
द्रोणकर्णयोः निशि संप्रहारः — Night Engagement with Droṇa and Karṇa
Upa-parva: Rātri-yuddha (Night Battle) Episode within Droṇa-parva
Saṃjaya reports that, seeing his troops routed, Duryodhana becomes intensely agitated and confronts Karṇa and Droṇa with pointed speech, invoking earlier assurances of victory and framing their present posture as insufficient. Stung by his rebuke, the two senior warriors surge into action against the Pandava-aligned fighters (including Śaineya/Sātyaki and allied Somakas), producing heavy pressure on the Pañcāla contingent. The scene shifts into a night battle: darkness and dust obscure identification; torches (pradīpāḥ/ulkāḥ) become moving beacons that attract concentrated attacks; combatants recognize one another by shouted names and gotras. The Pandava side experiences fragmentation and flight, while Kṛṣṇa addresses Arjuna, urging coordinated resistance and reassurance of the army. Bhīma advances with allied forces to help restore the line. The chapter closes with the nocturnal melee intensifying across both sides, emphasizing tactical disorientation and the psychological volatility of night warfare.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र, भूरिश्रवा के वध के बाद भी युद्ध की ज्वाला शांत न होने पर, संजय से पूछते हैं—उस क्षण के बाद रण कैसे फिर भड़क उठा? → भूरिश्रवा के परलोकगमन के पश्चात अर्जुन का रथ फिर जयद्रथ की ओर मुड़ता है; अर्जुन कृष्ण से घोड़ों को उसी दिशा में हाँकने को कहता है जहाँ ‘राजा जयद्रथ’ खड़ा है। उधर कौरव-पक्ष में जयद्रथ-रक्षा का संकल्प कठोर होता जाता है—कर्ण को युद्ध-काल का स्मरण कराकर अर्जुन से जयद्रथ को बचाने हेतु अपना पराक्रम दिखाने को उकसाया जाता है। कौरव महारथी रथ-समूहों से मोर्चा बाँधते हैं और रणभूमि में घेराबंदी, प्रतिघेराबंदी का जाल फैलता है। → अर्जुन समस्त योद्धाओं के देखते-देखते अपने ‘पाणिलाघव’ का प्रदर्शन करते हुए बाण-वर्षा से शत्रु-पंक्तियों को ढक देता है; कर्ण भी शरजाल में मोहित होकर कर्तव्य-विमूढ़-सा हो जाता है, उसके घोड़े और सारथी मारे जाते हैं और वह रथहीन हो पड़ता है—क्षण भर को कौरव-रक्षा की धुरी डगमगाती है। → अश्वत्थामा कर्ण को रथ पर बैठाकर पुनः अर्जुन के साथ युद्ध में उतार देता है; कौरव-सेना के श्रेष्ठ महारथी संगठित होकर मोर्चा सँभालते हैं। रण में हाथी-घोड़े गिरते हैं, ध्वज-छत्र-चामर और शिर कटकर बिखरते हैं—पर जयद्रथ तक पहुँचने का अर्जुन का वेग अभी रोका नहीं गया, केवल टाल दिया गया है। → कर्ण के पुनः रथस्थ होते ही अर्जुन के मार्ग में नई दीवार खड़ी होती है—अब जयद्रथ-रक्षा का घेरा टूटेगा या सूर्यास्त से पहले अर्जुन की प्रतिज्ञा संकट में पड़ेगी?
Verse 1
धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! उस अवस्थामें कुरुवंशी भूरिश्रवाके मारे जानेपर पुनः: जिस प्रकार युद्ध हुआ, वह मुझे बताओ
ধৃতরাষ্ট্র জিজ্ঞাসা করলেন—সঞ্জয়, সেই অবস্থায় কুরুবংশীয় ভূরিশ্রবা নিহত হওয়ার পর আবার যুদ্ধ কীভাবে শুরু হল এবং কোন রীতিতে তা চলল, আমাকে বলো।
Verse 2
संजय उवाच भूरिश्रवसि संक्रान्ते परलोकाय भारत । वासुदेवं महाबाहुरर्जुन: समचूचुदत्,संजयने कहा--भारत! भूरिश्रवाके परलोकगामी हो जानेपर महाबाहु अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णको प्रेरित करते हुए कहा--
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত, ভূরিশ্রবা পরলোকে গমন করলে মহাবাহু অর্জুন বাসুদেবকে (শ্রীকৃষ্ণকে) প্রেরণা দিয়ে বলল—
Verse 3
चोदयाश्वान् भृशं कृष्ण यतो राजा जयद्रथ: । श्रूयते पुण्डरीकाक्ष त्रिषु धर्मेषु वर्तते
সঞ্জয় বললেন—হে কৃষ্ণ! যেখানে রাজা জয়দ্রথ দাঁড়িয়ে আছে, সেই দিকেই দ্রুত ঘোড়াগুলিকে তাড়াও। হে পদ্মনয়ন! শোনা যায়, এই মুহূর্তে সে ত্রিধর্মের সীমার মধ্যে অবস্থান করছে।
Verse 4
प्रतिज्ञां सफलां चापि कर्तुमहसि मेडनघ । अस्तमेति महाबाहो त्वरमाणो दिवाकर:
সঞ্জয় বললেন—হে নিষ্পাপ! আমার প্রতিজ্ঞা সফল করা তোমারই কর্তব্য। হে মহাবাহু! সূর্য দ্রুত অস্তের দিকে ধাবিত হচ্ছে।
Verse 5
एतद्धि पुरुषव्यात्र महदशभ्युद्यंतं मया । कार्य संरक्ष्यते चैष कुरुसेनामहारथै:,'पुरुषसिंह! मैंने यह बहुत बड़े कार्यके लिये उद्योग आरम्भ किया है। कौरव-सेनाके महारथी इस जयद्रथकी रक्षा कर रहे हैं
সঞ্জয় বললেন—হে পুরুষব্যাঘ্র! আমি এক মহৎ ও দুরূহ কর্মে উদ্যোগী হয়েছি; আর এই কর্মেই কুরুসেনার মহারথীরা জয়দ্রথকে রক্ষা করছে।
Verse 6
तथा नाभ्येति सूर्योडस्तं यथा सत्यं भवेद् वच: । चोदयाश्वांस्तथा कृष्ण यथा हन्यां जयद्रथम्
হে কৃষ্ণ! সূর্য অস্ত না যাওয়া পর্যন্ত—যেন আমার বাক্য সত্য হয় এবং আমি জয়দ্রথকে বধ করতে পারি—সেইভাবে দ্রুত ঘোড়াগুলিকে তাড়াও।
Verse 7
ततः कृष्णो महाबाहू रजतप्रतिमान् हयान् । हयज्ञश्नोदयामास जयद्रथवध्ध॑ प्रति,तब अभश्वविद्याके ज्ञाता महाबाहु श्रीकृष्णने जयद्रथको मारनेके उद्देश्स्से उसकी ओर चाँदीके समान श्वेत घोड़ोंको हाँका
তখন মহাবাহু, অশ্ববিদ্যায় পারদর্শী শ্রীকৃষ্ণ জয়দ্রথ-বধের সংকল্পে রূপার মতো শুভ্র ঘোড়াগুলিকে সেই দিকেই তাড়ালেন।
Verse 8
त॑ प्रयान््तममोधघेषुमुत्पतद्धिरिवाशुगै: । त्वरमाणा महाराज सेनामुख्या: समाद्रवन्
মহারাজ! যাঁর বাণ কখনও বৃথা যায় না, সেই অর্জুনকে ধনুক থেকে ছুটে যাওয়া তীরের মতো বেগে উড়ন্ত অশ্বসমূহে চড়ে জয়দ্রথের দিকে অগ্রসর হতে দেখে কৌরবসেনার প্রধান প্রধান বীরেরা তৎক্ষণাৎ প্রবল বেগে ধেয়ে এল।
Verse 9
दुर्योधनश्व कर्णश्र वृषसेनो5थ मद्रराट् । अश्वत्थामा कृपश्चैव स्वयमेव च सैन्धव:,दुर्योधन, कर्ण, वृषसेन, मद्रराज शल्य, अअश्वत्थामा, कृपाचार्य और स्वयं सिंधुराज जयद्रथ--ये सभी युद्धके लिये डट गये
দুর্যোধন, কর্ণ, বৃষসেন, মদ্ররাজ শল্য, অশ্বত্থামা, কৃপাচার্য এবং স্বয়ং সিন্ধুরাজ জয়দ্রথ—এ সকলেই যুদ্ধের জন্য দৃঢ়সংকল্পে স্থির হয়ে দাঁড়াল।
