
दुर्योधन-कर्ण-संवादः (Duryodhana–Karna Dialogue on Vyūha-bheda and Daiva)
Upa-parva: Droṇa-parva (War-Day Discourse on Vyūha-bheda and Daiva)
Sañjaya reports that Duryodhana, provoked by Droṇa’s earlier urging, turns his mind fully to battle yet speaks in agitation to Karṇa. He points to Arjuna (with Kṛṣṇa) breaching a formation designed by the ācārya and laments that Jayadratha has fallen despite the presence of leading warriors. Duryodhana interprets the breach as evidence of Droṇa’s partiality toward Arjuna: he suggests Droṇa ‘gave a gate’ to the favored disciple and granted Jayadratha safety, which in turn amplified destruction among the Kaurava ranks, including losses among Duryodhana’s brothers. Karṇa replies by instructing Duryodhana not to censure the teacher; he attributes the reversal to daiva (fate) rather than a failure of effort, asserting that even sustained exertion can be nullified by destiny. Karṇa broadens the argument: human beings should perform their duty without hesitation, yet success is established in daiva; he recalls prior stratagems used against the Pāṇḍavas and notes that outcomes nonetheless turned by fate. The chapter closes with Sañjaya noting the appearance of Pāṇḍava divisions and the recommencement of intense, intermingled chariot-and-elephant combat between the armies.
Chapter Arc: जयद्रथ-वध के उन्मत्त प्रवाह के बीच रणभूमि पर भारद्वाजपुत्र द्रोण लाल अश्वों से जुते रथ पर चढ़, चित्त एकाग्र कर पाण्डव-पक्ष की ओर मध्यम वेग से बढ़ते हैं—मानो स्वयं युद्ध का नियम बनकर उतर आए हों। → द्रोण, धृतराष्ट्र के ‘प्रिय-हित’ के लिए प्रतिज्ञाबद्ध होकर, चित्रपुङ्ख तीक्ष्ण बाणों से सोमक, सृञ्जय, केकय आदि पाण्डव-सहायकों को काटने लगते हैं; पाण्डव-सेना के अग्रभाग में अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा, ध्वजों का टूटना, यन्ताओं का गिरना और रथों का छिन्न-भिन्न होना घमासान को बढ़ाता है। → द्रोण ‘बृहत्क्षत्र’ को विशेष कर (कौरव-पक्ष की रक्षा/उत्साह हेतु) रण में दिव्य, सुदुर्जय ब्राह्मास्त्र का प्रादुर्भाव करते हैं; फिर अपना नाम उच्चारित कर सहस्रों बाणों से पाण्डवेयों को आच्छादित कर देते हैं—क्षण भर को युद्ध का आकाश ही शर-मेघ बन जाता है। → पाण्डव-पक्ष के अनेक वीर प्रतिरोध करते हैं—तोमर, शक्ति आदि अस्त्रों का प्रहार होता है, पर द्रोण उन्हें शिलीमुखों से काट गिराते हैं; विशेषतः चेदि-प्रधान योद्धाओं को यमलोक भेजते हुए वे कौरव-सेना के लिए मार्ग खोलते हैं और रण-तट पर अपना पराक्रम स्थिर कर देते हैं। → द्रोण की शर-वृष्टि थमती नहीं—पाण्डव-पक्ष के शेष महारथी अब किस उपाय से इस ब्राह्म-तेज की दीवार को भेदेंगे?
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्माभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिका प्रवेश और दोनों सेनाओंका घमासान युद्धविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १२४ ॥/ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ४९ श्लोक हैं।) ऑपन-माज छा अऑफि-आकऋाल-ण पजञ्चविशर्त्याधिकशततमो< ध्याय: द्रोणाचार्यके द्वारा बृहत्क्षत्र
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ, অপরাহ্নে সোমকদের সঙ্গে দ্রোণাচার্যের আবার এক মহাসংগ্রাম শুরু হলো; সেখানে মেঘগর্জনের মতো গভীর গর্জন ধ্বনিত হচ্ছিল।
Verse 2
शोणाश्वृं रथमास्थाय नरवीर: समाहित: । समरे< भ्यद्रवत् पाण्डूनू जवमास्थाय मध्यमम्,नरखवीर द्रोण लाल घोड़ोंवाले रथपर आरूढ़ हो चित्तको एकाग्र करके मध्यम वेगका आश्रय ले समरभूमिमें पाण्डवोंपर टूट पड़े
