
युधिष्ठिरस्य कृष्णार्जुनादि-समाश्वासनम् (Yudhiṣṭhira’s reassurance and praise of Kṛṣṇa, Arjuna, Bhīma, and Sātyaki)
Upa-parva: Jayadratha-vadha-anantara-saṃvāda (Aftermath discourse following Jayadratha’s fall)
Saṃjaya reports that Yudhiṣṭhira descends from his chariot and embraces Kṛṣṇa with visible relief and tears. He then addresses Vāsudeva and Dhanaṃjaya, expressing gratitude at seeing the two ‘burden-bearing’ mahārathas safe and affirming the downfall of Jayadratha. Yudhiṣṭhira frames success as arising from Kṛṣṇa’s favor, extending the claim to cosmic order: when Kṛṣṇa is pleased, victory and stability follow, and even the gods attain outcomes through his grace. Kṛṣṇa and Arjuna respond by crediting Yudhiṣṭhira’s righteous anger as a destructive force against the Kaurava side, citing prior outcomes (e.g., Bhīṣma’s fall) as precedent for the consequences of provoking a principled ruler-warrior. Bhīma and Sātyaki arrive wounded by arrows, salute the senior leader, and are welcomed; Yudhiṣṭhira praises their escape from severe tactical pressure (metaphorically described as an ocean and predatory grasp), embraces them, and the Pāṇḍava host regains collective confidence and readiness for continued engagement.
Chapter Arc: रणभूमि में रथों की भगदड़ देख द्रोणाचार्य का क्रोध भड़क उठता है; वे दुःशासन से तीखे स्वर में पूछते हैं—ये महारथी क्यों भाग रहे हैं, क्या जयद्रथ जीवित है, क्या दुर्योधन कुशल है? → द्रोण दुःशासन को धिक्कारते हैं—राजपुत्र और युवराज-पद का अधिकारी होकर युद्ध में पलायन कैसा? वे कौरवों की पंक्तियों के टूटने का कारण पूछते हुए अनुशासन और लज्जा दोनों का बाण चलाते हैं। इसी बीच युयुधान (सात्यकि) म्लेच्छ-सेना सहित आगे बढ़कर कौरवों पर प्रहार करता है, और द्रोण स्वयं धृष्टद्युम्न की ओर मुड़कर निकट-युद्ध का संकल्प लेते हैं। → द्रोण और धृष्टद्युम्न का अद्भुत संग्राम—इंद्र-प्रह्लाद-सदृश, त्रैलोक्य की दृष्टि खींच लेने वाला—जहाँ बार-बार घायल होने पर भी द्रोण क्रोध को धार देकर प्रतिघात करते हैं और दोनों सेनाओं की धड़कनें उसी द्वंद्व पर टिक जाती हैं। → द्रोण की फटकार से कौरव-पक्ष में क्षणिक संकोच और पुनर्संगठन का प्रयास होता है; दूसरी ओर पाण्डव-पक्ष में सात्यकि का आक्रमण और धृष्टद्युम्न का सामना युद्ध को और तीखा कर देता है—पर निर्णायक परिणाम अभी नहीं निकलता। → द्रोण का उग्र संकल्प और धृष्टद्युम्न का प्रतिरोध अगले क्षणों में किसका पलड़ा भारी करेगा—और कौरवों की डगमगाती पंक्तियाँ क्या टिक पाएँगी?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ श्लोक मिलाकर कुल ६३ श्लोक हैं।) ऑपन-माज बछ। अकाल द्वाविशर्त्याधेकशततमो< ध्याय: द्रोणाचार्यका दःशासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! দু্ঃশাসনের রথকে নিকটে স্থিত দেখে, ভরদ্বাজপুত্র দ্রোণাচার্য দু্ঃশাসনকে এইরূপ বাক্য বললেন।
Verse 2
दुःशासन रथा: सर्वे कस्माच्चैते प्रविद्रुता: । कच्चित् क्षेम॑ तु नृपतेः: कच्चिज्जीवति सैन्धव:
সঞ্জয় বললেন—“দুঃশাসন! এ সব রথী এমন বিশৃঙ্খলভাবে কেন পিছু হটছে? রাজা দুর্যোধন কি কুশলে আছেন? আর সিন্ধুরাজ জয়দ্রথ কি এখনও জীবিত?”
Verse 3
राजपुत्रो भवानत्र राजभ्राता महारथ: । किमर्थ द्रवते युद्धे यौवराज्यमवाप्य हि,“तुम तो राजाके बेटे, राजाके भाई और महारथी वीर हो। युवराजका पद प्राप्त करके तुम इस युद्धस्थलमें किसलिये भागे फिरते हो?
সঞ্জয় বললেন—“তুমি তো রাজপুত্র, রাজার ভ্রাতা এবং মহারথী। যুবরাজ্যের পদ লাভ করেও যুদ্ধক্ষেত্রে কেন এভাবে দৌড়াদৌড়ি করছ?”
Verse 4
दासी जितासि दूते त्वं यथाकामचरी भव । वाससां वाहिका राज्ञो क्रातुर्ज्येष्ठस्य मे भव
সঞ্জয় বললেন—“দুঃশাসন! তুমি দ্রৌপদীকে বলেছিলে—‘হে দূতী, তুমি পাশায় জেতা দাসী; আমাদের ইচ্ছামতো চল। আমার জ্যেষ্ঠ ভ্রাতা রাজা দুর্যোধনের বস্ত্রবাহিকা হও।’”
Verse 5
न सन्ति पतय: सर्वे तेडद्य षण्ढतिलै: समा | दुःशासनैवं कस्मात् त्वं पूर्वमुकत्वा पलायसे
সঞ্জয় বললেন—“‘তোমার সেই সব স্বামী আজ আর নেই—ফাঁপা তিলের মতো তুচ্ছ হয়ে গেছে।’ দুঃশাসন! আগে এমন তিরস্কার করে এখন যুদ্ধ থেকে কেন পালাচ্ছ?”
Verse 6
स्वयं वैरं महत् कृत्वा पञज्चालै: पाण्डवै: सह । एकं सात्यकिमासाद्य कथं भीतो5सि संयुगे
সঞ্জয় বললেন—“পাঞ্চাল ও পাণ্ডবদের সঙ্গে তুমি নিজেই মহাবৈর সৃষ্টি করেছ; অথচ রণক্ষেত্রে একা সাত্যকির মুখোমুখি হয়েই কীভাবে ভয়ে কেঁপে উঠলে?”
