Mahabharata Adhyaya 159
Drona ParvaAdhyaya 15964 Versesकौरव-पक्ष का दबाव (द्रोण के अस्त्रों से) बना रहता है, पर भीम के पुनरुत्थान और संहार से पाण्डव-पक्ष में पलटवार की तीव्रता बढ़ती है—युद्ध का पलड़ा डगमगाता है।

Adhyaya 159

अध्याय १५९ — रात्रौ श्रमविरामः (Night Exhaustion and Brief Pause in Battle)

Upa-parva: Rātri-śrama–virāma (Night Fatigue and Truce Episode) — Droṇa Parva Context Unit

Sañjaya reports that after Ghaṭotkaca is killed by Karṇa, Yudhiṣṭhira is seized by grief and anger and instructs Dhṛṣṭadyumna to check Droṇa, emphasizing Dhṛṣṭadyumna’s destined role in Droṇa’s fall. A coalition of Pāṇḍava allies—named leaders, charioteers, infantry, elephants, and horses—surges forward with the intention of reaching Droṇa. Droṇa receives them in battle; Duryodhana also advances to protect Droṇa’s life. The engagement, however, becomes impaired by severe night conditions: darkness and dust combine with fatigue so that many warriors are described as ‘sleep-blinded,’ acting without clear perception, sometimes harming allies and themselves. Arjuna (Bībhatsu) recognizes the degraded state of the armies and calls out loudly, advising a brief pause and rest on the battlefield until the moon rises, after which combat can resume. Both sides approve this counsel; troops rest in place with weapons and mounts, and the text offers extended battlefield imagery of sleeping soldiers, elephants, and horses. As moonlight spreads and darkness recedes, the armies awaken and the battle recommences with renewed force.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहता है कि रणभूमि में पाण्डव-पक्ष के प्रमुख योद्धा—युधिष्ठिर, भीम, धृष्टद्युम्न और सात्यकि—मन को युद्ध में स्थिर कर द्रोण की प्रचण्ड व्यवस्था को तोड़ने हेतु आगे बढ़ते हैं। → सोमदत्त सात्यकि को देखकर पुनः क्रुद्ध होता है और तीव्र शरवर्षा से उसे ढक देता है; उधर द्रोणाचार्य पाञ्चालों को भयभीत कर पीछे ढकेलते हैं, और युधिष्ठिर पर एक के बाद एक दिव्यास्त्रों (वारुण, याम्य, आग्नेय, त्वाष्ट, सावित्र) का क्रमशः प्रयोग कर दबाव बढ़ाते हैं। → भीमसेन शक्तिप्रहार से काँपकर मूर्च्छित हो जाता है, फिर चेतना पाकर क्रोध में गदा/शस्त्र-प्रहार से प्रत्याघात करता है; साथ ही वह नाराचों से शत्रु-रथियों का संहार करता हुआ कर्णपुत्र वृषसेन पर भी बाण-वर्षा आरम्भ कर देता है—रण का केन्द्र भीम की उग्र प्रतिज्ञा-शक्ति बन जाता है। → द्रोण की मार से पाञ्चालों का पलायन और पाण्डवों का पुनर्संगठन साथ-साथ चलता है; भीम की वापसी (मूर्च्छा से उठकर) पाण्डव-पक्ष में नया उत्साह भरती है, जबकि कौरव-पक्ष में भीम के संहार से क्षति और भय फैलता है। → द्रोण के दिव्यास्त्र-क्रम और भीम द्वारा वृषसेन पर केन्द्रित आक्रमण के बीच यह अनिश्चित रह जाता है कि अगला निर्णायक पतन किसका होगा—युधिष्ठिर की रक्षा टूटेगी या कौरव-पक्ष का कोई प्रमुख स्तम्भ ढहेगा।

Shlokas

Verse 1

#-+3.2"22 हु हि की - भूमि नापनेका एक नाप जो चार सौ हाथका होता है। सप्तपञ्चाशर्दाधिकशततमोब् ध्याय: सोमदत्तकी ! मूच्छ

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামার হাতে দ্রুপদের পুত্রগণ, কুন্তিভোজের পুত্র এবং সহস্র সহস্র রাক্ষস নিহত হয়েছে দেখে যুধিষ্ঠির, ভীমসেন, পার্ষত ধৃষ্টদ্যুম্ন ও যুযুধান (সাত্যকি) সতর্ক হয়ে কেবল যুদ্ধেই মন স্থির করল।

Verse 2

युधिष्ठिरों भीमसेनो धृष्टद्युम्नश्न पार्षत: । युयुधानश्न संयत्ता युद्धायैव मनो दधु: २ ।।

সঞ্জয় বললেন—রাজন! দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামার হাতে দ্রুপদ ও কুন্তিভোজের পুত্রদের এবং সহস্র সহস্র রাক্ষসের নিধন দেখে যুধিষ্ঠির, ভীমসেন, পার্ষতপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্ন ও যুযুধান—সকলেই সতর্ক ও প্রস্তুত হয়ে কেবল যুদ্ধেই মন স্থির করলেন।

