্ধে নিক্ষেপ করব।
Verse 9
तस्मिन् हते महेष्वासे भ्रातरस्तस्य मानद । तव वश्या भविष्यन्ति वनं यास्यन्ति वा पुन:,मानद! महाधनुर्धर अर्जुनके मारे जानेपर उनके सभी भाई तुम्हारे वशमें हो जायाँगे अथवा पुनः वनमें चले जायँगे
হে মানদ! সেই মহাধনুর্ধর নিহত হলে তার ভ্রাতারা তোমার বশে আসবে, নতুবা আবার বনে চলে যাবে।
Verse 10
मयि जीवति कौरव्य विषादं मा कृथा: क्वचित् | अहं जेष्यामि समरे सहितान् सर्वपाण्डवान्,कुरुनन्दन! तुम मेरे जीते-जी कभी विषाद न करो। मैं समरभूमिमें संगठित होकर आये हुए समस्त पाण्डवोंको जीत लूँगा
হে কৌরব! আমি জীবিত থাকতে তুমি কখনো বিষাদ করো না; সমরে একত্রিত সকল পাণ্ডবকে আমি পরাজিত করব।
Verse 11
पंचालान् केकयांश्वैव वृष्णीश्वापि समागतान् | बाणौचै: शकलीकृत्य तव दास्यामि मेदिनीम्
রণক্ষেত্রে সমবেত পাঁচাল, কেকয় এবং বৃষ্ণিদেরও আমি আমার বাণবৃষ্টিতে খণ্ড-বিখণ্ড করে এই পৃথিবী তোমাকে অর্পণ করব।
Verse 12
संजय उवाच एवं ब्रुवाणं कर्ण तु कृप: शारद्वतोड<ब्रवीत् स्मयन्निव महाबाहु: सूतपुत्रमिदं वच:
সঞ্জয় বললেন—রাজন! এভাবে কথা বলতে থাকা সূতপুত্র কর্ণকে শারদ্বতের পুত্র মহাবাহু কৃপাচার্য যেন মৃদু হাসি হেসে এই বাক্য বললেন।
Verse 13
शोभनं शोभनं कर्ण सनाथ: कुरुपुड्गभव: । त्वया नाथेन राधेय वचसा यदि सिध्यति
সঞ্জয় বললেন— “অতি উত্তম, অতি উত্তম, কর্ণ! তোমার মতো রক্ষক থাকলে কুরুপুঙ্গব (দুর্যোধন) সত্যিই সনাথ। রাধেয়! যদি কেবল বাক্য আর চতুর কথাতেই কাজ সিদ্ধ হয়, তবে তোমার মতো সহায় পেয়ে সে নিশ্চয়ই নিরাপদ।”
Verse 14
बहुश: कत्थसे कर्ण कौरवस्य समीपतः । नतुते विक्रम: कश्चिद् दृश्यते फलमेव वा
সঞ্জয় বললেন— “কর্ণ! কৌরবকুমার সুয়োধনের সামনে তুমি বারবার দীর্ঘ গর্বোক্তি কর; কিন্তু তোমার কোনো প্রকৃত বীরত্বও দেখা যায় না, তার কোনো ফলও প্রকাশ পায় না।”
Verse 15
समागम: पाण्डुसुतैर्दृष्टस्ते बहुशो युधि । सर्वत्र निर्जितश्चासि पाण्डवै: सूतनन्दन
সঞ্জয় বললেন— “সূতনন্দন! যুদ্ধক্ষেত্রে পাণ্ডুপুত্রদের সঙ্গে তোমার বহুবার সম্মুখসমর হয়েছে; কিন্তু সর্বত্রই পাণ্ডবদের হাতে তুমি পরাজিত হয়েছ।”
Verse 16
ह्वियमाणे तदा कर्ण गन्धर्वर्धृतराष्ट्रजे । तदायुध्यन्त सैन्यानि त्वमेको5ग्रेडपलायिथा:
সঞ্জয় বললেন— “কর্ণ! মনে আছে তো—যখন গন্ধর্বরা ধৃতরাষ্ট্রপুত্র দুর্যোধনকে ধরে নিয়ে যাচ্ছিল, তখন সমস্ত সেনা যুদ্ধ করছিল; কিন্তু তুমি একাই সবার আগে সম্মুখভাগ থেকে পালিয়ে গিয়েছিলে।”
Verse 17
विराटनगरे चापि समेता: सर्वकौरवा: । पार्थेन निर्जिता युद्धे त्वं च कर्ण सहानुज:
সঞ্জয় বললেন— “কর্ণ! বিরাটনগরেও সমস্ত কৌরব একত্র হয়েছিল; কিন্তু যুদ্ধে পার্থ (অর্জুন) একাই সকলকে পরাস্ত করেছিল। কর্ণ! তুমিও তোমার অনুজদের সঙ্গে সেখানে পরাজিত হয়েছিলে।”
Verse 18
एकस्याप्यसमर्थस्त्वं फाल्गुनस्य रणाजिरे । कथमुत्सहसे जेतुं सकृष्णान् सर्वपाण्डवान्
সঞ্জয় বললেন—রণক্ষেত্রে তুমি একা ফাল্গুন অর্জুনেরও মোকাবিলা করতে অক্ষম। তবে কৃষ্ণসহ সমস্ত পাণ্ডবকে জয় করার সাহস তুমি কীভাবে কর?
