
धृतराष्ट्र–संजय संवादः: कर्ण–घटोत्कचयोर्निशायुद्धवर्णनम् (Dhṛtarāṣṭra–Sañjaya Dialogue: Description of the Night Engagement of Karṇa and Ghaṭotkaca)
Upa-parva: Karna–Ghaṭotkaca Night-Engagement Episode (Niśā-yuddha Prasaṅga)
Dhṛtarāṣṭra questions Sañjaya about the midnight confrontation between Karṇa and the rākṣasa Ghaṭotkaca, requesting a precise account of the rākṣasa’s form, chariot, banner, horses, armor, and weaponry. Sañjaya supplies an almost catalog-like portrayal of Ghaṭotkaca’s fearsome physiognomy and ornaments, then describes his chariot’s features, standard, and driver. The narrative shifts to the tactical exchange: both combatants obscure the directions with dense volleys, sustaining a prolonged night-battle marked by mutual wounding and psychological impact on surrounding troops. Ghaṭotkaca deploys successive māyā-configurations—weapon-rains, transformations into mountain and storm-cloud forms, disappearances and reappearances, and the summoning of terrifying beings—to disorient the Kaurava side. Karṇa counters with composure and astric responses, breaking māyā constructs, striking down supporting forces, and neutralizing major projectiles (including a formidable aśani-like weapon) through agility and counter-throw. The chapter culminates with Ghaṭotkaca, his illusions disrupted, issuing a direct threat to Karṇa and then withdrawing (antaradhāna), leaving the engagement unresolved in this unit but narratively emphasizing Karṇa’s resilience under extraordinary conditions.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र, युद्धभूमि की धूल और शोक के बीच, संजय से पूछते हैं—जब दोनों पक्ष युद्ध को उद्यत थे, तब कर्ण के वाग्बाणों से आहत और रथहीन भीमसेन ने क्या किया? → संजय बताता है कि भीम, कर्ण की कटु वाणी से तिलमिलाकर अर्जुन (फाल्गुन) से बोल उठता है—कर्ण ने उसे बार-बार ‘निमूछिया’, ‘मूढ़’, ‘औदरिक’ और ‘अकृतास्त्र’ कहकर अपमानित किया; यह अपमान केवल भीम का नहीं, पाण्डव-प्रतिष्ठा का भी है। भीम का क्रोध अर्जुन की प्रतिज्ञा को और तीखा करता है—कर्णपुत्र (कर्ण) के वध का संकल्प स्पष्ट होता जाता है। → अर्जुन के भीतर प्रतिज्ञा का ज्वार उठता है—वह घोषणा करता है कि कर्णसुत के वध की प्रतिज्ञा वह निभाएगा; वह ऐसा पुरुष नहीं देखता जो संकल्प को धारण कर फिर उसे छोड़ दे। युद्धभूमि में बाणों से छिन्न-भिन्न हाथियों और वीरों का दृश्य इस प्रतिज्ञा को रक्त-यथार्थ में बदल देता है। → अध्याय का अंत प्रतिज्ञा-पूर्ति की दिशा में स्थिरता देता है—अर्जुन माधव (कृष्ण) के प्रति कृतज्ञ होकर स्वीकार करता है कि उनकी कृपा के बिना यह दुस्तर प्रतिज्ञा पार नहीं हो सकती थी; संकल्प, सहायता और धर्म-बल का त्रिकोण स्थापित होता है। → कर्ण-वध की प्रतिज्ञा अब केवल वचन नहीं, निकट आती नियति है—अगला चरण यह तय करेगा कि यह संकल्प किस मूल्य पर पूरा होगा।
Verse 1
धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! जब पाण्डवपक्षके और मेरे शूरवीर सैनिक पूर्वोक्तरूपसे युद्धके लिये उद्यत हो गये, तब भीमसेनने क्या किया? यह मुझे बताओ
ধৃতরাষ্ট্র জিজ্ঞাসা করলেন—সঞ্জয়! পূর্বোক্তরূপে যখন পাণ্ডবপক্ষের এবং আমার বীর সৈন্যরা যুদ্ধে উদ্যত হল, তখন ভীমসেন কী করল? আমাকে বলো।
Verse 2
संजय उवाच विरथो भीमसेनो वै कर्णवाक्ृशल्यपीडित: । अमर्षवशमापन्न: फाल्गुनं वाक्यमब्रवीत्
সঞ্জয় বললেন—রাজন! রথহীন ভীমসেন কর্ণের বাক্যবাণে বিদ্ধ হয়ে অসহ্য ক্রোধে আচ্ছন্ন হল। সে ফাল্গুন (অর্জুন)-কে এই কথা বলল—
Verse 3
पुन: पुनस्तूबरक मूढ औदरिकेति च । अकृतास्त्रक मा योत्सीर्बाल संग्रामकातर