Verse 3

सोमदत्त: पुनः क्रुद्धो दृष्टया सात्यकिमाहवे । महता शरवर्षेणच्छादयामास भारत,भारत! युद्धस्थलमें सात्यकिको देखकर सोमदत्त पुनः कुपित हो उठे और उन्होंने बड़ी भारी बाण-वर्षा करके सात्यकिको आच्छादित कर दिया

সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! যুদ্ধক্ষেত্রে সাত্যকিকে দেখে সোমদত্ত পুনরায় ক্রুদ্ধ হয়ে উঠলেন এবং প্রবল তীরবৃষ্টিতে তাকে আচ্ছন্ন করে দিলেন।

Verse 4

ततः समभवद्‌ युद्धमतीव भयवर्धनम्‌ | त्वदीयानां परेषां च घोरं विजयकाड्क्षिणाम्‌,फिर तो विजयकी अभिलाषा रखनेवाले आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंमें अत्यन्त भंयकर घोर युद्ध छिड़ गया

তারপর বিজয়কামনায় উন্মুখ আপনার পক্ষ ও শত্রুপক্ষের যোদ্ধাদের মধ্যে ভয়বর্ধক, ভয়ংকর এক ঘোর যুদ্ধ শুরু হল।

Verse 5

त॑ दृष्टवा समुपायान्तं रुक्मपुड्खे: शिलाशितै: । दशभ्रि: सात्वतस्यार्थे भीमो विव्याध सायकै:

তাকে অগ্রসর হতে দেখে সাত্বত (সাত্যকি)-র কল্যাণার্থে ভীম শিলায় শান দেওয়া স্বর্ণপক্ষযুক্ত দশটি তীরে সোমদত্তকে বিদ্ধ করলেন।

Verse 6

सोमदत्तो5पि तं वीरं शतेन प्रत्यविध्यत । सात्वतस्त्वभिसंक्रुद्ध: पुत्राधिभिरभिप्लुतम्‌

সঞ্জয় বললেন—সোমদত্তও সেই বীর ভীমসেনকে শত তীরে বিদ্ধ করে প্রতিশোধ নিলেন। তখন সাত্যকি, পুত্রশোকে আচ্ছন্ন ও ক্রোধে দগ্ধ হয়ে, বার্ধক্যগুণে ভূষিত বৃদ্ধ সোমদত্তকে বজ্রাঘাতসম দশটি তীক্ষ্ণ তীরে বিদ্ধ করলেন।

Verse 7

वृद्ध वृद्धगुणैर्युक्ते ययातिमिव नाहुषम्‌ । विव्याध दशभिस्ती $णै: शरैर्वज़निपातनै:

সঞ্জয় বললেন—তখন পুত্রশোকে দগ্ধ ও অতিশয় ক্রুদ্ধ সাত্যকি, নহুষনন্দন যযাতির ন্যায় বার্ধক্যের গুণে ভূষিত বৃদ্ধ সোমদত্তকে বজ্রসম দশটি তীক্ষ্ণ শর দিয়ে বিদ্ধ করল।

Verse 8

शक्त्या चैन विनिर्भिवद्य पुनर्विव्याध सप्तभि: । ततस्तु सात्यकेरर्थे भीमसेनो नवं दृढम्‌

শক্তি দিয়ে তাকে বিদীর্ণ করে সে আবার সাতটি শর দিয়ে পুনরায় বিদ্ধ করল। তারপর সাত্যকির কল্যাণার্থে ভীমসেন নতুন ও দৃঢ় সংকল্প গ্রহণ করল।

Verse 9

मुमोच परिघं घोरं सोमदत्तस्य मूर्थनि । फिर शक्तिसे इन्हें विदीर्ण करके सात बाणोंद्वारा पुन: गहरी चोट पहुँचायी। तत्पश्चात्‌ सात्यकिके लिये भीमसेनने सोमदत्तके मस्तकपर नूतन, सुदृढ़ एवं भयंकर परिघका प्रहार किया ।।

ভীমসেন সোমদত্তের মস্তকে ভয়ংকর পরিঘ নিক্ষেপ করল। আর সাত্বতও অগ্নিসদৃশ দীপ্তিমান উৎকৃষ্ট শর ছুড়ল।

Verse 10

युगपत्‌ पेततुर्वीरे घोरौ परिघमार्गणीौ

একই মুহূর্তে সেই বীরের উপর ভয়ংকর পরিঘ ও বাণ—দুটি অস্ত্রই একসঙ্গে পতিত হল।

Verse 11

व्यामोहिते तु तनये बाह्लीकस्तमुपाद्रवत्‌

কিন্তু যখন তার পুত্র বিভ্রান্তিতে পড়ল, তখন বাহ্লীক তার দিকে ঝাঁপিয়ে পড়ল।

Verse 12

भीमो<थ सात्वतस्यार्थे बाह्लीक॑ नवभि: शरै:

সঞ্জয় বললেন—তখন সাত্বত বীরের স্বার্থে ভীম বাহ্লীককে নয়টি শর দিয়ে বিদ্ধ করলেন।

Verse 13

प्रातिपेयस्तु संक्रुद्ध: शक्ति भीमस्य वक्षसि

সঞ্জয় বললেন—ক্রুদ্ধ প্রাতিপেয় ভীমের বক্ষস্থলে শক্তি নিক্ষেপ করল।

Verse 14

स तथाभिहतो भीमश्नचकम्पे च मुमोह च

সঞ্জয় বললেন—এভাবে আঘাতপ্রাপ্ত ভীম সামান্য কেঁপে উঠল এবং ক্ষণকালের জন্য মূর্ছিত হল।

Verse 15

सा पाण्डवेन प्रहिता बाह्लीकस्य शिरो5हरत्‌

সঞ্জয় বললেন—পাণ্ডবের নিক্ষিপ্ত সেই অস্ত্র বাহ্লীকের মস্তক ছিন্ন করল।

Verse 16

तस्मिन्‌ विनिहते वीरे बाह्लीके पुरुषर्षभ

সঞ্জয় বললেন—হে পুরুষশ্রেষ্ঠ! সেই বীর বাহ্লীকের নিহত হলে যুদ্ধের গতি অন্যরূপ হল।

Verse 17

नागदत्तो दृढरथो महाबाहुरयोभुज:

সঞ্জয় বললেন—নাগদত্ত ও দৃঢ়রথ—মহাবাহু, লৌহসম দৃঢ় বাহুবলসম্পন্ন—অগ্রসর হল।

Verse 18

तान्‌ दृष्टवा चुक्रुधे भीमो जगृहे भारसाधनान्‌

সঞ্জয় বললেন—তাদের দেখে ভীম ক্রোধে জ্বলে উঠল এবং ভারী অস্ত্রশস্ত্র তুলে নিল।

Verse 19

ते विद्धा व्यसव: पेतु: स्यन्दने भ्यो हतौजस:

সঞ্জয় বললেন—আঘাতে বিদ্ধ হয়ে, প্রাণহীন ও শক্তিহীন হয়ে তারা রথ থেকে পড়ে গেল।

Verse 20

चण्डवातप्रभग्नास्तु पर्वताग्रान्महीरुहा: । उन बाणोंसे घायल होकर आपके पुत्र अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे और पर्वतशिखरसे प्रचण्ड वायुद्वारा उखाड़े हुए वृक्षोंक समान तेजोहीन होकर रथोंसे नीचे गिर पड़े || १९३६ || नाराचैर्दशभिर्भीमस्तान्‌ निहत्य तवात्मजान्‌

সঞ্জয় বললেন—যেমন পর্বতশিখর থেকে প্রবল ঝড়ে উপড়ে যাওয়া মহাবৃক্ষ ভেঙে পড়ে, তেমনি সেই বাণে বিদ্ধ হয়ে আপনার পুত্রেরা তেজহীন হয়ে রথ থেকে নিচে লুটিয়ে পড়ল, প্রাণ হারাল। তারপর ভীম দশটি নারাচ বাণে আপনার সেই পুত্রদের নিধন করল।

Verse 21

ततो वृकरथो नाम भ्राता कर्णस्य विश्रुत:

তখন কর্ণের প্রসিদ্ধ ভ্রাতা, বৃকরথ নামে, আবির্ভূত হল।

Verse 22

ततः सप्त रथान्‌ वीर: स्यालानां तव भारत

তখন, হে ভারত! সেই বীর যোদ্ধা তোমার শ্যালকদের সাতটি রথের দিকে ধাবিত হল; যুদ্ধের নির্মম বাধ্যতায় আত্মীয়তার বন্ধন উপেক্ষিত হল।

Verse 23

अमर्षयन्तो निहतं शतचन्द्रं महारथम्‌

শতচন্দ্র মহারথীর নিহত হওয়া তারা সহ্য করতে পারল না; শোক ও ক্রোধে আচ্ছন্ন হয়ে তারা সেই ঘটনাই মনে মনে ভাবতে লাগল।

Verse 24

शकुने भ्रातरो वीरा गवाक्ष: शरभो विभु: । सुभगो भानुदत्तश्न शूरा: पजच महारथा:

শকুনির ভাইরা—বীর—গবাক্ষ, শরভ, বিভু, সুভগ ও ভানুদত্ত—এই পাঁচজনই ছিলেন শূর মহারথী।

Verse 25

अभिद्र॒त्य शरैस्तीकणैरभीमसेनमताडयन्‌ । महारथी शतचन्द्रके मारे जानेपर अमर्षमें भरे हुए शकुनिके वीर भाई गवाक्ष, शरभ, विभु, सुभग और भानुदत्त--ये पाँच शूर महारथी भीमसेनपर टूट पड़े और उन्हें पैने बाणोंद्वारा घायल करने लगे || २३-२४ $ ।।

তারা ধেয়ে এসে তীক্ষ্ণ শর দিয়ে ভীমসেনকে আঘাত করতে লাগল। নারাচের আঘাতে বিদ্ধ হয়েও তিনি বৃষ্টির বেগে আঘাতপ্রাপ্ত পর্বতের মতো অচল রইলেন।