Verse 19
“समरांगणमें अकेले अर्जुनका सामना करनेकी भी तुममें शक्ति नहीं है; फिर श्रीकृष्णसहित सम्पूर्ण पाण्डवोंको जीत लेनेका उत्साह कैसे दिखाते हो? ।।
সঞ্জয় বললেন—রণক্ষেত্রে তোমার একা অর্জুনেরও মোকাবিলা করার শক্তি নেই; তবে কৃষ্ণসহ সমস্ত পাণ্ডবকে জয় করার এমন দম্ভ তুমি কীভাবে দেখাও? তখন তারা বলল—“কর্ণ, যুদ্ধ করো; হে সূতপুত্র, তুমি অতিরিক্ত বড়াই করো। যে কথা না বলে বীরত্ব দেখায়, সেই-ই প্রকৃত বীর; এটাই সৎপুরুষের ব্রত।”
Verse 20
गर्जित्वा सूतपुत्र त्वं शारदा भ्रमिवाफलम् | निष्फलो दृश्यसे कर्ण तच्च राजा न बुध्यते
সঞ্জয় বললেন—হে সূতপুত্র, তুমি গর্জন করো বটে, কিন্তু শরৎকালের ঘুরে বেড়ানো নিষ্ফল মেঘের মতো। হে কর্ণ, কর্মে তুমি নিষ্ফলই প্রতীয়মান—আর রাজা তা বোঝেন না।
Verse 21
'सूतपुत्र कर्ण! तुम शरद्-ऋतुके निष्फल बादलोंके समान गर्जना करके भी निष्फल ही दिखायी देते हो; किंतु राजा दुर्योधन इस बातको नहीं समझ रहे हैं ।।
সঞ্জয় বললেন—হে সূতপুত্র কর্ণ! শরৎকালের নিষ্ফল মেঘের মতো গর্জে উঠেও তুমি নিষ্ফলই প্রতীয়মান; কিন্তু রাজা দুর্যোধন তা বোঝেন না। হে রাধেয়, যতক্ষণ তুমি পার্থকে দেখছ না ততক্ষণ গর্জাও; কারণ কাছে থেকে পার্থকে দেখলে পরে তোমার সেই গর্জন আর সহজে মিলবে না।
Verse 22
'राधानन्दन! जबतक तुम अर्जुनको नहीं देखते हो, तभीतक गर्जना कर लो। कुन्तीकुमार अर्जुनको समीप देख लेनेपर फिर यह गर्जना तुम्हारे लिये दुर्लभ हो जायगी ।।
সঞ্জয় বললেন—হে রাধানন্দন, যতক্ষণ তুমি পার্থকে দেখছ না ততক্ষণ গর্জাও; কাছে থেকে পার্থকে দেখলে তোমার গর্জন দুর্লভ হবে। ফাল্গুনের সেই বাণ এখনও তোমাকে স্পর্শ করেনি বলেই তুমি গর্জাচ্ছ; পার্থের শরবিদ্ধ হলে তোমার এই গর্জন-তর্জন আর সহজে উঠবে না।
Verse 23
बाहुभि: क्षत्रिया: शूरा वाम्भि: शूरा द्विजातय: । धनुषा फाल्गुन: शूर: कर्ण: शूरो मनोरथै:
সঞ্জয় বললেন— ক্ষত্রিয়েরা বাহুবলে বীরত্ব প্রকাশ করে, আর দ্বিজেরা বাক্শক্তিতে পরাক্রম দেখায়। ধনুকে ফাল্গুন (অর্জুন) বীর, আর কর্ণ বীর তার মনোরথ ও কল্পিত পরিকল্পনার জোরে।
Verse 24
तोषितो येन रुद्रोडपि कः पार्थ प्रतिघातयेत् । क्षत्रिय अपनी भुजाओंसे शौर्यका परिचय देते हैं। ब्राह्मण वाणीद्वारा प्रवचन करनेमें वीर होते हैं। अर्जुन धनुष चलानेमें शूर हैं; किंतु कर्ण केवल मनसूबे बाँधनेमें वीर है। जिन्होंने अपने पराक्रमसे भगवान् शंकरको भी संतुष्ट किया है
সঞ্জয় বললেন— হে পার্থ! যাঁকে তুষ্ট করে রুদ্র (শিব) পর্যন্ত প্রসন্ন হয়েছেন, সেই অর্জুনকে কে আঘাত করতে পারে? ক্ষত্রিয়েরা বাহুবলে শৌর্য দেখায়, আর ব্রাহ্মণেরা নির্ভীক বাক্য ও উপদেশে বীর। অর্জুন ধনুর্বিদ্যায় শূর, কিন্তু কর্ণ বীর কেবল বড় বড় মনোরথ বাঁধায়। যে নিজের পরাক্রমে ভগবান শঙ্করকে সন্তুষ্ট করেছে, সেই অর্জুনকে কে বধ করতে পারে?