সঞ্জয় বললেন—ধনঞ্জয়! তোমার সামনেই কর্ণ আমাকে বারবার বলেছে—‘ওহে দাড়িহীন! মূর্খ! পেটুক! অস্ত্রবিদ্যায় অদক্ষ! বালক! যুদ্ধভীরু! যুদ্ধ কোরো না।’ হে ভারত! যে আমাকে এভাবে বলে, সে আমার বধযোগ্য; আর সে আমাকে তাই বলেছে।
Verse 4
इति मामब्रवीत् कर्ण: पश्यतस्ते धनंजय । एवं वक्ता च मे वध्यस्तेन चोक्तो5स्मि भारत
সঞ্জয় বললেন—ধনঞ্জয়! তোমার চোখের সামনেই কর্ণ আমাকে এ কথা বলেছে। হে ভারত! যে আমাকে এভাবে বলে, সে আমার বধযোগ্য; আর সে আমাকে তাই বলেছে।
Verse 5
एतद् व्रतं महाबाहो त्वया सह कृतं मया । तथैतन्मम कौन्तेय यथा तव न संशय:
সঞ্জয় বললেন—হে মহাবাহু! এই ব্রত আমি তোমার সঙ্গে একত্রেই গ্রহণ করেছি। হে কুন্তীপুত্র! আমার কাছে যেমন, তোমার কাছেও তেমনই—এতে কোনো সংশয় নেই।
Verse 6
“महाबाहु कुन्तीकुमार! ऐसा कहनेवालेके वधकी यह प्रतिज्ञा मैंने तुम्हारे साथ ही की थी। यह कर्णका वध जैसे मेरा कार्य है, वैसे ही तुम्हारा भी है, इसमें संशय नहीं है ।।
সঞ্জয় বললেন—অতএব, হে নরশ্রেষ্ঠ! আমার এই বাক্য স্মরণে রাখো। হে ধনঞ্জয়! আমার সেই প্রতিজ্ঞা যেন সত্য হয়, তেমনই করো।
Verse 7
तच्छुत्वा वचन तस्य भीमस्यामितविक्रम: । ततोअर्जुनो5ब्रवीत् कर्ण किंचिदभ्येत्य संयुगे,भीमसेनका यह वचन सुनकर अमित पराक्रमी अर्जुन युद्धस्थलमें कर्णके कुछ निकट जाकर उससे इस प्रकार बोले--
সঞ্জয় বললেন—ভীমের সেই কথা শুনে অপরিমেয় পরাক্রমী অর্জুন যুদ্ধক্ষেত্রে কর্ণের কিছুটা কাছে গিয়ে তাকে এইভাবে বলল।
Verse 8
कर्ण कर्ण वृथादृष्टे सूतपुत्रात्मसंस्तुत । अधर्मबुद्धे शृणु मे यत् त्वां वक्ष्यामि साम्प्रतम्
সঞ্জয় বললেন—“হে কর্ণ, কর্ণ! তোর দৃষ্টি বৃথা ও বিভ্রান্ত। হে সূতপুত্র! তুই নিজেই নিজের প্রশংসা করিস। হে অধর্মবুদ্ধি! এখন আমি যা বলব, তা শোন।”
Verse 9
द्विविधं कर्म शूराणां युद्धे जयपराजयौ । तौ चाप्यनित्यौ राधेय वासवस्यापि युध्यत:
সঞ্জয় বললেন—“যুদ্ধে বীরদের ফল দুই প্রকার—জয় ও পরাজয়। হে রাধেয়! এ দুটিই অনিত্য; এমনকি বাসব (ইন্দ্র) যুদ্ধ করলেও তার ক্ষেত্রেও তা নিশ্চিত নয়।”
Verse 10
(रणमुत्सृज्य निर्लज्ज गच्छसे वै पुनः पुन: । माहात्म्यं पश्य भीमस्य कर्ण जन्म कुले तथा ।।
সঞ্জয় বললেন— “হে নির্লজ্জ! তুমি বারবার যুদ্ধ ত্যাগ করে পালিয়ে যাও। ভীমের মহিমা দেখ—উত্তম কুলে জন্ম ও মহৎ স্বভাব এমন যে, তুমি পালায়নপরায়ণ হয়েও পালাতে থাকলেও তিনি তোমার প্রতি কঠোর বাক্য উচ্চারণ করেননি। তবু তুমি আবার যুদ্ধ করে দৈবযোগে একবার সেই পাণ্ডববীর ভীমকে রথহীন করেছিলে; কিন্তু হে রাধেয়, ভীমের প্রতি গালিগালাজ করে তুমি তোমার বংশেরই উপযুক্ত কাজ করেছ। হে নরশ্রেষ্ঠ! এখন যে বিপদ তোমার সামনে উপস্থিত, তা তুমি বুঝতে পারছ না। যেমন শৃগাল বনচর মহাপশুকে তুচ্ছ করে, তেমনি তুমি ক্ষত্রিয়ধর্মকে অবজ্ঞা করছ। ভীমের জন্য যুদ্ধ পৈতৃক কর্ম; আর তোমার জন্য, হে সূতপুত্র, কুলোচিত কর্ম সারথ্য। হে রাধেয়! যুদ্ধের মুখে, সকল অস্ত্রধারীর মাঝে আমি তোমাকে বলছি—যা পারো, সর্বপ্রকারে করে নাও। যুদ্ধে ইন্দ্রেরও সর্বদা অব্যর্থ সিদ্ধি হয় না। একবার যুযুধান (সাত্যকি) তোমাকে রথহীন করে মৃত্যুর নিকটে এনে ফেলেছিল; ইন্দ্রিয়সমূহ বিচলিত ছিল—তবু ‘তুমি আমার বধ্য’ জেনে, জয় করেও সে তোমাকে জীবিত ছেড়ে দিয়েছিল।”
Verse 11
यदृच्छया रणे भीम॑ युध्यमानं महाबलम् | कथंचिद् विरथं कृत्वा यत् त्वं रूक्षमभाषथा:
সঞ্জয় বললেন— “যুদ্ধে দৈবযোগে, প্রবলভাবে লড়তে থাকা মহাবলী ভীমকে কোনো মতে রথহীন করে তুমি যে রূঢ় বাক্য বলেছিলে—তাই তোমার অহংকার ও ক্রোধের চাপ প্রকাশ করে।”
Verse 12
नारिं जित्वातिकत्थन्ते न च जल्पन्ति दुर्वच:
“নারীকে জয় করে তারা অতিশয় দম্ভ করে; আর কঠোরজিহ্বা লোকেরা সংযত বাক্য বলতে জানে না।”
Verse 13
त्वं तु प्राकृतविज्ञानस्तत् तद् वदसि सूतज
“কিন্তু তুমি তো সাধারণ বোধবুদ্ধির অধিকারী, হে সূতপুত্র; তাই এ কথা-সে কথা বলে চল।”
Verse 14
युध्यमानं पराक्रान्तं शूरमार्यव्रते रतम्
“(আমি তাকে) যুদ্ধ করতে দেখলাম—পরাক্রমে দীপ্ত, বীর, এবং আর্য-ধর্মের ব্রতে অবিচল।”