Verse 26

जघान पज्चभिर्बाणै: पञ्चैवातिरथान्‌ बली । जैसे वर्षाके वेगसे पर्वत आहत होता है, उसी प्रकार उनके नाराचोंसे घायल होकर बलवान्‌ भीमसेनने अपने पाँच बाणोंद्वारा उन पाँचों अतिरथी वीरोंको मार डाला ।।

বলবান ভীমসেন পাঁচটি বাণে সেই পাঁচ অতিরথীকে নিধন করলেন। সেই বীরদের নিহত দেখে শ্রেষ্ঠ রাজারা বিচলিত হয়ে পড়ল।

Verse 27

ततो युधिष्ठिर: क्रुद्धस्तवतानीकमशातयत्‌ । मिषत: कुम्भयोनेस्तु पुत्राणां तव चानघ

তখন ক্রোধে দগ্ধ যুধিষ্ঠির তোমার সৈন্যদলকে চূর্ণ করল—কুম্ভযোনি (ব্যাস)-পুত্রগণ ও তুমি, হে নিষ্পাপ, দেখতেই থাকলে।

Verse 28

उन पाँचों वीरोंको मारा गया देख सभी श्रेष्ठ नरेश विचलित हो उठे। निष्पाप नरेश्वर! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए राजा युधिष्ठिर द्रोणाचार्य तथा आपके पुत्रोंके देखते-देखते आपकी सेनाका संहार करने लगे ।।

সঞ্জয় বললেন—সেই যুদ্ধে ক্রোধে উন্মত্ত রাজা যুধিষ্ঠির দ্রোণাচার্য ও তোমার পুত্রদের চোখের সামনে তোমার সেনাকে সংহার করতে লাগলেন। ক্রুদ্ধ যুধিষ্ঠির অম্বষ্ঠ, মালব, বীর ত্রিগর্ত এবং শিবি-যোদ্ধাদেরও মৃত্যুলোকে পাঠালেন।

Verse 29

अभीषाहाउुछूरसेनान्‌ बाह्लीकान्‌ सवसातिकान्‌ | निकृत्य पृथिवीं राजा चक्रे शोणितकर्दमाम्‌,अभीषाह, सूरसेन, बाह्नीक और वसातिदेशीय योद्धाओंको नष्ट करके राजा युधिष्ठिरने इस भूतलपर रक्तकी कीच मचा दी

সঞ্জয় বললেন—অভীষাহ, উচ্ছূরসেন, বাহ্লীক এবং বসাতি-দেশীয় যোদ্ধাদের নিধন করে রাজা যুধিষ্ঠির পৃথিবীকে রক্ত-কাদায় পরিণত করলেন।

Verse 30

यौधेयान्‌ मालवान्‌ राजन्‌ मद्रकाणां गणान्‌ युधि । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय शूरान्‌ बाणैर्युधिष्ठिर:,राजन! युधिष्ठिरने अपने बाणोंसे यौधेय, मालव तथा शूरवीर मद्रकगणोंको मृत्युके लोकमें भेज दिया

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! যুদ্ধে যুধিষ্ঠির তাঁর বাণে যৌধেয়, মালব এবং বীর মদ্রক-গণকে মৃত্যুলোকে পাঠালেন।

Verse 31

हताहरत गृह्नीत विध्यत व्यवकृन्तत । इत्यासीत्‌ तुमुलः शब्दो युधिष्ठिररथं प्रति,युधिष्ठिरके रथके आसपास “मारो, ले आओ, पकड़ो, घायल करो, टुकड़े-टुकड़े कर डालो' इत्यादि भयंकर शब्द गूँजने लगा

সঞ্জয় বললেন—যুধিষ্ঠিরের রথের দিকে “মারো! টেনে আনো! ধরো! বিদ্ধ করো! টুকরো টুকরো করে ফেলো!”—এমন ভয়ংকর, প্রবল কোলাহল উঠল।

Verse 32

सैन्यानि द्रावयन्तं त॑ द्रोणो दृष्टवा युधिष्ठिरम्‌ । चोदितस्तव पुत्रेण सायकैरभ्यवाकिरत्‌

যুধিষ্ঠিরকে সেনাদলকে পলায়ন করাতে দেখে দ্রোণ, তোমার পুত্র দুর্যোধনের প্রেরণায়, তাঁর উপর শরবৃষ্টি বর্ষণ করলেন।

Verse 33

द्रोणस्तु परमक्रुद्धों वायव्यास्त्रेण पार्थिवम्‌ । विव्याध सो5पि तद्‌ दिव्यमस्त्रमस्त्रेण जध्निवान्‌

অত্যন্ত ক্রোধে উন্মত্ত দ্রোণাচার্য বায়ব্যাস্ত্র দিয়ে রাজা যুধিষ্ঠিরকে বিদ্ধ করলেন; কিন্তু যুধিষ্ঠির নিজের দিব্যাস্ত্র দিয়ে সেই দিব্য অস্ত্রকে নষ্ট করে দিলেন।