নরবীর দ্রোণ লালচে ঘোড়ায় টানা রথে আরোহণ করে, মন সংযত ও একাগ্র রেখে, মধ্যম বেগে সমরক্ষেত্রে পাণ্ডবদের দিকে ধেয়ে গেলেন।
Verse 3
तव प्रियहिते युक्तो महेष्वासो महाबल: । चित्रपुड्खै: शितैर्बाणै: कलशोत्तमसम्भव:
সঞ্জয় বললেন—রাজন! আপনার প্রিয় ও হিতসাধনে নিবিষ্ট, মহাবলী মহাধনুর্ধর, উত্তম কলশজাত দ্রোণাচার্য বিচিত্র পাখনাযুক্ত তীক্ষ্ণ বাণে সোমক, সৃঞ্জয় ও কেকয়দের নিধন আরম্ভ করলেন।
Verse 4
वरान् वरान् हि योधानां विचिन्वन्निव भारत । आक्रीडत रणे राजन् भारद्वाज: प्रतापवान्
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! রাজন! প্রতাপশালী ভারদ্বাজ (দ্রোণ) রণক্ষেত্রে যেন একে একে শ্রেষ্ঠ শ্রেষ্ঠ যোদ্ধাদের বেছে নিচ্ছেন—এমন ভঙ্গিতে যুদ্ধকে খেলনার মতো করে লড়ছিলেন।
Verse 5
तमभ्ययाद् बृहत्क्षत्र: केकयानां महारथ: । भ्रातृणां नूप पज्चानां श्रेष्ठ समरकर्कश:
সঞ্জয় বললেন—নরেশ! তখন কেকয়দের মহারথী, সমরে কঠোর, পাঁচ রাজভ্রাতার মধ্যে জ্যেষ্ঠ বৃহৎক্ষত্র দ্রোণাচার্যের সম্মুখীন হতে অগ্রসর হলেন।
Verse 6
विमुज्चन् विशिखांस्ती क्षणनाचार्य भृशमार्दयत् | महामेघो यथा वर्ष विमुञ्चन् गन्धमादने
সঞ্জয় বললেন—সে মুহূর্তে তীক্ষ্ণ বাণের বর্ষা ছেড়ে আচার্য দ্রোণকে ভীষণভাবে পীড়িত করল; যেমন গন্ধমাদন পর্বতে মহামেঘ প্রবল ধারায় বৃষ্টি ঝরায়।
Verse 7
तस्य द्रोणो महाराज स्वर्णपुड्खान् शिलाशितान् । प्रेषयामास संक़्रुद्ध: सायकान् दश पठ्च च
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! তখন দ্রোণ ক্রোধে প্রজ্বলিত হয়ে পাথরে শান দেওয়া, সোনালি পাখনাযুক্ত পনেরোটি বাণ বৃহৎক্ষত্রের দিকে নিক্ষেপ করলেন।
Verse 8
तांस्तु द्रोणविनिर्मुक्तान् क्रुद्धाशीविषसंनिभान् | एकैकं पज्चभिर्बाणैर्युधि चिच्छेद हृष्टवत्
দ্রোণাচার্যের নিক্ষিপ্ত, ক্রুদ্ধ বিষধর সাপের ন্যায় ভয়ংকর সেই বাণগুলির প্রত্যেকটিকে বृहৎক্ষত্র যুদ্ধে পাঁচ-পাঁচটি বাণে আনন্দিতচিত্তে ছিন্ন করল।
Verse 9
तदस्य लाघवं दृष्टवा प्रहस्य द्विजपुड्रव: । प्रेषयामास विशिखानष्टौ संनतपर्वण:,उनकी इस फुर्तीको देखकर विप्रवर द्रोणने हँसते हुए झुकी हुई गाँठवाले आठ बाणोंका प्रहार किया
তার এই ক্ষিপ্রতা দেখে দ্বিজশ্রেষ্ঠ দ্রোণ হেসে উঠলেন এবং বাঁকানো গাঁটযুক্ত আটটি বাণ নিক্ষেপ করলেন।
Verse 10
तान् दृष्टवा पततस्तूर्ण द्रोणचापच्युतान् शरान् । अवारयच्छरैरेव तावद्धिनिशितैमचे
দ্রোণের ধনুক থেকে ছুটে আসা সেই তীরগুলোকে দ্রুত নিজের দিকে ধেয়ে আসতে দেখে বृहৎক্ষত্র সমসংখ্যক তীক্ষ্ণ বাণে যুদ্ধক্ষেত্রে সেগুলো কেটে ফেলে দিল।
Verse 11
ततो5भवन्महाराज तव सैन्यस्य विस्मय: । बृहत्क्षत्रेण तत् कर्म कृत॑ दृष्टवा सुदुष्करम्
তখন, মহারাজ, বृहৎক্ষত্রের দ্বারা সম্পন্ন সেই অতিদুষ্কর কর্ম দেখে আপনার সেনাবাহিনী বিস্ময়ে অভিভূত হল।
Verse 12
ततो दोणो महाराज बृहत्क्षत्रं विशेषयन् । प्रादुश्चक्रे रणे दिव्यं ब्राह्ममस्त्रं सुदुर्जयम्
তখন, মহারাজ, বृहৎক্ষত্রকে অতিক্রম করে নিজের শ্রেষ্ঠত্ব প্রকাশ করতে দ্রোণ রণক্ষেত্রে অতি দুর্জয় দিব্য ব্রাহ্মাস্ত্র প্রকাশ করলেন।
Verse 13
कैकेयो<स्त्रं समालोक्य मुक्त द्रोणेन संयुगे । ब्रह्मास्त्रेणैव राजेन्द्र ब्राह्ममस्त्रमशातयत्
সঞ্জয় বললেন—হে রাজেন্দ্র! যুদ্ধের ঘোরের মধ্যে দ্রোণ কর্তৃক নিক্ষিপ্ত ব্রহ্মাস্ত্র দেখে কৈকেয়রাজ স্বীয় ব্রহ্মাস্ত্র দ্বারাই সেই ব্রহ্মাস্ত্রকে প্রশমিত করলেন।
Verse 14
ततोओस््त्रे निहते ब्राह्मे बृहत्क्षत्रस्तु भारत । विव्याध ब्राह्माणं षष्ट्या स्वर्णपुड्खै: शिलाशितै:
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! ব্রহ্মাস্ত্র নিবারিত হলে বৃহৎক্ষত্র স্বর্ণপক্ষযুক্ত, শিলায় শানিত ষাটটি শর দিয়ে সেই ব্রাহ্মণকে বিদ্ধ করল।
