
Droṇa-parva Adhyāya 114 — Karṇa–Bhīmasena Missile Exchange, Disarmament, and Arjuna’s Intervention
Upa-parva: Karna–Bhīmasena Saṃmukha-yuddha (Strategic Engagement Episode)
Sañjaya reports an escalating duel between Karṇa and Bhīmasena. Bhīma initially wounds Karṇa, notably striking and causing a prominent earring to fall, then presses with volleys that mark Karṇa’s forehead with embedded arrows. Karṇa responds with concentrated barrages described through solar and fire-wheel imagery, visually “covering” directions and light, emphasizing speed, density, and craftsmanship of missiles. The exchange shifts to tactical disablement: Karṇa cuts Bhīma’s quivers, bowstring, and horse-reins, kills or strikes horses and the charioteer, and severs Bhīma’s standard, forcing Bhīma into a dismounted (viratha) condition. Bhīma attempts improvised countermeasures—throwing a chariot-spear and later using shield and sword—both neutralized by Karṇa’s precision. Karṇa then uses verbal provocation to assert superiority and destabilize Bhīma’s morale. At this juncture, Arjuna (prompted by Kṛṣṇa) attacks Karṇa to relieve Bhīma, compelling Karṇa’s withdrawal. Arjuna then targets Drauṇi with a lethal nārāca; Drauṇi intercepts it, retreats into dense formations, and Arjuna continues pursuit, inflicting damage while maintaining operational pressure.
Chapter Arc: जयद्रथ-वध के लिए उद्यत अर्जुन दूर निकल चुके हैं; युधिष्ठिर की चिंता यह है कि कहीं अर्जुन अकेले शत्रु-चक्र में न घिर जाए—तभी सात्यकि को बुलाकर आदेश दिया जाता है कि वे तुरंत अर्जुन के पास पहुँचें। → सात्यकि भीतर-ही-भीतर दो निष्ठाओं का भार तौलते हैं—गुरु अर्जुन की आज्ञा और धर्मराज का शासन। वे स्पष्ट कहते हैं कि अर्जुन का वचन उनके लिए अत्यंत महत्त्व रखता है, पर युधिष्ठिर का आदेश उससे भी ‘विशिष्टतर’ है; फिर वे दूरी (तीन योजन) और समय की कसौटी पर प्रतिज्ञा करते हैं कि जयद्रथ-वध से पहले वे अर्जुन तक पहुँचेंगे। प्रस्थान के साथ ही भीम का साथ चलना और कौरव-सेना की ओर बढ़ना तनाव को युद्ध-तत्परता में बदल देता है। → सात्यकि सम्मानपूर्वक विदा लेकर, भीम की रक्षा-चिंता के बीच, कौरव-सेना को ऐसे देखते हैं जैसे व्याघ्र मृग-गण को—और अर्जुन-दर्शन की उत्कंठा तथा जयद्रथ-वध की प्रतिज्ञा के साथ वे शत्रु-व्यूह में वेगपूर्वक प्रवेश का संकल्प करते हैं। → धर्मराज की आज्ञा स्थिर हो जाती है, सात्यकि की प्रतिज्ञा बँध जाती है, और उनका प्रस्थान निर्णायक रूप से आरम्भ हो जाता है—लक्ष्य एक ही: अर्जुन तक पहुँचना और जयद्रथ-वध के प्रयत्न को सहारा देना। → सात्यकि कौरव-सेना के भीतर किस-किस रथी से टकराएँगे, और क्या वे समय रहते अर्जुन तक पहुँच पाएँगे—यही अगले प्रसंग का द्वार बनता है।
Verse 1