Verse 10
समासाद्य च बीभत्सु: सैन्धवं समुपस्थितम् । नेत्राभ्यां क्रोधदीप्ताभ्यां सम्प्रैक्षन्निर्दहज्िव
সামনে উপস্থিত সিন্ধুরাজকে পেয়ে অর্জুন (বীভৎসু) ক্রোধে দীপ্ত নয়নে তাকে এমনভাবে চেয়ে দেখল, যেন দৃষ্টিতেই তাকে দগ্ধ করে ভস্ম করে দেবে।
Verse 11
ततो दुर्योधनो राजा राधेयं त्वरितो<ब्रवीत् । अर्जुन प्रेक्ष्य संयातं जयद्रथवर्ध॑ प्रति,तब राजा दुर्योधनने अर्जुनको जयद्रथको मारनेके लिये उसकी ओर जाते देख तुरंत ही राधापुत्र कर्णसे कहा--
তখন রাজা দুর্যোধন অর্জুনকে জয়দ্রথ-বধের উদ্দেশ্যে অগ্রসর হতে দেখে তৎক্ষণাৎ রাধেয় কর্ণকে বলল।
Verse 12
अयं स वैकर्तन युद्धकालो विदर्शयस्वात्मबलं महात्मन् | यथा न वध्येत रणे<र्जुनेन जयद्रथ: कर्ण तथा कुरुष्व
হে সূর্যপুত্র! এই তো সেই যুদ্ধক্ষণ উপস্থিত। মহাত্মন্, এখন তোমার স্ববল প্রদর্শন করো। কর্ণ! রণক্ষেত্রে অর্জুনের হাতে যেন জয়দ্রথ নিহত না হয়—তেমনই ব্যবস্থা করো।
Verse 13
अल्पावशेषो दिवसो नृवीर विघातयस्वाद्य रिपुं शरौचै: । दिनक्षयं प्राप्य नरप्रवीर ध्रुवो हि न: कर्ण जयो भविष्यति
সঞ্জয় বললেন—হে নরবীর, দিনের অল্পই অবশিষ্ট। আজ তীরবৃষ্টিতে শত্রুকে আঘাত করে তার অগ্রগতি রুদ্ধ করো। হে শ্রেষ্ঠ যোদ্ধা কর্ণ, দিনান্তে আমাদের জয় নিশ্চয়ই হবে।
Verse 14
सैन्धवे रक्ष्यमाणे तु सूर्यस्यास्तमन प्रति । मिथ्याप्रतिज्ञ: कौन्तेयः प्रवेक्ष्यति हुताशनम्,'सूर्यास्त होनेतक यदि सिंधुराज सुरक्षित रहे तो प्रतिज्ञा झूठी होनेके कारण अर्जुन अग्निमें प्रवेश कर जायँगे
সঞ্জয় বললেন—যদি সূর্যাস্ত পর্যন্ত সিন্ধুরাজকে রক্ষা করা যায়, তবে প্রতিজ্ঞা মিথ্যা হওয়ায় কুন্তীপুত্র অর্জুন অগ্নিতে প্রবেশ করবে।
Verse 15
अनर्जुनायां च भुवि मुहूर्तमपि मानद । जीवितुं नोत्सहेरन् वै भ्रातरो5स्य सहानुगा:,“मानद! फिर अर्जुनरहित भूतलपर उनके भाई और अनुगामी सेवक दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकते
সঞ্জয় বললেন—হে মানদ, এই পৃথিবীতে অর্জুন না থাকলে তার ভ্রাতারা ও তাদের অনুগামীরা এক মুহূর্তও বাঁচতে সাহস করবে না।
Verse 16
विनष्टै: पाण्डवेयैश्न सशैलवनकाननाम् | वसुंधरामिमां कर्ण भोक्ष्यामो हतकण्टकाम्,“कर्ण! पाण्डवोंके नष्ट हो जानेपर हमलोग पर्वत, वन और काननोंसहित इस निष्कण्टक वसुधाका राज्य भोगेंगे
সঞ্জয় বললেন—হে কর্ণ, পাণ্ডবেরা বিনষ্ট হলে আমরা পর্বত, বন ও কাননসহ এই ‘কণ্টকমুক্ত’ পৃথিবীর রাজ্য ভোগ করব।
Verse 17
दैवेनोपहत: पार्थो विपरीतश्च मानद । कार्याकार्यमजानान: प्रतिज्ञां कृतवान् रणे
সঞ্জয় বললেন—হে মানদ, দৈবাঘাতে পার্থের বুদ্ধি বিপরীত হয়ে গিয়েছিল; তাই কর্তব্য-অকর্তব্য না ভেবে রণক্ষেত্রে জয়দ্রথ-বধের প্রতিজ্ঞা করেছিল। তারপর যুগান্তের মেঘগর্জনের মতো ধ্বনিত, মহেন্দ্রের ধনুর সম মহান গাণ্ডীবকে সে বাহুবলে টেনে ধরল; উচ্চহাস্যে অগ্রসর হয়ে তোমাদের যোদ্ধাদের দগ্ধ করতে লাগল—যমের রাজ্য বৃদ্ধি করতে লাগল।
Verse 18
नूनमात्मविनाशाय पाण्डवेन किरीटिना । प्रतिज्ञेयं कृता कर्ण जयद्रथवर्ध॑ प्रति,“कर्ण! निश्चय ही किरीटधारी पाण्डव अर्जुनने अपने ही विनाशके लिये जयद्रथ-वधकी यह प्रतिज्ञा कर डाली है
সঞ্জয় বললেন—হে কর্ণ! নিশ্চিতই মুকুটধারী পাণ্ডব অর্জুন যেন নিজেরই বিনাশ ডেকে আনতে জয়দ্রথ-বধের এই প্রতিজ্ঞা করেছে।
Verse 19
कथं जीवति दुर्धर्षे त्वयि राधेय फाल्गुन: । अनस्तंगत आदित्ये हन्यात् सैन्धवककं नृपम्,'राधानन्दन! तुम-जैसे दुर्धर्ष वीरके जीते-जी अर्जुन सिंधुराजको सूर्यास्त होनेसे पहले ही कैसे मार सकेंगे?
সঞ্জয় বললেন—হে রাধেয়! তোমার মতো দুর্ধর্ষ বীর জীবিত থাকতে ফাল্গুন অর্জুন কীভাবে সূর্যাস্তের আগে সিন্ধুরাজ জয়দ্রথকে বধ করবে?
Verse 20
रक्षितं मद्रराजेन कृपेण च महात्मना । जयद्रथं रणमुखे कथं हन्याद् धनंजय:,“मद्रराज शल्य और महामना कृपाचार्यसे सुरक्षित हुए जयद्रथको अर्जुन युद्धके मुहानेपर कैसे मार सकेंगे?
সঞ্জয় বললেন—মদ্ররাজ শল্য ও মহাত্মা কৃপাচার্যের দ্বারা রণমুখে রক্ষিত জয়দ্রথকে ধনঞ্জয় অর্জুন কীভাবে বধ করবে?
Verse 21
द्रौणिना रक्ष्यमाणं च मया दुःशासनेन च । कथं प्राप्स्यति बीभत्सु: सैन्धवं कालचोदितः
সঞ্জয় বললেন—দ্রৌণি অশ্বত্থামা, আমি এবং দুঃশাসন যাকে রক্ষা করছি, সেই সাইন্ধব জয়দ্রথের কাছে কালপ্রেরিত ভীভৎসু অর্জুন কীভাবে পৌঁছবে?
Verse 22
“मैं, दःशासन तथा अभश्वत्थामा जिनकी रक्षा कर रहे हैं, उन सिंधुराज जयद्रथको अर्जुन कैसे प्राप्त कर सकेंगे? जान पड़ता है कि वे कालसे प्रेरित हो रहे हैं ।।
সঞ্জয় বললেন—আমি, দুঃশাসন ও দ্রৌণি অশ্বত্থামা যাকে রক্ষা করছি, সেই সাইন্ধব জয়দ্রথের কাছে কালপ্রেরিত পার্থ অর্জুন কীভাবে পৌঁছবে? হে মানদ! বহু বীর যুদ্ধরত, আর সূর্যও ঢলে পড়ছে; তাই আমার আশঙ্কা, পার্থ সময়মতো জয়দ্রথের কাছে পৌঁছতে পারবে না।
Verse 23
स त्वं कर्ण मया सार्थ शूरैश्नान्यैर्महारथै: । द्रौणिना त्वं हि सहितो मद्रेशेन कृपेण च
সঞ্জয় বললেন—হে কর্ণ! তুমি আমার সঙ্গে এবং অন্যান্য বীর মহারথীদের সঙ্গে ছিলে; আর দ্রৌণি (অশ্বত্থামা), মদ্ররাজ ও কৃপাচার্যও নিশ্চয়ই তোমার সহিত ছিলেন।
Verse 24
एवमुक्तस्तु राधेयस्तव पुत्रेण मारिष
সঞ্জয় বললেন—হে মান্যবর! তোমার পুত্র এভাবে বললে রাধেয় (কর্ণ) উত্তর দিলেন।
Verse 25
दुर्योधनमिदं वाक्य प्रत्युवाच कुरूत्तमम् । आर्य! आपके पुत्रके ऐसा कहनेपर राधानन्दन कर्णने कुरुश्रेष्ठ दुर्योधनसे इस प्रकार कहा-- || २४ $ || दृढलक्ष्येण वीरेण भीमसेनेन धन्विना
সঞ্জয় বললেন—রাধানন্দন কর্ণ কুরুশ্রেষ্ঠ দুর্যোধনকে এই কথা বললেন—“হে মানদ! দৃঢ় লক্ষ্যসম্পন্ন বীর ধনুর্ধর ভীমসেন যুদ্ধক্ষেত্রে তীরবৃষ্টিতে বারবার আমার দেহকে ভীষণভাবে ক্ষতবিক্ষত করেছে। ‘আমাকে স্থির দাঁড়াতে হবে, পালাতে নয়’—এই সংকল্পেই আমি এখনো রণভূমিতে অবস্থান করছি।”
Verse 26
भृशं भिन्नतनु: संख्ये शरजालैरनेकश: । स्थातव्यमिति तिष्ठामि रणे सम्प्रति मानद
“হে মানদ! যুদ্ধের ঘোরে তীরসমূহের আঘাতে বহুবার আমার দেহ ভীষণভাবে বিদীর্ণ হয়েছে; তবু ‘আমাকে দাঁড়িয়ে থাকতে হবে’—এই ভাবনায় আমি এখন রণে স্থির আছি।”