Verse 15
भरतनन्दन! ब्रह्मास्त्रका निवारण हो जानेपर बृहत्क्षत्रने सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सोनेके पंखोंसे युक्त साठ बाणोंद्वारा ब्राह्मण द्रोणाचार्यको वेध दिया ।।
সঞ্জয় বললেন—হে ভরতনন্দন! ব্রহ্মাস্ত্র নিবারিত হলে বৃহৎক্ষত্র শিলায় শানিত, স্বর্ণপক্ষযুক্ত ষাটটি শর দিয়ে ব্রাহ্মণ দ্রোণাচার্যকে বিদ্ধ করল। তখন দ্বিপদশ্রেষ্ঠ দ্রোণ তার প্রতি এক নারাচ নিক্ষেপ করলেন; সেই নারাচ বৃহৎক্ষত্রের কবচ বিদীর্ণ করে ভূমিতলে প্রবেশ করল।
Verse 16
कृष्णसर्पो यथा मुक्तो वल्मीकं नृपसत्तम । तथात्यगान्महीं बाणो भित्त्वा कैकेयमाहवे
সঞ্জয় বললেন—হে নৃপশ্রেষ্ঠ! যেমন কালো সাপ মুক্ত হয়ে ঢিবির গর্তে প্রবেশ করে, তেমনই যুদ্ধক্ষেত্রে কৈকেয়কে বিদীর্ণ করে সেই বাণ ভূমিতে প্রবেশ করল।
Verse 17
सो5तिविद्धों महाराज कैकेयो द्रोणसायकै: । क्रोधेन महता5<विष्टो व्यावृत्य नयने शुभे
সঞ্জয় বললেন—হে মহারাজ! দ্রোণের শর দ্বারা বারংবার অতিবিদ্ধ হয়ে সেই কৈকেয় রাজপুত্র মহাক্রোধে আচ্ছন্ন হল এবং তার শুভ নয়নদ্বয় বিস্ফারিত করে তাকিয়ে রইল।
Verse 18
द्रोणं विव्याध सप्तत्या स्वर्णपुड्खै: शिलाशितै: । सारथिं चास्य बाणेन भृशं मर्मस्वताडयत्
সঞ্জয় বললেন—সে পাথরে শান দিয়ে ধার করা স্বর্ণপক্ষযুক্ত সত্তরটি শর দিয়ে দ্রোণাচার্যকে বিদ্ধ করল; আর আরেকটি শর দিয়ে তাঁর সারথির মর্মস্থানে প্রবল আঘাত হানল।
Verse 19
द्रोणस्तु बहुभिवविद्धों बृहत्क्षत्रेण मारिष । असृजद् विशिखांस्तीक्ष्णान् कैकेयस्य रथं प्रति
সঞ্জয় বললেন—হে মান্যবর, বৃহৎক্ষত্রের বহু শর বিদ্ধ হয়ে দ্রোণ কেকয়রাজের রথের দিকে তীক্ষ্ণ বাণের প্রবল বর্ষা আরম্ভ করলেন।
Verse 20
व्याकुलीकृत्य त॑ द्रोणो बृहत्क्षत्र महारथम् | अश्रांश्षतुर्भिन्यवधीच्चतुरो5स्य पतत्त्रिभि:
সঞ্জয় বললেন—দ্রোণ বৃহৎক্ষত্র মহারথীকে ব্যাকুল করে দিলেন; তারপর নিজের চারটি শর দিয়ে তার চারটি শর কেটে দিলেন, এবং আবার চারটি পাখাযুক্ত শরও চার শরেই ছিন্ন করলেন।
Verse 21
द्रोणाचार्यने महारथी बृहत्क्षत्रको व्याकुल करके अपने चार बाणोंद्वारा उनके चारों घोड़ोंको मार डाला ।।
সঞ্জয় বললেন—দ্রোণ বৃহৎক্ষত্র মহারথীকে ব্যাকুল করে নিজের চার শর দিয়ে তার চার ঘোড়াকে নিধন করলেন। তারপর এক শর দিয়ে সারথিকে রথাসন থেকে ফেলে দিলেন, আর দুই শর দিয়ে ধ্বজ ও ছত্র কেটে মাটিতে নামিয়ে দিলেন।
Verse 22
ततः साधुविसूृष्टेन नाराचेन द्विजर्षभ: । हृद्यविध्यद् बृहत्क्षत्रं स च्छिन्नहृदयो5पतत्
সঞ্জয় বললেন—তারপর দ্বিজশ্রেষ্ঠ দ্রোণ সুপরিচালিত নারাচ দিয়ে বৃহৎক্ষত্রের হৃদয়দেশ বিদ্ধ করলেন; হৃদয় বিদীর্ণ হয়ে সে ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল।
Verse 23
बृहत्क्षत्रे हते राजन् केकयानां महारथे । शैशुपालिरभिक्रुद्धों यन्तारमिदमब्रवीत्,राजन! केकय महारथी बृहत्क्षत्रके मारे जानेपर शिशुपालपुत्र धृष्टकेतुने अत्यन्त कुपित हो अपने सारथिसे इस प्रकार कहा--
সঞ্জয় বললেন—রাজন! কেকয়দের মহারথী বৃহৎক্ষত্র নিহত হলে, শিশুপালপুত্র ধৃষ্টকেতু প্রবল ক্রোধে জ্বলে উঠে সারথিকে এই কথা বলল।
Verse 24
सारथे याहि यत्रैष द्रोणस्तिष्ठति देशित: । विनिघ्नन् केकयान् सर्वान् पज्चालानां च वाहिनीम्
“সারথি! যেখানে দ্রোণাচার্য বর্মধারী হয়ে নির্দেশিত স্থানে দাঁড়িয়ে আছেন এবং সমস্ত কেকয় ও পাঞ্চাল-সেনাকে নিধন করছেন—সেখানেই চলো।”
Verse 25
तस्य तद् वचन श्रुत्वा सारथी रथिनां वरम् । द्रोणाय प्रापयामास काम्बोजैर्जवनै्हयै:
তার কথা শুনে সারথি কাম্বোজ ও যবনদেশীয় দ্রুতগামী অশ্বে রথীদের শ্রেষ্ঠ ধৃষ্টকেতুকে দ্রোণাচার্যের নিকট পৌঁছে দিল।
Verse 26
धष्टकेतुश्न चेदीनामृूष भोडतिबलोदित: । वधायाभ्यद्रवद् द्रोणं पतड़ इव पावकम्,अत्यन्त बलसम्पन्न चेदिराज धुृष्टकेतु द्रोणाचार्यका वध करनेके लिये उनकी ओर उसी प्रकार दौड़ा, जैसे फतिंगा आगपर टूट पड़ता है
চেদিদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, অতিশয় বলবান ও উদ্দীপ্ত ধৃষ্টকেতু দ্রোণাচার্যকে বধ করতে এমনভাবে ধাবিত হল, যেন পতঙ্গ জ্বলন্ত অগ্নিতে ঝাঁপিয়ে পড়ে।
Verse 27
सो<विध्यत तदा द्रोणं षष्ट्या साश्चरथध्वजम् | पुनश्चान्यै: शरैस्ती&णै: सुप्तं व्याप्र॑ तुदल्निव
তখন সে ঘোড়া, রথ ও ধ্বজসহ দ্রোণাচার্যকে ষাটটি বাণে বিদ্ধ করল। আবার, যেন ঘুমন্ত ব্যাঘ্রকে খোঁচাচ্ছে—এমনভাবে, অন্য তীক্ষ্ণ শরেও আচার্যকে আরও আঘাত করল।
Verse 28
तस्य द्रोणो धरनुर्मध्ये क्षुपप्रेण शितेन च । चकर्त गार्ध्रपत्रेण यतमानस्य शुष्मिण:
সঞ্জয় বললেন—বিজয়ের জন্য উদ্যত সেই পরাক্রমী ধৃষ্টকেতুর ধনুক দ্রোণাচার্য গৃধ্রপক্ষ-যুক্ত তীক্ষ্ণ ক্ষুরপ্র-শরে ধনুর্মধ্যেই ছিন্ন করলেন।
Verse 29
अथान्यद् धनुरादाय शैशुपालिमीहारथ: । विव्याध सायकैद्रोणं कड़कबर्हिणवाजितै:,यह देख महारथी शिशुपालकुमारने दूसरा धनुष हाथमें लेकर कंक और मोरकी पाँखोंसे युक्त बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यकोी घायल कर दिया
সঞ্জয় বললেন—এ দেখে শৈশুপালির মহারথী পুত্র অন্য ধনুক তুলে কঙ্ক ও ময়ূরপক্ষ-যুক্ত বাণে দ্রোণাচার্যকে বিদ্ধ করল।
Verse 30
तस्य द्रोणो हयान् हत्वा चतुर्भिश्चतुर: शरै: । सारथेश्ष॒ शिर: कायाच्चकर्त प्रहसन्निव
সঞ্জয় বললেন—দ্রোণ চারটি শরে তার চার ঘোড়াকে বধ করে, তারপর সারথির মস্তক দেহ থেকে ছিন্ন করলেন—যেন বিদ্রূপ হাসি হেসে।
Verse 31
अथैनं पज्चविंशत्या सायकानां समार्पयत् । अवप्लुत्य रथाच्चैद्यो गदामादाय सत्वर:
সঞ্জয় বললেন—তারপর সে পঁচিশটি বাণের বর্ষায় তাঁকে আঘাত করল। এরপর চৈদ্যরাজ রথ থেকে লাফিয়ে নেমে দ্রুত গদা তুলে নিল।
Verse 32
तामापतन्तीमालोक्य कालरात्रिमिवोद्यताम्
সঞ্জয় বললেন—লোহার, স্বর্ণখচিত, ভারী সেই গদা উঠতি কালরাত্রির মতো নিজের দিকে ধেয়ে আসতে দেখে দ্রোণাচার্য সহস্র তীক্ষ্ণ বাণে তাকে বহু খণ্ডে বিদীর্ণ করলেন।
Verse 33
अश्मसारमरयी गुर्वी तपनीयविभूषिताम् । शरैरनेकसाहसैर्भारद्वाजो5च्छिनच्छितै:
সঞ্জয় বললেন—লোহার মতো কঠিন ধাতুতে গড়া, অতিভারী ও স্বর্ণালঙ্কৃত সেই গদা যেন কালরাত্রির ন্যায় উপর থেকে ধেয়ে এলো। তা নিজের উপর পতিত হতে দেখে ভরদ্বাজপুত্র দ্রোণাচার্য অসংখ্য তীক্ষ্ণ বাণে তাকে খণ্ড-বিখণ্ড করে দিলেন।
Verse 34
सा छिज्ना बहुभिर्बाणैभरिद्वाजेन मारिष | गदा पपात कौरव्य नादयन्ती धरातलम्,माननीय कौरवनरेश! द्रोणाचार्यद्वारा अनेक बाणोंसे छिन्न-भिन्न की हुई वह गदा भूतलको निनादित करती हुई धमसे गिर पड़ी
সঞ্জয় বললেন—হে কৌরব! ভরদ্বাজপুত্র দ্রোণাচার্যের বহু বাণে খণ্ডিত সেই গদা ভূমিকে প্রতিধ্বনিত করতে করতে ধপাস করে পড়ে গেল।
Verse 35
गदां विनिहतां दृष्टवा धृष्टकेतुरमर्षण: । तोमरं व्यसृजद् वीर: शक्ति च कनकोज्ज्वलाम्
নিজের গদা নষ্ট হতে দেখে ক্রোধে দগ্ধ বীর ধৃষ্টকেতু দ্রোণাচার্যের দিকে তোमर নিক্ষেপ করল এবং স্বর্ণদীপ্ত শক্তিও ছুড়ে মারল।
Verse 36
तोमरं पज्चभिर्भित्त्वा शक्ति चिच्छेद पठचभि: । तौ जम्मतुर्महीं छिन्नौ सर्पाविव गरुत्मता
দ্রোণাচার্য পাঁচটি বাণে তোমরটি ভেঙে দিলেন এবং আরও পাঁচটি বাণে ধৃষ্টকেতুর শক্তিকেও খণ্ড খণ্ড করলেন। ছিন্ন সেই দুই অস্ত্র গরুড়ের দ্বারা ভাঙা দুই সাপের মতো মাটিতে পড়ে গেল।
Verse 37
ततो<स्य विशिखं तीक्ष्णं वधाय वधकाड्क्षिण: । प्रेषयामास समरे भारद्वाज: प्रतापवान्
তারপর যে ধৃষ্টকেতু নিজেই বধের বাসনা নিয়ে উঠেছিল, তাকে বধ করার জন্য প্রতাপশালী ভরদ্বাজপুত্র দ্রোণ সমরে তার দিকে এক তীক্ষ্ণ বাণ প্রেরণ করলেন।
Verse 38
स तस्य कवचं भित्त्वा हृदयं चामितौजस: । अभ्यगाद् धरणीं बाणो हंस: पद्मवनं यथा
অমিত-তেজস্বী সেই বীরের কবচ ও হৃদয় বিদীর্ণ করে তীরটি মাটির মধ্যে প্রবেশ করল—যেমন রাজহাঁস পদ্মবনে সরে যায়।