Verse 7
न जानीषे पुरा त्वं तु गृह्नन्नक्षान् दुरोदरे । शरा होते भविष्यन्ति दारुणाशीविषोपमा:,“क्या पहले तुम जूएमें पासे उठाते समय नहीं जानते थे कि ये एक दिन भयंकर विषधर सर्पोके समान विनाशकारी बाण बन जायाँगे
সঞ্জয় বললেন—তুমি যখন একদিন সেই সর্বনাশা পাশাখেলায় পাশা তুলেছিলে, তখন কি জানোনি যে একদিন সেগুলোই বিষধর সাপের মতো নির্মম ও প্রাণঘাতী তীরে পরিণত হবে? ধর্মভঙ্গ করে যে জুয়া খেলেছিলে, তা আজ যুদ্ধের হিংসা ও দুঃখ হয়ে ফল দিয়েছে।
Verse 8
अप्रियाणां हि वचसां पाण्डवस्य विशेषत: । द्रौपद्याश्न॒ परिक्लेशस्त्वन्मूलो हुभवत् पुरा
সঞ্জয় বললেন—বিশেষ করে পাণ্ডব যুধিষ্ঠিরের প্রতি যে অপ্রিয় ও কঠোর বাক্য উচ্চারিত হয়েছিল, আর পূর্বকালে দ্রৌপদীর ওপর যে ক্লেশ নেমে এসেছিল—তার মূলে ছিলে তুমিই। সেই অপমান ও নিষ্ঠুরতার নৈতিক ভার তোমারই কর্মে গিয়ে ঠেকে।
Verse 9
क्व ते मानश्न दर्पश्न क्य ते वीर्य क्व गर्जितम् । आशीविषसमान् पार्थान् कोपयित्वा क्व यास्यसि
সঞ্জয় বললেন—কোথায় গেল তোমার মান আর দম্ভ? কোথায় তোমার বীর্য, কোথায় তোমার গর্জন? বিষধর সাপের মতো ভয়ংকর পার্থদের ক্রুদ্ধ করে এখন তুমি কোথায় পালাচ্ছ?
Verse 10
शोच्येयं भारती सेना राज्यं चैव सुयोधन: । यस्य त्वं कर्कशो भ्राता पलायनपरायण:
সঞ্জয় বললেন—এই ভারতীয় সেনা, এই রাজ্য এবং স্বয়ং সুয়োধন—সবই আজ করুণার পাত্র; কারণ তার কঠোরস্বভাব ভাই হয়েও তুমি এখন যুদ্ধ থেকে মুখ ফিরিয়ে পালাতে উদ্যত।
Verse 11
“वीर! तुम्हें तो अपने बाहुबलका आश्रय लेकर इस भागती हुई भयभीत सेनाकी रक्षा करनी चाहिये
সঞ্জয় বললেন—হে বীর! নিজের বাহুবলের আশ্রয় নিয়ে এই ভীত-সন্ত্রস্ত, পলায়নপর সেনাকে তোমার রক্ষা করা উচিত।
Verse 12
स त्वमद्य रणं हित्वा भीतो हर्षयसे परान् । विद्रुते त्वयि सैन्यस्य नायके शरत्रुसूदन
কিন্তু আজ তুমি ভয়ে রণক্ষেত্র ত্যাগ করে শত্রুপক্ষকে আনন্দ দিচ্ছ। হে শত্রুনাশক! তুমি—সেনানায়ক—পলায়ন করলে সমগ্র বাহিনীই বিশৃঙ্খল পলায়নে ভেঙে পড়ে।
Verse 13
एकेन सात्वतेनाद्य युध्यमानस्य तेन वै
আজ সেই একমাত্র সাত্বত বীরের দ্বারাই—যিনি যুদ্ধ করে চলেছেন—নিশ্চয়ই…
Verse 14
पलायने तव मति: संग्रामाद्धि प्रवर्तते | यदा गाण्डीवधन्वानं भीमसेनं च कौरव
হে কৌরব! যখন তুমি গাণ্ডীবধারী অর্জুন ও ভীমসেনকে দেখ, তখন তোমার মন সত্যই যুদ্ধ থেকে সরে পলায়নের দিকে ধাবিত হয়।
Verse 15
यमौ वा युधि द्रष्टासि तदा त्वं कि करिष्यसि । “कौरव! अकेले सात्यकिके साथ युद्ध करते समय, जब आज तुम्हारी बुद्धि संग्रामसे पलायन करमेमें प्रवृत्त हो गयी, तुमने भागनेका विचार कर लिया, तब जिस समय तुम गाण्डीवधारी अर्जुन, भीमसेन अथवा नकुल-सहदेवको युद्धस्थलमें देखोगे, उस समय तुम क्या करोगे? ।।
আর যখন তুমি রণক্ষেত্রে যমজ ভ্রাতা—নকুল ও সহদেবকে—দেখবে, তখন তুমি কী করবে?
Verse 16
त्वरितो वीर गच्छ त्वं गान्धार्युदरमाविश
ত্বরিত হও, হে বীর! যাও, এবং গান্ধারীর অন্তঃপুরে প্রবেশ কর।
Verse 17
यदि तावत् कृता बुद्धि: पलायनपरायणा
সঞ্জয় বললেন—যদি সত্যই তোমার বুদ্ধি আগেই পালায়নের দিকেই স্থির হয়ে থাকে, তবে তোমার মন যুদ্ধক্ষেত্র ত্যাগ করতেই স্থির, সম্মুখে উপস্থিত কর্তব্যের মুখোমুখি হতে নয়।
Verse 18
यावत् फाल्गुननाराचा निर्मुक्तोरगसंनिभा:
সঞ্জয় বললেন—যতক্ষণ ফাল্গুন (অর্জুন)-এর শরগুলি—দ্রুত ধারাবাহিকতায় নিক্ষিপ্ত, মুক্ত সাপের মতো—অবিরাম ছুটে চলছিল…
Verse 19
यावत् ते पृथिवीं पार्था हत्वा भ्रातृशतं रणे
সঞ্জয় বললেন—যতক্ষণ তোমরা, হে পার্থগণ, রণে শত ভ্রাতাকে বধ করে পৃথিবীকে নিজের বশে এনেছ…
Verse 20
यावन्न क्रुद्धयते राजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिर:
সঞ্জয় বললেন—যতক্ষণ ধর্মপুত্র রাজা যুধিষ্ঠির ক্রুদ্ধ হন না…
Verse 21
यावद् भीमो महाबाहुर्विगाह्य महतीं चमूम्
সঞ্জয় বললেন—যতক্ষণ মহাবাহু ভীম বিশাল সেনাব্যূহে প্রবেশ করে…
Verse 22
पूर्वमुक्तश्न ते भ्राता भीष्मेणासौ सुयोधन:
সঞ্জয় বললেন—পূর্বে ভীষ্ম তোমার ভ্রাতা সুয়োধনকে উপদেশ দিয়েছিলেন—“সৌম্য, পাণ্ডবরা যুদ্ধে অজেয়; তাদের সঙ্গে সন্ধি কর।” তবু তোমার মোহগ্রস্ত ভ্রাতা দুর্যোধন সেই পরামর্শ মানল না।
Verse 23
अजेया: पाण्डवा: संख्ये सौम्य संशाम्य तैः सह । न च तत् कृतवान् मन्दस्तव भ्राता सुयोधन:
সৌম্য, পাণ্ডবরা যুদ্ধে অজেয়; তাদের সঙ্গে সন্ধি কর। কিন্তু তোমার মন্দবুদ্ধি ভ্রাতা সুয়োধন তা করল না।
Verse 24
स युद्धे धृतिमास्थाय यत्तो युध्यस्व पाण्डवै: । तवापि शोणितं भीम: पास्यतीति मया श्रुतम्
এই যুদ্ধে ধৈর্য ধারণ করে, মন একাগ্র করে পাণ্ডবদের সঙ্গে যুদ্ধ কর। আমি শুনেছি, ভীম তোমারও রক্ত পান করবে।
Verse 25
कि भीमस्य न जानासि विक्रमं त्वं सुबालिश
হে পরম মূঢ়! তুমি কি ভীমের পরাক্রম জান না?