Verse 25
शूरा गर्जन्ति सततं प्रावषीव बलाहका:
সঞ্জয় বললেন— বীরেরা বারবার গর্জন করছিল, যেন বর্ষাকালে মেঘের গর্জন।
Verse 26
दोषमत्र न पश्यामि शूराणां रणमूर्थनि
সঞ্জয় বললেন— যুদ্ধের অগ্রভাগে দাঁড়ানো সেই বীরদের মধ্যে আমি এখানে কোনো দোষ দেখি না।
Verse 27
यं भारं पुरुषों वोढुं मनसा हि व्यवस्यति
সঞ্জয় বললেন— যে ভার একজন পুরুষ মনে মনে বহন করার সংকল্প করে…
Verse 28
दैवमस्य ध्रुवं तत्र साहाय्यायोपपद्यते | “पुरुष अपने मनसे जिस भारको ढोनेका निश्चय करता है, उसमें दैव अवश्य ही उसकी सहायता करता है ।।
সঞ্জয় বললেন— এমন উদ্যোগে দৈব অবশ্যম্ভাবী ও অচল সহায় হয়ে উপস্থিত হয়। মানুষ যখন মনে কঠিন ভার বহনের দৃঢ় সংকল্প করে, তখন সেই সংকল্প সিদ্ধ করতে বিধিও তার সহায় হয়।
Verse 29
हत्वा पाण्ड्सुतानाजी सकृष्णान् सहसात्वतान् | गर्जामि यद्य॒हं विप्र तव कि तत्र नश्यति
হে বিপ্র! যদি আমি যুদ্ধে পাণ্ডুপুত্রদের—কৃষ্ণ ও সাত্বতদেরসহ—বধ করার সংকল্প করে গর্জন করি, তাতে তোমার কী ক্ষতি হয়?
Verse 30
वृथा शूरा न गर्जन्ति शारदा इव तोयदा: । सामर्थ्यमात्मनो ज्ञात्वा ततो गर्जन्ति पण्डिता:
শূররা বৃথা গর্জন করে না—শরৎকালের মেঘের মতো নয় তারা। পণ্ডিতজন আগে নিজের সামর্থ্য বুঝে নেয়, তারপরই গর্জে ওঠে।
Verse 31
सो5हमद्य रणे यत्तौ सहितौ कृष्णपाण्डवौ । उत्सहे मनसा जेतुं ततो गर्जामि गौतम
গৌতম! আজ রণক্ষেত্রে বিজয়ের জন্য একসঙ্গে উদ্যত কৃষ্ণ ও পাণ্ডব (অর্জুন)-কে আমি মনে মনে জয় করার সাহস সঞ্চয় করেছি; তাই আমি গর্জে উঠছি।
Verse 32
पश्य त्वं गर्जितस्यास्य फल मे विप्र सानुगान् । हत्वा पाण्ड्सुतानाजी सहकृष्णान् ससात्वतान्
হে বিপ্র! তোমার অনুগামীদেরসহ আমার এই গর্জনের ফল দেখো—যুদ্ধে পাণ্ডুপুত্রদের, কৃষ্ণ ও সাত্বতদেরসহ, বধ করে।
Verse 33
दुर्योधनाय दास्यामि पृथिवीं हतकण्टकाम् । “ब्रह्म! मेरी इस गर्जनाका फल देख लेना। मैं युद्धमें श्रीकृष्ण, सात्यकि तथा अनुगामियोंसहित पाण्डवोंको मारकर इस भूमण्डलका निष्कण्टक राज्य दुर्योधनको दे दूँगा' ।।
কৃপ বললেন—হে সূতপুত্র, তোমার এই গর্বভরা প্রলাপ ও কল্পিত পরিকল্পনা আমার কাছে বিশ্বাসযোগ্য নয়। কর্ণ, তুমি সর্বদা কৃষ্ণ, অর্জুন ও ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরকে নিন্দা কর; কিন্তু যুদ্ধে জয় নিশ্চিত সেই পক্ষেই, যেখানে যুদ্ধবিশারদ কৃষ্ণ ও অর্জুন অবস্থান করেন।
Verse 34
सदा क्षिपसि वै कृष्णौ धर्मराजं च पाण्डवम् | ध्रुवस्तत्र जय: कर्ण यत्र युद्धविशारदौ
কৃপ বললেন—কর্ণ, তুমি সর্বদা কৃষ্ণ ও পাণ্ডব ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরকে বিদ্রূপ কর; কিন্তু যেখানে যুদ্ধবিশারদ কৃষ্ণ ও অর্জুন আছেন, সেই পক্ষেই জয় নিশ্চিত।
Verse 35
देवगन्धर्वयक्षाणां मनुष्योरगरक्षसाम् । दंशितानामपि रणे अजेयौ कृष्णपाण्डवौ
কৃপ বললেন—দেবতা, গন্ধর্ব, যক্ষ, মানুষযোদ্ধা, নাগ ও রাক্ষস—সবাই যদি বর্ম বেঁধে যুদ্ধক্ষেত্রে আসে, তবু রণাঙ্গনে কৃষ্ণ ও পাণ্ডব (অর্জুন) অজেয়ই থাকবেন।
Verse 36
ब्रह्मण्य: सत्यवाग दान्तो गुरुदैवतपूजक: । नित्यं धर्मरतश्नैव कृतास्त्रश्न विशेषत:
কৃপ বললেন—তিনি ব্রাহ্মণ ও ধর্মের প্রতি ভক্ত, বাক্যে সত্যবাদী, সংযমী, এবং গুরুকে দেবতুল্য জেনে পূজা করেন। তিনি সর্বদা ধর্মে রত এবং বিশেষত অস্ত্রবিদ্যায় সম্পূর্ণ সিদ্ধ।
Verse 37
भ्रातरश्नास्य बलिन: सर्वस्त्रिषु कृतश्रमा:
কৃপ বললেন—তার ভ্রাতারাও বলবান, এবং সকল অস্ত্রে পরিশ্রমসাধ্য অনুশীলনে সুপ্রশিক্ষিত—অভিজ্ঞ যোদ্ধা।
Verse 38
सम्बन्धिननश्रेन्द्रवीर्या: स्वनुरक्ता: प्रहारिण:
কৃপ বললেন—তাদের আত্মীয়রাও ইন্দ্রসম বীর্যবান, নিজ পক্ষের প্রতি অনুরক্ত এবং আঘাত হানতে দক্ষ। তাদের নাম—ধৃষ্টদ্যুম্ন, শিখণ্ডী, দুর্মুখের পুত্র জনমেজয়, চন্দ্রসেন, রুদ্রসেন, কীর্তিধর্মা, ধ্রুব, ধর, বসুচন্দ্র, দামচন্দ্র, সিংহচন্দ্র, সুতেজন, দ্রুপদের পুত্রগণ এবং মহা অস্ত্রবিদ দ্রুপদ স্বয়ং।
Verse 39
धृष्टद्युम्म: शिखण्डी च दौर्मुखिर्जनमेजय: । चन्द्रसेनो रुद्रसेन: कीर्तिधर्मा ध्रुवो धर:
ধৃষ্টদ্যুম্ন ও শিখণ্ডী, এবং দুর্মুখের পুত্র জনমেজয়; চন্দ্রসেন ও রুদ্রসেন; কীর্তিধর্মা, ধ্রুব ও ধর—এরা সকলেই ইন্দ্রসম বীর্যবান, নিজ পক্ষের প্রতি অনুরক্ত এবং প্রহারে দক্ষ।
Verse 40
वसुचन्द्रो दामचन्द्र: सिंहचन्द्र: सुतेजन: । द्रुपदस्य तथा पुत्रा द्रुपदश्च महास्त्रवित्
বসুচন্দ্র, দামচন্দ্র, সিংহচন্দ্র ও সুতেজন; দ্রুপদের পুত্রগণ, এবং দ্রুপদ নিজেও মহা অস্ত্রবিদ।
Verse 41
येषामर्थाय संयत्तों मत्स्यराज: सहानुज: । शतानीक: सूर्यदत्त: श्रुतानीक: श्रुतध्वज:
যাদের জন্য মৎস্যরাজ তাঁর অনুজদের সঙ্গে অস্ত্র ধারণ করে প্রস্তুত হয়েছেন—তারা হল শাতানীক, সূর্যদত্ত, শ্রুতানীক ও শ্রুতধ্বজ।
Verse 42
बलानीको जयानीको जयाश्वो रथवाहन: । चन्द्रोदय: समरथो विराटभ्रातर: शुभा:
বলানীক, জয়ানীক, জয়াশ্ব, রথবাহন, চন্দ্রোদয় ও সমরথ—এরা বিরাটের শুভ (যশস্বী) ভ্রাতা।
Verse 43
यमौ च द्रौपदेयाश्न राक्षसश्र॒ घटोत्कच: । येषामर्थाय युध्यन्ते न तेषां विद्यते क्षय:
যমজ দুই ভাই (নকুল-সহদেব), দ্রৌপদীর পুত্রগণ এবং রাক্ষস ঘটোৎকচ—যাদের জন্য বীরেরা যুদ্ধ করে, তাদের পক্ষের কখনও ক্ষয় হয় না; তাদের উদ্দেশ্য লুপ্ত হয় না।
Verse 44
जिनके लिये शतानीक, सूर्यदत्त, श्रुतानीक, श्रुतध्वज, बलानीक, जयानीक, जयाश्व, रथवाहन, चन्द्रोदय तथा समरथ--ये विराटके श्रेष्ठ भाई और इन भाइयोंसहित मत्स्यराज विराट युद्ध करनेको तैयार हैं, नकुल, सहदेव, द्रौपदीके पुत्र तथा राक्षस घटोत्कच--ये वीर जिनके लिये युद्ध कर रहे हैं, उन पाण्डवोंकी कभी कोई क्षति नहीं हो सकती है || ४१-- ४३ ।। एते चान्ये च बहवो गुणा: पाण्डुसुतस्य वै । कामं॑ खलु जगत्सर्व॑ सदेवासुरमानुषम्
পাণ্ডুপুত্রদের মধ্যে এ সকল এবং আরও বহু গুণ আছে। সত্যই, দেব-অসুর-মানুষসহ সমগ্র জগৎ ইচ্ছামতো তাদের বিরুদ্ধে দাঁড়ালেও পাণ্ডবদের ধ্বংস করা যায় না।
Verse 45
सयक्षराक्षसगणं सभूतभुजगद्धिपम् । निःशेषमस्त्रवीर्येण कुर्वाते भीमफाल्गुनौ
যক্ষ-রাক্ষসের দল, ভূতসমেত এবং নাগরাজ পর্যন্ত—ভীম ও ফাল্গুন (অর্জুন) অস্ত্রশক্তির পরাক্রমে সকলকে নিঃশেষ করে দিচ্ছেন।
Verse 46
पाणए्डुपुत्र युधिष्ठिरके ये तथा और भी बहुत-से गुण हैं। भीमसेन और अर्जुन यदि चाहें तो अपने अस्त्रबलसे देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष, राक्षस, भूत, नाग और हाथियोंसहित इस सम्पूर्ण जगत्का सर्वथा विनाश कर सकते हैं ।।
পাণ্ডুপুত্র যুধিষ্ঠিরের মধ্যে এ ছাড়াও বহু গুণ আছে। ভীমসেন ও অর্জুন ইচ্ছা করলে অস্ত্রবলের দ্বারা দেব, অসুর, মানুষ, যক্ষ, রাক্ষস, ভূত, নাগ এবং হাতিসহ এই সমগ্র জগৎ সম্পূর্ণ ধ্বংস করতে পারেন। আর যুধিষ্ঠির তো ভয়ংকর দৃষ্টিতেই পৃথিবী দগ্ধ করতে সক্ষম—তাঁর বল অপরিমেয়, এবং তিনি শৌর্য ও উদ্দেশ্যে অটল।
Verse 47