Verse 39
पतद्ं हि ग्रसेच्चाषो यथा क्षुद्रं बुभुक्षित: । तथा द्रोणो5ग्रसच्छूरो धृष्टकेतुं महाहवे
যেমন ক্ষুধার্ত নীলকণ্ঠ পাখি ক্ষুদ্র কীট গিলে ফেলে, তেমনই মহাযুদ্ধে বীর দ্রোণ ধৃষ্টকেতুকে নিজের শরবৃষ্টির গ্রাস করে নিলেন।
Verse 40
निहते चेदिराजे तु तत् खण्डं पित्रयमाविशत् । अमर्षवशमापन्न: पुत्रो5स्य परमास्त्रवित्,चेदिराजके मारे जानेपर उत्तम अस्त्रोंका ज्ञाता उसका पुत्र अमर्षके वशीभूत हो पिताके स्थानपर आकर डट गया
চেদিরাজ নিহত হলে, পরম অস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী তাঁর পুত্র অসহ্য ক্রোধে আচ্ছন্ন হয়ে পিতার স্থানে এসে দৃঢ়ভাবে দাঁড়াল।
Verse 41
तमपि प्रहसन् द्रोण: शरैर्निन्ये यमक्षयम् । महाव्यात्रो महारण्ये मृगशावं यथा बली
তাকেও দ্রোণ হাসতে হাসতে শরবৃষ্টিতে যমলোকে পাঠালেন—যেমন বিশাল অরণ্যে বলবান মহাবাঘ হরিণশাবককে ছোঁ মেরে ধরে।
Verse 42
तेषु प्रक्षीयमाणेषु पाण्डवेयेषु भारत । जरासंधसुतो वीर: स्वयं द्रोणमुपाद्रवत्,भरतनन्दन! उन पाण्डवयोद्धाओंके इस प्रकार नष्ट होनेपर जरासंधके वीर पुत्र सहदेवने स्वयं ही द्रोणाचार्यपर धावा किया
হে ভারতনন্দন! পাণ্ডবপক্ষের যোদ্ধারা এভাবে ক্ষয়প্রাপ্ত হতে থাকলে, জরাসন্ধের বীর পুত্র সহদেব স্বয়ং দ্রোণের ওপর ঝাঁপিয়ে পড়ল।
Verse 43
सतु द्रोणं महाबाहु: शरधाराभिराहवे । अदृश्यमकरोत् तूर्ण जलदो भास्करं यथा
সঞ্জয় বললেন—তখন মহাবাহু সহদেব রণক্ষেত্রে তীক্ষ্ণ বাণধারায় দ্রোণাচার্যকে মুহূর্তে এমনভাবে আচ্ছন্ন করলেন যে তিনি যেন অদৃশ্য হয়ে গেলেন—যেমন আকাশে মেঘ সূর্যকে ঢেকে দেয়।
Verse 44
तस्य तल्लाघवं दृष्ट्वा द्रोण: क्षत्रियमर्दन: । व्यसृजत् सायकांस्तूर्ण शतशो5थ सहस्रश:
তার সেই ক্ষিপ্রতা দেখে ক্ষত্রিয়-সংহারক দ্রোণ তৎক্ষণাৎ শত শত, তারপর সহস্র সহস্র বাণ নিক্ষেপ করতে লাগলেন।
Verse 45
छादयित्वा रणे द्रोणो रथस्थं रथिनां वरम् । जारासंधिं जघानाशु मिषतां सर्वधन्विनाम्
এভাবে রণক্ষেত্রে দ্রোণ রথারূঢ় রথীদের শ্রেষ্ঠ—জরাসন্ধের পুত্রকে—বাণে সম্পূর্ণ আচ্ছাদিত করে, সকল ধনুর্ধরের চোখের সামনে, দ্রুত নিধন করলেন।
Verse 46
यो यः सम नीयते तत्र तं द्रोणो हान्तकोपम: । आदत्त सर्वभूतानि प्राप्ते काले यथान्तक:
সেখানে যাকে-যাকে তার সামনে আনা হচ্ছিল, দ্রোণ ক্রুদ্ধ মৃত্যুর মতো তাকে ধরে নিধন করছিলেন; যেমন নির্ধারিত সময় এলে অন্তক সকল প্রাণীকে গ্রাস করে।
Verse 47
ततो द्रोणो महाराज नाम विश्राव्य संयुगे । शरैरनेकसाहसी: पाण्डवेयान् समावृणोत्,महाराज! तदनन्तर द्रोणाचार्यने युद्धस्थलमें अपना नाम सुनाकर अनेक सहस्र बाणोंद्वारा पाण्डव-सैनिकोंको ढक दिया
তারপর, মহারাজ, দ্রোণ যুদ্ধক্ষেত্রে নিজের নাম ঘোষণা করে, অগণিত সহস্র বাণে পাণ্ডবদের সেনাকে চারদিক থেকে আচ্ছন্ন করলেন।
Verse 48
ते तु नामाड़किता बाणा द्रोणेनास्ता: शिलाशिता: । नरान् नागान् हयांश्वैव निजघ्नु: शतशो मृधे
দ্রোণাচার্যের নিক্ষিপ্ত সেই বাণগুলি শানপাথরে ঘষে তীক্ষ্ণ করা ছিল এবং তাতে আচার্যের নাম খোদিত ছিল। যুদ্ধক্ষেত্রে তারা শত শত মানুষ, হাতি ও ঘোড়াকে নিধন করল।
Verse 49
ते वध्यमाना द्रोणेन शक्रेणेव महासुरा: । समकम्पन्त पड्चाला गाव: शीतार्दिता इव
দ্রোণের আঘাতে বিদ্ধ হয়ে পাঞ্চাল যোদ্ধারা কেঁপে উঠল—যেমন ইন্দ্রের প্রহারে মহাসুরেরা কাঁপে, আর যেমন শীতে কাতর গাভীরা থরথর করে কাঁপে।
Verse 50
ततो निष्ठानको घोर: पाण्डवानामजायत । द्रोणेन वध्यमानेघु सैन्येषु भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! फिर तो द्रोणाचार्यके द्वारा मारी जाती हुई पाण्डवोंकी सेनाओंमें घोर आर्तनाद होने लगा
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! দ্রোণ যখন পাণ্ডবদের সৈন্যদলকে নিধন করতে লাগলেন, তখন তাদের মধ্যে ভয়ংকর আর্তনাদ উঠল।