Verse 26
गच्छ तूर्ण रथेनैव यत्र तिष्तति सात्यकि:
হে ভরতনন্দন! এই রথেই শীঘ্র সেখানে যাও, যেখানে সাত্যকি দাঁড়িয়ে আছে। তুমি না থাকলে এই সমগ্র বাহিনী নিশ্চিতই পালিয়ে যাবে। নিজের স্বার্থে রণক্ষেত্রে সত্যপরাক্রমী সাত্যকির সঙ্গে যুদ্ধ কর।
Verse 27
त्वया हीन॑ बल॑ होतदू विद्रविष्यति भारत । आत्मार्थ योधय रणे सात्यकिं सत्यविक्रमम्
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! তুমি অনুপস্থিত থাকলে এই সমগ্র সেনা শীঘ্রই ভেঙে পালাবে। অতএব নিজের কল্যাণের জন্য রণক্ষেত্রে সত্যপরাক্রমী সাত্যকির সঙ্গে যুদ্ধ কর।
Verse 28
एवमुक्तस्तव सुतो नाब्रवीत् किंचिदप्यसौ । श्रुतं चाश्रुतवत् कृत्वा प्रायाद् येन स सात्यकि:
সঞ্জয় বললেন—এভাবে বলা হলেও তোমার পুত্র একটি কথাও বলল না। শোনা কথাকে অশোনা করে সে সেই পথেই রওনা হল, যে পথে সাত্যকি গিয়েছিল।
Verse 29
सैन्येन महता युक्तो म्लेच्छानामनिवर्तिनाम् । आसाद्य च रणे यत्तो युयुधानमयोधयत्
সঞ্জয় বললেন—পিছু না হটা ম্লেচ্ছদের বিশাল বাহিনীসহ সে দৃঢ় সংকল্পে রণক্ষেত্রে এগিয়ে এসে যুযুধান (সাত্যকি)-এর কাছে পৌঁছে প্রবল প্রচেষ্টায় তার সঙ্গে যুদ্ধ শুরু করল।
Verse 30
द्रोणो5पि रथिनां श्रेष्ठ; पज्चालान् पाण्डवांस्तथा । अभ्यद्रवत संक्रुद्धो जवमास्थाय मध्यमम्,इधर रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य भी क्रोधमें भरकर मध्यम वेगका आश्रय ले पांचालों और पाण्डवोंपर टूट पड़े
সঞ্জয় বললেন—রথীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ দ্রোণও ক্রোধে উদ্দীপ্ত হয়ে মধ্যম বেগ ধারণ করে পাঞ্চাল ও পাণ্ডবদের উপর ঝাঁপিয়ে পড়লেন।
Verse 31
प्रविश्य च रणे द्रोण: पाण्डवानां वरूथिनीम् । द्रावयामास योधान् वै शतशोडथ सहस्रश:,टद्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें पाण्डवोंकी विशाल सेनामें प्रवेश करके उनके सैकड़ों और हजारों सैनिकोंको भगाने लगे
সঞ্জয় বললেন—দ্রোণ রণক্ষেত্রে পাণ্ডবদের সেনাবিন্যাসে প্রবেশ করে তাদের শত শত ও সহস্র সহস্র যোদ্ধাকে ছত্রভঙ্গ করে পালাতে বাধ্য করলেন।
Verse 32
ततो द्रोणो महाराज नाम विश्नाव्य संयुगे । पाण्डुपाज्चालमत्स्यानां प्रचक्रे कदनं महत्
তখন, মহারাজ, দ্রোণ যুদ্ধক্ষেত্রে নিজের নাম ঘোষণা করতে করতে পাণ্ডব, পাঞ্চাল ও মৎস্যসেনাদের উপর মহা-সংহার আরম্ভ করলেন।
Verse 33
त॑ जयन्तमनीकानि भारद्वाजं ततस्तत: । पाज्चालपुत्रो द्युतिमान् वीरकेतु: समभ्ययात्
এদিক-ওদিক ঘুরে সর্বত্র সৈন্যদলকে পরাস্ত করে, যখন ভারদ্বাজপুত্র দ্রোণ বারবার ব্যূহ ভেঙে দিচ্ছিলেন, তখন দীপ্তিমান পাঞ্চালরাজপুত্র বীরকেতু তাঁকে সম্মুখীন হতে অগ্রসর হল।
Verse 34
स द्रोणं पञ्चभिर्विद्ध्वा शरै: संनतपर्वभि: । ध्वजमेकेन विव्याध सारथिं चास्य सप्तभि:
সে বাঁকানো গাঁটযুক্ত পাঁচটি শর দিয়ে দ্রোণকে বিদ্ধ করল; তারপর এক শর দিয়ে তাঁর ধ্বজকে এবং সাত শর দিয়ে তাঁর সারথিকেও আঘাত করল।
Verse 35
तत्राद्भुतं महाराज दृष्टवानस्मि संयुगे । यद द्रोणो रभसं युद्धे पाञ्चाल्यं नाभ्यवर्तत,महाराज! उस युद्धमें मैंने यह अद्भुत बात देखी कि द्रोणाचार्य उस वेगशाली पांचालराजकुमार वीरकेतुकी ओर बढ़ न सके
মহারাজ, সেই যুদ্ধে আমি এক আশ্চর্য ঘটনা দেখলাম—যুদ্ধের উন্মত্ত বেগে প্রবল দ্রোণও সেই পাঞ্চাল বীরের দিকে অগ্রসর হতে পারলেন না।
Verse 36
संनिरुद्ध रणे द्रोणं पडचाला बीक्ष्य मारिष । आवत्र॒ुः सर्वतो राजन् धर्मपुत्रजयैषिण:
হে মান্য রাজন, রণক্ষেত্রে দ্রোণকে অবরুদ্ধ দেখে, ধর্মপুত্রের বিজয় কামনাকারী পাঞ্চালরা চারদিক থেকে তাঁকে ঘিরে ফেলল।
Verse 37
ते शरैरग्निसंकाशैस्तोमरैश्व महाधनै: । शस्त्रैश्न विविध राजन् द्रोणममेकमवाकिरन्
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, তারা অগ্নিসদৃশ দীপ্ত বাণ, বহুমূল্য তোমর এবং নানাবিধ অস্ত্রের বর্ষণে একাকী দ্রোণকে চারদিক থেকে আচ্ছন্ন করল—যেন লৌহঝড়ে তাঁকে চাপা দিতে চায়।
Verse 38
निहत्य तान् बाणगणैद्रोणो राजन् समन्ततः । महाजलधरान् व्योम्नि मातरिश्वेव चाबभौ
সঞ্জয় বললেন—হে নরেশ্বর, দ্রোণ তাঁর বাণসমূহে চারদিক থেকে সেই অস্ত্রপ্রবাহকে খণ্ডিত করে নাশ করলেন; আকাশে বৃহৎ মেঘমণ্ডলী ছিন্নভিন্ন করে অগ্রসর হওয়া বায়ুদেবের মতো তিনি দীপ্তিমান হয়ে উঠলেন।