महानपनयस्त्वेष नित्यं हि तव सूतज
হে সূতপুত্র! এ তোমার জন্য মহা অপযশ; সত্যই, এই অপকীর্তি তোমার আচরণে সর্বদাই লেগে থাকে।
Verse 48
संजय उवाच एवमुक्तस्तु राधेय: प्रहसन् भरतर्षभ
সঞ্জয় বললেন—হে ভারতশ্রেষ্ঠ! এ কথা শুনে রাধেয় কর্ণ হেসে উঠল।
Verse 49
अब्रवीच्च तदा कर्णों गुरुं शारद्वतं कृपम् संजय कहते हैं--भरतश्रेष्ठ) उनके ऐसा कहनेपर राधापुत्र कर्ण ठठाकर हँस पड़ा और शरद्वानके पुत्र गुरु कृपाचार्यसे उस समय यों बोला-- || ४८ ई ।।
সঞ্জয় বললেন—তখন কর্ণ তাঁর গুরু শারদ্বত কৃপকে বলল—“হে ব্রাহ্মণ! পাণ্ডবদের সম্বন্ধে আপনি যা বলেছেন, তা সত্য।”
Verse 50
अजय्याश्षु रणे पार्था देवैरपि सवासवै:
“যুদ্ধে পৃথাপুত্র পাণ্ডবরা অজেয়—ইন্দ্রসহ দেবতারাও তাদের জয় করতে পারে না।”
Verse 51
सदैत्ययक्षगन्धर्वै: पिशाचोरगराक्षसै: । “यह भी ठीक है कि कुन्तीके पुत्रोंको रणभूमिमें इन्द्र आदि देवता
“দৈত্য, যক্ষ, গন্ধর্ব, পিশাচ, নাগ ও রাক্ষসেরাও তাদের জয় করতে পারে না; তবু বাসব (ইন্দ্র) প্রদত্ত শক্তি-অস্ত্রে আমি পৃথাপুত্রদের পরাস্ত করব।”
Verse 52
मम ह्वमोघा दत्तेयं शक्ति: शक्रेण वै द्विज । एतया निहनिष्यामि सव्यसाचिनमाहवे
“হে দ্বিজ! শক্র (ইন্দ্র) আমাকে এই অমোঘ শক্তি দিয়েছেন; এর দ্বারাই আমি যুদ্ধে সব্যসাচী অর্জুনকে নিধন করব।”
Verse 53
हते तु पाण्डवे कृष्णे भ्रातरश्नास्यथ सोदरा: । अनर्जुना न शक्ष्यन्ति महीं भोक्तुं कथठचन,'पाण्डुपुत्र अर्जुनके मारे जानेपर उनके बिना उनके सहोदर भाई किसी तरह इस पृथ्वीका राज्य नहीं भोग सकेंगे
Sañjaya said: “But if Arjuna, the Pāṇḍava, is slain, then his own brothers—born of the same mother—will in no way be able to enjoy or govern the earth without him.” The statement underscores Arjuna’s pivotal role in sustaining the Pāṇḍavas’ political legitimacy and moral confidence amid the war’s crisis.
Verse 54
तेषु नष्टेषु सर्वेषु पृथिवीयं ससागरा । अयत्नात् कौरवेन्द्रस्य वशे स्थास्यति गौतम,“गौतम! उन सबके नष्ट हो जानेपर बिना किसी प्रयत्नके ही यह समुद्रसहित सारी पृथ्वी कौरवराज दुर्योधनके वशमें हो जायगी
Sañjaya said: “Gautama, when all those warriors have been destroyed, this entire earth—together with the encircling ocean—will, without any further effort, come under the control of the Kuru king (Duryodhana.” The line underscores the grim wartime logic that sovereignty is imagined as the automatic fruit of annihilating opposition, raising an implicit ethical tension between political victory and the catastrophic human cost that secures it.
Verse 55
सुनीतैरिह सर्वार्था: सिध्यन्ते नात्र संशय: । एतमर्थमहं ज्ञात्वा ततो ग्जामि गौतम
Sañjaya said: “Here in this world, all aims are accomplished through well-guided, prudent effort—of this there is no doubt. Understanding this truth, I therefore raise my cry, O Gautama.”
Verse 56
त्वंतुविप्रश्न वृद्धक्ष अशक्तश्नापि संयुगे कृतस्नेहश्न पार्थेषु मोहान्मामवमन्यसे
Sañjaya said: “But you are a brāhmaṇa, and moreover an old man—indeed you have no strength for battle. And since you bear affection for the sons of Pṛthā, you are, out of delusion, showing contempt for me.”