Verse 15
पश्यतां सर्वसैन्यानां केशवस्य ममैव च
সঞ্জয় বললেন—সমস্ত সেনাবাহিনীর দৃষ্টির সামনে, কেশবের সম্মুখে এবং আমার সামনেও।
Verse 16
नच त्वां परुषं किंचिदुक्तवान् पाण्डुनन्दन:
সঞ্জয় বললেন—পাণ্ডুনন্দন তোমাকে কোনো কঠোর বাক্য একেবারেই বলেনি। অতএব তোমার এই দম্ভের যথোচিত ফল তুমি অবিলম্বে ভোগ কর।
Verse 17
यस्मात् तु बहु रूक्ष॑ च श्रावितस्ते वृकोदर: । परोक्षं यच्च सौभद्रो युष्माभिन्निहतो मम
সঞ্জয় বললেন—কারণ তুমি বৃকোদরকে বহু রূঢ় ও তিক্ত বাক্য শুনিয়েছ, আর কারণ আমার সৌভদ্র (অভিমন্যু) তোমাদের দ্বারা আড়ালে নিহত হয়েছে—সেই নিষ্ঠুরতার ফল এখন প্রকাশ পাচ্ছে।
Verse 18
त्वया तस्य धनुश्छिन्नमात्मनाशाय दुर्मते
সঞ্জয় বললেন—হে দুর্মতি! তুমি তার ধনুক কেটে দিয়েছ; এটাই তোমার নিজের বিনাশের কারণ হবে।
Verse 19
कुरु त्वं सर्वकृत्यानि महत् ते भयमागतम्
সঞ্জয় বললেন—এখন যা যা করণীয়, সবই কর; তোমার উপর মহাভয় এসে পড়েছে।
Verse 20
ये चान्ये5प्युपयास्यन्ति बुद्धिमोहेन मां नूपा:
আর অন্য সেই রাজাগণও, যাদের বিচারবুদ্ধি মোহে আচ্ছন্ন, আমার কাছে (পরামর্শ/সহায়তার জন্য) আসবে।
Verse 21
त्वां च मूढाकृतप्रज्ममतिमानिनमाहवे
আর তুমিও—রণক্ষেত্রে—যে প্রকৃতপক্ষে বিবেকহীন হয়েও জ্ঞানীর ভান করো এবং আত্মঅহংকারে স্ফীত।
Verse 22
अर्जुनेन प्रतिज्ञाते वधे कर्णसुतस्य तु
অর্জুন যখন কর্ণপুত্রের বধের প্রতিজ্ঞা করলেন, তখন যোদ্ধার শপথবাক্যের ধর্মভার যুদ্ধের গতিকে গম্ভীর করে তুলল।
Verse 23
तस्मिन्नाकुलसंग्रामे वर्तमाने महाभये
সেই বিভ্রান্তিকর সংঘর্ষ চলতে থাকলে—মহাভয়ের মধ্যে—
Verse 24
मन्दरश्मि: सहस्रांशुरस्तं गिरिमुपाद्रवत् । उस महाभयानक तुमुल संग्रामके छिड़ जानेपर मन्द किरणोंवाले भगवान् सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये ।। ततो राजन् हृषीकेश: संग्रामशिरसि स्थितम्
সেই মহাভয়ংকর, তুমুল যুদ্ধ শুরু হলে, মৃদু কিরণধারী সহস্রকিরণ সূর্যদেব অস্তাচল পর্বতের দিকে দ্রুত অগ্রসর হলেন। তারপর, হে রাজন, যুদ্ধের অগ্রভাগে অবস্থানকারী হৃষীকেশ (কৃষ্ণ)…
Verse 25
दिष्टया सम्पादिता जिष्णो प्रतिज्ञा महती त्वया
সঞ্জয় বললেন—দৈবকৃপায়, হে জিষ্ণু, তোমার গ্রহণ করা সেই মহাপ্রতিজ্ঞা তোমার দ্বারাই সম্পন্ন হয়েছে।
Verse 26
धार्तराष्ट्रबलं प्राप्प देवसेनापि भारत
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত, ধার্তরাষ্ট্রদের সেনাদলের কাছে পৌঁছে দেবসেনাও সেখানে এসে উপস্থিত হল।
Verse 27
न तं पश्यामि लोकेषु चिन्तयन् पुरुषं क्वचित्
সঞ্জয় বললেন—বিচার করেও আমি কোনো লোকেই কোথাও এমন কোনো পুরুষকে দেখি না, যে তার সমকক্ষ হতে পারে।
Verse 28
महाप्रभावा बहवस्त्वया तुल्याधिकाडपि वा
সঞ্জয় বললেন—মহাপ্রভাবশালী বহু পুরুষ আছেন—কেউ তোমার সমান, কেউবা তোমার চেয়েও অধিক।
Verse 29
समेता: पृथिवीपाला धार्तराष्ट्रस्य कारणात् । धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके लिये बहुत-से महान् प्रभावशाली राजा यहाँ एकत्र हो गये हैं, जिनमेंसे कितने ही तुम्हारे समान या तुमसे भी अधिक बलशाली हैं ।।
সঞ্জয় বললেন—ধৃতরাষ্ট্রপুত্রের কারণেই পৃথিবীর অধিপতি রাজারা এখানে সমবেত হয়েছে। তারা বর্মধারী যোদ্ধারা রণে তোমাকে পেয়ে ক্রোধে জ্বলে উঠল, আর পিছু হটল না।
Verse 30
तव वीर्य बल॑ चैव रुद्रशक्रान्तकोपमम् । 'वे भी रणक्षेत्रमें कवच बाँधकर कुपित हो तुम्हारा सामना करनेके लिये आये, परंतु टिक न सके। तुम्हारा बल और पराक्रम रुद्र, इन्द्र तथा यमराजके समान है ।।
সঞ্জয় বললেন—যে যোদ্ধারা রণক্ষেত্রে কবচ বেঁধে ক্রুদ্ধ হয়ে তোমার মুখোমুখি হতে এসেছিল, তারা স্থির থাকতে পারেনি। তোমার বীর্য ও বল রুদ্র, শক্র (ইন্দ্র) ও অন্তক (যম)-সম। যুদ্ধে এমন পরাক্রম কেউ দেখাতে পারে না।
Verse 31
एवमेव हते कर्णे सानुबन्धे दुरात्मनि
সঞ্জয় বললেন—এইভাবেই, দুষ্টচিত্ত কর্ণ যখন তার সঙ্গে যুক্ত সব অনুবন্ধসহ নিহত হল, তখন…
Verse 32