Verse 39
ततः शरं महाघोरं सूर्यपावकसंनिभम् । संदधे परवीरघ्नो वीरकेतो रथ॑ं प्रति
সঞ্জয় বললেন—তারপর শত্রুবীর-সংহারক দ্রোণ সূর্য ও অগ্নিসদৃশ দাহক এক মহাভয়ংকর বাণ ধনুকে সংযোজিত করে বীরকেতুর রথের দিকে নিক্ষেপ করলেন।
Verse 40
स भित्त्वा तु शरो राजन् पाज्चालकुलनन्दनम् | अभ्यागाद् धरणी तूर्ण लोहिताद्रों ज्वलन्निव
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, সেই বাণ পাঞ্চালকুলনন্দন বীরকেতুকে বিদীর্ণ করে, রক্তে সিক্ত হয়ে, যেন জ্বলতে জ্বলতে, দ্রুত ভূমিতে প্রবেশ করল।
Verse 41
ततो5पतद्ू रथात् तूर्ण पाउ्चालकुलनन्दन: । पर्वताग्रादिव महांश्वम्पको वायुपीडित:
সঞ্জয় বললেন—তারপর পাঞ্চালকুলের আনন্দ সেই রাজকুমার রথ থেকে হঠাৎই পড়ে গেল—যেন প্রবল বায়ুতে ভেঙে পাহাড়চূড়া থেকে পতিত এক বিশাল চম্পক বৃক্ষ।
Verse 42
तस्मिन् हते महेष्वासे राजपुत्रे महाबले । पजञ्चालास्त्वरिता द्रोणं समन्तात् पर्यवारयन्,उस महान् धनुर्धर महाबली राजकुमारके मारे जानेपर पांचालसैनिकोंने शीघ्र ही आकर द्रोणाचार्यको चारों ओरसे घेर लिया
সেই মহাধনুর্ধর, মহাবলী রাজপুত্র নিহত হলে পাঞ্চালরা তৎক্ষণাৎ ছুটে এসে দ্রোণকে চারদিক থেকে ঘিরে ফেলল।
Verse 43
चित्रकेतु: सुधन्वा च चित्रवर्मा च भारत । तथा चित्ररथश्चैव भ्रातृव्यसनकर्शिता:
হে ভারত! চিত্রকেতু, সুধন্বা, চিত্রবর্মা এবং চিত্ররথ—ভ্রাতৃহত্যার শোকে বিদীর্ণ হয়ে যুদ্ধাকাঙ্ক্ষায় একসঙ্গে দ্রোণের ওপর ঝাঁপিয়ে পড়ল এবং বর্ষাকালের মেঘের মতো তীরের বৃষ্টি ঝরাতে লাগল।
Verse 44
अभ्यद्रवन्त सहिता भारद्वाजं युयुत्सव:ः । मुज्चन्त: शरवर्षाणि तपान्ते जलदा इव
হে ভারত! তারা একত্রিত হয়ে যুদ্ধাকাঙ্ক্ষায় ভারদ্বাজ (দ্রোণ)-এর দিকে ধেয়ে গেল; তীরের বৃষ্টি ছুড়ে বর্ষার মেঘের মতো তাকে দগ্ধ করতে লাগল।
Verse 45
स वध्यमानो बहुधा राजपुत्रैर्महारथै: । क्रोधमाहारयत् तेषामभावाय द्विजर्षभ:,उन महारथी राजकुमारोंद्वारा बारंबार घायल किये जानेपर द्विजश्रेष्ठ द्रोणने उनके विनाशके लिये महान् क्रोध प्रकट किया
সেই মহারথী রাজপুত্রদের দ্বারা বারবার আহত হতে হতে দ্বিজশ্রেষ্ঠ দ্রোণ তাদের বিনাশের জন্য ভয়ংকর ক্রোধ ধারণ করলেন।
Verse 46
ततः शरमयं जाल द्रोणस्तेषामवासृजत् । ते हन्यमाना द्रोणस्थ शरैराकर्णचोदितै:
তখন দ্রোণ তাদের বিরুদ্ধে তীরের জালসদৃশ এক প্রবল বর্ষণ নিক্ষেপ করলেন। দ্রোণের কর্ণপর্যন্ত টানা ধনুক থেকে ছোড়া তীরে আঘাত পেয়ে তারা রণক্ষেত্রে চূর্ণ-বিচূর্ণ হয়ে বিপর্যস্ত হল।
Verse 47
तान् विमूढान् रणे द्रोण: प्रहसन्निव भारत
হে ভারত! রণক্ষেত্রে দ্রোণ যেন হাস্যরস মিশ্রিত ভঙ্গিতে সেই মোহগ্রস্ত যোদ্ধাদের সম্মুখে উপস্থিত হলেন।
Verse 48
अथापरै: सुनिशितैर्भल्लैस्तेषां महायशा:
তারপর মহাযশস্বী যোদ্ধা অন্য অতিশয় তীক্ষ্ণ ভল্ল-বাণে পুনরায় তাদের উপর আঘাত হানলেন।
Verse 49
ते रथेभ्यो हता: पेतु: क्षितो राजन् सुवर्चस:
হে রাজন! আঘাতে নিহত সেই দীপ্তিমান যোদ্ধারা রথ থেকে পড়ে ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল।
Verse 50
तान् निहत्य रणे राजन् भारद्वाज: प्रतापवान्
হে রাজন! রণে তাদের বধ করে প্রতাপশালী ভারদ্বাজপুত্র দ্রোণ মহাবীরের ন্যায় স্থির হয়ে দাঁড়ালেন।
Verse 51
कार्मुकं भ्रामयामास हेमपृष्ठं दुरासदम् । (तदस्य भ्राजते राजन् मेघमध्ये तडिद् यथा ।।
হে মহারাজ! সেই রাজপুত্রদের বধ করে প্রতাপশালী দ্রোণ স্বর্ণমণ্ডিত পৃষ্ঠবিশিষ্ট দুর্জয় ধনুক ঘোরাতে লাগলেন; হে রাজন, সে ধনুক মেঘমণ্ডলে বিদ্যুতের মতো দীপ্ত হচ্ছিল।
Verse 52
धृष्टय्युम्नो भुशोद्विग्नो नेत्राभ्यां पातयन् जलम् । अभ्यवर्तत संग्रामे क्रुद्धो द्रोणरथं प्रति
দেবতুল্য তেজস্বী পাঞ্চাল মহারথীদের নিহত হতে দেখে ধৃষ্টদ্যুম্ন গভীরভাবে বিচলিত হলেন। চোখ থেকে অশ্রু ঝরতে ঝরতে ক্রোধে দগ্ধ হয়ে তিনি পুনরায় রণক্ষেত্রে ফিরলেন এবং সোজা দ্রোণাচার্যের রথের দিকে অগ্রসর হলেন।
Verse 53
ततो हाहेति सहसा नाद: समभवन्नूप । पाज्चाल्येन रणे दृष्टवा द्रोणमावारितं शरै:,राजन! रणक्षेत्रमें धृष्टद्युम्नके बाणोंसे द्रोणाचार्यकी गति अवरुद्ध हुई देख (कौरव- सेनामें) सहसा हाहाकार मच गया