Verse 57
यद्येवं वक्ष्यससे भूयो ममाप्रियमिह द्विज । ततस्ते खड्गमुद्यम्य जिद्लां छेत्स्यामि दुर्मते
Sañjaya said: “If, O brāhmaṇa, you again speak here words that are displeasing to me, then I will raise my sword and cut off your tongue, you wicked-minded one.” The line conveys how anger and wounded pride can drive a person to threaten violence even against a brāhmaṇa, revealing a sharp ethical collapse amid the pressures of war and harsh speech.
Verse 58
यच्चापि पाण्डवान् विप्र स्तोतुमिच्छसि संयुगे । भीषयन् सर्वसैन्यानि कौरवेयाणि दुर्मते
আর যদি, হে বিপ্র, তুমি যুদ্ধক্ষেত্রের মধ্যেই পাণ্ডবদের স্তব করতে চাও—কৌরবদের সমস্ত সেনাকে ভীতসন্ত্রস্ত করে, হে দুর্মতি—তবে পরবর্তী কথা শোনো।
Verse 59
दुर्योधनश्च द्रोणश्व॒ शकुनिर्दुर्मुखो जय:
সেখানে দুর্যোধন, দ্রোণ, শকুনি, দুর্মুখ ও জয় উপস্থিত ছিল।
Verse 60
दुःशासनो वृषसेनो मद्रराजस्त्वमेव च | सोमदत्तश्न भूरिश्व॒ तथा द्रौणिविविंशति:
দুঃশাসন, বৃষসেন, মদ্ররাজ—এবং তুমিও—সোমদত্ত, ভূরিশ্রবা, তদুপরি দ্রৌণি ও বিবিংশতি।
Verse 61
तिष्ठेयुर्देशिता यत्र सर्वे युद्धविशारदा: । जयेदेतान् नरः को नु शक्रतुल्यबलोडप्यरि:
যেখানে সেই সকল যুদ্ধবিশারদ যোদ্ধা সাজানো ও নির্দেশিত অবস্থায় দাঁড়িয়ে থাকে—তাদের কে-ই বা পরাজিত করতে পারে, শত্রু ইন্দ্রসম বলবান হলেও?
Verse 62
“दुर्योधन, द्रोण, शकुनि, दुर्मुख, जय, दुःशासन, वृषसेन, मद्रराज शल्य, तुम स्वयं, सोमदत, भूरि, अश्वत्थामा और विविंशति--ये युद्धकुशल सम्पूर्ण वीर जहाँ कवच बाँधकर खड़े हो जायाँगे, वहाँ इन्हें कौन मनुष्य जीत सकता है? वह इन्द्रके तुल्य बलवान् शत्रु ही क्यों न हो (इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता) ।।
দুর্যোধন, দ্রোণ, শকুনি, দুর্মুখ, জয়, দুঃশাসন, বৃষসেন, মদ্ররাজ শল্য, তুমিও, সোমদত্ত, ভূরি, অশ্বত্থামা ও বিবিংশতি—এই সকল যুদ্ধকুশলী বীর যখন বর্ম বেঁধে সেখানে দাঁড়াবে, তখন তাদের কে মানুষ জয় করতে পারে? ইন্দ্রসম বলবান শত্রুও তাদের কী ক্ষতি করতে পারবে? কারণ যারা সত্যিই শূর, অস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী, বলবান, স্বর্গলাভে আকাঙ্ক্ষী, ধর্মজ্ঞ ও যুদ্ধনিপুণ—তারা যুদ্ধে দেবতাদেরও সংহার করতে সক্ষম।
Verse 63
एते स्थास्यन्ति संग्रामे पाण्डवानां वधार्थिन: । जयमाकाड्क्षमाणा हि कौरवेयस्य दंशिता:,“ये वीरगण कुरुराज दुर्योधनकी जय चाहते हुए पाण्डवोंके वधकी इच्छासे संग्राममें कवच बाँधकर डट जायाँगे
সঞ্জয় বললেন—এরা যুদ্ধে স্থির হয়ে দাঁড়াবে, পাণ্ডবদের বধের অভিপ্রায়ে। কৌরবকুমারের জয় কামনা করে তারা বর্ম পরিধান করে সম্পূর্ণ সজ্জিত ও দৃঢ়প্রতিজ্ঞ থাকবে।
Verse 64
दैवायत्तमहं मनन््ये जयं सुबलिनामपि | यत्र भीष्मो महाबाहुः शेते शरशताचित:
সঞ্জয় বললেন—আমি মনে করি, অতি বলবানদেরও জয় ভাগ্যের অধীন। দেখো, মহাবাহু ভীষ্ম আজ রণক্ষেত্রে শত শত বাণে বিদ্ধ হয়ে শরশয্যায় শায়িত।
Verse 65
विकर्णश्षित्रसेनश्व॒ बाह्नलीको5थ जयद्रथ: । भूरिश्रवा जयश्वैव जलसंध: सुदक्षिण:
সঞ্জয় বললেন—বিকর্ণ, চিত্রসেন, বাহ্লীক ও জয়দ্রথ; ভুরিশ্রবা, জয়, জলসন্ধ এবং সুদক্ষিণ—এরা সকলেই মহাযোদ্ধা।
Verse 66
शलश्न रथिनां श्रेष्ठो भगदत्तश्न वीर्यवान् एते चान्ये च राजानो देवैरपि सुदुर्जया:
সঞ্জয় বললেন—রথীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ শল এবং পরাক্রমী ভগদত্ত—এরা ও আরও বহু রাজা এমন যে দেবতারাও কষ্টে তাদের জয় করতে পারে।
Verse 67
निहता: समरे शूरा: पाण्डवैर्बलवत्तरा: । किमन्यद् दैवसंयोगान्मन्यसे पुरुषाधम
সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধে পাণ্ডবদের চেয়েও বলবান বহু বীর পাণ্ডবদের হাতেই নিহত হয়েছে। হে নরাধম! দैবসংযোগ ছাড়া তুমি আর কী মনে করো?