वर्धयिष्यामि भूयस्त्वां विजितारिं हतद्विषम् । “इसी प्रकार सगे-सम्बन्धियोंसहित दुरात्मा कर्णके मारे जानेपर शत्रुओंको जीतने और द्वेषी विपक्षियोंको मार डालनेवाले तुझ विजयी वीरको पुन: बधाई दूँगा” ।।
সঞ্জয় বললেন—আমি আবার তোমার গৌরব বর্ণনা করব—তুমি শত্রুজয়ী, বিদ্বেষী প্রতিপক্ষের সংহারক, বিজয়ী বীর। তখন অর্জুন উত্তর দিল—হে মাধব, এ সবই আপনার কৃপাপ্রসাদে।
Verse 33
अनाक्षर्यो जयस्तेषां येषां नाथोडसि केशव
সঞ্জয় বললেন—হে কেশব! যাদের রক্ষক আপনি, তাদের বিজয়ে আশ্চর্য কী? আপনার কৃপাপ্রসাদে যুধিষ্ঠির সমগ্র পৃথিবীর রাজ্য লাভ করবেন। হে বার্ষ্ণেয় প্রভু! এ আপনারই প্রভাব, এ আপনারই বিজয়। হে মধুসূদন! আমরা চিরকাল আপনার আশীর্বাদের যোগ্য হয়ে থাকব।
Verse 34
त्वत्प्रसादान्महीं कृत्स्नां सम्प्राप्स्यति युधिष्ठिर: । तव प्रभावो वार्ष्णेय तवैव विजय: प्रभो । वर्धनीयास्तव वयं सदैव मधुसूदन
সঞ্জয় বললেন—আপনার প্রসাদে যুধিষ্ঠির সমগ্র পৃথিবী লাভ করবেন। হে বার্ষ্ণেয় প্রভু! এ আপনারই প্রভাব; এ আপনারই বিজয়। হে মধুসূদন! আমরা সদা আপনার প্রশংসা ও অভিনন্দন জানাতে থাকব।
Verse 35
एवमुक्तस्तत: कृष्ण: शनकैर्वाहयन् हयान् । दर्शयामास पार्थाय क्रूरमायोधनं महत्
এভাবে বলা হলে কৃষ্ণ ধীরে ধীরে অশ্বদের চালিয়ে পার্থকে সেই বিশাল, নিষ্ঠুর যুদ্ধক্ষেত্রের দৃশ্য দেখাতে লাগলেন।
Verse 36
श्रीकृष्ण उवाच प्रार्थयन्तो जयं युद्धे प्रथितं च महद् यश: । पृथिव्यां शेरते शूरा: पार्थिवास्त्वच्छरैर्हता:
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—যুদ্ধজয় ও সর্বত্র প্রসিদ্ধ মহাযশ কামনা করে এই বীর রাজারা তোমার তীরে নিহত হয়ে এখন পৃথিবীতে শুয়ে আছে।
Verse 37
श्रीकृष्ण बोले--अर्जुन! युद्धमें विजय और सब ओर फैले हुए महान् सुयशकी अभिलाषा रखनेवाले ये शूरवीर भूपाल तुम्हारे बाणोंसे मरकर पृथ्वीपर सो रहे हैं ।।
অর্জুন! এদের অস্ত্রশস্ত্র ও অলংকার ছড়িয়ে পড়েছে; ঘোড়া, রথ ও হাতি বিনষ্ট হয়েছে; আর মর্মস্থল ছিন্নভিন্ন হওয়ায় এ রাজারা চরম অসহায়তায় পতিত হয়েছে।
Verse 38
ससत्त्वा गतसत्त्वाश्न प्रभया परया युता: । सजीवा इव लक्ष्यन्ते गतसत्त्वा नराधिपा:
কতজনের প্রাণ এখনও আছে, আর কতজনের প্রাণ চলে গেছে; তবু যাদের প্রাণ গেছে, সেই নৃপতিরাও অপূর্ব দীপ্তিতে উজ্জ্বল বলে যেন জীবিতই মনে হয়।
Verse 39
तेषां शरै: स्वर्णपुड्खै: शस्त्रैश्व विविधै: शितै: । वाहनैरायुधैश्नैव सम्पूर्णा पश्य मेदिनीम्
দেখো—এই সমগ্র ভূমি সর্বত্র ভরে আছে তাদের সোনালি পালকযুক্ত তীর, নানাবিধ ধারালো অস্ত্র, আর পতিত বাহন ও যুদ্ধসামগ্রীতে।
Verse 40
वर्मभिश्चर्मभिहरि: शिरोभिश्व॒ सकुण्डलै: । उष्णीषैर्मुकुटै: स्रग्भिश्वूडामणिभिरम्बरै:
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—হে ভারত! চারদিকে যুদ্ধক্ষেত্রে ছড়িয়ে আছে পতিত বর্ম ও ঢাল; কুণ্ডলধারী মস্তক, পাগড়ি ও মুকুট, মালা, চূড়ামণি এবং বস্ত্র। এই ছিন্নভিন্ন অলংকার ও যুদ্ধোপকরণে ভূমি যেন অদ্ভুতভাবে অলংকৃত—ভয়ংকর মূল্যে কেনা এক শোভা।
Verse 41
कण्ठसूत्रैरड्रदैश्व निष्कैरपि च सप्रभै: । अन्यैश्षाभरणैश्षित्रैर्भाति भारत मेदिनी
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—হে ভারত! এই ভূমি চারদিকে পতিত কণ্ঠসূত্র, সমৃদ্ধ ও দীপ্তিমান নিষ্ক এবং নানা বিচিত্র অলংকারে ঝলমল করছে। হত্যার মাঝেও যোদ্ধাদের এই চিহ্নগুলি ছড়িয়ে পড়ে এমন এক শোভা সৃষ্টি করে, যা নীরবে যুদ্ধের মূল্য ও অহংকারের ক্ষণস্থায়িত্ব প্রকাশ করে।
Verse 42
अनुकर्षरुपासड्रैः पताकाभिर्ध्वजैस्तथा । उपस्करैरधिष्ठानैरीषादण्डकबन्धुरै:
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—হে ভারত! এই ভূমি রথের টান-দড়ি ও জোড়ার ফিতা, পতাকা ও ধ্বজ, নানা উপকরণ ও আসন, জোয়াল-দণ্ড ও বাঁধন-রজ্জু, আর ভাঙা চাকা ও ছিটকে পড়া অংশে ভরে ঝলমল করছে। যুদ্ধের ছড়ানো সরঞ্জামের এই অবশেষে রণভূমি তেমনি শোভিত দেখায়, যেমন শরৎকালের নির্মল আকাশ নক্ষত্রে অলংকৃত—কিন্তু এ শোভা আনন্দের নয়, ধ্বংসের স্মারক।