তখন, হে রাজন, হঠাৎই ‘হায়! হায়!’ বলে এক তীব্র আর্তনাদ উঠল। রণক্ষেত্রে পাঞ্চালপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্নের শরবৃষ্টিতে দ্রোণাচার্যের অগ্রগতি রুদ্ধ হতে দেখে কৌরবসেনায় হাহাকার ছড়িয়ে পড়ল।
Verse 54
स च्छाद्यमानो बहुधा पार्षतेन महात्मना । न विव्यथे ततो द्रोण: स्मयन्नेवान्वयुध्यत
মহাত্মা পৃষতপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্নের অসংখ্য শর দ্বারা বারবার আচ্ছন্ন হয়েও দ্রোণাচার্য বিন্দুমাত্র বিচলিত হলেন না। তিনি মৃদু হাসি নিয়ে যুদ্ধ চালিয়ে গেলেন।
Verse 55
ततो द्रोणं महाराज पाज्चाल्य: क्रोधमूर्च्छित: । आजपघानोरसि क्ुद्धो नवत्या नतपर्वणाम्
তারপর, হে মহারাজ, পাঞ্চালপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্ন ক্রোধে আচ্ছন্ন হয়ে, উন্মত্ত রোষে দ্রোণাচার্যের বক্ষে নব্বইটি বাঁকা-গাঁটযুক্ত শর নিক্ষেপ করে আঘাত করলেন।
Verse 56
स गाढविद्धों बलिना भारद्वाजोी महायशा: । निषसाद रथोपस्थे कश्मलं च जगाम ह,बलवान वीर धृष्टद्युम्नके द्वारा गहरी चोट पहुँचायी जानेपर महायशस्वी द्रोणाचार्य रथके पिछले भागमें बैठ गये और मूर्च्छित हो गये
বলবান ধৃষ্টদ্যুম্নের গভীর আঘাতে মহাযশস্বী ভারদ্বাজপুত্র দ্রোণাচার্য রথের পশ্চাৎভাগে বসে পড়লেন এবং মূর্ছায় আচ্ছন্ন হলেন।
Verse 57
त॑ वै तथागतं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्न: पराक्रमी । चापमुत्यृज्य शीघ्र तु असिं जग्राह वीर्यवान्,उनको उस अवस्थामें देखकर बल और पराक्रमसे सम्पन्न धृष्टद्युम्नने धनुष रख दिया और तुरंत ही तलवार हाथमें ले ली
তাঁকে সেই অবস্থায় দেখে পরাক্রমশালী ধৃষ্টদ্যুম্ন তৎক্ষণাৎ ধনুক ত্যাগ করে হাতে তরবারি তুলে নিল।
Verse 58
अवल्लुत्य रथाच्चापि त्वरित: स महारथ: । आरुरोह रथं तूर्ण भारद्वाजस्य मारिष,माननीय नरेश! महारथी धृष्टद्युम्न शीघ्र ही अपने रथसे कूदकर द्रोणाचार्यके रथपर जा चढ़े
হে মান্য রাজন! মহারথী ধৃষ্টদ্যুম্ন দ্রুত নিজের রথ থেকে লাফিয়ে নেমে ভরদ্বাজপুত্র দ্রোণের রথে উঠে পড়ল।
Verse 59
हर्तुमिच्छन् शिर: कायात् क्रोधसंरक्तलोचन: । प्रत्याश्वस्तस्ततो द्रोणो धनुर्गृ.द्दा महारवम्
রাজন! ক্রোধে রক্তচক্ষু হয়ে সে দ্রোণের মস্তক দেহ থেকে বিচ্ছিন্ন করতে উদ্যত হল। ঠিক তখনই দ্রোণ সংযতচিত্ত হলেন; মহাধ্বনিযুক্ত ধনুক তুলে, নিকটে আসা ধৃষ্টদ্যুম্নকে অল্প দূর থেকে নিক্ষিপ্ত ক্ষুদ্র বাণে বিদ্ধ করে আহত করলেন।
Verse 60
आसजन्नमागतं दृष्टवा धृष्टद्युम्न॑ जिघांसया । शरैर्वैतस्तिकै राजन् विव्याधासन्नवेधिभि:
রাজন! ধৃষ্টদ্যুম্নকে হত্যার অভিপ্রায়ে নিকটে আসতে দেখে দ্রোণ সংযত হয়ে নিকটভেদী ‘বৈতস্তিক’ বাণে তাকে বিদ্ধ করলেন।
Verse 61
योधयामास समरे धृष्टद्युम्नं महारथम् । ते हि वैतस्तिका नाम शरा आसन्नयोधिन:
তখন তিনি সমরে মহারথী ধৃষ্টদ্যুম্নের সঙ্গে যুদ্ধ করলেন; কারণ ‘বৈতস্তিক’ নামে পরিচিত সেই বাণগুলি নিকটযুদ্ধে বিশেষ কার্যকর।
Verse 62
स वध्यमानो बहुभि: सायकैस्तैर्महाबल:
সঞ্জয় বললেন—অসংখ্য শরবিদ্ধ হয়েও মহাবলী, পরাক্রমী ধৃষ্টদ্যুম্ন ঘন শরবর্ষায় বেগ রুদ্ধ হয়ে রথ থেকে লাফিয়ে নামলেন; তারপর আবার নিজের রথে উঠে মহাধনু হাতে নিয়ে সেই বীর মহারথী রণাঙ্গনে দ্রোণাচার্যকে বিদ্ধ করতে উদ্যত হলেন। হে রাজন, দ্রোণও নিজের শর দ্বারা দ্রুপদপুত্রকে আহত করলেন।
Verse 63
अवल्लुत्य रथात् तूर्ण भग्नवेग: पराक्रमी । आरुह्दु स्वरथं वीर: प्रगृह्द च महद् धनु:
বেগ ভেঙে গেলে পরাক্রমী বীর ধৃষ্টদ্যুম্ন দ্রুত রথ থেকে লাফিয়ে নামলেন। তারপর নিজের রথে উঠে মহাধনু ধারণ করে তিনি রণে দ্রোণাচার্যকে বিদ্ধ করতে অগ্রসর হলেন। দ্রোণও শরবর্ষণ করে দ্রুপদপুত্রকে আহত করলেন।
Verse 64
विव्याध समरे द्रोणं धृष्टद्युम्नो महारथ: । द्रोणश्वापि महाराज शरैरविव्याध पार्षतम्
সমরে মহারথী ধৃষ্টদ্যুম্ন দ্রোণকে শর দিয়ে বিদ্ধ করলেন। হে মহারাজ, দ্রোণও শরসমূহে পার্ষতকে (ধৃষ্টদ্যুম্নকে) আহত করলেন।
Verse 65
तदद्भुतम भूद् युद्ध द्रोणपाउचालयोस्तदा । त्रैलोक्यकाड्क्षिणोरासीच्छक्रप्रह्लादयोरिव
তখন দ্রোণ ও পাঞ্চালদের মধ্যে সেই যুদ্ধ বিস্ময়কর হয়ে উঠল। তা যেন ত্রিলোকের আধিপত্য কামনাকারী শক্র (ইন্দ্র) ও প্রহ্লাদের সংঘর্ষ।