ऑपन--माजल बछ। अ<-छऋा दादशाधिकशततमो< ध्याय: सात्यकिकी अर्जुनके पास जानेकी तैयारी और सम्मानपूर्वक विदा होकर उनका प्रस्थान तथा साथ आते हुए भीमको कक रक्षाके लिये लौटा ना संजय उवाच धर्मराजस्य तद् वाक््यं निशम्य शिनिपुड्भव: । स पार्थाद् भयमाशंसन् _परित्यागान्महीपते:
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! ধর্মরাজের সেই কথা শুনে শিনিদের শ্রেষ্ঠ সাত্যকির মনে আশঙ্কা জাগল—রাজাকে ছেড়ে গেলে পার্থ (অর্জুন) অসন্তুষ্ট হবেন। আর বিশেষ করে তিনি নিজের জন্য লোকনিন্দার ভয় দেখতে পেলেন। তিনি ভাবলেন—“লোকে যদি আমাকে অর্জুনের দিকে যেতে দেখে, তবে বলবে—এ ভয়ে পালিয়ে গেল।”
Verse 2
अपवादं हाात्मनश्न लोकात् पश्यन् विशेषत: । ते मां भीतमिति ब्रूयुरायान्तं फाल्गुनं प्रति
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! নিজের প্রতি লোকনিন্দার আশঙ্কা বিশেষভাবে দেখে সে ভাবল—লোকেরা যদি আমাকে ফাল্গুন (অর্জুন)-এর দিকে যেতে দেখে, তবে বলবে, ‘এ তো ভয়ে পালিয়ে এসেছে।’ এইভাবে নিন্দাভয় ও মানরক্ষার চিন্তা সেই যুদ্ধক্ষণে তাকে ভারাক্রান্ত করল।
Verse 3
निश्चित्य बहुधैवं स सात्यकिर्युद्धदुर्मद: । धर्मराजमिदं वाक्यमत्रवीत् पुरुषर्षभ:,युद्धमें दुर्जय वीर पुरुषरत्न सात्यकिने इस प्रकार भाँति-भाँतिसे विचार करके धर्मराजसे यह बात कही--
সঞ্জয় বললেন—বহু দিক ভেবে স্থির সিদ্ধান্ত করে, যুদ্ধের উন্মাদনাতেও অচঞ্চল সাত্যকি ধর্মরাজকে এই কথা বলল। কর্তব্য ও পরিণাম মেপে, সেই পুরুষশ্রেষ্ঠ রণমাঝে বাক্য আরম্ভ করল।
Verse 4
कृतां चेन्मन्यसे रक्षां स्वस्ति ते5स्तु विशाम्पते । अनुयास्यामि बीभत्सुं करिष्ये वचनं तव
সাত্যকি বলল—হে প্রজানাথ! যদি আপনি আপনার রক্ষাব্যবস্থা সম্পূর্ণ হয়েছে বলে মনে করেন, তবে আপনার মঙ্গল হোক। আমি বীভৎসু (অর্জুন)-এর পশ্চাতে যাব এবং আপনার আদেশ পালন করব।
Verse 5
न हि मे पाण्डवात् वक्ित् त्रिषु लोकेषु विद्यते । यो मे प्रियतरो राजन् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते
সাত্যকি বলল—হে রাজন! আমি আপনাকে সত্য বলছি; তিন লোকের মধ্যে পাণ্ডব অর্জুনের চেয়ে আমার কাছে প্রিয় আর কোনো পুরুষ নেই।
Verse 6
तस्याहं पदवीं यास्ये संदेशात् तव मानद । त्वत्कृते न च मे किंचिदकर्तव्यं कथंचन
সাত্যকি বলল—হে মানদ! আপনার আদেশ ও বার্তা নিয়ে আমি তারই পথ অনুসরণ করব। আপনার জন্য এমন কোনো কাজ নেই, যা আমি কোনোভাবে না করতে পারি।
Verse 7
यथा हि मे गुरोरवाक्यं विशिष्टं द्विपदां वर । तथा तवापि वचन विशिष्टतरमेव मे,“नरश्रेष्ठ! मेरे गुरु अर्जुनका वचन मेरे लिये जैसा महत्त्व रखता है, आपका वचन भी वैसा ही है, बल्कि उससे भी बढ़कर है
সঞ্জয় বললেন—হে নরশ্রেষ্ঠ! যেমন আমার গুরুর বাক্য আমার কাছে বিশেষ মর্যাদাসম্পন্ন, তেমনি আপনার বাক্যও; বরং আমার কাছে তা আরও অধিক বিশিষ্ট।
Verse 8
प्रिये हि तव वर्तेते भ्रातरौ कृष्णपाण्डवौ । तयो: प्रिये स्थितं चैव विद्धि मां राजपुड़व
সঞ্জয় বললেন—হে নৃপশ্রেষ্ঠ! দুই ভাই—শ্রীকৃষ্ণ ও পাণ্ডব (অর্জুন)—আপনার প্রিয় কাজে নিয়োজিত। আর যা তাদের উভয়ের প্রিয়, তাতেই আমাকেও দৃঢ়ভাবে নিবিষ্ট বলে জানুন।