Verse 43
चक्रैः प्रमथितैश्ित्रैरक्षेश्न॒ बहुधा रणे । युगै्योक्त्रै: कलापैश्न धनुर्भि: सायकैस्तथा
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—সেই যুদ্ধে রথ নানাভাবে চূর্ণবিচূর্ণ হল—চাকা ভেঙে গেল, অক্ষ দুভাগ হল; জোয়াল ও লাগামও ছিন্নভিন্ন হয়ে পড়ল। তূণীর ছড়িয়ে গেল, ধনুক ভাঙল, আর শর সর্বত্র বিছিয়ে রইল। এভাবে এই ভূমি সেই ধ্বংসের সাক্ষী হল, যা উন্মত্ত ক্রোধ থেকে জন্মায়—যখন কৌশল ও বীর্য সংযমহীন হয়ে ওঠে।
Verse 44
परिस्तोमै: कुथाभि श्न परिघैरड्कुशैस्तथा । शक्तिभिभिन्दिपालैश्न तृणै: शूलै: परश्वचै:
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—তারা চারদিক থেকে নানাবিধ অস্ত্রে তাকে আঘাত করতে লাগল—পরিস্তোম ও কুথা, পরিঘ ও অঙ্কুশ, শক্তি ও ভিন্দিপাল, আর ত্রিশূল ও পরশু দিয়ে। যুদ্ধের উন্মাদনায় বল বহুগুণে বাড়ে, সংযম লুপ্ত হয়—এই ছিল সেই ভয়ংকর দৃশ্যের মর্ম।
Verse 45
प्रासैश्न तोमरैश्वैव कुन्तैर्यष्टि भिरेव च । शतघध्नीभिर्भूशुण्डीभि: खड्गै: परशुभिस्तथा
বল্লম ও তোমর, কুন্ত ও দণ্ড দ্বারা; শতম্নী, ভূশুণ্ডী-নিক্ষেপ, এবং খড়্গ ও পরশু দ্বারাও।
Verse 46
मुसलैर्मुद्गरैश्वैव गदाभि: कुणपैस्तथा । सुवर्णविकृताभिश्व कशाभिभर्भरतर्षभ
মুসল, মুদ্গর ও গদা দ্বারা; এমনকি শবদেহ দ্বারাও; আর হে ভরতশ্রেষ্ঠ, স্বর্ণে অলংকৃত চাবুক দ্বারাও।
Verse 47
घण्टाभिश्ष गजेन्द्राणां भाण्डैश्न विविधैरपि । स्रग्भिश्ष नानाभरणैवस्त्रैश्ैव महाधनै:
গজেন্দ্রদের ঘণ্টা দ্বারা, এবং নানাবিধ সামগ্রী দ্বারাও; মালা, নানা অলংকার, বস্ত্র—এমনকি মহাধন দ্বারাও।
Verse 48
पृथिव्यां पृथिवीहेतो: पृथिवीपतयो हता:
এই পৃথিবীতেই, পৃথিবীরই কারণে, পৃথিবীর অধিপতিরা নিহত হয়েছে।
Verse 49
पृथिवीमुपगुदाज्लैः सुप्ता: कान्तामिव प्रियाम् इस पृथ्वीके राज्यके लिये मारे गये ये पृथ्वीपति अपने सम्पूर्ण अंगोंद्वारा प्यारी प्राणवललभाके समान इस भूमिका आलिंगन करके इसपर सो रहे हैं ।।
পৃথিবীর রাজ্যের জন্য নিহত এই পৃথিবীপতিরা, সর্বাঙ্গে এই ভূমিকে প্রিয় কান্তার মতো আলিঙ্গন করে তার বুকে নিদ্রিত হয়ে আছে। আর হে বীর, দেখ—পর্বতশিখরের মতো প্রতীয়মান, ঐরাবত-সদৃশ এই হাতিগুলি বাণাহত হয়ে মাটিতে কাতরিয়ে গড়াগড়ি খাচ্ছে; তাদের ক্ষত থেকে রক্তধারা তেমনি প্রবাহিত হচ্ছে, যেমন পর্বত গুহামুখ থেকে গেরু-রঞ্জিত জলধারা ঝরায়।
Verse 50
क्षरत: शोणितं भूरि शस्त्रच्छेददरीमुखै: । दरीमुखैरिव गिरीन् गैरिकाम्बुपरिस्रवान्
অস্ত্রাঘাতে সৃষ্ট বিস্তীর্ণ ক্ষত-গহ্বর থেকে প্রচুর রক্ত ঝরছিল—যেন পর্বতের গিরিখাত বেয়ে গেরুয়া জলের ধারা নেমে আসে।
Verse 51
हयांश्व॒ पतितान् पश्य स्वर्णभाण्डविभूषितान्
দেখো এই অশ্বগুলো—সোনার সাজে ভূষিত ছিল, এখন পতিত ও প্রাণহীন। আর দেখো এই রথগুলো—যাদের অধিপতি নিহত; গন্ধর্ব-নগরের মতোই জাঁকজমকপূর্ণ, তবু শূন্য। তাদের ধ্বজা-পতাকা ছিন্ন, জোয়াল ও ধুর ভাঙা, চাকা নষ্ট, আর সারথিরাও নিহত।
Verse 52
गन्धर्वनगराकारान् रथांश्व निहतेश्वरान् । छिन्नध्वजपताकाक्षान् विचक्रान् हतसारथीन्
গন্ধর্ব-নগরের মতো দেখায় এমন এই রথ ও অশ্বগুলো দেখো—যাদের অধিপতি নিহত। এদের ধ্বজা-পতাকা ও ধুর ছিন্নভিন্ন, চাকা ভেঙে গেছে, আর সারথিরাও নিহত।
Verse 53
निकृत्तकूबरयुगान् भग्नेषाबन्धुरान् प्रभो | पश्य पार्थ हयान् भूमौ विमानोपमदर्शनान्
প্রভো! এই রথগুলোর কूबर ও জোয়াল কাটা, ঈষাদণ্ড ভাঙা, আর বাঁধন-রজ্জুও ছিন্নভিন্ন। হে পার্থ, ভূমিতে পড়ে থাকা এই অশ্বগুলো দেখো—দর্শনে যেন বিমানের মতোই প্রতীয়মান।
Verse 54
पत्ती क्षनिहतान वीर शतशो5थ सहस्रश: । धनुर्भुतश्चर्मभृतः शयानान् रुधिरोक्षितान्,वीर! अपने मारे हुए इन सैकड़ों और हजारों पैदल सैनिकोंको देखो, जो धनुष और ढाल लिये खूनसे लथपथ हो धरतीपर सो रहे हैं
হে বীর! ক্ষণমাত্রে নিহত এই পদাতিকদের দেখো—শত শত, সহস্র সহস্র। ধনুক ও ঢাল ধারণ করে, রক্তে সিক্ত হয়ে তারা ভূমিতে শুয়ে আছে।
Verse 55