Verse 51
प्रताप्पमाना: सूर्येण हन््यमाना श्व॒ सायकै: । अन्यपद्यन्त पञज्चालास्तदा संत्रस्तचेतस:
হে ভরতনন্দন! উপর থেকে সূর্য দগ্ধ করছিল, আর রণক্ষেত্রে দ্রোণের বাণবৃষ্টি পড়ছিল; তখন পাঞ্চাল বীরদের চিত্ত ভয়ে সন্ত্রস্ত হয়ে ব্যাকুল ও বিভ্রান্ত হয়ে পড়ল।
Verse 52
मोहिता बाणजालेन भारद्वाजेन संयुगे । ऊरुग्राहगृहीतानां पजचलानां महारथा:,उस युद्धस्थलमें भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यके बाण-समूहोंसे आहत हो पांचाल महारथी मूर्छित हो रहे थे। उनकी जाँघें अकड़ गयी थीं
সেই যুদ্ধে ভারদ্বাজনন্দন দ্রোণের বাণজালে আচ্ছন্ন হয়ে পাঞ্চালদের মহারথীরা এমন অসহায় হয়ে পড়ল যেন কারও জঙ্ঘা-গ্রাসে ধরা পড়েছে; তারা স্তব্ধ হয়ে মূর্ছিতের মতো লুটিয়ে পড়ল।
Verse 53
चेदयश्न महाराज सृजजया: काशिकोसला: । अभ्यद्रवन्त संह्ृष्टा भारद्वाजं युयुत्सया,महाराज! उस समय चेदि, सृंजय, काशी और कोसल प्रदेशोंके सैनिक हर्ष और उत्साहमें भरकर युद्धकी अभिलाषासे द्रोणाचार्यपर टूट पड़े
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ, চেদি, সৃঞ্জয় এবং কাশী-কোশলের যোদ্ধারা উল্লাসে ভরে যুদ্ধের আকাঙ্ক্ষায় ভরদ্বাজপুত্র দ্রোণাচার্যের দিকে ধেয়ে এল।
Verse 54
ब्रुवन्तश्न॒ रणेडन्योन्यं चेदिपडचालसूञ्जया: । घ्नत द्रोणं घ्नत द्रोणमिति ते द्रोणमभ्ययु:
সঞ্জয় বললেন—রণক্ষেত্রে পরস্পরকে ডেকে চেদি, পাঁচাল ও সৃঞ্জয় বীরেরা—“দ্রোণকে মারো, দ্রোণকে মারো”—এই ধ্বনি তুলে দ্রোণাচার্যের দিকে ঝাঁপিয়ে পড়ল।
Verse 55
यतन्तः पुरुषव्याप्रा: सर्वशक््त्या महाद्युतिम् । निनीषवो रणे द्रोणं यमस्य सदन प्रति
সঞ্জয় বললেন—সেই পুরুষসিংহ বীরেরা সর্বশক্তি দিয়ে চেষ্টা করতে লাগল, উদ্দেশ্য একটাই—রণে মহাতেজস্বী দ্রোণাচার্যকে যমের ধামে পাঠানো।
Verse 56
यतमानांस्तु तान् वीरान् भारद्वाज: शिलीमुखै: । यमाय प्रेषयामास चेदिमुख्यान् विशेषत:
সঞ্জয় বললেন—এভাবে যুদ্ধে উদ্যত সেই বীরদের, বিশেষ করে চেদি দেশের প্রধান যোদ্ধাদের, ভরদ্বাজপুত্র দ্রোণাচার্য তীক্ষ্ণ বাণে যমলোকে পাঠিয়ে দিলেন।
Verse 57
तेषु प्रक्षीयमाणेषु चेदिमुख्येषु सर्वश: । पज्चाला: समकम्पन्त द्रोणसायकपीडिता:,चेदि देशके प्रधान वीर जब इस प्रकार नष्ट होने लगे, तब द्रोणाचार्यके बाणोंसे पीड़ित हुए पांचालयोद्धा थर-थर काँपने लगे
সঞ্জয় বললেন—চেদি দেশের প্রধান বীরেরা যখন সর্বদিকে এভাবে ক্ষয় হতে লাগল, তখন দ্রোণের বাণে পীড়িত পাঁচাল যোদ্ধারা কাঁপতে শুরু করল।
Verse 58
प्राक्रोशन् भीमसेन ते धृष्टद्युम्नं च भारत । दृष्टवा द्रोणस्य कर्माणि तथारूपाणि मारिष,माननीय भरतनन्दन! वे द्रोणके वैसे पराक्रमको देखकर भीमसेन तथा धृष्टद्युम्नको पुकारने लगे
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! দ্রোণের সেই ভয়ংকর ও অতুল কর্ম দেখে তারা চিৎকার করে উঠল, ভীমসেন ও ধৃষ্টদ্যুম্নকে ডাকতে লাগল।
Verse 59
ब्राह्मणेन तपो नूनं चरितं दुश्चरं महत् । तथा हि युधि संक्रुद्धों दहति क्षत्रियर्षभान्
সঞ্জয় বললেন—নিশ্চয়ই এই ব্রাহ্মণ মহৎ ও দুরাচর তপস্যা করেছেন; কারণ যুদ্ধে ক্রুদ্ধ হলে তিনি শ্রেষ্ঠ ক্ষত্রিয়দের দগ্ধ করে দেন।
Verse 60
और परस्पर कहने लगे--“इस ब्राह्मणने निश्चय ही कोई बड़ी भारी दुष्कर तपस्या की है, तभी तो यह युद्धमें अत्यन्त क़ुद्ध होकर श्रेष्ठ क्षत्रियोंको दग्ध कर रहा है ।।
সঞ্জয় বললেন—তখন তারা পরস্পর বলতে লাগল—“নিশ্চয়ই এই ব্রাহ্মণ মহৎ ও দুরূহ তপস্যা করেছেন; তাই যুদ্ধক্ষেত্রে ক্রোধে দগ্ধ হয়ে তিনি শ্রেষ্ঠ ক্ষত্রিয়দের পুড়িয়ে দিচ্ছেন। যুদ্ধ করা ক্ষত্রিয়ের ধর্ম, আর তপস্যাই ব্রাহ্মণের পরম ধর্ম বলে মানা হয়। কিন্তু এই তপস্বী, অস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী ব্রাহ্মণ তো কেবল দৃষ্টিপাতেই দগ্ধ করতে পারেন!”