Verse 9
तवाज्ञां शिरसा गृह पाण्डवार्थमहं प्रभो । भिच््वेदं दुर्भिदं सैन्यं प्रयास्पे नरपुड़व
সঞ্জয় বললেন—প্রভু, হে নরশ্রেষ্ঠ! আপনার আজ্ঞা শিরোধার্য করে পাণ্ডবদের কল্যাণার্থে আমি যাব। এই দুর্ভেদ্য সেনাবিন্যাস ভেদ করে আমি অর্জুনের কাছে পৌঁছব।
Verse 10
द्रोणानीकं विशाम्येष क्रुद्धो झष इवार्णवम् । तत्र यास्यामि यत्रासौ राजन् राजा जयद्रथ:
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! যেমন মহামাছ সমুদ্রে ঝাঁপ দেয়, তেমনি ক্রোধে আমি দ্রোণাচার্যের সেনাবিন্যাসে প্রবেশ করি। আমি সেখানেই যাব, যেখানে সেই রাজা জয়দ্রথ আছে।
Verse 11
यत्र सेनां समाश्रित्य भीतस्तिष्ठति पाण्डवात् । गुप्तो रथवरश्रेष्ठैद्रॉणिकर्णकृपादिभि:
সঞ্জয় বললেন—পাণ্ডুনন্দন অর্জুনকে ভয় করে, নিজের সেনার আশ্রয় নিয়ে যেখানে জয়দ্রথ দাঁড়িয়ে আছে—অশ্বত্থামা, কর্ণ ও কৃপাচার্য প্রভৃতি শ্রেষ্ঠ মহারথীদের দ্বারা সুরক্ষিত—সেখানেই আমাকে পৌঁছতে হবে।
Verse 12
इतस्त्रियोजनं मन्ये तमध्वानं विशाम्पते । यत्र तिष्ठति पार्थोडसौ जयद्रथवधोद्यत:,'प्रजापालक नरेश! इस समय जहाँ जयद्रथ-वधके लिये उद्यत हुए अर्जुन खड़े हैं, उस स्थानको मैं यहाँसे तीन योजन दूर मानता हूँ
প্রজাপালক নৃপতি! আমি মনে করি, এখান থেকে তিন যোজন দূরে সেই স্থান—যেখানে জয়দ্রথ-বধে উদ্যত পার্থ অর্জুন দাঁড়িয়ে আছেন।
Verse 13
त्रियोजनगतस्यापि तसस््य यास्याम्यहं पदम् । आसैन्धववधाद् राजन सुदृढेनान्तरात्मना,“राजन! अर्जुनके तीन योजन दूर चले जानेपर भी मैं जयद्रथ-वधके पहले ही सुदृढ़ हृदयसे अर्जुनके स्थानपर पहुँच जाऊँगा
রাজন! অর্জুন তিন যোজন দূরে চলে গেলেও, আমি অন্তরের দৃঢ় সংকল্পে—সৈন্ধব-বধের আগেই—তার অবস্থানে পৌঁছে যাব।
Verse 14
अनादिष्टस्तु गुरुणा को नु युध्येत मानव: । आदिष्टस्तु यथा राजन् को न युध्येत मादृश:
নরেশ্বর! গুরুর আদেশ না পেলে কোন মানুষই বা যুদ্ধ করবে? আর গুরুর আদেশ পেলে আমার মতো বীরই বা কে যুদ্ধ থেকে সরে থাকবে?
Verse 15
अभिजानामि त॑ देशं यत्र यास्याम्यहं प्रभो । हलशक्तिगदाप्रासचर्मखड््गर्धितोमरम्
প্রভু! আমি সেই দেশকে চিনি, যেখানে আমাকে যেতে হবে—যেখানে ভূমি হাল-শস্ত্র, শক্তি, গদা, প্রাস, চর্ম, খড়্গ ও কণ্টকিত তোমরে ভরা।
Verse 16
यदेतत् कुञ्जरानीकं॑ साहस्रमनुपश्यसि
মহারাজ! আপনি যে সহস্র হাতির বাহিনী দেখছেন, এটাই কুঞ্জরানীক।
Verse 17
कुलमाञ्जनकं नाम यत्रैते वीर्यशालिन: । आस्थिता बहुभिम्लेंच्छैर्युद्धशौण्डै: प्रहारिभि:
মহারাজ! আপনি যে সহস্র সহস্র হাতির সেনা দেখছেন, তার নাম আঞ্জনককুল। সেখানে পরাক্রমশালী গজরাজেরা দাঁড়িয়ে আছে; তাদের পিঠে প্রহারকুশল ও যুদ্ধনিপুণ বহু ম্লেচ্ছ যোদ্ধা আরূঢ়।
Verse 18
नागा मेघनिभा राजन् क्षरन्त इव तोयदा: । नैते जातु निवर्तेरन् प्रेषिता हस्तिसादिभि:
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! মেঘসম শ্যাম এই গজেরা যেন জলধরের মতো ধারায় ধারায় জল ঝরাচ্ছে। মাহুত ও পরিচারকদের দ্বারা তাড়িত হলে এরা কখনোই পশ্চাদপসরণ করবে না।
Verse 19