Verse 34

तस्मिन्‌ विनिहते चास्त्रे भारद्वाजो युधिष्ठिरे । वारुणं याम्यमाग्नेयं त्वाष्टूं सावित्रमेव च

সেই অস্ত্র নষ্ট হলে, ভারদ্বাজপুত্র দ্রোণ যুধিষ্ঠিরের বিরুদ্ধে পর্যায়ক্রমে বারুণ, যাম্য, আগ্নেয়, ত্বাষ্টৃ এবং সাবিত্র—এই অস্ত্রগুলিও নিক্ষেপ করলেন।

Verse 35

क्षिप्तानि क्षिप्यमाणानि तानि चास्त्राणि धर्मज:

সেই অস্ত্রগুলি—যেগুলি নিক্ষিপ্ত হয়েছে এবং যেগুলি নিক্ষিপ্ত হচ্ছে—ধর্মজ যুধিষ্ঠির যুদ্ধসংঘর্ষের মধ্যে প্রতিহত করলেন।

Verse 36

जधघानास्त्रैर्महाबाहु: कुम्भयोनेरवित्रसन्‌ । परंतु महाबाहु धर्मपुत्र युधिष्ठिरने द्रोणाचार्यसे तनिक भी भय न खाकर उनके द्वारा चलाये गये और चलाये जानेवाले सभी अस्त्रोंको अपने दिव्यास्त्रोंसे नष्ट कर दिया ।।

মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির কুম্ভযোনি দ্রোণাচার্যের প্রতি বিন্দুমাত্র ভয় না রেখে, তাঁর নিক্ষিপ্ত ও নিক্ষেপ্য সকল অস্ত্রকে নিজের দিব্যাস্ত্র দিয়ে নষ্ট করলেন। তারপর কুম্ভসম্ভব দ্রোণ, নিজের প্রতিজ্ঞা সত্য করতে এবং তোমার পুত্রের কল্যাণে উদ্যত হয়ে, যুধিষ্ঠিরকে বধ করার বাসনায়, তাঁর বিরুদ্ধে ঐন্দ্র ও প্রাজাপত্য অস্ত্র প্রয়োগ করলেন।

Verse 37

प्रादुश्चक्रेउस्त्रमैन्द्र वै प्राजापत्यं च भारत । जिधघांसुर्धर्मतनयं तव पुत्रहिते रत:

সঞ্জয় বললেন— হে ভারত! তোমার পুত্রের কল্যাণে নিবিষ্ট এবং ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠিরকে বধ করতে উদ্যত দ্রোণাচার্য নিজের প্রতিজ্ঞা সত্য করতে ঐন্দ্র ও প্রাজাপত্য অস্ত্র প্রকাশ করে প্রয়োগ করলেন।

Verse 38

पति: कुरूणां गजसिंहगामी विशालवक्षा: पृथुलोहिताक्ष: । प्रादुश्षकारास्त्रमहीनतेजा माहेन्द्रमन्‍न्यत्‌ स जघान तेन

সঞ্জয় বললেন— কুরুদের অধিপতি যুধিষ্ঠির, গজ ও সিংহের ন্যায় বেগবান, প্রশস্ত বক্ষবিশিষ্ট, বৃহৎ রক্তিম নয়নধারী, অক্ষুণ্ণ তেজস্বী— তিনি মাহেন্দ্র অস্ত্র প্রকাশ করলেন; এবং সেই অস্ত্র দ্বারাই অন্যান্য সকল দিব্যাস্ত্রকে বিনষ্ট ও নিবারণ করলেন।

Verse 39

विहन्यमानेष्वस्त्रेषु द्रोण: क्रोधसमन्वित: । युधिष्ठिरवध॑ प्रेप्सुब्राह्मिमस्त्रमुदैरयत्‌,उन अस्त्रोंके नष्ट हो जानेपर क्रोधभरे द्रोणाचार्यने युधिष्ठिरका वध करनेकी इच्छासे ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया

সঞ্জয় বললেন— অস্ত্রসমূহ বিধ্বস্ত হতে থাকলে ক্রোধে অভিভূত দ্রোণ, যুধিষ্ঠিরবধের আকাঙ্ক্ষায় ব্রাহ্ম অস্ত্র (ব্রহ্মাস্ত্র) নিক্ষেপ করলেন।

Verse 40

ततो नाज्ञासिषं किंचिद्‌ घोरेण तमसा5<वृते । सर्वभूतानि च परं त्रासं जम्मुर्महीपते,महीपते! फिर तो मैं घोर अन्धकारसे आवृत उस युद्धसस्‍्थलमें कुछ भी जान न सका और समस्त प्राणी अत्यन्त भयभीत हो उठे

সঞ্জয় বললেন— হে মহীপতি! তখন ভয়ংকর অন্ধকারে যুদ্ধক্ষেত্র আচ্ছন্ন হয়ে গেল; আমি কিছুই বুঝতে পারলাম না, আর সকল প্রাণী চরম আতঙ্কে কাঁপতে লাগল।