महीमालिड्ग्य सर्वज्ञि: पांसुध्वस्तशिरोरुहान् । पश्य योधान् महाबाहो त्वच्छरैर्भिन्नविग्रहान्
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—মহাবাহো, তোমার শরবিদ্ধ হয়ে যাদের দেহ ছিন্নভিন্ন হয়েছে, সেই যোদ্ধাদের দেখো। ধূলিতে তাদের কেশ জটিল হয়েছে, আর সর্বাঙ্গে পৃথিবীকে আলিঙ্গন করে তারা যেন নিদ্রিত হয়ে পড়ে আছে।
Verse 56
निपातितद्विपरथवाजिसंकुल- मसृग्वसापिशितसमृद्धकर्दमम् । निशाचरश्ववृकपिशाचमोदनं महीतलं नरवर पश्य दुर्दशम्
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—নরশ্রেষ্ঠ! এই ভূমির ভয়াবহ দশা দেখো। পতিত হাতি, চূর্ণ রথ ও মৃত অশ্বে এ স্থান ভরে গেছে। রক্ত, চর্বি ও মাংসে কাদামাটি জমেছে; এই রণক্ষেত্র নিশাচর, কুকুর, নেকড়ে ও পিশাচদের আনন্দস্থল হয়ে উঠেছে।
Verse 57
इदं महत् त्वय्युपपद्यते प्रभो रणाजिरे कर्म यशोभिवर्धनम् | शतक्रतौ चापि च देवसत्तमे महाहवे जचघ्नुषि दैत्यदानवान्
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—প্রভো! রণাঙ্গনে যশবর্ধক এই মহৎ কর্ম তোমারই উপযুক্ত। মহাযুদ্ধে দৈত্য-দানব সংহারকারী দেবশ্রেষ্ঠ শতক্রতু ইন্দ্রের মধ্যেও এ সামর্থ্য আছে; তবু তোমার মধ্যে তা সর্বাধিক সার্থক।
Verse 58
संजय उवाच एवं संदर्शयन् कृष्णो रणभूमिं किरीटिने । स्वै: समेत: समुदितै: पाउ्चजन्यं व्यनादयत्
সঞ্জয় বললেন—রাজন! এইভাবে কিরীটধারী অর্জুনকে রণভূমির দৃশ্য দেখাতে দেখাতে ভগবান শ্রীকৃষ্ণ সেখানে সমবেত স্বজনদের সঙ্গে পাঞ্চজন্য শঙ্খ ধ্বনিত করলেন।
Verse 59
स दर्शयन्नेव किरीटिने5रिहा जनार्दनस्तामरिभूमिमज्जसा । अजातशशन्रुं समुपेत्य पाण्डवं निवेदयामास हतं जयद्रथम्
সঞ্জয় বললেন—শত্রুনাশক জনার্দন কিরীটধারী অর্জুনকে রণভূমির দৃশ্য দেখাতে দেখাতেই দ্রুত অজাতশত্রু পাণ্ডব যুধিষ্ঠিরের কাছে গিয়ে নিবেদন করলেন—“জয়দ্রথ নিহত হয়েছে।”
Verse 116
अधर्मस्त्वेष सुमहाननार्यचरितं च तत् । 'परंतु तूने रणभूमिमें युद्धपरायण महाबली भीमसेनको दैवेच्छासे किसी प्रकार रथहीन करके जो उनके प्रति कठोर बातें कही थीं
সঞ্জয় বললেন—এটি তোমার অতি মহৎ অধর্ম; এ আচরণ আর্যদের যোগ্য নয়। রণক্ষেত্রে যুদ্ধপরায়ণ মহাবলী ভীমসেনকে দৈববশত কোনোভাবে রথহীন করে তুমি তার প্রতি কঠোর বাক্য বলেছিলে—এ তোমার গুরুতর পাপ। এমন কাজ নীচচিত্ত লোকেরই।
Verse 123
न च कज्चन निन्दन्ति सन्त: शूरा नरर्षभा: | “नरश्रेष्ठ शूरवीर सज्जन शत्रुको जीतकर बढ़-बढ़कर बातें नहीं बनाते, किसीको कट वचन नहीं कहते और न किसीकी निन््दा ही करते हैं
সঞ্জয় বললেন—সজ্জন, শূর, নরশ্রেষ্ঠেরা কাউকে নিন্দা করে না। বিজয় ও শক্তির সময়েও তারা কটু বাক্য বলে না, অন্যের দোষ খোঁজে না; যুদ্ধের উন্মত্ততার মধ্যেও এই সংযমই তাদের চরিত্র।
Verse 136
बह्नबद्धमकर्ण्य च चापलादपरीक्षितम् | 'सूतपुत्र! तेरी बुद्धि बहुत ओछी है। इसीलिये तू चपलतावश बिना जाँचे-बूझे बहुत-सी न सुननेयोग्य असम्बद्ध बातें बक जाया करता है
সঞ্জয় বললেন—চপলতাবশত বিচার না করে বলা বহু অসংলগ্ন ও অশ্রাব্য কথা শুনে তিনি তা ‘শোনার অযোগ্য’ বলে নিন্দা করলেন। আর বললেন—“সূতপুত্র! তোর বুদ্ধি অতিশয় নীচ; তাই অবিবেচনায় চপল হয়ে তুই বহু অশ্রাব্য, অসংলগ্ন কথা প্রলাপ করিস।”
Verse 143
यदवोचोडप्रियं भीम॑ नैतत् सत्यं वचस्तव । 'तूने युद्धमें संलग्न, श्रेष्ठ व्रतके पालनमें तत्पर, पराक्रमी और शूरवीर भीमसेनके प्रति जो अप्रिय वचन कहा है, तेरा यह कथन ठीक नहीं है
সঞ্জয় বললেন—ভীমসেনের প্রতি তুমি যে অপ্রিয় বাক্য বলেছ, তা সত্য নয়; তোমার সে কথা যথাযথ নয়। যুদ্ধে সংলগ্ন, শ্রেষ্ঠ ব্রতে অবিচল, পরাক্রমশালী ও শূর ভীমসেনের প্রতি এমন ভাষা শোভা পায় না।
Verse 148
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि अष्टचत्वारिंशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें एक सौ अड्श़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত জয়দ্রথবধপর্বে একশো আটচল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 156