Verse 27
नाड़मिड्गति किंचिन्मे संतप्तस्य महेषुभि: । योत्स्यामि तु यथाशक्त्या त्वदर्थ जीवितं मम
“এখন আমার দগ্ধ দেহের কোনো অঙ্গই যেন সামান্যও সাড়া দিচ্ছে না। মহাবাণের দাহে আমি জ্বলছি; তবু যথাশক্তি যুদ্ধ করব, কারণ আমার জীবন তোমারই জন্য।”
Verse 28
यथा पाण्डवमुख्योडसौ न हनिष्यति सैन्धवम् । न हि मे युध्यमानस्य सायकानस्यत: शितान्
সঞ্জয় বললেন—“এভাবে পাণ্ডবদের শ্রেষ্ঠ সেই (অর্জুন) সৈন্ধবকে বধ করতে পারবে না। কারণ আমি যুদ্ধ করতে করতে তীক্ষ্ণ শর নিক্ষেপ করছি; আমার থাকতে তা ঘটতে দেব না।”
Verse 29
यत्तु भक्तिमता कार्य सततं हितकाड्क्षिणा
সঞ্জয় বললেন—“কিন্তু ভক্তিভরে, এবং যে সদা প্রকৃত কল্যাণ কামনা করে, তার যা করা কর্তব্য…”
Verse 30
सैन्धवार्थ परं यत्नं करिष्याम्यद्य संयुगे
সঞ্জয় বললেন—“সৈন্ধব (জয়দ্রথ)-এর জন্য আজ রণক্ষেত্রে আমি সর্বোচ্চ প্রচেষ্টা করব।”
Verse 31
अद्य योत्स्येडर्जुनमहं पौरुष॑ स्वं व्यपाश्रित:
সঞ্জয় বললেন—“আজ আমি নিজের পৌরুষের শক্তির উপর নির্ভর করে অর্জুনের সঙ্গে যুদ্ধ করব।”
Verse 32
अद्य युद्ध कुरुश्रेष्ठ मम पार्थस्य चोभयो:
সঞ্জয় বললেন—“আজ, হে কুরুশ্রেষ্ঠ! যুদ্ধ হবে—আমার পক্ষ থেকেও এবং পার্থের পক্ষ থেকেও।”
Verse 33
कर्णकौरवयोरेवं रणे सम्भाषमाणयो:
সঞ্জয় বললেন—রণক্ষেত্রে কর্ণ ও কৌরবেরা এইভাবে কথোপকথন করতেই যুদ্ধের ধর্মসঙ্কটময় প্রবাহ এগিয়ে চলল; যেখানে অস্ত্র উত্থিত থাকলেও উপদেশ, আনুগত্য ও উচ্চাকাঙ্ক্ষা পরস্পরের সঙ্গে সংঘর্ষে লিপ্ত থাকে।
Verse 34
चिच्छेद निशितैर्बाणै: शूराणामनिवर्तिनाम्
সঞ্জয় বললেন—তীক্ষ্ণ বাণে সে পিছু না-হটা বীরদের ছিন্নভিন্ন করে ফেলল; যুদ্ধধর্মের নির্মমতার মধ্যে তাদের উগ্র অগ্রযাত্রা থামিয়ে দিল।
Verse 35
भुजान् परिघसंकाशान् हस्तिहस्तोपमान् रणे । उन्होंने तीखे बाणोंसे रणभूमिमें कभी पीठ न दिखानेवाले शूरवीरोंकी परिघके समान सुदृढ़ तथा हाथीकी सूँड़के समान मोटी भुजाओंको काट डाला ।।
সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধে সে কখনও পিঠ না-দেখানো বীরদের গদার মতো দৃঢ়, হাতির শুঁড়ের মতো ভারী বাহুগুলি তীক্ষ্ণ বাণে কেটে ফেলল; আর মহাবাহু যোদ্ধাদের মস্তকও ধারালো শর দিয়ে ছিন্ন করল। এ-ই ক্ষাত্রধর্মের ভয়ংকর নীতি—অটল সাহস প্রশংসিত, কিন্তু কর্তব্যের মূল্য প্রকাশ পায় দেহচ্ছেদে।
Verse 36
शोणिताक्तान् हयारोहान् गृहीतप्रासतोमरान्
সঞ্জয় বললেন—সে রক্তমাখা অশ্বারোহীদের দেখল, যাদের হাতে বর্শা ও তোमर ছিল। আহত হয়েও তারা অস্ত্রধারী ও উদ্যত—এতে যুদ্ধের ভয়াবহ নিকটতা এবং হিংসার নৈতিক মূল্য প্রকাশ পায়।
Verse 37
हया वारणमुख्याश्च प्रापतन्त समन्तत:
সঞ্জয় বললেন—চারদিক থেকে শ্রেষ্ঠ অশ্ব ও অগ্রগণ্য গজেরা বেগে ঝাঁপিয়ে পড়ল। যুদ্ধের গতি আরও সঙ্কুচিত ও তীব্র হলো, আর যোদ্ধাদের সংকল্প কঠিন হয়ে নিরন্তর আক্রমণে পরিণত হল।
Verse 38
कक्षमग्निरिवोद्धूत: प्रदहंस्तव वाहिनीम्
সঞ্জয় বললেন—যেমন অরণ্যে লাগা আগুন হঠাৎ প্রবল হয়ে উঠলে চারদিকে ছড়িয়ে পড়ে, তেমনই সে তোমার সেনাবাহিনীকে সর্বদিক থেকে দগ্ধ করে গ্রাস করছিল।
Verse 39
हतभूयिष्ठयोधं तत् कृत्वा तव बल॑ बली
সঞ্জয় বললেন—সেই পরাক্রমী তোমার সেনাকে এমন অবস্থায় নামিয়ে আনল যে অধিকাংশ যোদ্ধাই নিহত; যুদ্ধবিধ্বংসের ভারী ফলসহ তোমার বাহিনীকে সে এভাবে করল।
Verse 40
बीभत्सुर्भीमसेनेन सात्वतेन च रक्षित:
সঞ্জয় বললেন—বীভৎসু অর্জুনকে ভীমসেন এবং সাত্বত (শ্রীকৃষ্ণ) রক্ষা করছিলেন; ভয়ংকর রণক্ষেত্রে সে তাদের আশ্রয়ে অবিচল দাঁড়িয়ে ছিল।
Verse 41
त॑ तथावस्थितं दृष्टवा त्वदीया वीर्यसम्पदा
সঞ্জয় বললেন—তাকে সেইভাবে অচল দাঁড়িয়ে থাকতে দেখে, তোমার যোদ্ধারা নিজেদের বীর্য-সম্পদের ভরসায় রণক্ষেত্রের কঠোর নিয়ম মেনে তার দিকে ধেয়ে গেল।
Verse 42
दुर्योधनश्व कर्णश्र वृषसेनो5थ मद्रराट्
সঞ্জয় বললেন—দুর্যোধন ও কর্ণ, বৃষসেন এবং মদ্ররাজ শল্য, অশ্বত্থামা ও কৃপাচার্য, আর স্বয়ং সিন্ধুরাজ জয়দ্রথ—এরা সকলেই জয়দ্রথের রক্ষার্থে সজ্জিত হয়ে, মুকুটধারী অর্জুনকে চারদিক থেকে ঘিরে ফেলল।
Verse 43
अश्वत्थामा कृपश्चैव स्वयमेव च सैन्धव: । संनद्धा: सैन्धवस्यार्थे समावृण्वन् किरीटिनम्
সঞ্জয় বললেন—অশ্বত্থামা, কৃপাচার্য এবং স্বয়ং সৈন্ধব (জয়দ্রথ) যুদ্ধের জন্য সজ্জিত হয়ে, সৈন্ধবকে রক্ষা করার উদ্দেশ্যে, মুকুটধারী অর্জুনকে চারদিক থেকে ঘিরে ফেলল।
Verse 44
नृत्यन्तं रथमार्गेषु धनुज्यातलनिःस्वनै: । संग्रामकोविदं पार्थ सर्वे युद्धविशारदा:
সঞ্জয় বললেন—ধনুর্জ্যার টংকার-ধ্বনিতে রথপথে সে যেন নৃত্য করতে করতে অগ্রসর হচ্ছিল। যুদ্ধবিশারদ সকল যোদ্ধাই পার্থকে সমরের কৌশলে অতুলনীয় বলে দেখল।
Verse 45
सैन्धवं पृष्ठतः कृत्वा जिघांसन्तो<च्युतार्जुनौ
সঞ্জয় বললেন—সৈন্ধবকে পেছনে রেখে, অচ্যুত ও অর্জুন তাকে বধ করার সংকল্পে অগ্রসর হলেন।
Verse 46
ते भुजैभोगिभोगाभेर्थनूंष्यानम्य सायकान्
সঞ্জয় বললেন—সাপের কুণ্ডলীর মতো বাহু দিয়ে তারা ধনুক বাঁকিয়ে তীর সংযত করল।
Verse 47
मुमुचु: सूर्यरश्म्याभान् शतश: फाल्गुनं प्रति । उन कौरव-सैनिकोंने सर्पके शरीरके समान प्रतीत होनेवाली अपनी भुजाओंद्वारा धनुषोंको नवाकर अर्जुनपर सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले सैकड़ों बाण छोड़े ।।
সঞ্জয় বললেন—তারা ফাল্গুন (অর্জুন)-এর দিকে সূর্যরশ্মির মতো দীপ্ত শত শত তীর নিক্ষেপ করল। তখন যুদ্ধোন্মত্ত মুকুটধারী বীর সেই ধাবমান তীরসমূহ প্রত্যক্ষ করল।
Verse 48
द्विधा त्रिधाष्टथैकैकं छित्त्वा विव्याध तान् रथान् । तदनन्तर रणदुर्मद किरीटधारी अर्जुनने उन छोड़े गये बाणोंमेंसे प्रत्येकके दो-दो, तीन- तीन और आठ-आठ टुकड़े करके उन रथियोंको भी घायल कर दिया ।।
সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধের উন্মত্ত বেগে মত্ত, মুকুটধারী অর্জুন নিক্ষিপ্ত তীরগুলিকে একে একে দ্বিখণ্ড, ত্রিখণ্ড এবং অষ্টখণ্ড করে কেটে দিলেন; তারপর সেই রথীদেরও বিদ্ধ করে আহত করলেন। এদিকে সিংহলাঙ্গূলকেতু নিজের বীর্য প্রদর্শন করতে করতে যুদ্ধক্রীড়া অব্যাহত রাখল।