Verse 41

ब्रह्मास्त्रमुद्यतं दृष्टवा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । ब्र्मास्त्रेणैव राजेन्द्र तदस्त्रं प्रत्यवारयत्‌

সঞ্জয় বললেন— হে রাজেন্দ্র! ব্রহ্মাস্ত্র উদ্যত দেখে কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠির ব্রহ্মাস্ত্র দ্বারাই সেই অস্ত্রকে প্রতিহত ও নিবারণ করলেন।

Verse 42

ततः सैनिकमुख्यास्ते प्रशशंसुर्नरर्षभौ । द्रोणपार्थों महेष्वासौ सर्वयुद्धविशारदौ

তখন সেনার প্রধান প্রধান নায়কেরা নরশ্রেষ্ঠ সেই দুই বৃষসম বীর—মহাধনুর্ধর দ্রোণ ও পার্থ (অর্জুন)—এর প্রশংসা করতে লাগল; তাঁরা উভয়েই সর্বপ্রকার যুদ্ধে সুদক্ষ ছিলেন।

Verse 43

ततः प्रमुच्य कौन्तेयं द्रोणो द्रुपदवाहिनीम्‌ | व्यधमत्‌ क्रोधताम्राक्षो वायव्यास्त्रेण भारत

তখন দ্রোণ কুন্তীপুত্রকে ছেড়ে, ক্রোধে রক্তচক্ষু হয়ে, হে ভারত, বায়ব্যাস্ত্র প্রয়োগ করে দ্রুপদের সেনাবাহিনীকে চূর্ণ করতে লাগলেন।

Verse 44

ते हन्यमाना दोणेन पज्चाला: प्राद्रवन्‌ भयात्‌ । पश्यतो भीमसेनस्य पार्थस्य च महात्मन:

দ্রোণের আঘাতে নিহত হতে হতে পাঞ্চালরা ভয়ে পালিয়ে গেল—এ সবই ভীমসেন ও মহাত্মা পার্থের চোখের সামনে ঘটল।

Verse 45

द्रोणाचार्यकी मार खाकर पांचाल-सैनिक भीमसेन और महात्मा अर्जुनके देखते-देखते भयके मारे भागने लगे ।।

তখন কিরীটধারী অর্জুন ও ভীম হঠাৎ ফিরে এলেন; সেনাদলকে মহাভয়ে বিচলিত দেখে তাঁরা রথ-ব্যূহের দ্বারা বাহিনীকে সংহত করে থামিয়ে দিলেন।

Verse 46

बीभस्सुर्दक्षिणं पार्श्वमुत्तरं च वृकोदर: । भारद्वाजं शरौघाभ्यां महदभ्यामभ्यवर्षताम्‌

বীভৎসু (অর্জুন) দক্ষিণ পার্শ্ব রক্ষা করলেন, আর বৃকোদর (ভীম) উত্তর দিক; তারপর তাঁরা দু’জনে মিলে ভারদ্বাজ (দ্রোণ)-এর উপর ঘন ও মহৎ শরবৃষ্টি বর্ষণ করলেন।

Verse 47

अर्जुनने द्रोणाचार्यके दाहिने पार्श्वमें और भीमसेनने बायें पारश्वमें महान्‌ बाणसमूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।।

সঞ্জয় বললেন—অর্জুন দ্রোণাচার্যের ডান পার্শ্বে এবং ভীমসেন বাম পার্শ্বে মহাশরবৃষ্টি আরম্ভ করলেন। হে মহারাজ, তখন কেকয়, সৃঞ্জয়, মহৌজস্বী পাঞ্চাল, মৎস্য এবং সাত্বত (যাদব) যোদ্ধারাও সেই দুই বীরের অনুসরণ করে সহায়তায় অগ্রসর হল।

Verse 48

ततः सा भारती सेना वध्यमाना किरीटिना । तमसा निद्रया चैव पुनरेव व्यदीर्यत,उस समय किरीटधारी अर्जुनकी मार खाती हुई कौरवी-सेना अंधकार और निद्रासे पीड़ित हो पुनः: तितर-बितर हो गयी

সঞ্জয় বললেন—তখন কিরীটধারী অর্জুনের আঘাতে বিধ্বস্ত সেই কৌরব সেনা অন্ধকার ও নিদ্রায় আচ্ছন্ন হয়ে আবারও ভেঙে পড়ে ছত্রভঙ্গ হয়ে গেল।

Verse 49

द्रोणेन वार्यमाणास्ते स्वयं तव सुतेन च | नाशक्यन्त महाराज योधा वारयितुं तदा,महाराज! द्रोणाचार्य और स्वयं आपके पुत्र दुर्योधनके मना करनेपर भी उस समय आपके योद्धा रोके न जा सके

সঞ্জয় বললেন—হে মহারাজ, তখন দ্রোণাচার্য এবং স্বয়ং আপনার পুত্র (দুর্যোধন) নিষেধ করলেও আপনার যোদ্ধাদের আর থামানো গেল না।