Verse 66
जैसे त्रिलोकीके राज्यकी इच्छा रखनेवाले इन्द्र और प्रह्नादमें परस्पर युद्ध हुआ था, उसी प्रकार उस समय द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नमें अत्यन्त अद्भुत युद्ध होने लगा ।।
যেমন ত্রিলোকের রাজত্ব কামনাকারী ইন্দ্র ও প্রহ্লাদের মধ্যে একদিন পরস্পর যুদ্ধ হয়েছিল, তেমনই তখন দ্রোণাচার্য ও ধৃষ্টদ্যুম্নের মধ্যে এক অতিশয় বিস্ময়কর সমর শুরু হল। উভয়েই যুদ্ধপথ ও রণকৌশলে পারদর্শী; তাই বিচিত্র মণ্ডল, যমক ও নানা প্রকার চাল চলতে চলতে, রথ থেকে শরবর্ষণ করে একে অপরকে ক্ষতবিক্ষত করতে লাগলেন।
Verse 67
मोहयन्तौ मनांस्याजौ योधानां द्रोणपार्षतौ । सृजन्तौ शरवर्षाणि वर्षास्विव बलाहकौ,वर्षाकालके दो मेघोंके समान बाण-वर्षा करते हुए द्रोणाचार्य और धृष्टट्युम्न युद्धस्थलमें सम्पूर्ण योद्धाओंके मन मोहने लगे
রণক্ষেত্রে দ্রোণ ও পার্ষত (ধৃষ্টদ্যুম্ন) যোদ্ধাদের মন বিমোহিত করলেন; বর্ষাকালের দুই মেঘের মতো তাঁরা তীরের বৃষ্টি ঝরালেন।
Verse 68
छादयन्तौ महात्मानौ शरैव्योम दिशो महीम् । तदद्धुतं तयोर्युद्धं भूतसड्घा हापूजयन्
সেই দুই মহাত্মা তাঁদের তীরে আকাশ, দিকসমূহ ও পৃথিবী ঢেকে দিলেন। তাঁদের সেই আশ্চর্য যুদ্ধ দেখে ভূতগণ বিস্ময়ে শ্রদ্ধা নিবেদন করল।
Verse 69
वे दोनों महामनस्वी वीर अपने बाणोंद्वारा आकाश, दिशाओं तथा पृथ्वीको आच्छादित करने लगे। उन दोनोंके उस अद्भुत युद्धकी सभी प्राणियोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की ।।
মহারাজ! ক্ষত্রিয়গণ ও আপনার অন্যান্য সৈন্যরাও সেই যুদ্ধের প্রশংসা করল। আর পাঞ্চাল যোদ্ধারা উচ্চস্বরে চিৎকার করে উঠল—‘রাজন! ধৃষ্টদ্যুম্নের সঙ্গে যুদ্ধে জড়িয়ে পড়া দ্রোণ নিশ্চয়ই আমাদের বশে আসবেন।’
Verse 70
।। द्रोणस्तु त्वरितो युद्धे धृष्टय्युम्नस्य सारथे:
তখন যুদ্ধে দ্রোণ দ্রুত ধৃষ্টদ্যুম্নের সারথির দিকে মনোনিবেশ করলেন।
Verse 71
शिर: प्रच्यावयामास फलं पक्व॑ तरोरिव । इसी समय द्रोणने युद्धमें बड़ी उतावलीके साथ धृष्टद्युम्मके सारथिका सिर वृक्षके पके हुए फलके समान धड़से नीचे गिरा दिया || ७० ई ।।
তিনি তার মস্তক এমনভাবে ছিন্ন করে ফেললেন, যেন গাছ থেকে পাকা ফল ঝরে পড়ে।
Verse 72
तेषु प्रद्रवमाणेषु पडचालान् सृञ्जयांस्तथा । अयोधयदू रणे द्रोणस्तत्र तत्र पराक्रमी
সঞ্জয় বললেন—রাজন! যখন পদাতিকেরা ও সৃঞ্জয়গণ বিশৃঙ্খলভাবে পলায়ন করছিল, তখন পরাক্রমশালী দ্রোণ রণক্ষেত্রে কখনও এদিকে কখনও ওদিকে বারংবার তাদের সঙ্গে যুদ্ধ করলেন—পলায়ন দমন করে নিজের বীর্য প্রকাশ করলেন।
Verse 73
राजन! फिर तो महामना धृष्टद्युम्नके घोड़े भाग चले। उनके भाग जानेपर पराक्रमी द्रोणाचार्य रणभूमिमें सब ओर घूम-घूमकर पांचालों और सूंजयोंके साथ युद्ध करने लगे ।।
সঞ্জয় বললেন—রাজন! তখন মহাত্মা ধৃষ্টদ্যুম্নের অশ্বগুলি বিক্ষিপ্ত হয়ে পালিয়ে গেল। তারা পালিয়ে গেলে পরাক্রমী দ্রোণাচার্য রণক্ষেত্রে চারিদিকে ঘুরে ঘুরে পাঞ্চাল ও সৃঞ্জয়দের সঙ্গে যুদ্ধ করতে লাগলেন। পাণ্ডব ও পাঞ্চালদের পরাজিত করে প্রতাপশালী ভারদ্বাজপুত্র দ্রোণ—শত্রুদমনকারী—পুনরায় নিজের ব্যূহে ফিরে এসে দৃঢ়ভাবে দাঁড়ালেন। প্রভো! তখন পাণ্ডবসেনা যুদ্ধে তাঁকে জয় করার সাহস পেল না।
Verse 122
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिकप्रवेशे द्रोणपराक्रमे द्वाविंशत्यधिकशततमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বে, জয়দ্রথবধপর্বের অন্তর্গত, সাত্যকির প্রবেশ ও দ্রোণের পরাক্রম-বর্ণনায়, একশো বাইশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 126
कोडन्य: स्थास्यति संग्रामे भीतो भीते व्यपाश्रये । 'परंतु तुम आज युद्ध छोड़कर भयभीत हो उठे और शत्रुओंका हर्ष बढ़ा रहे हो। शत्रुसूदन! तुम तो सेनापति हो। तुम्हारे भागनेपर दूसरा कौन युद्धभूमिमें ठहर सकेगा? जब आश्रयदाता या रक्षक ही डर जाय
যদি আশ্রয়দাতা বা রক্ষকই ভয়ে কাঁপে, তবে আর কে যুদ্ধক্ষেত্রে দাঁড়াবে? কিন্তু আজ তুমি যুদ্ধ ত্যাগ করে ভীত হয়ে পড়েছ এবং শত্রুদের আনন্দ বাড়াচ্ছ। শত্রুসূদন! তুমি তো সেনাপতি; তুমি পালালে রণাঙ্গনে আর কে স্থির থাকবে? রক্ষকই যখন ভীত, তখন অন্যেরা কেন ভীত হবে না?