विरथो भीमसेनेन कृतोडसि बहुशो रणे । “सारी सेनाओंके देखते-देखते मेरे और श्रीकृष्णके सामने युद्धस्थलमें भीमसेनने तुझे अनेक बार रथहीन कर दिया है
সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধে ভীমসেন তোমাকে বহুবার রথহীন করেছে। সমস্ত সেনার চোখের সামনে, আমার ও শ্রীকৃষ্ণের সম্মুখে, রণক্ষেত্রে ভীমসেন বারংবার তোমাকে রথচ্যুত করেছে।
Verse 173
तस्मादस्यावलेपस्य सद्यः फलमवाप्रुहि । 'परंतु उन पाण्डुनन्दन भीमने तुझसे कोई कटु वचन नहीं कहा। तूने जो भीमको बहुत- सी रूखी बातें सुनायी हैं और मेरे परोक्षमें तुमलोगोंने जो मेरे पुत्र सुभद्राकुमार अभिमन्युको अन्यायपूर्वक मार डाला है
সঞ্জয় বললেন—অতএব তোমার এই দম্ভের ফল তুমি অবিলম্বে ভোগ করো। ভীম তোমার প্রতি কোনো কটু বাক্য বলেনি; কিন্তু তুমি ভীমকে বহু রূঢ় কথা শুনিয়েছ, আর আমার অগোচরে তোমরা অন্যায়ভাবে সুভদ্রাপুত্র অভিমন্যুকে বধ করেছ—সেই অহংকারের যথোচিত ফল এখনই গ্রহণ করো।
Verse 183
तस्माद् वध्यो5सि मे मूढ सभृत्यसुतबान्धव: । “दुर्मते! मूढ़! तूने अपने विनाशके लिये अभिमन्युका धनुष काट दिया था, अतः मेरे द्वारा भृत्य, पुत्र तथा वन्धु-बान्धवोंसहित प्राणदण्ड पानेयोग्य है
সঞ্জয় বললেন—অতএব, হে মূঢ়, তুমি আমার দ্বারা বধযোগ্য—তোমার ভৃত্য, পুত্র ও আত্মীয়স্বজনসহ। হে দুর্মতি, তুমি নিজের বিনাশ ডেকে এনে অভিমন্যুর ধনুক কেটেছিলে; তাই তুমি আমার হাতে প্রাণদণ্ডের যোগ্য।
Verse 196
हन्तास्मि वृषसेन ते प्रेक्षमाणस्य संयुगे । “तू अपने सारे कर्तव्य पूर्ण कर ले। तुझे भारी भय आ पहुँचा है। मैं युद्धस्थलमें तेरे देखते-देखते तेरे पुत्र वृषसेनको मार डालूँगा
সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধে, তোমার চোখের সামনেই, আমি তোমার পুত্র বৃষসেনকে বধ করব। তুমি যেভাবে যথোচিত মনে করো সেভাবে কর্তব্য সম্পন্ন করো; তোমার উপর মহাভয় এসে পড়েছে।
Verse 213
दृष्टवा दुर्योधनो मन्दो भृशं तप्स्यति पातितम् | 'ओ मूढ़! तुझ अपवित्र बुद्धिवाले अत्यन्त घमंडी सहायकको युद्धस्थलमें धराशायी हुआ देखकर मूर्ख दुर्योधनको भी बड़ा पश्चात्ताप होगा
সঞ্জয় বললেন—রণক্ষেত্রে পতিত সেই অশুচি-বুদ্ধিসম্পন্ন, অতিশয় অহংকারী সহায়কে দেখে মূঢ় দুর্যোধনও প্রবল অনুতাপে দগ্ধ হবে; সে অত্যন্ত কাতর হবে।
Verse 226
महान् सुतुमुल: शब्दो बभूव रथिनां तदा । इस प्रकार अर्जुनके द्वारा कर्णपुत्र वृषसेनके वधकी प्रतिज्ञा होनेपर उस समय वहाँ रथियोंका महान् एवं भयंकर कोलाहल छा गया
তখন রথীদের মধ্যে মহা ও অতিভয়ংকর গর্জন উঠল। অর্জুন কর্ণপুত্র বৃষসেনকে বধ করার প্রতিজ্ঞা করতেই সেখানে রথীদের ঘোর কোলাহল ছেয়ে গেল।
Verse 243
तीर्णप्रतिज्ञं बीभत्सुं परिष्वज्यैनमब्रवीत् । राजन! तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णने प्रतिज्ञासे पार होकर युद्धके मुहानेपर खड़े हुए अर्जुनको हृदयसे लगाकर इस प्रकार कहा--
প্রতিজ্ঞা পূর্ণ করা বিভৎসু অর্জুনকে বুকে জড়িয়ে ভগবান শ্রীকৃষ্ণ বললেন। রাজন, তারপর প্রতিজ্ঞার কঠিন পরীক্ষা অতিক্রম করে যুদ্ধের সম্মুখভাগে দাঁড়ানো অর্জুনকে হৃদয়ে টেনে নিয়ে তিনি এইভাবে কথা বললেন—
Verse 256
दिष्टया विनिहतः पापो वृद्धक्षत्र: सहात्मज: । “विजयशील अर्जुन! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुमने अपनी बड़ी भारी प्रतिज्ञा पूरी कर ली। सौभाग्यसे पापी वृद्धक्षत्र पुत्रसहित मारा गया
সৌভাগ্যক্রমে পাপী বৃদ্ধক্ষত্র পুত্রসহ নিহত হয়েছে। হে বিজয়শীল অর্জুন, এ মহাসৌভাগ্য যে তুমি তোমার কঠিন প্রতিজ্ঞা পূর্ণ করেছ।
Verse 263
सीदेत समरे जिष्णो नात्र कार्या विचारणा | “भारत! दुर्योधनकी सेनामें पहुँचकर समरभूमिमें देवताओंकी सेना भी शिथिल हो सकती है। जिष्णो! इस विषयमें कोई दूसरा विचार नहीं करना चाहिये
হে জিষ্ণু, সমরে শিথিলতা আসতে পারে—এতে আর বিচার নেই। হে ভারত, দুর্যোধনের সেনার মুখোমুখি হয়ে রণভূমিতে দেবতাদের সেনাও ঢিলে পড়তে পারে; হে জিষ্ণু, এ বিষয়ে দ্বিতীয় চিন্তা করো না।