Verse 49
स विद्ध्वा दशभि: पार्थ वासुदेव॑ च सप्तभि:
সে পার্থকে দশটি তীরে এবং বাসুদেবকে সাতটি তীরে বিদ্ধ করে, পুনরায় যুদ্ধে আরও তীব্রভাবে আক্রমণ চালাল।
Verse 50
अथैनं कौरवश्रेष्ठा: सर्व एव महारथा:
তখন কৌরবদের সকল শ্রেষ্ঠ মহারথী সমরে একযোগে তার দিকে ধেয়ে এল।
Verse 51
महता रथवंशेन सर्वतः प्रत्यवारयन् । तत्पश्चात् कौरव-सेनाके सभी श्रेष्ठ महारथियोंने विशाल रथसमूहके द्वारा कृपाचार्यको सब ओरसे घेर लिया ।। ५० ई || विस्फारयन्तश्नापानि विसृजन्तश्न सायकान्
তারা বিরাট রথসমূহ দিয়ে তাকে সর্বদিক থেকে প্রতিহত করল। তারপর কৌরবসেনার শ্রেষ্ঠ মহারথীরা ধনুকের টংকার তুলে ও তীরবর্ষণ করতে করতে কৃপাচার্যকে চারদিক থেকে রথবেষ্টনীতে ঘিরে ফেলল।
Verse 52
सैन्धवं पर्यरक्षन्त शासनात् तनयस्य ते | वे आपके पुत्रकी आज्ञासे धनुष खींचते और बाण छोड़ते हुए वहाँ जयद्रथकी सब ओरसे रक्षा करने लगे ।। ततः पार्थस्य शूरस्य बाह्दोर्बलमदृश्यत
তোমার পুত্রের আদেশে তারা ধনুক টেনে তীর ছুড়ে চারদিক থেকে সৈন্ধব জয়দ্রথকে রক্ষা করতে লাগল। তখন বীর পার্থের বাহুবল প্রকাশিত হয়ে উঠল।
Verse 53
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य द्रौणे: शारद्वतस्य च
সঞ্জয় বললেন: অস্ত্রে অস্ত্র প্রতিহত করে তারা দ্রোণপুত্র ও শারদ্বতের আক্রমণও রোধ করল—যুদ্ধের কোলাহলে সংযত শক্তি দিয়ে শক্তির মোকাবিলা করে।
Verse 54
तं॑ द्रौणि: पञचविंशत्या वृषसेनश्न सप्तभि:
সঞ্জয় বললেন: দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা তাকে পঁচিশটি বাণে এবং বৃষসেন সাতটি বাণে বিদ্ধ করল—একাগ্র শরবর্ষায় যুদ্ধের চাপ আরও তীব্র হলো।
Verse 55
त एनमभिगर्जन्तो विध्यन्तश्न पुनः पुन:
সঞ্জয় বললেন: ক্রোধে গর্জন করতে করতে তারা তাকে বারবার বিদ্ধ করল—যুদ্ধের নির্মমতার এক ছবি, যেখানে বীরোৎসাহ বারংবার, অমানবিক আঘাতে রূপ নেয়।
Verse 56
श्लिष्ट च सर्वतश्नक्रू रथमण्डलमाशु ते
সঞ্জয় বললেন: তারপর তারা দ্রুত চারদিক থেকে ঘেঁষে এক ঘন রথ-মণ্ডল গড়ে তুলল—নিজেদের রক্ষা করতে এবং শত্রুকে চেপে ধরতে এই ঘেরাও-ব্যূহ।
Verse 57
त एनमभिनर्दन्तो विधुन्वाना धनूंषि च
সঞ্জয় বললেন: তারা উচ্চস্বরে গর্জন করে ধনুক ঝাঁকিয়ে-তুলে ধরল—শত্রুকে ভীত করতে এবং নিজেদের মনোবল দৃঢ় করতে এই উগ্র প্রদর্শন, যুদ্ধের নৈতিক চাপের মাঝেও।
Verse 58
ते महास्त्राणि दिव्यानि तत्र राजन् व्यदर्शयन्
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, সেখানে তারা সেই মহাদিব্য অস্ত্রসমূহ প্রদর্শন করল।
Verse 59
हतभूयिष्ठयोधं तत् कृत्वा तव बल॑ बली
সঞ্জয় বললেন—সেই পরাক্রমী তোমার সেনাকে, যার অধিকাংশ যোদ্ধা নিহত, এমন অবস্থায় পরিণত করল।
Verse 60
तं कर्ण: संयुगे राजन् प्रत्यवारयदाशुगै:
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, যুদ্ধে কর্ণ দ্রুতগামী তীক্ষ্ণ বাণে তাকে প্রতিহত করে পিছিয়ে দিল।
Verse 61
त॑ पार्थों दशभिर्बाणै: प्रत्यविध्यद् रणाजिरे
সঞ্জয় বললেন—রণাঙ্গনে পার্থ পাল্টা আঘাতে তাকে দশটি বাণে বিদ্ধ করল।
Verse 62
सात्वतश्ष त्रिभिर्बाणै: कर्ण विव्याध मारिष
সঞ্জয় বললেন—তখন সাত্বত বীর, হে মারিষ, কর্ণকে তিনটি বাণে বিদ্ধ করল।
Verse 63
भीमसेनस्टत्रिभिश्वैव पुनः पार्थश्च॒ सप्तभि: । माननीय नरेश! तदनन्तर सात्यकिने तीन बाणोंसे कर्णको वेध दिया, फिर भीमसेनने भी उसे तीन बाण मारे और अर्जुनने पुनः सात बाणोंसे कर्णको घायल कर दिया ।।
সঞ্জয় বললেন—মাননীয় রাজন! তারপর সাত্যকি কর্ণকে তিনটি শর দিয়ে বিদ্ধ করল; ভীমসেনও তাকে তিনটি শর মারল; আর পার্থ (অর্জুন) পুনরায় সাতটি শর দিয়ে কর্ণকে আহত করলেন। তখন মহারথী কর্ণ প্রত্যুত্তরে তাদের প্রত্যেককে ষাটটি করে শর দিয়ে বিদ্ধ করল।
Verse 64
तद् युद्धमभवद् राजन् कर्णस्य बहुभि: सह । तब महारथी कर्णने उन तीनोंको साठ-साठ बाण मारकर बदला चुकाया। राजन! कर्णका वह युद्ध अनेक वीरोंके साथ हो रहा था ।। ६३ $ ।। तत्राद्भुतमपश्याम सूतपुत्रस्य मारिष
সঞ্জয় বললেন—রাজন! কর্ণের সেই যুদ্ধ বহু বীরের সঙ্গে একসঙ্গে চলছিল। হে মান্যজন! সেখানে আমরা সূতপুত্রের আশ্চর্য পরাক্রম দেখলাম।
Verse 65
यदेक: समरे क्रुद्धस्त्रीन् रथान् पर्यवारयत् । आर्य! वहाँ हमने सूतपुत्रका अद्भुत पराक्रम देखा कि समरभूमिमें कुपित होकर उसने अकेले ही तीन-तीन महारथियोंको रोक दिया था ।।
হে আর্য! সেখানে আমরা সূতপুত্রের আশ্চর্য বীরত্ব দেখলাম—সমরে ক্রুদ্ধ হয়ে সে একাই তিনটি রথকে রোধ করল।
Verse 66
रुधिरोक्षितसर्वाड्ि: सूतपुत्र: प्रतापवान्
প্রতাপশালী সূতপুত্র কর্ণের সর্বাঙ্গ রক্তে সিক্ত ছিল; তবু সেই বীর রণক্ষেত্রে ক্ষিপ্রতা দেখিয়ে পঞ্চাশটি শর দিয়ে অর্জুনকেও আহত করল।
Verse 67
शरै: पञ्चाशता वीर: फाल्गुनं प्रत्यविध्यत । तस्य तल्लाघवं दृष्टवा नामृष्यत रणेडर्जुन:
সেই বীর পঞ্চাশটি শর দিয়ে ফাল্গুন (অর্জুন)কে বিদ্ধ করল। রণক্ষেত্রে তার সেই ক্ষিপ্রতা দেখে অর্জুন সহ্য করতে পারলেন না।
Verse 68
ततः पार्थो धनुश्कछित्त्वा विव्याधैनं स्तनान्तरे । सायकैर्नवभिरर्वीरस्त्वरमाणो धनंजय:,तदनन्तर कुन्तीकुमार वीर धनंजयने कर्णका धनुष काटकर बड़ी उतावलीके साथ उसकी छातीमें नौ बाणोंका प्रहार किया
তখন কুন্তীপুত্র বীর ধনঞ্জয় (অর্জুন) কর্ণের ধনুক কেটে দিয়ে তৎক্ষণাৎ তার বক্ষস্থলে নয়টি শর নিক্ষেপ করলেন।
Verse 69
अथान्यद् धनुरादाय सूतपुत्र: प्रतापवान् | सायकैरष्टसाहस्नैश्छादयामास पाण्डवम्,तब प्रतापी सूतपुत्रने दूसरा धनुष हाथमें लेकर आठ हजार बाणोंसे पाण्डुपुत्र अर्जुनको ढक दिया
তখন প্রতাপশালী সূতপুত্র কর্ণ অন্য এক ধনুক হাতে নিয়ে আট হাজার শর দিয়ে পাণ্ডুপুত্র অর্জুনকে আচ্ছাদিত করলেন।
Verse 70
तां बाणवृष्टिमतुलां कर्णचापसमुत्थिताम् | व्यधमत् सायकै: पार्थ: शलभानिव मारुत:
কর্ণের ধনুক থেকে নির্গত সেই অতুল বাণবৃষ্টি অর্জুন নিজের শর দিয়ে তেমনই ছিন্নভিন্ন করলেন, যেমন বায়ু পঙ্গপালের ঝাঁক উড়িয়ে দেয়।
Verse 71
छादयामास च तदा सायकैरर्जुनो रणे । पश्यतां सर्वयोधानां दर्शयन् पाणिलाघवम्