Verse 61
द्रोणाग्निमस्त्रसंस्पर्श प्रविष्टा: क्षत्रियर्षभा: । बहवो दुस्तरं घोरं यत्रादहुन्त भारत
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! বহু ক্ষত্রিয়শ্রেষ্ঠ বীর, দ্রোণরূপী অগ্নিতে—যার দাহক স্পর্শ ছিল অস্ত্রসমূহ—প্রবেশ করে সেই ভয়ংকর ও দুরতিক্রম আগুনে সেখানেই দগ্ধ হল।
Verse 62
यथाबलं यथोत्साहं यथासत्त्वं महाद्युति: | मोहयन् सर्वभूतानि दोणो हन्ति बलानि नः
সঞ্জয় বললেন—“নিজ শক্তি, উদ্যম ও স্থৈর্য অনুযায়ী মহাতেজস্বী দ্রোণ সকল প্রাণীকে বিমোহিত করে আমাদের সেনাবাহিনীকে নিধন করছেন।”
Verse 63
तेषां तद् वचन श्रुत्वा क्षत्रधर्मा व्यवस्थित: । अर्धचन्द्रेण चिच्छेद क्षत्रधर्मा महाबल:
তাদের কথা শুনে মহাবলী ক্ষত্রধর্মা ক্ষত্রিয়ধর্মে অবিচল রইল। অর্ধচন্দ্রাকৃতি বাণে সে (শত্রুর) অস্ত্র ছিন্ন করল।
Verse 64
क्रोधसंविग्नमनसो द्रोणस्य सशरं धनु: । उनकी यह बात सुनकर क्षत्रधर्मा युद्धके लिये द्रोणाचार्यके सामने आकर खड़ा हो गया। उस महाबली वीरने अर्धचन्द्राकार बाण मारकर क्रोधसे उद्विग्न मनवाले द्रोणाचार्यके धनुष और बाणको काट दिया ।।
ক্রোধে বিচলিতচিত্ত দ্রোণের তীরে-সহ ধনুক সে ছিন্ন করল। তখন ক্ষত্রিয়মর্দন দ্রোণ আরও অধিক ক্রুদ্ধ হয়ে উঠলেন।
Verse 65
अन्यत् कार्मुकमादाय भास्वरं वेगवत्तरम् । तत्राधाय शरं तीक्ष्णं परानीकविशातनम्
তখন তিনি আরেকটি ধনুক নিলেন—উজ্জ্বল ও অধিক বেগবান। তাতে স্থাপন করলেন এক তীক্ষ্ণ বাণ, যা শত্রুসেনার সারি ছিন্নভিন্ন করতে সক্ষম।
Verse 66
आकर्णपूर्णमाचार्यो बलवानभ्यवासृजत् । स हत्वा क्षत्रधर्माणं जगाम धरणीतलम्
বলবান আচার্য ধনুক কান পর্যন্ত টেনে বাণ ছাড়লেন। সেই বাণ ক্ষত্রধর্মাকে বধ করে তাকে ভূমিতে লুটিয়ে দিল।
Verse 67
इससे क्षत्रियोंका मर्दन करनेवाले द्रोणाचार्य अत्यन्त कुपित हो उठे और अत्यन्त वेगशाली तथा प्रकाशमान दूसरा धनुष हाथमें लेकर उन्होंने एक तीखा बाण अपने धनुषपर रखा, जो शत्रुसेनाका विनाश करनेवाला था। बलवान् आचार्यने कानतक धनुषको खींचकर उस बाणको छोड़ दिया। वह बाण क्षत्रधर्माका वध करके धरतीमें समा गया ।।
হৃদয় বিদীর্ণ হয়ে সে রথ থেকে পড়ে ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল। ধৃষ্টদ্যুম্নের পুত্র নিহত হলে সমস্ত সেনাদল ভয়ে কেঁপে উঠল।
Verse 68
अथ द्रोणं समारोहच्चेकितानो महाबल: । स द्रोणं दशभिर्विद्ध्वा प्रत्यविद्धयत् स्तनान्तरे
Sañjaya said: Then the mighty Cekitāna charged straight at Droṇa. Piercing Droṇa with ten arrows, he struck back in return, wounding him in the region between the breasts. The scene underscores the relentless reciprocity of battlefield violence, where prowess and retaliation eclipse restraint, even against a revered teacher-warrior.
Verse 69
चतुर्भि: सारथिं चास्य चतुर्भिश्चतुरों हयान् | तदनन्तर महाबली चेकितानने द्रोणाचार्यपर चढ़ाई की। उन्होंने दस बाणोंसे द्रोणको घायल करके उनकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी। साथ ही चार बाणोंसे उनके सारथिको और चार ही बाणोंद्वारा उनके चारों घोड़ोंको भी बींध डाला || ६८ इ ।।
Sañjaya said: Then the mighty Cekitāna pressed his attack against Droṇācārya. Striking Droṇa with ten arrows, he inflicted a deep wound in his chest; and at the same time, with four arrows he pierced Droṇa’s charioteer, and with four more he struck down the four horses. The scene underscores the ruthless precision of battlefield skill, where disabling the chariot becomes as decisive as wounding the warrior himself.
Verse 70
तस्य सूते हते ते5श्वा रथमादाय विद्रुता:
Sañjaya said: When his charioteer was slain, those horses, taking the chariot with them, bolted away—an image of how, in the chaos of war, even the finest martial order collapses when its guiding hand is removed.
Verse 71
समरे शरसंवीता भारद्वाजेन मारिष | चेकितानके सारथिके मारे जानेपर वे घोड़े उनका रथ लेकर भाग चले। आर्य! द्रोणाचार्यने समरांगणमें उनके शरीरोंको बाणोंसे भर दिया था || ७० ई ।।
Sanjaya said: Seeing Cekitāna’s chariot—its horses and charioteer slain—and surveying the gathered warriors of the Cedis, the Pāñcālas, and the Sṛñjayas on the battlefield, Droṇa, the illustrious son of Bharadvāja, drove them back on every side in that great fight, filling their bodies with arrows. The scene displays the grim ethic of kṣatriya warfare: mastery and resolve can rout even valiant hosts, yet victory is purchased through relentless injury and fear.