अथ यान् रथिनो राजन् सहस्रमनुपश्यसि
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! এখন আপনি যে সহস্র রথীকে দেখছেন…
Verse 20
एते रुक्मरथा नाम राजपुत्रा महारथा: । रथेष्वस्त्रेषु निपुणा नागेषु च विशाम्पते
সঞ্জয় বললেন—হে প্রজাপতি! এরা ‘রুক্মরথ’ নামে খ্যাত রাজপুত্র মহারথী। রথ ও অস্ত্রচালনায় এরা নিপুণ, এবং গজযুদ্ধে ও হাতি পরিচালনাতেও দক্ষ।
Verse 21
“राजन! आप जिन सहस्रों रथियोंको देख रहे हैं, ये रुक्मरथ नामवाले महारथी राजकुमार हैं। प्रजानाथ! ये रथों, अस्त्रों और हाथियोंके संचालनमें भी निपुण हैं ।।
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! আপনি যে সহস্র রথীকে দেখছেন, তারা ‘রুক্মরথ’ নামে খ্যাত রাজপুত্র মহারথী। হে প্রজাপতি! তারা রথ, অস্ত্র ও হাতি পরিচালনায় নিপুণ। তারা ধনুর্বিদ্যায় পারদর্শী, মুষ্টিযুদ্ধে কুশলী, গদাযুদ্ধের বিশেষজ্ঞ এবং নিয়ুদ্ধ/মল্লযুদ্ধেও সমান প্রवीণ।
Verse 22
खड्गप्रहरणे युक्ता: सम्पाते चासिचर्मणो: । शूराश्व कृतविद्याश्च स्पर्थन्ते च परस्परम्
এরা তলোয়ারাঘাতে সুপ্রশিক্ষিত এবং তলোয়ার-ঢালের নিকট সংঘর্ষেও দক্ষ। বীর, অস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী, এবং পরস্পরের সঙ্গে যুদ্ধ-প্রতিযোগিতায় লিপ্ত থাকে।
Verse 23
नित्यं हि समरे राजन् विजिगीषन्ति मानवान् | कर्णेन विहिता राजन् दुःशासनमनुव्रता:,“नरेश्वर! ये सदा समरभूमिमें मनुष्योंको जीतनेकी इच्छा रखते हैं। महाराज! कर्णने इन्हें दःशासनका अनुगामी बना रखा है
হে রাজন! সমরে সর্বদাই এমন মানুষ থাকে যারা অন্যকে জয় করার আকাঙ্ক্ষায় দগ্ধ। আর হে মহারাজ! কর্ণের নির্দেশে এরা দুঃশাসনের অনুগামী হয়ে আছে।
Verse 24
एतांस््तु वासुदेवो5पि रथोदारान् प्रशंसति । सतत प्रियकामाश्ष् कर्णस्यैते वशे स्थिता:
এই উদার মহারথীদের প্রশংসা স্বয়ং বাসুদেব (শ্রীকৃষ্ণ)ও করেন। এরা সকলেই কর্ণের বশে আছে এবং সর্বদা তার প্রিয় সাধনে উদ্যত।
Verse 25
तस्यैव वचनाद् राजन निवृत्ता: श्वेतवाहनात् । ते न क्लान्ता न च श्रान्ता दृढावरणकार्मुका:
হে রাজন! তারই আদেশে তারা শ্বেতবাহন (অর্জুন)-এর দিক থেকে ফিরে এসেছে। তাদের বর্ম ও ধনুক অত্যন্ত দৃঢ়; তারা না ক্লান্ত, না বিচলিত।
Verse 26
मदर्थेड्धिछिता नून॑ धार्तराष्ट्रस्य शासनात् । एतान् प्रमथ्य संग्रामे प्रियार्थ तव कौरव
হে কৌরব! ধৃতরাষ্ট্রপুত্রের আদেশে নিশ্চয়ই এরা আমারই কারণে বিনাশের পথে ঠেলে দেওয়া হয়েছে। এদের যুদ্ধে চূর্ণ করে সে তোমার প্রিয় কার্য সাধন করতে চায়।
Verse 27
यांस्त्वेतानपरान् राजन् नागान् सप्त शतानिमान्
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, তুমি যে অন্য সাতশো হাতিগুলো দেখছ—সুশোভিত ও সজ্জিত, আর যাদের উপর কিরাত যোদ্ধারা আরূঢ়—এরা সেই হাতিই, যাদের পূর্বে দিগ্বিজয়ের কালে নিজের প্রাণ রক্ষার বাসনায় কিরাতরাজ সব্যসাচী অর্জুনকে উপহার দিয়েছিল। আজ সেই সুসজ্জিত হাতিগুলোই এই যুদ্ধে তোমার সহায় ও সেবক হয়ে দাঁড়িয়ে আছে।
Verse 28
प्रेक्षसे वर्मसंछन्नानू किरातैः समधिष्ठितान् । किरातराजो यानू् प्रादाद् द्विरदान् सव्यसाचिन:
তুমি দেখছ সেই হাতিগুলো—কবচে আচ্ছাদিত এবং কিরাতদের দ্বারা অধিষ্ঠিত—যে হাতিগুলো কিরাতরাজ সব্যসাচী অর্জুনকে দান করেছিল।
Verse 29
आनम्ेते पुरा राज॑स्तव कर्मकरा दृढम्
হে রাজন, এরা পূর্বে দৃঢ়ভাবে তোমার কর্মকর—তোমার অধীন সেবক—ছিল।
Verse 30
एषामेते महामात्रा: किराता युद्धदुर्मदा:
এরা তাদের মহামাত্র—কিরাত যোদ্ধা, যারা যুদ্ধের গর্বে উন্মত্ত।
Verse 31
हस्तिशिक्षाविदश्नैव सर्वे चैवाग्नियोनय: । एते विनिर्जिता: संख्ये संग्रामे सव्यसाचिना
এরা সকলেই হাতি প্রশিক্ষণ ও পরিচালনায় দক্ষ, এবং সকলেই অগ্নিজাত—অগ্নির ন্যায় তেজস্বী; তবু যুদ্ধের ময়দানে সব্যসাচী অর্জুন তাদের পরাভূত করেছিল।
Verse 32
मदर्थमद्य संयत्ता दुर्योधनवशानुगा: । एतान् हत्वा शरै राजन् किरातान् युद्धदुर्मदान्
সঞ্জয় বললেন—রাজন! আমারই কারণে আজ এরা দুর্যোধনের বশানুগ হয়ে অস্ত্র ধারণ করেছে। হে নৃপ! তোমার শরবাণে যুদ্ধ-মদে উদ্ধত এই কিরাতদের বধ করে…
Verse 33
ये त्वेते सुमहानागा अञ्जनस्य कुलोद्धवा:
সঞ্জয় বললেন—রাজন! যে মহাবলশালী গজরাজদের তুমি এখন দেখছ, তারা মহাগজ অঞ্জনের বংশজাত। স্বভাবে তারা অত্যন্ত কঠোর, যুদ্ধে সুপ্রশিক্ষিত, আর তাদের কপালদেশ ও মুখ থেকে মদধারা অবিরাম ঝরে। সকলেই শুদ্ধ স্বর্ণের বর্মে ভূষিত। নৃপ! পূর্বেও তারা রণে লক্ষ্যভেদে বিজয়ী হয়েছে, আর সমরে ঐরাবতের ন্যায় পরাক্রম প্রকাশ করে। উত্তর পর্বত (হিমালয়) থেকে আগত তীক্ষ্ণস্বভাব লুণ্ঠক ও দস্যুরা এদের পিঠে আরূঢ়।
Verse 34
कर्कशाश्च विनीताश्च प्रभिन्नकरटामुखा: । जाम्बूनदमयै: सर्वे वर्मभि: सुविभूषिता:
সঞ্জয় বললেন—এরা স্বভাবে কড়া, আবার যুদ্ধে সুপ্রশিক্ষিতও; এদের কপালদেশ ও মুখ থেকে মদ ঝরে পড়ছে। সকলেই শুদ্ধ স্বর্ণের বর্মে সুসজ্জিত।
Verse 35
लब्धलक्ष्या रणे राजन्नैरावणसमा युधि । उत्तरात् पर्वतादेते ती4&णैर्दस्युभिरास्थिता:
সঞ্জয় বললেন—রাজন! রণে লক্ষ্যসাধনে সিদ্ধ এই গজরাজেরা যুদ্ধে ঐরাবতের সমান পরাক্রমী। এরা উত্তর পর্বত (হিমালয়) থেকে এসেছে, আর তীক্ষ্ণস্বভাব দস্যু-লুণ্ঠকেরা এদের পিঠে আরূঢ়।
Verse 36
कर्कशै: प्रवरै्योधै: कार्ष्णायसतनुच्छदै: । सन्ति गोयोनयश्नात्र सन्ति वानरयोनय:
সঞ্জয় বললেন—এখানে আছে কঠোর ও শ্রেষ্ঠ যোদ্ধারা, কালো লোহার বর্মে আবৃত; আর এখানে আছে গোরূপ-যোনিজাত, এবং এখানে আছে বানর-যোনিজাতও।
Verse 37
अनीकं समवेतानां धूम्रवर्णमुदीर्यते
সঞ্জয় বললেন—সমবেত যোদ্ধাদের ঘনবদ্ধ সেনারাশি থেকে ধূসর ধোঁয়ার মতো এক মেঘ উঠল; যুদ্ধের ক্রমবর্ধমান উন্মত্ততা ও তার জাগানো ধর্ম-অধর্মের অন্ধকারের অশুভ লক্ষণ।
Verse 38
एतद् दुर्योधनो लब्ध्वा समग्र राजमण्डलम्
সঞ্জয় বললেন—এইভাবে সমগ্র রাজমণ্ডল লাভ করে, কালের প্রেরণায় দুর্যোধন নিজেকে কৃতার্থ ও সফল মনে করল। সেই দম্ভে সে পাণ্ডবদের তুচ্ছ জ্ঞান করে, মিত্রবলের এই সমবেত মহিমাকেই নিজের সিদ্ধির প্রমাণ ভাবে—যদিও তার কর্মের নৈতিক ভার অনিবার্য পরিণতির দিকে পেকে উঠছে।
Verse 39
कृपं च सौमदत्तिं च द्रोणं च रथिनां वरम् | सिन्धुराजं तथा कर्णमवमन्यत पाण्डवान्