Verse 96

सोमदत्तोरसि क्रुद्धः सुपत्र॑ निशितं युधि । इसी समय सात्यकिने भी युद्धस्थलमें कुपित हो सोमदत्तकी छातीपर सुन्दर पंखवाले, अग्निके समान तेजस्वी, उत्तम और तीखे बाणका प्रहार किया

সঞ্জয় বললেন—তখন যুদ্ধক্ষেত্রে ক্রুদ্ধ সাত্যকি সোমদত্তের বক্ষে সুপক্ষযুক্ত, তীক্ষ্ণ ও দীপ্তিমান এক শর নিক্ষেপ করে আঘাত করল।

Verse 106

शरीरे सोमदत्तस्थ स पपात महारथ: । वे भयंकर परिघ और बाण वीर सोमदत्तके शरीरपर एक ही साथ गिरे। इससे महारथी सोमदत्त मूर्च्छित होकर गिर पड़े

সঞ্জয় বললেন—সোমদত্তের দেহে ভয়ংকর পরিঘসম আঘাত ও শরের আঘাত একসঙ্গে পড়তেই সেই মহারথী অচেতন হয়ে ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল।

Verse 113

विसृजन्‌ शरवर्षाणि कालवर्षीव तोयद: । अपने पुत्रके मूर्च्छित होनेपर बाह्लीकने वर्षाऋतुमें वर्षा करनेवाले मेघके समान बाणोंकी वृष्टि करते हुए वहाँ सात्यकिपर धावा किया

সঞ্জয় বললেন— ঋতুকালে বর্ষণকারী মেঘের মতো শরবৃষ্টি করতে করতে, পুত্রকে মূর্ছিত দেখে বাহ্লীক শোক-ক্রোধে দগ্ধ হয়ে সেখানে সাত্যকির বিরুদ্ধে ঝাঁপিয়ে পড়ল—শরের ঝড়ে তাকে আচ্ছন্ন করল।

Verse 126

प्रपीडयन्‌ महात्मानं विव्याध रणमूर्थनि । भीमसेनने सात्यकिके लिये महात्मा बाह्नीकको पीड़ित करते हुए युद्धके मुहानेपर उन्हें नौ बाणोंसे घायल कर दिया

সঞ্জয় বললেন— রণমুখে সেই মহাযোদ্ধাকে চাপে রেখে, সাত্যকির কল্যাণার্থে ভীমসেন বাহ্লীককে নয়টি বাণে বিদ্ধ করল।

Verse 136

निचखान महाबाहु: पुरंदर इवाशनिम्‌ | तब महाबाहु प्रतीपपुत्र बाह्नीकने अत्यन्त कुपित हो भीमसेनकी छातीमें अपनी शक्ति धँसा दी, मानो देवराज इन्द्रने किसी पर्वतपर वज्र मारा हो

সঞ্জয় বললেন— তখন প্রতীপপুত্র মহাবাহু বাহ্লীক প্রবল ক্রোধে উন্মত্ত হয়ে ভীমসেনের বক্ষে নিজের শক্তি গেঁথে দিল—যেন পুরন্দর ইন্দ্র পর্বতে বজ্রাঘাত করলেন।

Verse 143

प्राप्प चेतश्न॒ बलवान्‌ गदामस्मै ससर्ज ह | इस प्रकार शक्तिसे आहत होकर भीमसेन काँप उठे और मूर्च्छित हो गये। फिर सचेत होनेपर बलवान्‌ भीमने उनपर गदाका प्रहार किया

সঞ্জয় বললেন— শক্তির আঘাতে ভীমসেন কেঁপে উঠল ও মূর্ছিত হলো; পরে চেতনা ফিরে পেয়ে বলবান ভীম তার দিকে গদা নিক্ষেপ করল।

Verse 156

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ

সঞ্জয় বললেন— সে নিহত হয়ে পৃথিবীতে এমনভাবে লুটিয়ে পড়ল, যেন বজ্রাহত পর্বতরাজ ভেঙে পড়ে। পাণ্ডুপুত্র ভীমসেনের নিক্ষিপ্ত গদা বাহ্লীকের মস্তক ছিন্ন করল। এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত ঘটোৎকচবধপর্বে রাত্রিযুদ্ধবিষয়ক একশ ছাপ্পান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 157

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे द्रोणयुधिष्ठिरयुद्धे सप्तपञ्चाशदधिकशततमो<ध्याय:

সঞ্জয় বললেন—এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বে, ঘটোৎকচবধপর্বের অন্তর্গত রাত্রিযুদ্ধে, দ্রোণ ও যুধিষ্ঠিরের যুদ্ধপ্রসঙ্গে একশো সাতান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 163

पुत्रास्ते5 भ्यर्दयन्‌ भीम॑ दश दाशरथे: समा: । नरश्रेष्ठ) वीर बाह्लीकके मारे जानेपर श्रीरामचन्द्रजीके समान पराक्रमी आपके दस पुत्र भीमसेनको पीड़ा देने लगे