Verse 68
'परंतु उन अत्यन्त प्रबल तथा शूरवीर नरेशोंको भी पाण्डवोंने युद्धमें मार डाला। पुरुषाधम! तुम इसमें दैवसंयोगके सिवा दूसरा कौन-सा कारण मानते हो? ।।
সঞ্জয় বললেন—তবু পাণ্ডবেরা যুদ্ধে অতিশয় বলবান ও বীরখ্যাত সেই রাজাদেরও বধ করেছে। হে নরাধম! এখানে ভাগ্যের সংযোগ ছাড়া আর কোন কারণ তুমি দেখ? আর হে ব্রাহ্মণ, দुर্যোধনের যে শত্রুদের তুমি সর্বদা প্রশংসা কর, তাদের মধ্যেও শত শত, সহস্র সহস্র বীর নিহত হয়েছে।
Verse 69
क्षीयन्ते सर्वसैन्यानि कुरूणां पाण्डवैः सह । प्रभाव॑ नात्र पश्यामि पाण्डवानां कथंचन
কৌরবদের সেনা এবং পাণ্ডবদের সেনা—সবই ক্ষয়প্রাপ্ত হচ্ছে। কিন্তু এখানে পাণ্ডবদের কোনো নির্ণায়ক প্রভাব আমি কোনোভাবেই দেখতে পাচ্ছি না।
Verse 70
“कौरव तथा पाण्डव दोनों दलोंकी सारी सेनाएँ प्रतिदिन नष्ट हो रही हैं। मुझे इसमें किसी प्रकार भी पाण्डवोंका कोई विशेष प्रभाव नहीं दिखायी देता है ।।
সঞ্জয় বললেন—প্রতিদিন কৌরব ও পাণ্ডব—উভয় পক্ষেরই সমগ্র সেনা বিনষ্ট হচ্ছে। এতে পাণ্ডবদের কোনো বিশেষ প্রভাব আমি কোনোভাবেই দেখতে পাচ্ছি না। হে দ্বিজাধম! যাদের তুমি সর্বদা বলবান বলে মনে কর, তাদের সঙ্গেই আমি রণক্ষেত্রে দুর্যোধনের হিতার্থে যথাশক্তি যুদ্ধ করতে উদ্যত হব। বিজয় তো দैবের অধীন।
Verse 157
इस प्रकार श्रीमह्याभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें द्रोणाचार्य और युधिष्ठिरका युद्धविषयक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত ঘটোৎকচবধপর্বে রাত্রিযুদ্ধের প্রসঙ্গে দ্রোণাচার্য ও যুধিষ্ঠিরের যুদ্ধবিষয়ক একশো সাতান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 158
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे कृपकर्णवाक्ये$ष्टपजचाशदधिकशततमो< ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত ঘটোৎকচবধপর্বে রাত্রিযুদ্ধের প্রসঙ্গে কৃপাচার্য ও কর্ণের বাক্য-বিতর্কবিষয়ক একশো আটান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 243
कर्ण: प्रहरतां श्रेष्ठ: कृपं वाक्यमथाब्रवीत् | उन कृपाचार्यके ऐसा कहनेपर योद्धाओंमें श्रेष्ठ कर्णने उस समय रुष्ट होकर कृपाचार्यसे इस प्रकार कहा--
যুদ্ধে আঘাত হাননকারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ কর্ণ তখন কৃপকে সম্বোধন করে কথা বললেন। কৃপের উক্তি শুনে সেই মুহূর্তে ক্রোধে দগ্ধ হয়ে কর্ণ তীক্ষ্ণ বাক্যে প্রত্যুত্তর দিলেন—যেন সংযত উপদেশ ছাপিয়ে আহত অহংকারই উচ্চারিত হল।
Verse 253
फल चाशु प्रयच्छन्ति बीजमुप्तमृताविव । 'शूरवीर वर्षाकालके मेघोंकी तरह सदा गरजते हैं और ठीक ऋतुमें बोये हुए बीजके समान शीघ्र ही फल भी देते हैं
তারা দ্রুত ফল প্রদান করে—যেমন যথাযথ ঋতুতে বোনা বীজ শীঘ্রই ফল দেয়। বীরেরা বর্ষাকালের মেঘের মতো সদা গর্জন করে, আর সময়োচিত প্রচেষ্টা বিলম্বিত ফল আনে না।
Verse 263
तत्तद् विकत्थमानानां भारं चोद्धहतां मृथे । 'युद्धस्थलमें महान् भार उठानेवाले शूरवीर यदि युद्धके मुहानेपर अपनी प्रशंसाकी ही बातें कहते हैं तो इसमें मुझे उनका कोई दोष नहीं दिखायी देता
যে বীরেরা রণক্ষেত্রে মহাভার বহন করে এবং শত্রুর ভার উচ্ছেদ করে, তারা যদি যুদ্ধের দ্বারপ্রান্তে নিজের বীরত্বের প্রশংসা করে কথা বলে—তাতে আমি তাদের কোনো দোষ দেখি না।
Verse 363
धृतिमांश्व कृतज्ञश्न धर्मपुत्रो युधिष्ठिर: । धर्मपुत्र युधिष्ठिर ब्राह्मणभक्त
ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির ধৈর্যশীল ও কৃতজ্ঞ। তিনি ব্রাহ্মণভক্ত, সত্যবাদী, ইন্দ্রিয়জয়ী, গুরু ও দেবতাদের সম্মানকারী। সর্বদা ধর্মপরায়ণ, অস্ত্রবিদ্যায় বিশেষ দক্ষ, ক্ষমাশীল, সাহসী এবং কৃতজ্ঞতায় চিহ্নিত।
Verse 373
गुरुवृत्तिरता: प्राज्ञा धर्मनित्या यशस्विन: । इनके बलवान् भाई भी सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंकी कलामें परिश्रम किये हुए हैं। वे गुरुसेवापरायण, विद्वान, धर्मतत्पर और यशस्वी हैं
তারা গুরুচরিত্রের অনুরূপ আচরণে রত, বিচক্ষণ, ধর্মে নিত্য স্থিত এবং যশস্বী। তাদের বলবান ভ্রাতাও সমস্ত অস্ত্র-শস্ত্র ও যুদ্ধকলায় পরিশ্রমসহকারে সুপ্রশিক্ষিত। তারা গুরুসেবায় নিবিষ্ট, পণ্ডিত, ধর্মনিষ্ঠ এবং কীর্তিমান।
Verse 466
कथं तान् संयुगे कर्ण जेतुमुत्सहसे परान् । युधिष्ठिर भी यदि रोषभरी दृष्टिसे देखें तो इस भूमण्डलको भस्म कर सकते हैं। कर्ण! जिनके लिये अनन्त बलशाली भगवान् श्रीकृष्ण भी कवच धारण करके लड़नेको तैयार हैं
কৃপ বললেন—কর্ণ! তুমি কীভাবে যুদ্ধে সেই মহাবল শত্রুদের জয় করতে সাহস করছ? যুধিষ্ঠির যদি ক্রোধভরা দৃষ্টিতে একবারও তাকান, তবে এই সমগ্র পৃথিবীকে ভস্ম করে দিতে পারেন। আর যাদের জন্য অনন্তবলশালী ভগবান শ্রীকৃষ্ণও কবচ ধারণ করে যুদ্ধ করতে প্রস্তুত—সেই শত্রুদের তুমি রণে জয় করবে, এ দুঃসাহস কীভাবে করছ?
Verse 473
यस्त्वमुत्सहसे योद्धुं समरे शौरिणा सह । सूतपुत्र! तुम जो सदा समरभूमिमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ युद्ध करनेका उत्साह दिखाते हो, यह तुम्हारा महान् अन्याय (अक्षम्य अपराध) है
কৃপ বললেন—হে সূতপুত্র! তুমি যে রণক্ষেত্রে শৌরি (শ্রীকৃষ্ণ)-এর সঙ্গে যুদ্ধ করতে উদ্গ্রীব হও, এ তোমার মহা অন্যায়—ক্ষমার অযোগ্য অপরাধ।
Verse 493
एते चान्ये च बहवो गुणा: पाण्डुसुतेषु वै “बाबाजी! पाण्डवोंके विषयमें तुमने जो बात कही है वह सब सत्य है। यही नहीं, पाण्डवोंमें और भी बहुत-से गुण हैं
সঞ্জয় বললেন—এগুলো ছাড়াও পাণ্ডুপুত্রদের মধ্যে সত্যিই আরও বহু গুণ বিদ্যমান।
Verse 586
अत्रापि शृणु मे वाक््यं यथावद् ब्रुवतो द्विज । “ब्रह्मन! दुर्मते! तुम तो युद्धस्थलमें समस्त कौरव-सेनाओंको भयभीत करनेके लिये पाण्डवोंके गुण गाना चाहते हो
সঞ্জয় বললেন—হে দ্বিজ! আমি যথাযথভাবে যা বলছি, তা এখানেও শোনো—“হে ব্রাহ্মণ, হে দুর্মতি! তুমি যুদ্ধক্ষেত্রে সমগ্র কৌরবসেনাকে ভীত করতে পাণ্ডবদের গুণগান করতে চাও; সেই বিষয়েও আমি যে সত্য বলছি, তা শোনো।”
The dilemma concerns command ethics under royal pressure: whether a commander should prioritize the ruler’s demand for swift victory or adhere to disciplined strategy and principled conduct, especially when the opponent’s capability (Arjuna) makes reckless escalation counterproductive.
The chapter teaches that effective action requires truthful appraisal (satya-based assessment) and restraint against self-deception; public vows and confidence must be matched by capability, and leadership must balance obedience with expert judgment.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-function is narrative and ethical—positioning Arjuna as a benchmark of martial excellence and illustrating how boastful counsel distorts decision-making within the larger karmic and strategic framework of the war.
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