Verse 131
ननु नाम त्वया वीर दीर्यमाणा भयार्दिता । स्वबाहुबलमास्थाय रक्षितव्या हनीकिनी
সঞ্জয় বললেন—হে বীর! যখন তোমার সেনা ছিন্নভিন্ন হচ্ছিল এবং ভয়ে কাতর ছিল, তখন নিজের বাহুবলের উপর নির্ভর করে তোমারই সেই বাহিনীকে রক্ষা করা উচিত ছিল।
Verse 153
न तुल्या: सात्यकिशरा येषां भीत: पलायसे । 'रणक्षेत्रमें अर्जुनके बाण सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी हैं। उनके समान सात्यकिके बाण नहीं हैं, जिनसे भयभीत होकर तुम भागे जा रहे हो
সঞ্জয় বললেন— রণক্ষেত্রে অর্জুনের শর সূর্য ও অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান। সাত্যকির শর তাদের সমান নয়; অর্জুনের শরভয়ে তুমি পলায়ন করছ।
Verse 173
पृथिवी धर्मराजाय शमेनैव प्रदीयताम् । “यदि तुमने भागनेका ही विचार कर लिया है, तब यह पृथ्वीका राज्य शान्तिपूर्वक ही धर्मराज युधिष्ठिरको सौंप दो
সঞ্জয় বললেন— শান্তির পথেই ধর্মরাজকে এই পৃথিবীর রাজ্য সমর্পণ করো। যদি সত্যিই তোমার স্থির সিদ্ধান্ত কেবল পলায়ন হয়, তবে শান্তভাবে যুধিষ্ঠিরের হাতে রাজ্য তুলে দাও।
Verse 186
नाविशन्ति शरीरं ते तावत् संशाम्य पाण्डवै: | 'केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पोंके समान अर्जुनके बाण जबतक तुम्हारे शरीरमें नहीं घुस रहे हैं, तबतक ही तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो
সঞ্জয় বললেন— পাণ্ডবদের সঙ্গে সন্ধি করো, যতক্ষণ না অর্জুনের শর—খোলস ছেড়ে বেরোনো সাপের মতো—তোমার দেহে প্রবেশ করছে।
Verse 206
कृष्णश्व॒ समरश्लाघी तावत् संशाम्य पाण्डवै: । “जबतक धर्मपुत्र राजा युधिष्छिर तथा युद्धकी प्रशंसा करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण क्रोध नहीं करते हैं, तभीतक तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो
সঞ্জয় বললেন— ধর্মপুত্র রাজা যুধিষ্ঠির এবং সমরে বীর্যগৌরবের প্রশংসাকারী শ্রীকৃষ্ণ ক্রুদ্ধ হওয়ার আগে পাণ্ডবদের সঙ্গে সন্ধি করো; তাঁদের ক্রোধ জাগলে সন্ধি দুর্লভ হবে।
Verse 213
सोदरांस्ते न गृह्नाति तावत् संशाम्य पाण्डवै: । “जबतक महाबाहु भीमसेन विशाल कौरव-सेनामें घुसकर तुम्हारे सारे भाइयोंको दबोच नहीं लेते हैं, तभीतक तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो
সঞ্জয় বললেন— মহাবাহু ভীমসেন বিশাল কৌরবসেনায় প্রবেশ করে তোমার সহোদরদের একে একে গ্রাস করার আগে পাণ্ডবদের সঙ্গে সন্ধি করো; বিলম্বই সর্বনাশ ডেকে আনে।
Verse 243
तच्चाप्यवितथं तस्य तत् तथैव भविष्यति | “अत: अब तुम रणक्षेत्रमें धैर्य धारण करके प्रयत्नपूर्वक पाण्डवोंके साथ युद्ध करो। मैंने सुना है भीमसेन तुम्हारा भी खून पीयेंगे। भीमसेनकी वह प्रतिज्ञा झूठी नहीं है। वह उसी रूपमें सत्य होगी
সঞ্জয় বললেন—সেটিও তার ক্ষেত্রে মিথ্যা হবে না; ঠিক তেমনই ঘটবে। অতএব আজ রণক্ষেত্রে ধৈর্য ধারণ করে সর্বশক্তি দিয়ে পাণ্ডবদের সঙ্গে যুদ্ধ করো। আমি শুনেছি, ভীমসেন তোমারও রক্ত পান করবে। ভীমসেনের সেই প্রতিজ্ঞা মিথ্যা নয়; সেই রূপেই তা সত্য হবে।
Verse 463
कर्तव्यं नाभ्यजानन् वै कुमारा राजसत्तम | तब द्रोणाचार्यने उनके ऊपर बाणोंका जाल-सा बिछा दिया। नृपश्रेष्ठ! द्रोणाचार्यके कानतक खींचकर छोड़े हुए उन बाणोंद्वारा घायल होकर वे राजकुमार यह भी न जान सके कि हमें क्या करना चाहिये?