Verse 273
त्वदृते पुरुषव्याप्र य एतद् योधयेद् बलम् | 'पुरुषसिंह! मैं बहुत सोचनेपर भी तीनों लोकोंमें कहीं तुम्हारे सिवा किसी दूसरे पुरुषको ऐसा नहीं देखता, जो इस सेनाके साथ युद्ध कर सके
হে পুরুষব্যাঘ্র! তোমাকে ছাড়া কে এই সেনার সঙ্গে যুদ্ধ করতে পারে? অনেক ভেবে দেখেও তিন লোকের কোথাও তোমার ব্যতীত এমন কোনো পুরুষকে আমি দেখি না, যে এই বাহিনীর বিরুদ্ধে দাঁড়িয়ে যুদ্ধ করতে সক্ষম।
Verse 303
यादृशं कृतवानद्य त्वमेक: शत्रुतापन: । 'युद्धमें कोई भी ऐसा पराक्रम नहीं कर सकता, जैसा कि आज तुमने अकेले ही कर दिखाया है। वास्तवमें तुम शत्रुओंको संताप देनेवाले हो
সঞ্জয় বললেন—হে শত্রুতাপন! আজ তুমি একাই যে কীর্তি সাধন করেছ, যুদ্ধক্ষেত্রে তেমন পরাক্রম আর কেউ দেখাতে পারে না। সত্যই তুমি শত্রুদের দহন-যন্ত্রণা দাও।
Verse 473
अपदविद्धैर्बभौ भूमिगग्रहैद्यौरिव शारदी । बहुत-से अनुकर्ष
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—হে ভারতশ্রেষ্ঠ! যুদ্ধক্ষেত্র সর্বত্র ছড়িয়ে থাকা অসংখ্য অস্ত্র-শস্ত্র ও সামগ্রীতে দীপ্তিমান; যেন শরৎকালের আকাশ নক্ষত্রে ঝলমল করে। টানার দড়ি, উপাসঙ্গ, পতাকা ও ধ্বজ, সাজসজ্জার উপকরণ, আসন, দণ্ড, বাঁধনরজ্জু, ভাঙা চাকা, বিচিত্র অক্ষ, নানা প্রকার জোয়াল, লাগাম-রশি, ধনুক-বাণ; হাতিদের রঙিন ঝুল, পিঠের গালিচা; পরিঘ, অঙ্কুশ, শক্তি, ভিন্দিপাল, তূণীর, শূল, কুঠার, প্রাস, তোমর, কুন্ত, দণ্ড, শতঘ্নী, ভুশুণ্ডী, খড়্গ, পরশু, মুসল, মুদ্গর, গদা প্রভৃতি; সোনার চাবুক, গজরাজের ঘণ্টা, নানা হৌদা ও জীন, মালা, বিচিত্র অলংকার ও মূল্যবান বস্ত্র—সবই ছড়িয়ে আছে।
Verse 503
तांक्ष बाणहतान् वीर पश्य निष्टनत: क्षितौ । वीर! देखो
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—হে বীর! দেখো, বাণবিদ্ধ হয়ে সেই হাতিগুলি মাটিতে কাতরাতে কাতরাতে পড়ে আছে। পর্বতশিখরের মতো উঁচু, ঐরাবতের ন্যায় প্রতাপশালী তারা অস্ত্রঘাতে সৃষ্ট ক্ষতছিদ্র থেকে ক্রমে ক্রমে অধিক রক্তধারা ঝরাচ্ছে—যেমন পর্বত গুহামুখ থেকে গেরুমিশ্রিত লালচে জলধারা প্রবাহিত করে। বাণে বিদ্ধ হয়ে তারা ভূমিতে গড়াগড়ি দিচ্ছে।
Verse 2036
तांश्व सर्वान् हनिष्यामि सत्येनायुधमालभे । “दूसरे भी जो राजा अपनी बुद्धिपर मोह छा जानेके कारण मेरे समीप आ जायाँगे, उन सबका संहार कर डालूँगा। इस सत्यको सामने रखकर मैं अपना धनुष छूता (शपथ खाता) हूँ
সঞ্জয় বললেন—“আমি তাদের সকলকে বধ করব। আর যে অন্য রাজারা মোহাচ্ছন্ন বুদ্ধিতে আমার নিকট আসবে, তাদেরও সর্বনাশ করব। এই সত্যকে সামনে রেখে আমি অস্ত্র (ধনুক) স্পর্শ করে শপথ করছি।”
Verse 3236
प्रतिज्ञेयं मया तीर्णा विबुधैरपि दुस्तरा । तब अर्जुनने उनकी बातोंका उत्तर देते हुए कहा--“माधव! आपकी कृपासे मैं इस प्रतिज्ञाकों पार कर सका हूँ; अन्यथा इसका पार पाना देवताओंके लिये भी कठिन था
সঞ্জয় বললেন—অর্জুন উত্তর দিল—“মাধব! আপনার কৃপায় আমি এই প্রতিজ্ঞার পার হতে পেরেছি; নচেৎ দেবতাদের পক্ষেও এর পার হওয়া দুরূহ।”
The implicit dilemma concerns how a warrior should respond when combat shifts from conventional norms to perception-disrupting tactics (māyā): whether steadfast duty permits escalation, and how to preserve discernment and proportionality amid fear-inducing spectacle.
The chapter underscores disciplined perception and composure: when reality is contested by illusion and panic, steadiness (dhairya) and methodical response become practical virtues that stabilize both individual agency and collective morale.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is archival and didactic—Sañjaya’s forensic detailing models how the epic frames war as both event-record and ethical case-study within the broader mokṣa-oriented reflection of the Mahābhārata.
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