Verse 72
तान् समेतान् रणे शूरांश्नेदिपणचालसृञ्जयान् | समन्ताद् द्रावयन् द्रोणो बह्मशोभत मारिष
Sañjaya said: Seeing that chariot of Cekitāna whose horses and charioteer had been slain, and casting his gaze upon the assembled heroes of the Cedi, Pañcāla, and Sṛñjaya forces on the battlefield, Droṇācārya drove them back on every side. O revered one, at that moment he shone with a formidable, almost sacred splendor—his prowess asserting itself amid the harsh demands of war.
Verse 73
आकर्णपलित: श्यामो ववसाशीतिपञ्चक: । रणे पर्यचरद् द्रोणो वृद्ध: षोडशवर्षवत्
কানের ধারে কেশ পেকে গিয়েছিল, দেহবর্ণ শ্যাম, আর বয়স পঁচাশি—তবু বৃদ্ধ দ্রোণ রণক্ষেত্রে ষোলো বছরের যুবকের মতোই বিচরণ করছিলেন।
Verse 74
अथ द्रोणं महाराज विचरन्तमभीतवत् | वज्हस्तममन्यन्त शत्रव: शत्रुसूदनम्,महाराज! रणभूमिमें निर्भय-से विचरते हुए शत्रुसूदन द्रोणको शत्रुओंने वज्रधारी इन्द्र समझा
হে মহারাজ! রণক্ষেত্রে নির্ভয়ে বিচরণরত শত্রুসূদন দ্রোণকে শত্রুরা বজ্রধারী ইন্দ্র বলেই মনে করল।
Verse 75
ततोडब्रवीन्महाबाहुर्द्रपदो बुद्धिमान् नूप । लुब्धो<यं क्षत्रियान् हन्ति व्याघ्र: क्षुद्रमृगानिव
তখন মহাবাহু, বুদ্ধিমান রাজা দ্রুপদ বললেন—“লোভে অন্ধ হয়ে এ ব্যক্তি ক্ষত্রিয়দের হত্যা করছে, যেমন বাঘ ক্ষুদ্র হরিণদের মারে।”
Verse 76
कृच्छान् दुर्योधनो लोकान् पाप: प्राप्स्यति दुर्मति: । यस्य लोभाद् विनिहता: समरे क्षत्रियर्षभा:
দুর্মতি পাপী দুর্যোধন কঠোর দুঃখময় লোকসমূহে গমন করবে; যার লোভে এই সমরে বহু ক্ষত্রিয়শ্রেষ্ঠ বীর নিহত হয়েছে।
Verse 77
शतश: शेरते भूमौ निकृत्ता गोवृषा इव । रुधिरेण परीताड़्ा श्वशृूगालादनीकृता:
শত শত যোদ্ধা কাটা পড়ে গরু-ষাঁড়ের মতো মাটিতে শুয়ে আছে। রক্তে সিক্ত দেহগুলি কুকুর ও শেয়ালের খাদ্য হয়ে গেছে।
Verse 78
एवमुक्त्वा महाराज द्रुपदो5क्षौहिणीपति: । पुरस्कृत्य रणे पार्थान् द्रोणमभ्यद्रवद् द्रतम्
এ কথা বলে, মহারাজ, এক অক্ষৌহিণীর অধিপতি দ্রুপদ রণক্ষেত্রে পৃথাপুত্রদের অগ্রে স্থাপন করে দ্রোণাচার্যের দিকে দ্রুত সোজা আক্রমণ করলেন।
Verse 125
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि द्रोणपराक्रमे पजञ्चविंशत्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें द्रोगपराक्रमाविषयक एक यौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত জয়দ্রথবধপর্বে দ্রোণের পরাক্রম-বিষয়ক একশো পঁচিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 313
भारद्वाजाय चिक्षेप रुषितामिव पन्नगीम् | तत्पश्चात् उन्होंने धृष्टकेतुको पचीस बाण मारे। उस समय धृष्टकेतुने शीघ्रतापूर्वक रथसे कूदकर गदा हाथमें ले ली और रोषमें भरी हुई सर्पिणीके समान उसे द्रोणाचार्यपर दे मारा
সে ভারদ্বাজপুত্র দ্রোণের দিকে ক্রুদ্ধ সাপিনীর মতো তা নিক্ষেপ করল। তারপর সে ধৃষ্টকেতুকে পঁচিশটি বাণে বিদ্ধ করল। তখন ধৃষ্টকেতু দ্রুত রথ থেকে লাফিয়ে নেমে হাতে গদা তুলে নিল এবং ক্রোধে স্ফীত সাপিনীর মতো তা দ্রোণাচার্যের দিকে ছুড়ে মারল।
Verse 693
ध्वजं सप्तभिरुन्मथ्य यन्तारमवधीत् त्रिभि: । तब आचार्यने उनकी दोनों भुजाओं और छातीमें कुल तीन बाण मारे। फिर सात सायकोंद्वारा उनकी ध्वजाके टुकड़े-टुकड़े करके तीन बाणोंसे सारथिका वध कर दिया
আচার্য সাতটি বাণে ধ্বজ চূর্ণ করলেন এবং তিনটি বাণে সারথিকে বধ করলেন। তারপর তিনি সেই যোদ্ধার দুই বাহু ও বক্ষে তিনটি শর নিক্ষেপ করলেন। পুনরায় সাতটি তীক্ষ্ণ বাণে ধ্বজ খণ্ড-বিখণ্ড করলেন এবং তিনটি বাণে রথচালককে নিধন করলেন।
Whether a ruler should attribute battlefield failure to a commander’s bias or accept limits of control: Duryodhana’s impulse to blame Droṇa conflicts with norms of respecting the ācārya and maintaining strategic unity during crisis.
Karṇa articulates a pragmatic fatalism: one must act with full resolve and without hesitation, yet outcomes may be overturned by daiva; therefore counsel should preserve duty-performance and cohesion rather than escalate internal blame.
No explicit phalaśruti appears; the chapter’s meta-level function is interpretive—embedding a theory of causation (daiva constraining effort) to contextualize reversals within the broader war narrative.
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