সঞ্জয় বললেন—সে পাণ্ডবদের অবজ্ঞা করল; কৃপ, সৌমদত্তি (ভূরিশ্রবা), রথীদের শ্রেষ্ঠ দ্রোণ, সিন্ধুরাজ এবং কর্ণ—এদের সহায়তা পেয়ে তার দম্ভ আরও কঠিন হয়ে উঠল।
Verse 40
ते तु सर्वेड्द्य सम्प्राप्ता मम नाराचगोचरम्
সঞ্জয় বললেন—“কিন্তু আজ তারা সকলেই আমার তীক্ষ্ণ নারাচের নাগালের মধ্যে এসে পড়েছে।”
Verse 41
तेन सम्भाविता नित्यं परवीर्योपजीविना
সঞ্জয় বললেন—তার দ্বারা তারা সর্বদা সম্মানিত ও প্রতিপালিত ছিল—যে ব্যক্তি অন্যের বীর্য-পরাক্রমের উপর নির্ভর করেই জীবিকা নির্বাহ করত।
Verse 42
ये त्वेते रथिनो राजन् दृश्यन्ते काड्चनध्वजा:
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! ওখানে যে রথী যোদ্ধাদের দেখা যাচ্ছে, যাদের ধ্বজা সোনালি…
Verse 43
शूराश्व कृतविद्याश्व धनुर्वेदे च निछ्ठिता:
তারা ছিলেন বীর, যুদ্ধবিদ্যায় শিক্ষিত এবং ধনুর্বিদ্যায় সুপ্রতিষ্ঠিত।
Verse 44
अक्षौहिण्यश्व संरब्धा धार्तराष्ट्स्य भारत
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত, হে ভরতবংশের আনন্দ! ধৃতরাষ্ট্রের বাহিনীর বহু অক্ষৌহিণী, অশ্বসমৃদ্ধ ও সম্পূর্ণ সজ্জিত, দুর্যোধনের ক্রোধে দগ্ধ হয়ে, কৌরব বীরদের রক্ষায় আমারই উদ্দেশ্যে প্রস্তুত দাঁড়িয়ে আছে। হে মহারাজ! তারা সকলেই সতর্ক ও উদ্যত হয়ে কেবল আমার উপরই ঝাঁপিয়ে পড়তে চায়।
Verse 45
यत्ता मदर्थे तिष्ठन्ति कुरुवीराभिरक्षिता: । अप्रमत्ता महाराज मामेव प्रत्युपस्थिता:
তারা আমারই উদ্দেশ্যে উদ্যত হয়ে দাঁড়িয়ে আছে, কৌরব বীরদের দ্বারা রক্ষিত। হে মহারাজ! তারা সকলেই সতর্ক হয়ে কেবল আমার প্রতিই ধেয়ে আসতে প্রস্তুত।
Verse 46
तानहं प्रमथिष्यामि तृणानीव हुताशन: । तस्मात् सर्वानुपासंगान् सर्वोपकरणानि च
আমি তাদের চূর্ণ করব, যেমন প্রজ্বলিত অগ্নি শুকনো তৃণকে গ্রাস করে। অতএব, সকল আসক্তি এবং সকল উপকরণ (কার্যসাধন) একত্র করে প্রস্তুত রাখো।
Verse 47
अस्मिंस्तु किल सम्मर्दे ग्राह्में विविधमायुधम्
সঞ্জয় বললেন—সেই ভয়ংকর সংঘর্ষে, যেন গ্রামসম ঘন জনসমাবেশ; সেখানে নানাবিধ অস্ত্র হাতে হাতে কেড়ে নিয়ে চালানো হচ্ছিল।
Verse 48
काम्बोजै्हि समेष्यामि तीक्ष्णराशीविषोपमै:
সঞ্জয় বললেন—“আমি কাম্বোজদের সঙ্গে অগ্রসর হব—তারা তীক্ষ্ণ বিষরাশির মতোই প্রাণঘাতী।”
Verse 49
नानाशस्त्रसमावायैर्विविधायुधयोधिभि: । “आज मैं विषधर सर्पके समान क्रूर स्वभाववाले उन काम्बोज-सैनिकोंके साथ युद्ध करूँगा, जो नाना प्रकारके शस्त्रसमुदायोंसे सम्पन्न और भाँति- भाँतिके आयुधोंद्वारा युद्ध करनेमें कुशल हैं ।।
সঞ্জয় বললেন—“আমি সেই কিরাতদের সঙ্গেও যুদ্ধে প্রবৃত্ত হব—যারা নানাবিধ অস্ত্রসম্ভারে সমৃদ্ধ, বিচিত্র অস্ত্রপ্রয়োগে দক্ষ, আর যাদের আঘাত বিষের মতো।”
Verse 50
शकैश्नापि समेष्यामि शक्रतुल्यपराक्रमै:
সঞ্জয় বললেন—“আমি শকদের সঙ্গেও যুদ্ধে প্রবৃত্ত হব—যাদের পরাক্রম ইন্দ্রসম।”
Verse 51
तथान्यैरविविधैर्योचै: कालकल्पैर्दुरासदै:
সঞ্জয় বললেন—“তদ্রূপ আরও নানা উপায়ে—দ্রুতগামী অশ্বের ভরসায় এবং কালসিদ্ধ, দুর্ভেদ্য যুদ্ধবিন্যাসে—যোদ্ধারা এমন চাপ বাড়াল যে শত্রুর পক্ষে তা সহ্য করা কঠিন হল।”