সঞ্জয় বললেন—হে রাজশ্রেষ্ঠ, সেই যুবরাজেরা কর্তব্য কী তা বুঝতে না পেরে আঘাতে বিমূঢ় হয়ে পড়ল। তখন দ্রোণাচার্য ধনুক কান পর্যন্ত টেনে তীক্ষ্ণ বাণ ছেড়ে তাদের উপর যেন শরজালের মতো বিছিয়ে দিলেন। সেই ধারালো বাণে বিদ্ধ হয়ে তারা এমন বিভ্রান্ত হল যে কী করা উচিত, তাও স্থির করতে পারল না।
Verse 473
व्यश्वसूतरथांश्ष॒क्रे कुमारान् कुपितो रणे । भरतनन्दन! रणक्षेत्रमें कुपित हुए द्रोणाचार्यने हँसते हुए-से अपने बाणोंद्वारा उन किंकर्तव्यविमूढ़ राजकुमारोंको घोड़े, सारथि तथा रथसे हीन कर दिया
সঞ্জয় বললেন—হে ভরতনন্দন! রণে ক্রুদ্ধ দ্রোণাচার্য সেই যুবরাজদের ঘোড়া, সারথি ও রথ থেকে বঞ্চিত করলেন। যুদ্ধক্ষেত্রে রাগে জ্বলতে জ্বলতে, যেন হাসিমুখে, নিজের বাণে তিনি কর্তব্যবিমূঢ় রাজপুত্রদের যুদ্ধের অবলম্বন কেড়ে নিয়ে সম্পূর্ণ অসহায় করে দিলেন।
Verse 483
पुष्पाणीव विचिन्वन् हि सोत्तमाड्ान्यपातयत् | तत्पश्चात् दूसरे तेज धारवाले भल्ल्लोंसे महायशस्वी द्रोणने उन राजकुमारोंके मस्तक उसी प्रकार काट गिराये, मानो वृक्षोंसे फूल चुन लिये हों
সঞ্জয় বললেন—তিনি যেন ফুল বাছাই করছেন, তেমনই শ্রেষ্ঠ যোদ্ধাদের একে একে মাটিতে ফেলতে লাগলেন। তারপর মহাযশস্বী দ্রোণ তীক্ষ্ণ দীপ্ত ভল্লবাণে সেই রাজপুত্রদের মস্তক কেটে ফেলে দিলেন—যেন গাছ থেকে ফুল ছিঁড়ে নেওয়া হচ্ছে।
Verse 496
देवासुरे पुरा युद्धे यथा दैतेयदानवा: । राजन! जैसे पूर्वकालके देवासुर-संग्राममें दैत्य और दानव धराशायी हुए थे, उसी प्रकार वे सुन्दर कान्तिवाले राजकुमार मारे जाकर उस समय रथोंसे पृथ्वीपर गिर पड़े
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! প্রাচীন কালে দেবাসুর-যুদ্ধে যেমন দৈত্য ও দানবরা নিপতিত হয়েছিল, তেমনই সেই দীপ্ত সৌন্দর্যধারী রাজপুত্রেরা যুদ্ধে নিহত হয়ে রথ থেকে পড়ে পৃথিবীতে লুটিয়ে পড়ল।
Verse 613
द्रोणस्य विहिता राजन यैर्धुष्टद्युम्नमाक्षिणोत् । राजन! आचार्य समरांगणमें महारथी धृष्टद्युम्नके साथ युद्ध करने लगे। निकटसे युद्ध करनेवाले द्रोणाचार्यके पास उन्हींके बनाये हुए वैतस्तिक नामक बाण थे
রাজন! দ্রোণাচার্য যে উপায়ে ধৃষ্টদ্যুম্নকে আঘাত করেছিলেন, তা পূর্বেই তিনি বিধান করেছিলেন। রাজন, আচার্য সমরাঙ্গণে মহারথী ধৃষ্টদ্যুম্নের সঙ্গে নিকটযুদ্ধে প্রবৃত্ত হলেন। দ্রোণাচার্যের কাছে তাঁরই নির্মিত ‘বৈতস্তিক’ নামক বাণ ছিল; সেই বাণে তিনি ধৃষ্টদ্যুম্নকে ক্ষত-বিক্ষত করে দিলেন।
Verse 1291
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें यात्यकिप्रवेशविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত জয়দ্রথবধপর্বে ইয়াত্যকির প্রবেশ-বিষয়ক একশ একুশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 1636
पृथिव्यां धावमानस्य नान्यत् पश्यामि जीवनम् | “वीर! जल्दी जाओ। अपनी माता गान्धारीदेवीके पेटमें घुस जाओ; अन्यथा इस भूतलपर दूसरा कोई ऐसा स्थान नहीं है
“পৃথিবীতে দৌড়াতে দৌড়াতে তোমার বাঁচার আর কোনো উপায় আমি দেখছি না। বীর! শীঘ্র যাও—তোমার মাতা গন্ধারীদেবীর গর্ভে প্রবেশ কর; নচেৎ এই ভূতলে এমন আর কোনো স্থান নেই, যেখানে পালিয়ে গিয়ে তোমার প্রাণরক্ষা হবে বলে আমার মনে হয়।”
Verse 1936
नाक्षिपन्ति महात्मानस्तावत् संशाम्य पाण्डवै: । “महामनस्वी कुन्तीकुमार जबतक तुम्हारे सौ भाइयोंको रणक्षेत्रमें मारकर यह सारी पृथ्वी तुमसे छीन नहीं लेते हैं, तभीतक तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो
“মহাত্মারা তাড়াহুড়ো করে আঘাত করেন না; আগে সংযম করে পাণ্ডবদের সঙ্গে শান্তির পথ খোঁজেন। হে কুন্তীপুত্র! যতক্ষণ না তারা রণক্ষেত্রে তোমার শত ভাইকে বধ করে এই সমগ্র পৃথিবী তোমার কাছ থেকে কেড়ে নেয়, ততক্ষণ পাণ্ডবদের সঙ্গে সন্ধি কর।”
Verse 2536
यत्त्वया वैरमारब्धं संयुगे प्रपलायिना । 'ओ मूर्ख! क्या तुम भीमसेनके पराक्रमको नहीं जानते, जो तुमने उनके साथ वैर ठाना और अब युद्धसे भागे जा रहे हो?
“তুমি—যে এখন যুদ্ধক্ষেত্র থেকে পালাচ্ছ—এই বৈরিতার সূচনা করেছিলে। হে মূঢ়! তুমি কি ভীমসেনের পরাক্রম জান না, যার সঙ্গে বৈর বেঁধে এখন তুমি রণ থেকে পলায়ন করছ?”
The tension between human agency (vows, strategy, anger) and attributed divine causality (Kṛṣṇa’s favor) is managed publicly so that responsibility, legitimacy, and discipline remain coherent for the polity and the army.
A leader sustains collective resilience by transparent gratitude, honoring contributors, and interpreting outcomes within a shared ethical-cosmological framework that reinforces unity without erasing accountability.
No formal phalaśruti is stated; the chapter’s meta-level function is narrative: it re-centers legitimacy and morale after a pivotal event and signals continued momentum within the war sequence.
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