সঞ্জয় বললেন—দাশরথির (শ্রীরামচন্দ্রের) সমান পরাক্রমশালী তোমার দশ পুত্র ভীমসেনকে ঘিরে ধরে পীড়িত করতে লাগল। বাহ্লীক নিহত হওয়ার পর শোক ও ক্রোধে উন্মত্ত হয়ে তারা একযোগে ভীমের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল।

Verse 176

दृढ: सुहस्तो विरजा: प्रमाथ्युग्रोडनुयाय्यपि । उनके नाम इस प्रकार हैं--नागदत्त

সঞ্জয় বললেন—তাদের নাম ছিল—নাগদত্ত, দৃঢ়রথ, মহাবাহু, অয়োভুজ, দৃঢ়ক্ষত্র, সুহস্ত, বিরজা, প্রমাথী, উগ্র এবং অনুয়ায়ী।

Verse 186

एकमेकं समुद्दिश्य पातयामास मर्मसु । उनको सामने देखकर भीमसेन कुपित हो उठे। उन्होंने प्रत्येकके लिये एक-एक करके भारसाधनमें समर्थ दस बाण हाथमें लिये और उन्हें उनके मर्मस्थानोंपर चलाया

সঞ্জয় বললেন—তাদের সম্মুখে দেখে ভীমসেন ক্রোধে দগ্ধ হলেন। তারপর একে একে লক্ষ্য স্থির করে, হাতে দশটি প্রবল বাণ নিয়ে, প্রত্যেকের মর্মস্থানে নিক্ষেপ করে তাদের ভূমিতে লুটিয়ে দিলেন।

Verse 216

जघान भीम॑ नाराचैस्तमप्यभ्यद्रवद्‌ बली । तदनन्तर कर्णके सुविख्यात बलवान्‌ भ्राता वकरथने आकर भीमसेनपर भी आक्रमण किया और उन्हें नाराचोंद्वारा घायल कर दिया

সঞ্জয় বললেন—ভীম তাকে নারাচ বাণে আঘাত করল; তবু সেই বলবান যোদ্ধা আবার ভীমের দিকে ধেয়ে এল। তারপর বাঁকা গতির রথে আরূঢ় তার সুপ্রসিদ্ধ, শক্তিশালী ভ্রাতা এসে ভীমসেনের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল এবং নারাচ শরে তাকে বিদ্ধ করল।

Verse 226

निहत्य भीमो नाराचै: शतचन्द्रमपोथयत्‌ | भारत! तत्पश्चात्‌ वीर भीमसेनने आपके सालोंमेंसे सात रथियोंको नाराचोंद्वारा मारकर शतचन्द्रको भी कालके गालमें भेज दिया

সঞ্জয় বললেন—তাদের বধ করে ভীম তীক্ষ্ণ নারাচে শতচন্দ্রকে ভূমিতে ফেলল। হে ভারতবংশীয়! তারপর বীর ভীমসেন নারাচে তোমার পক্ষের সাতজন মহারথীকে বধ করে শতচন্দ্রকেও মৃত্যুর মুখে পাঠাল।

Verse 346

चिक्षेप परमक्रुद्धों जिघांसु: पाण्डुनन्दनम्‌ । उस अस्त्रके नष्ट हो जानेपर द्रोणाचार्यने युधिष्ठिरपर क्रमश: वारुण

সঞ্জয় বললেন—পরম ক্রুদ্ধ হয়ে এবং পাণ্ডুনন্দন যুধিষ্ঠিরকে বধ করতে উদ্যত হয়ে দ্রোণাচার্য অস্ত্র নিক্ষেপ করলেন। সেই অস্ত্র নষ্ট হলে, ক্রোধে উন্মত্ত দ্রোণ যুধিষ্ঠিরের বিরুদ্ধে একে একে বারুণ, যাম্য, আগ্নেয়, ত্বাষ্ট্র ও সাবিত্র নামক দিব্যাস্ত্র প্রয়োগ করলেন।

Verse 2036

कर्णस्य दयितं पुत्रं वृषसेनमवाकिरत्‌ । आपके उन पुत्रोंको दस नाराचोंद्वारा मारकर भीमसेनने कर्णके प्यारे पुत्र वृषसेनपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी

সঞ্জয় বললেন—ভীমসেন প্রথমে তোমার সেই পুত্রদের দশটি তীক্ষ্ণ নারাচে বধ করে, তারপর কর্ণের প্রিয় পুত্র বৃষসেনের উপর শরের বর্ষা আরম্ভ করল।

Frequently Asked Questions

Whether continuing combat under conditions that erase discernment (darkness, dust, exhaustion) fulfills kṣatra-dharma or instead produces avoidable, indiscriminate harm—prompting the question of when restraint becomes the more responsible duty.

Disciplined action includes knowing when not to act: situational awareness, humane restraint, and restoration of clarity are portrayed as compatible with duty, especially when cognitive impairment increases unintended consequences.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary is implicit in the narrative framing—Arjuna’s counsel is socially validated by both armies and even praised by higher observers, indicating normative approval of restraint under degraded conditions.

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