এরপর রণক্ষেত্রে সকল যোদ্ধার দৃষ্টির সামনে, হাতের অতুল দ্রুততা প্রদর্শন করে অর্জুন তৎক্ষণাৎ বাণে কর্ণকেও আচ্ছাদিত করলেন।
Verse 72
वधार्थ चास्य समरे सायकं सूर्यवर्चसम् । चिक्षेप त्वरया युक्तस्त्वराकाले धनंजय:
তারপর ত্বরার সময় ত্বরিত ধনঞ্জয় (অর্জুন) সমরে সূতপুত্র কর্ণকে বধ করার উদ্দেশ্যে সূর্যসম তেজস্বী এক শর নিক্ষেপ করলেন।
Verse 73
तमापततन्तं वेगेन द्रौणिश्चविच्छेद सायकम् । अर्धचन्द्रेण तीक्ष्णेन स च्छिन्न: प्रापतद् भुवि,उस बाणको वेगपूर्वक आते देख अभश्वत्थामाने तीखे अर्धचन्द्रसे बीचमें ही काट दिया। कटकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा
তীরটি প্রবল বেগে ধেয়ে আসতে দেখে দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা তীক্ষ্ণ অর্ধচন্দ্রাকার শরে আকাশেই তাকে ছিন্ন করল। ছিন্ন হয়ে সেই অস্ত্র ভূমিতে পতিত হল।
Verse 74
कर्णो5पि द्विषतां हन्ता छादयामास फाल्गुनम् | सायकैर्बहुसाहस्रै: कृतप्रतिकृतेप्सया
শত্রুনিধন কর্ণও, নিজের উপর করা আঘাতের প্রতিশোধ নিতে উদ্গ্রীব হয়ে, বহু সহস্র শরে পুনরায় ফাল্গুন (অর্জুন)-কে আচ্ছাদিত করল।
Verse 75
तौ वृषाविव नर्दन्तौ नरसिंहौ महारथौ । सायकैस्तु प्रतिच्छन्न॑ चक्रतु: खमजिद्दागै:ः,वे दोनों पुरुषसिंह महारथी दो साँड़ोंके समान हँकड़ते हुए अपने सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा आकाशको आच्छादित करने लगे
সেই দুই মহারথী, নরসিংহসম, দুই ষাঁড়ের মতো গর্জন করতে করতে, বক্রতা-হীন দ্রুতগামী শরে আকাশকে আচ্ছাদিত করতে লাগল।
Verse 76
अदृश्यौ च शरौघैस्तौ निघ्नन्तावितरेतरम् | कर्ण पार्थोडस्मि तिष्ठ त्वं कर्णो5हं तिष्ठ फाल्गुन
শরবৃষ্টিতে নিজেদের আচ্ছাদিত করে তারা পরস্পরকে আঘাত করতে করতে অদৃশ্যপ্রায় হয়ে গেল; আর একে অপরকে ডেকে বলল—“কর্ণ! স্থির থাক, আমি পার্থ।” “ফাল্গুন! স্থির থাক, আমি কর্ণ।”
Verse 77
इत्येवं तर्जयन्तौ तौ वाक्शल्यैस्तुदतां तदा । युध्येतां समरे वीरौ चित्र लघु च सुष्ठुच
এইভাবে পরস্পরকে তর্জন-গর্জন করে, বাক্যরূপ শল্যে একে অপরকে বিদ্ধ করতে করতে, সেই দুই বীর রণক্ষেত্রে দ্রুত, সুশোভিত ও বিচিত্র ভঙ্গিতে যুদ্ধ করতে লাগল।
Verse 78
प्रेक्षणीयां चाभवतां सर्वयोधसमागमे । प्रशस्यमानौ समरे सिद्धचारणपन्नगै:
সঞ্জয় বললেন—সমস্ত যোদ্ধাদের সেই মহাসমাবেশে তারা দু’জনই দর্শনীয় হয়ে উঠল। ঘোর সমরে সিদ্ধ, চারণ ও পন্নগগণ তাদের বীর্য্যের প্রশংসা করছিল।
Verse 79
ततो दुर्योधनो राजंस्तावकानभ्यभाषत
সঞ্জয় বললেন—তখন রাজা দুর্যোধন নিজের সৈন্যদের বললেন—“বীরগণ, রাধাপুত্র কর্ণকে সর্বযত্নে রক্ষা করো। অর্জুনকে বধ না করে সে রণক্ষেত্র থেকে ফিরবে না; কারণ সে আমাকে এই প্রতিজ্ঞাই করেছে।”
Verse 80
यत्नाद् रक्षत राधेयं नाहत्वा समरेअ<र्जुनम् । निवर्तिष्यति राधेय इति मामुक्तवान् वृष:
সঞ্জয় বললেন—“হে রাজন, ‘রাধেয়কে সর্বযত্নে রক্ষা করো। সমরে অর্জুনকে বধ না করে রাধেয় সরে দাঁড়াবে না’—এ কথা বৃষ (কর্ণ) আমাকে বলেছিল।”
Verse 81
एतस्मिन्नन्तरे राजन् दृष्टवा कर्णस्य विक्रमम् | आकर्णममुक्तैरिषुभि: कर्णस्य चतुरो हयान्
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! সেই সময় কর্ণের বিক্রম দেখে শ্বেতবাহন অর্জুন ধনুক কর্ণপর্যন্ত টেনে ছোড়া বাণে কর্ণের চার ঘোড়াকে নিপাত করল।
Verse 82
अनयत् प्रेतलोकाय चतुर्भि: श्वेतवाहन: । सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत्
সঞ্জয় বললেন—তখন শ্বেতবাহন অর্জুন চারটি বাণে কর্ণের চার ঘোড়াকে প্রেতলোকে পাঠাল, আর এক তীক্ষ্ণ ভল্লে তার সারথিকে রথাসন থেকে নিচে ফেলে দিল, হে রাজন।
Verse 83
छादयामास स शरैस्तव पुत्रस्य पश्यत: । संछाद्यमान: समरे हताश्चो हतसारथि:
সঞ্জয় বললেন: তোমার পুত্রের চোখের সামনেই সে বাণবৃষ্টিতে সেই বীরকে আচ্ছাদিত করল। যুদ্ধে বাণে ঘেরা পড়ে সে হতাশ হয়ে দাঁড়াল; তার সারথি নিহত, শক্তি ভগ্ন।
Verse 84
"५५४ 407-#495 #॥ त॑ तथा विरथं दृष्टवा रथमारोप्य तं॑ तदा
সঞ্জয় বললেন: তাকে এভাবে রথহীন দেখে তারা তাকে তুলে রথে বসাল। যুদ্ধের কোলাহলে এটাই ধর্ম—বিপন্ন সঙ্গীকে ত্যাগ না করা, যাতে যোদ্ধার যুদ্ধক্ষমতা অটুট থাকে।
Verse 85
मद्रराजश्न॒ कौन्तेयमविध्यत् त्रिंशता शरै:
সঞ্জয় বললেন: মদ্ররাজ শল্য কৌন্তেয় অর্জুনকে ত্রিশটি বাণে বিদ্ধ করল।
Verse 86
शारद्वतस्तु विंशत्या वासुदेवं समार्पयत् । धनंजयं द्वादशशभिराजघान शिलीमुखै:
সঞ্জয় বললেন: শারদ্বত কৃপ বসুদেব শ্রীকৃষ্ণের দিকে বিশটি বাণ নিক্ষেপ করল, আর ধনঞ্জয় অর্জুনকে বারোটি তীক্ষ্ণ শিলীমুখে আঘাত করল।
Verse 87
मद्रराज शल्यने कुन्तीकुमार अर्जुनको तीस बाणोंसे घायल कर दिया। कृपाचार्यने भगवान् श्रीकृष्णको बीस बाण मारे और अर्जुनपर बारह बाणोंका प्रहार किया ।।
সঞ্জয় বললেন: মদ্ররাজ শল্য কুন্তীপুত্র অর্জুনকে ত্রিশ বাণে আহত করল। কৃপাচার্য বসুদেব শ্রীকৃষ্ণকে বিশ বাণে বিদ্ধ করলেন এবং অর্জুনের উপরও বারো বাণ নিক্ষেপ করলেন। তারপর, মহারাজ, সিন্ধুরাজ চারটি এবং বৃষসেন সাতটি বাণে শ্রীকৃষ্ণ ও পাণ্ডব অর্জুনকে পৃথক পৃথকভাবে আঘাত করল।
Verse 88
तथैव तानू प्रत्यविध्यत् कुन्तीपुत्रो धनंजय: । द्रोणपुत्रं चतुःषष्ट्या मद्रराजं शतेन च
তদ্রূপেই কুন্তীপুত্র ধনঞ্জয় অর্জুনও তাদের তীরে বিদ্ধ করে প্রতিশোধ নিলেন। তিনি দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামাকে চৌষট্টি এবং মদ্ররাজ শল্যকে একশো শর দ্বারা আঘাত করলেন।
Verse 89
सैन्धवं दशभिर्बाणैर्वुषसेन त्रिभि: शरै: । शारद्वतं च विंशत्या विद्ध्वा पार्थो ननाद ह
পার্থ অর্জুন সিন্ধুরাজ জয়দ্রথকে দশটি বাণে, বৃষসেনকে তিনটি শরে এবং শারদ্বত কৃপকে বিশটি বাণে বিদ্ধ করলেন। এভাবে আঘাত করে তিনি সিংহনাদ করলেন।
Verse 90
ते प्रतिज्ञाप्रतीघातमिच्छन्त: सव्यसाचिन: । सहितास्तावकास्तूर्णमभिपेतुर्धन॑ंजयम्,यह देख सव्यसाची अर्जुनकी प्रतिज्ञाको भंग करनेकी अभिलाषासे आपके वे सभी सैनिक एक साथ संगठित हो तुरंत उनपर टूट पड़े
সব্যসাচী অর্জুনের প্রতিজ্ঞা ভঙ্গ করতে ইচ্ছুক হয়ে তোমাদের সকল যোদ্ধা একত্রিত হয়ে দ্রুত ধনঞ্জয়ের ওপর ঝাঁপিয়ে পড়ল।
Verse 91
अथार्जुन: सर्वतो वारुणास्त्रं प्रादुश्षक्रे त्रासयन् धार्तराष्ट्रान् | त॑ प्रत्युदीयु: कुरव: पाण्डुपुत्रं रथैर्महाहैं: शरवर्षाण्यवर्षन्
তখন অর্জুন চারদিকে ধৃতরাষ্ট্রপুত্রদের ভীত করে বারুণাস্ত্র প্রকাশ করলেন। তার প্রতিউত্তরে কুরুসেনা মহারথে চড়ে পাণ্ডুপুত্রের দিকে এগিয়ে এসে তার ওপর তীরবৃষ্টি বর্ষণ করতে লাগল।
Verse 92
ततस्तु तस्मिंस्तुमुले समुत्थिते सुदारुणे भारत मोहनीये । नोमुहात प्राप्य स राजपुत्र: किरीटमाली व्यसृजच्छरौघान्
হে ভারত! সেই ভয়ংকর ও বিভ্রান্তিকর তুমুল যুদ্ধ উঠলেও কিরীটধারী রাজপুত্র অর্জুন এক মুহূর্তও বিমূঢ় হলেন না। তিনি অবিরাম তীরসমূহের বৃষ্টি বর্ষণ করতে লাগলেন।
Verse 93
राज्यप्रेप्सु: सव्यसाची कुरूणां स्मरन् क्लेशान् द्वादशवर्षवृत्तान् । गाण्डीवमुक्तैरिषुभिमहात्मा सर्वा दिशो व्यावृणोदप्रमेय:
সঞ্জয় বললেন—নিজ ন্যায্য রাজ্য পুনরুদ্ধারের আকাঙ্ক্ষায় সব্যসাচী অর্জুন কৌরবদের দেওয়া ক্লেশ এবং বারো বছরের বনবাসের দুঃখ স্মরণ করলেন। সেই স্মৃতিতে উদ্দীপ্ত হয়ে মহাত্মা, অপরিমেয় বীর গাণ্ডীব থেকে নিক্ষিপ্ত শরবৃষ্টিতে সর্বদিক আচ্ছন্ন করে দিলেন।
Verse 94
प्रदीप्तोल्कमभवच्चान्तरिक्ष॑ मृतेषु देहेष्वपपतन् वयांसि । यत् पिड्जनलज्येन किरीटमाली क्रुद्धो रिपूनाजगवेन हन्ति
সঞ্জয় বললেন—আকাশে বহু উল্কা জ্বলে উঠল, আর নিহতদের দেহের উপর মাংসাশী পাখিরা ঝাঁপিয়ে পড়ল; কারণ সেই সময় ক্রোধে দগ্ধ কিরীটধারী অর্জুন পীতবর্ণ প্রত্যঞ্চাযুক্ত গাণ্ডীব দিয়ে শত্রুদের নিধন করছিলেন।
Verse 95
ततः किरीटी महता महायशा: शरासनेनास्थ शराननीकजित् । हयप्रवेकोत्तमनागधूर्गतान् कुरुप्रवीरानिषुभिव्यपातयत्
সঞ্জয় বললেন—তারপর মহাযশস্বী কিরীটধারী অর্জুন, শত্রুসেনা-জয়ী, মহাধনুক হাতে নিয়ে শরবৃষ্টি করলেন এবং উৎকৃষ্ট অশ্বারূঢ় ও শ্রেষ্ঠ গজারূঢ় প্রধান কৌরব বীরদের নিপাত করলেন।
Verse 96
गदाश्न गुर्वी: परिघानयस्मया- नसींक्ष॒ शक्ती क्ष रणे नराधिपा: । महान्ति शस्त्राणि च भीमदर्शना: प्रगृह् पार्थ सहसाभिदुद्रुवु:
সঞ্জয় বললেন—সেই রণক্ষেত্রে ভয়ংকর দর্শন বহু নৃপতি ভারী গদা, লৌহপরিঘ, তরবারি, শক্তি ও অন্যান্য মহাশস্ত্র হাতে নিয়ে পার্থ অর্জুনের উপর হঠাৎ ঝাঁপিয়ে পড়ল।
Verse 98
तब यमराजके राज्यकी वृद्धि करनेवाले अर्जुनने प्रलयकालके मेघोंके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाले तथा इन्द्रधनुषके समान प्रतीत होनेवाले विशाल गाण्डीव धनुषको हँसते हुए दोनों हाथोंसे खींचा और आपके सैनिकोंको दग्ध करते हुए वे बड़े वेगसे आगे बढ़े ।।
সঞ্জয় বললেন—যমরাজ্যের বৃদ্ধি সাধনকারী সেই বীর মহাধনুর্ধর অর্জুন হাসতে হাসতে উভয় বাহুতে বিশাল গাণ্ডীব টানলেন; তার ধ্বনি প্রলয়কালের মেঘগর্জনের মতো গভীর, আর তার বক্রতা ইন্দ্রধনুর ন্যায় প্রতীয়মান। তারপর প্রবল বেগে অগ্রসর হয়ে তিনি রথী, গজারূঢ় ও পদাতিকদলকে যুদ্ধে এমন অবস্থায় ফেললেন যে তাদের অস্ত্রও রইল না, প্রাণও রইল না—এভাবে মৃত্যুর রাজ্য বৃদ্ধি পেল।
Verse 145
महाधनुर्धर वीर अर्जुनने रथ, हाथी और पैदल-समूहोंसहित उन कौरव-सैनिकोंको प्रचण्ड गतिसे आगे बढ़ते देख उनके सम्पूर्ण आयुधों और जीवनको भी नष्ट करके उन्हें यमराजके राज्यकी वृद्धि करनेवाला बना दिया ।।
সঞ্জয় বললেন— মহাধনুর্ধর বীর অর্জুন কৌরবসৈন্যকে রথ, গজ ও পদাতিকদলের সঙ্গে প্রচণ্ড বেগে অগ্রসর হতে দেখে তাদের সমস্ত অস্ত্র ভেঙে দিলেন এবং প্রাণও হরণ করলেন—এইভাবে যমরাজের রাজ্য বৃদ্ধি পেল। এইরূপে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বান্তর্গত জয়দ্রথবধপর্বে সংকুলযুদ্ধ-বিষয়ক একশো পঁয়তাল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 236
युध्यस्व यत्नमास्थाय पर पार्थेन संयुगे | “कर्ण! तुम मेरे, अश्वत्थामाके, मद्रराज शल्यके, कृपाचार्यके तथा अन्य शूरवीर महारथियोंके साथ पूरा प्रयत्न करके रणक्षेत्रमें अर्जुनके साथ युद्ध करो”
সঞ্জয় বললেন— “যুদ্ধে পার্থ (অর্জুন)-এর বিরুদ্ধে সর্বশক্তি ও দৃঢ় সংকল্প নিয়ে যুদ্ধ কর। কর্ণ! তুমি আমার, অশ্বত্থামা, মদ্ররাজ শল্য, কৃপাচার্য এবং অন্যান্য শূর মহারথীদের সঙ্গে সম্পূর্ণ প্রচেষ্টায় রণক্ষেত্রে অর্জুনের সঙ্গে যুদ্ধ কর।”
Verse 283
सैन्धवं प्राप्स्ते वीर: सव्यसाची धनंजय: । 'पाण्डवोंके प्रधान वीर अर्जुन जैसे भी किसी तरह सिंधुराजको नहीं मार सकेंगे
সঞ্জয় বললেন— “বীর সব্যসাচী ধনঞ্জয় অর্জুন সিন্ধুরাজের কাছে পৌঁছবেই। কিন্তু আমি এমন চেষ্টা করব যাতে পাণ্ডবদের প্রধান বীর অর্জুন কোনোভাবেই সিন্ধুরাজকে বধ করতে না পারে। যতক্ষণ আমি যুদ্ধে তৎপর হয়ে তীক্ষ্ণ বাণ নিক্ষেপ করে যাব, ততক্ষণ বীর সব্যসাচী ধনঞ্জয় সিন্ধুরাজের নাগাল পাবে না।”
Verse 296
तत् करिष्यामि कौरव्य जयो दैवे प्रतिष्ठित: । “कुरुनन्दन! सदा मित्रका हित चाहनेवाले भक्तिमान् पुरुषको जो कार्य करना चाहिये, वह मैं करूँगा। विजयकी प्राप्ति तो दैवके अधीन है
সঞ্জয় বললেন— “হে কৌরবনন্দন! যা করা উচিত, আমি তাই করব; কিন্তু জয় দैবের উপর প্রতিষ্ঠিত। মিত্রের মঙ্গলকামী ভক্তিমান পুরুষের যে কর্তব্য, তা আমি সম্পূর্ণ করব; তবে জয়-পরাজয় দैবাধীন।”
Verse 306
त्वत्प्रियार्थ महाराज जयो दैवे प्रतिष्ठित: । “महाराज! आज युद्धस्थलमें आपका प्रिय करनेके लिये मैं सिंधुराजकी रक्षाके निमित्त पूरा प्रयत्न करूँगा। विजय तो दैवके अधीन है
সঞ্জয় বললেন— “মহারাজ! আপনার প্রিয়ার্থে আজ রণক্ষেত্রে সিন্ধুরাজের রক্ষার জন্য আমি সর্বশক্তি দিয়ে চেষ্টা করব; কিন্তু জয় দैবের উপর প্রতিষ্ঠিত।”
Verse 316
त्वदर्थे पुरुषव्याप्र जयो दैवे प्रतिष्ठित: । 'पुरुषसिंह! आज मैं अपने पुरुषार्थका भरोसा करके तुम्हारे हितके लिये अर्जुनके साथ युद्ध करूँगा। विजयकी प्राप्ति तो दैवके अधीन है
সঞ্জয় বললেন— হে পুরুষসিংহ! তোমার কল্যাণের জন্য আমি নিজের পুরুষার্থের ভরসায় অর্জুনের সঙ্গে যুদ্ধ করব; কিন্তু জয়ের প্রাপ্তি তো দैবের অধীন।
Verse 326
पश्यन्तु सर्वसैन्यानि दारुणं लोमहर्षणम् | “कुरुश्रेष्ठ आज सारी सेनाएँ मेरे और अर्जुन दोनोंके भयंकर एवं रोमांचकारी युद्धको देखें!
হে কুরুশ্রেষ্ঠ! আজ সমস্ত সেনাদল আমার ও অর্জুন—উভয়ের ভয়ংকর, রোমাঞ্চকর যুদ্ধ দেখুক।
Verse 336
अर्जुनो निशितैर्बाणैर्जघान तव वाहिनीम् । जब रफक्षेत्रमें कर्ण और दुर्योधन इस तरह वार्तालाप कर रहे थे, उस समय अर्जुनने अपने पैने बाणोंद्वारा आपकी सेनाका संहार आरम्भ किया
সঞ্জয় বললেন— রণক্ষেত্রে কর্ণ ও দুর্যোধন এভাবে কথোপকথন করছিল, ঠিক তখনই অর্জুন তার ধারালো বাণে আপনার সেনার বিনাশ আরম্ভ করল।
Verse 353
हस्तिहस्तान् हयग्रीवान् रथाक्षांश्ष समन्ततः । महाबाहु अर्जुने सब ओर अपने तीखे बाणोंसे शत्रुओंके मस्तक, हाथियोंके शुण्डदण्डों, घोड़ोंकी गर्दनों तथा रथके धुरोंको भी खण्डित कर दिया
সঞ্জয় বললেন— মহাবাহু অর্জুন চারদিকে তার তীক্ষ্ণ বাণে শত্রুদের মস্তক, হাতিদের শুঁড়, ঘোড়াদের গ্রীবা এবং রথের জোয়াল-অক্ষ পর্যন্ত খণ্ডিত করে দিল।
Verse 363
क्षुरैश्रविच्छेद बीभत्सुर्द्धिधैकैकं त्रिधेव च अर्जुनने हाथोंमें प्रास और तोमर लिये खूनसे रँँगे हुए घुड़सवारोंमेंसे प्रत्येकके अपने छुरोंद्वारा दो-दो और तीन-तीन टुकड़े कर डाले
সঞ্জয় বললেন— ভীভৎসু অর্জুন প্রাস ও তোমরধারী রক্তসিক্ত অশ্বারোহীদের প্রত্যেককে তার ধারালো ক্ষুরে দু’টুকরো, এমনকি তিন টুকরো করে কেটে ফেলল।
Verse 383
अचिरेण महीं पार्थश्च॒कार रुधिरोत्तराम् । जैसे प्रचण्ड अग्नि घास-फ़ूसके जंगलको जला डालती है, उसी प्रकार अर्जुनने आपकी सेनाको दग्ध करते हुए थोड़ी ही देरमें वहाँकी भूमिको रक्तसे आप्लावित कर दिया
সঞ্জয় বললেন—অল্প সময়ের মধ্যেই পার্থ (অর্জুন) সেই ভূমিকে রক্তে প্লাবিত করে দিলেন। যেমন প্রচণ্ড অগ্নি শুকনো ঘাস-ঝোপের বন দগ্ধ করে ফেলে, তেমনই তিনি আপনার সেনাকে দহন করতে করতে দ্রুত সেখানে পৃথিবীকে শোণিতে ভাসিয়ে দিলেন।
Verse 393
आससाद दुराधर्ष: सैन्धवं सत्यविक्रम: । सत्यपराक्रमी, बलवान एवं दुर्धर्ष वीर अर्जुनने आपकी सेनाके अधिकांश योद्धाओंको मारकर सिंधुराजपर आक्रमण किया
সঞ্জয় বললেন—সত্যপরাক্রমী, বলবান ও দুর্ধর্ষ অর্জুন আপনার সেনার অধিকাংশ যোদ্ধাকে নিধন করে সিন্ধুরাজ (জয়দ্রথ)-এর দিকে অগ্রসর হয়ে যুদ্ধে তার উপর আক্রমণ চালালেন।
Verse 403
प्रबभौ भरतश्रेष्ठ ज्वलन्निव हुताशन: । भरतश्रेष्ठ] भीमसेन और सात्यकिसे सुरक्षित अर्जुन उस समय प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे
সঞ্জয় বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! ভীমসেন ও সাত্যকির দ্বারা রক্ষিত অর্জুন তখন জ্বলন্ত অগ্নির মতো দীপ্ত হয়ে উঠেছিলেন।
Verse 416
नामृष्यन्त महेष्वासा: पाण्डवं पुरुषर्षभा: । अर्जुनको इस प्रकार बल-पराक्रमकी सम्पत्तिसे युक्त होकर युद्धके लिये डटा हुआ देख आपकी सेनाके श्रेष्ठ पुरुष एवं महाधनुर्धर वीर सहन न कर सके
সঞ্জয় বললেন—অর্জুনকে এভাবে বল-পরাক্রমে সমৃদ্ধ হয়ে যুদ্ধের জন্য দৃঢ়ভাবে দাঁড়িয়ে থাকতে দেখে আপনার সেনার শ্রেষ্ঠ পুরুষ ও মহাধনুর্ধর বীরেরা তা সহ্য করতে পারল না।
Verse 446
अभीताः: पर्यवर्तन्त व्यादितास्यमिवान्तकम् । उस समय युद्धकुशल कुन्तीकुमार धनुषकी टंकार करते हुए रथके मार्गोपर नाच रहे थे और मुँह बाये हुए यमराजके समान भयंकर जान पढ़ते थे। उन्हें युद्धविशारद समस्त कौरव-महारथियोंने निर्भय हो चारों ओरसे घेर लिया
সঞ্জয় বললেন—তারা নির্ভয়ে বারবার ঘুরে ফিরে আসছিল, যেন হাঁ করা মুখের অন্তক (মৃত্যু) স্বয়ং। তখন যুদ্ধকুশল কুন্তীপুত্রেরা ধনুকের টংকার তুলতে তুলতে রথপথে নৃত্যরতদের মতো চলছিল এবং যমের ন্যায় ভয়ংকর দেখাচ্ছিল। তাদের এমন দেখে সকল কৌরব মহারথী নির্ভয়ে চারদিক থেকে ঘিরে ফেলল।
Verse 456
सूर्यास्तमनमिच्छन्तो लोहितायति भास्करे । वे श्रीकृष्ण और अर्जुनको मार डालनेकी इच्छासे सिंधुराज जयद्रथको पीछे करके सूर्यास्त होनेकी इच्छा और प्रतीक्षा करने लगे। उस समय सूर्य लाल-से हो चले
সঞ্জয় বললেন— ভাস্কর যখন রক্তিম হয়ে উঠল, তখন তারা সূর্যাস্তের আকাঙ্ক্ষায় সেই ক্ষণটির অপেক্ষা করতে লাগল। সিন্ধুরাজ জয়দ্রথকে পশ্চাতে ঢাল করে রেখে, সন্ধ্যার সুযোগে শ্রীকৃষ্ণ ও অর্জুনকে বধ করার নির্মম সংকল্প তারা করল।
Verse 486
शारद्वतीसुतो राजन्नर्जुनं प्रत्यवारयत् । राजन! जिनकी ध्वजामें सिंहकी पूँछका चिह्न था, उन शारद्वतीपुत्र कृपाचार्यने अपना बल-पराक्रम दिखाते हुए अर्जुनको रोका
সঞ্জয় বললেন— হে রাজন, শারদ্বতীর পুত্র কৃপাচার্য অর্জুনকে প্রতিহত করলেন। সিংহলেজ-চিহ্নিত ধ্বজা ধারণ করে তিনি নিজের বল-পরাক্রম প্রদর্শন করে পার্থের অগ্রগতি রুদ্ধ করলেন।
Verse 493
अतिष्ठद् रथमार्गेषु सैन्धवं प्रतिपालयन् । वे दस बाणोंसे अर्जुनको और सातसे श्रीकृष्णको घायल करके रथके मार्गोपर जयद्रथकी रक्षा करते हुए खड़े थे
জয়দ্রথকে রক্ষা করতে সে রথপথগুলিতে অবস্থান করল। দশটি বাণে অর্জুনকে এবং সাতটি বাণে শ্রীকৃষ্ণকে বিদ্ধ করে, রথের পথে দাঁড়িয়ে সে জয়দ্রথের প্রহরা দিল।
Verse 526
इषूणामक्षयत्वं च धनुषो गाण्डिवस्य च । तत्पश्चात् वहाँ शूरवीर कुन्तीकुमारकी भुजाओंका बल देखा गया। उनके गाण्डीव धनुष तथा बाणोंकी अक्षयताका परिचय मिला
সেখানে কুন্তীপুত্র সেই শূরবীরের বাহুবল দেখা গেল; তাঁর গাণ্ডীব ধনু ও বাণের অক্ষয়তা প্রকাশ পেল। বাণেরও এবং গাণ্ডীবেরও অশেষ শক্তির পরিচয় মিলল।
Verse 536
एकैकं दशभिर्बाणै: सवनिव समार्पयत् । उन्होंने अश्वत्थामा तथा कृपाचार्यके अस्त्रोंका अपने अस्त्रोंद्वारा निवारण करके बारी- बारीसे उन सबको दस-दस बाण मारे
তিনি অশ্বত্থামা ও কৃপাচার্যের অস্ত্রকে নিজের অস্ত্রে প্রতিহত করে, পরে পর্যায়ক্রমে প্রত্যেককে দশটি করে বাণে বিদ্ধ করলেন।
Verse 543
दुर्योधनस्तु विंशत्या कर्णशल्यौ त्रिभिस्त्रिभि: | अश्वत्थामाने पचीस, वृषसेनने सात, दुर्योधनने बीस तथा कर्ण और शल्यने तीन-तीन बाणोंसे अर्जुनको घायल कर दिया
সঞ্জয় বললেন—দুর্যোধন বিশটি শর দিয়ে অর্জুনকে বিদ্ধ করল; বৃষসেন সাতটি দিয়ে; অশ্বত্থামা পঁচিশটি দিয়ে; আর কর্ণ ও শল্য তিন-তিনটি করে। এভাবে যুদ্ধের প্রচণ্ড চাপে কৌরব বীরেরা একত্রে একাই ধনঞ্জয়কে চারদিক থেকে আঘাত করে আহত করল।
Verse 556
विधुन्वतश्न चापानि सर्वतः प्रत्यवारयन् | वे अर्जुनको लक्ष्य करके बार-बार गरजते, उन्हें बारंबार बाणोंसे बींधते और धनुषको हिलाते हुए सब ओरसे उन्हें आगे बढ़नेसे रोकने लगे
সঞ্জয় বললেন—ধনুক কাঁপিয়ে তারা চারদিক থেকে তার অগ্রগতি রোধ করল। অর্জুনকে লক্ষ্য করে তারা বারবার গর্জে উঠল, বারবার তীরবৃষ্টিতে তাকে বিদ্ধ করল, এবং সর্বদিক থেকে এগিয়ে এসে তার অগ্রযাত্রা থামিয়ে দিল।
Verse 563
सूर्यास्तमनमिच्छन्तस्त्वरमाणा महारथा: । उन महारथियोंने सूर्यास्तकी इच्छा रखते हुए बड़ी उतावलीके साथ अपने रथसमूहको परस्पर सटाकर सब ओरसे खड़ा कर दिया
সঞ্জয় বললেন—সূর্যাস্তের প্রতীক্ষায় তাড়িত সেই মহারথীরা তাদের রথসমূহকে পরস্পর ঘনিষ্ঠ করে সব দিক থেকে দৃঢ়ভাবে অবস্থান নিল।
Verse 576
सिषिचुर्मार्गणैस्ती&णैर्गिरिं मेघा इवाम्बुभि: । जैसे बादल पर्वतशिखरपर अपने जलकी बूँदोंसे आघात करते हैं
সঞ্জয় বললেন—যেমন মেঘ পর্বতশিখরে জলধারা বর্ষণ করে আঘাত হানে, তেমনই কৌরব মহারথীরা ধনুক কাঁপিয়ে ও অর্জুনের মুখোমুখি গর্জে উঠে তার উপর তীক্ষ্ণ তীরের বৃষ্টি নামাল।
Verse 583
धनंजयस्य गात्रे तु शूरा: परिघबाहव: । राजन! परिघके समान सुदृढ़ भुजाओंवाले उन शूरवीरोंने अर्जुनके शरीरपर वहाँ बड़े- बड़े दिव्यास्त्रोंका प्रदर्शन किया
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! পরিঘের মতো দৃঢ় বাহুযুক্ত সেই শূর বীরেরা সেখানে ধনঞ্জয়ের দেহে মহৎ দিব্যাস্ত্রের প্রয়োগ ও প্রদর্শন করল।
Verse 593
आससाद दुराधर्ष: सैन्धवं सत्यविक्रम: । तथापि सत्यपराक्रमी बलवान एवं दुर्धर्ष वीर अर्जुनने आपकी सेनाके अधिकांश योद्धाओंका संहार करके सिन्धुराजपर आक्रमण किया
সঞ্জয় বললেন—অদম্য ও সত্যবিক্রম অর্জুন সিন্ধুরাজ জয়দ্রথের নিকটে গিয়ে উপস্থিত হলেন। যুদ্ধের ঘন সংঘর্ষের মধ্যেও তিনি তোমার সেনার বহু যোদ্ধাকে সংহার করে, বলবান ও দুর্ধর্ষ বীর হয়ে, নিজের ব্রত ও রণধর্মে প্রেরিত হয়ে সৈন্ধবের উপর আক্রমণ করলেন।
Verse 606
मिषतो भीमसेनस्य सात्वतस्य च भारत | राजन! भरतनन्दन! उस युद्धस्थलमें कर्णने भीमसेन और सात्यकिके देखते-देखते अपने शीघ्रगामी बाणोंद्वारा अर्जुनको आगे बढ़नेसे रोक दिया
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত, হে রাজন, ভরতনন্দন! সেই রণক্ষেত্রে ভীমসেন ও সাত্যকির চোখের সামনেই কর্ণ তার দ্রুতগামী শর দ্বারা অর্জুনের অগ্রগতি রোধ করল।
Verse 616
सूतपुत्र॑ महाबाहुः सर्वसैन्यस्य पश्यत: । तब महाबाहु अर्जुनने समरांगणमें सारी सेनाके देखते-देखते सूतपुत्र कर्णको दस बाणोंसे घायल कर दिया
সঞ্জয় বললেন—সমগ্র সেনার সামনে রণাঙ্গণে মহাবাহু অর্জুন সূতপুত্র কর্ণকে দশটি শর দিয়ে বিদ্ধ করে আহত করল।
Verse 656
सायकानां शतेनैव सर्वमर्मस्वताडयत् । उस समय महाबाहु अर्जुनने रणभूमिमें सौ बाणोंद्वारा, सूर्यपुत्र कर्णको उसके सम्पूर्ण मर्मस्थानोंमें चोट पहुँचायी
সঞ্জয় বললেন—তখন মহাবাহু অর্জুন রণভূমিতে একশোটি শর দিয়ে সূর্যপুত্র কর্ণের সমস্ত মর্মস্থানে আঘাত করল।
Verse 783
अयुध्येतां महाराज परस्परवधैषिणौ । सम्पूर्ण योद्धाओंके उस सम्मेलनमें वे दोनों दर्शनीय हो रहे थे। महाराज! समरभूमिमें सिद्ध
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! তারা দু’জনই পরস্পরের বধ কামনা করে যুদ্ধ করছিল। সমগ্র যোদ্ধাদের সেই সমাবেশে তারা দু’জনই দর্শনীয় হয়ে উঠেছিল। মহারাজ! রণভূমিতে সিদ্ধ, চারণ ও নাগদের দ্বারা প্রশংসিত হতে হতে কর্ণ ও অর্জুন একে অপরকে সংহার করতে উদ্যত হয়ে লড়াই করল।
Verse 836
मोहित: शरजालेन कर्तव्यं नाभ्यपद्यत | इतना ही नहीं
সঞ্জয় বললেন—শরজালে মোহিত হয়ে সে কী কর্তব্য তা স্থির করতে পারল না। আপনার পুত্রের চোখের সামনেই তারা কর্ণকে তীরবৃষ্টিতে আচ্ছন্ন করল; আর যখন তার অশ্ব ও সারথি নিহত হল, তখন রণাঙ্গনে তীরে ঢাকা কর্ণ সেই তীরজালের বিভ্রমে পড়ে এটুকুও বিচার করতে পারল না—এখন তার ধর্মসঙ্গত করণীয় কী।
Verse 846
अश्वत्थामा महाराज भूयो<र्जुनमयोधयत् । महाराज! कर्णको इस प्रकार रथहीन हुआ देख अश्व॒त्थामाने उस समय उसे रथपर बैठा लिया और वह पुन: अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ, অশ্বত্থামা আবার অর্জুনের সঙ্গে যুদ্ধ করলেন। কর্ণকে এভাবে রথহীন দেখে, সেই মুহূর্তে অশ্বত্থামা তাকে নিজের রথে তুলে নিলেন; এবং কর্ণও তার সঙ্গে মিলিত হয়ে পুনরায় অর্জুনের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করতে লাগল।
Verse 3736
ध्वजाश्छत्राणि चापानि चामराणि शिरांसि च | बड़े-बड़े हाथी और घोड़े सब ओर धराशायी होने लगे। ध्वज, छत्र, धनुष, चँवर तथा योद्धाओंके मस्तक कट-कटकर गिरने लगे
সঞ্জয় বললেন—ধ্বজ, ছত্র, ধনুক, চামর এবং যোদ্ধাদের মস্তক—সবই কাটা পড়ে পড়ে যেতে লাগল। চারদিকে মহাকায় হাতি ও ঘোড়া রণভূমিতে লুটিয়ে পড়তে লাগল।
The chapter frames a dilemma between honor-driven escalation (responding to rebuke with intensified assault) and responsible command restraint, made sharper by night conditions where misidentification and disproportionate harm become more likely.
It underscores that agency under pressure—especially leadership speech and decisions—can rapidly amplify collective suffering; maintaining coordination and discernment is portrayed as a stabilizing counterforce to panic and pride.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions primarily as narrative documentation and ethical illustration within the war sequence, emphasizing consequence and context rather than offering a standalone salvific recital claim.
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