Verse 52
समेष्यामि रणे राजन् बहुभिरययुद्धदुर्मदै: । 'राजन्! इनके सिवा और भी जो नाना प्रकारके बहुसंख्यक युद्धदुर्मद
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, রণক্ষেত্রে যুদ্ধগর্বে উন্মত্ত বহু যোদ্ধার সঙ্গে আমি সম্মুখীন হব।
Verse 53
संजय उवाच तस्य सर्वानुपासंगान् सर्वोपकरणानि च
সঞ্জয় বললেন—তার সমস্ত সহায়ক সামগ্রী এবং সব রকম উপকরণও।
Verse 54
ततस्तानू सर्वतो युक्तान् सदश्वां श्वतुरो जना:
সঞ্জয় বললেন—তারপর সেই লোকেরা চারদিক থেকে সুসজ্জিত হয়ে, উৎকৃষ্ট অশ্বে যুক্ত হয়ে প্রস্তুত হল।
Verse 55
रसवत् पाययामासु: पान॑ मदसमीरणम् | तदनन्तर सब प्रकारसे सुशिक्षित उन चारों उत्तम घोड़ोंको सेवकोंने मदमत्त बना देनेवाला रसीला पेय पदार्थ पिलाया || ५४ $ ।।
সঞ্জয় বললেন—তারপর পরিচারকেরা সেই চারটি উৎকৃষ্ট, সুপ্রশিক্ষিত ঘোড়াকে মত্ততা জাগানো রসাল পানীয় পান করাল। পান করে তারা তৃপ্ত হল; তাদের স্নান করানো হল, খাদ্য দেওয়া হল এবং সুন্দরভাবে অলংকৃত করা হল।
Verse 56
विनीतशल्यांस्तुरगां श्षतुरो हेममालिन: । तान् युक्तान् रुक्मवर्णाभान् विनीतान् शीघ्रगामिन:
সঞ্জয় বললেন—তারপর সোনার মালায় ভূষিত, সাজ-সরঞ্জাম ঠিকমতো বাঁধা, শৃঙ্খলিত ও দ্রুতগামী, স্বর্ণাভ দীপ্তিতে উজ্জ্বল সেই চারটি ঘোড়াকে জোয়ালে জুড়ে দেওয়া হল।
Verse 57
संहृष्टमनसो व्यग्रान् विधिवत्कल्पितान् रथे । महाध्वजेन सिंहेन हेमकेसरमालिना
সঞ্জয় বললেন—আনন্দে উল্লসিত, তবু সতর্ক ও তৎপর মনে তারা বিধিমতে রথে সুসজ্জিত হল। সেই রথে সিংহচিহ্নযুক্ত মহাধ্বজ ছিল এবং স্বর্ণকেশর-সদৃশ ঝালরের মালায় তা শোভিত ছিল।
Verse 58
संवृते केतकैहेंमैर्मणिविद्रुमचित्रितै: । पाण्डुरा भ्रप्रकाशाभि: पताकाभिरलंकृते
সঞ্জয় বললেন—সে রথটি স্বর্ণময় কেতক অলংকারে আচ্ছাদিত, মণি ও প্রবালে বিচিত্রিত, এবং ধবল মেঘের দীপ্তির মতো উজ্জ্বল পতাকায় অলংকৃত ছিল।
Verse 59
हेमदण्डोच्छ्ितच्छत्रे बहुशस्त्रपरिच्छदे । योजयामास विधिवद्धेमभाण्डविभूषितान्
সঞ্জয় বললেন—স্বর্ণদণ্ডে উত্তোলিত ছত্র, এবং বহু অস্ত্র ও উপকরণে সমৃদ্ধ সেই রথে তিনি তাদের বিধিমতে জুড়ে দিলেন, স্বর্ণময় সাজ-সরঞ্জামে ভূষিত করে।
Verse 60
जब वे पी चुके तो उन्हें टहलाया और नहलाया गया। उसके बाद दाना और चारा खिलाया गया। फिर उन्हें सब प्रकारसे सुसज्जित किया गया। उनके अंगोंमें गड़े हुए बाण पहले ही निकाल दिये गये थे। वे चारों घोड़े सोनेकी मालाओंसे विभूषित थे। उन योग्य अश्वोंकी कान्ति सुवर्णके समान थी। वे सुशिक्षित और शीघ्रगामी थे। उनके मनमें हर्ष और उत्साह था। तनिक भी व्यग्रता नहीं थी। उन्हें विधिपूर्वक सजाया गया था। स्वर्णमय अलंकारोंसे अलंकृत उन अभश्वोंको सारथिने विधिपूर्वक रथमें जोता। वह रथ सुवर्णमय केशरोंसे सुशोभित सिंहके चिह्लवाले विशाल ध्वजसे सम्पन्न था। मणियों और मूँगोंसे चित्रित सोनेकी शलाकाओंसे शोभायमान एवं श्वेत पताकाओंसे अलंकृत था। उस रथके ऊपर स्वर्णमय दण्डसे विभूषित छत्र तना हुआ था तथा रथके भीतर नाना प्रकारके शस्त्र तथा अन्य आवश्यक सामान रखे गये थे ।। ५५-- ५९ || दारुकस्यानुजो भ्राता सूतस्तस्य प्रिय: सखा । न्यवेदयद् रथं युक्त वासवस्येव मातलि:
সঞ্জয় বললেন—ঘোড়াগুলি জল পান করলে তাদের হাঁটানো ও স্নান করানো হল; তারপর দানা-চারা খাইয়ে সর্বতোভাবে সুসজ্জিত করা হল। তাদের দেহে গেঁথে থাকা বাণগুলি আগেই বের করে দেওয়া হয়েছিল। চারটি ঘোড়াই স্বর্ণমালায় ভূষিত; সুপ্রশিক্ষিত ও দ্রুতগামী সেই অশ্বদের কান্তি ছিল স্বর্ণসম। তাদের মনে ছিল হর্ষ ও উদ্যম; বিন্দুমাত্র ব্যগ্রতা ছিল না। বিধিমতে সাজানো, স্বর্ণালংকারে অলংকৃত সেই অশ্বদের সারথি বিধিপূর্বক রথে জুড়ে দিল। সেই রথে স্বর্ণকেশর-শোভিত সিংহচিহ্নযুক্ত মহাধ্বজ ছিল; মণি ও প্রবালে চিত্রিত স্বর্ণশলাকায় দীপ্ত, শ্বেত পতাকায় অলংকৃত, স্বর্ণদণ্ডে উত্তোলিত ছত্রে আচ্ছাদিত; এবং ভিতরে নানা প্রকার অস্ত্র ও প্রয়োজনীয় সামগ্রী রাখা ছিল। তারপর দারুকের অনুজ ভ্রাতা—যে ছিল তার সূত, প্রিয় সখা এবং সাত্যকির সারথি—জানাল যে রথটি জুড়ে প্রস্তুত, যেমন বাসব (ইন্দ্র)-এর সারথি ও বন্ধু মাতলি।
Verse 61
ततः स्नात: शुचिर्भूत्वा कृतकौतुकमज़ल: । स््नातकानां सहस्रस्य स्वर्णनिष्कानथो ददौ
সঞ্জয় বললেন—তারপর স্নান করে শুচি হয়ে, যাত্রাকালীন মঙ্গলকর্ম সম্পন্ন করে, তিনি এক সহস্র স্নাতককে স্বর্ণনিষ্ক দান করলেন।
Verse 62
आशीवदि: परिष्वक्तः सात्यकि: श्रीमतां वर: । ततः स मधुपर्कार्ह: पीत्वा कैलातकं मधु
ব্রাহ্মণদের আশীর্বাদ ও আলিঙ্গনে সম্মানিত, শ্রীমানদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ এবং মধুপর্কের যোগ্য সাত্যকি তারপর ‘কৈলাতক’ নামে মধু পান করল।
Verse 63
लोहिताक्षो बभौ तत्र मदविद्वललोचन: । आलकभ्य वीरकांस्यं च हर्षण महतान्वित:
সেখানে তার চোখ লাল হয়ে উঠল, মদের প্রভাবে দৃষ্টি অস্থির হল। মহা হর্ষে পরিপূর্ণ হয়ে সে বীরকাঁস্য-পাত্র স্পর্শ/ধারণ করল।
Verse 64
द्विगुणीकृततेजा हि प्रज्वलन्निव पावक: । उत्सड्गे धनुरादाय सशरं रथिनां वर:
রথীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ সাত্যকির তেজ যেন জ্বলন্ত অগ্নির মতো দ্বিগুণ হল। সে তীরসহ ধনুক কোলে তুলে ধরল।
Verse 65
कृतस्वस्त्ययनो विप्रै: कवची समलंकृतः । लाजैर्गन्धैस्तथा माल्यै: कन्याभिक्षाभिनन्दित:
বিপ্রদের দ্বারা স্বস্তিবাচনাদি মঙ্গলকর্ম সম্পন্ন হলে, কবচধারী ও অলংকৃত সাত্যকিকে লাজা, সুগন্ধি দ্রব্য ও মালা দিয়ে পূজা করা হল; কুমারীরা ভিক্ষা/উপহার দিয়ে তাকে অভিনন্দিত করল।
Verse 66
युधिष्ठटिरस्थ चरणावभिवाद्य कृताञ्जलि: । तेन मूर्थन्युपाप्रात आरुरोह महारथम्
তারপর সাত্যকি করজোড়ে যুধিষ্ঠিরের চরণে প্রণাম করল। যুধিষ্ঠির স্নেহভরে তার মস্তক শুঁকে আশীর্বাদ করলেন; এরপর সে মহারথে আরোহণ করল।
Verse 67
ततस्ते वाजिनो हृष्टा: सुपुष्टा: वातरंहस: । अजय्या जैत्रमूहुस्तं विकुर्वाणा: सम सैन्धवा:,तदनन्तर वे हृष्ट-पुष्ट वायुके समान वेगशाली एवं अजेय सिंधुदेशीय घोड़े मदमत्त हो उस विजयशील रथको लेकर चल दिये
তারপর হৃষ্ট-পুষ্ট, বায়ুর ন্যায় বেগবান ও অজেয় সিন্ধুদেশীয় অশ্বেরা গর্বে উল্লসিত হয়ে সেই বিজয়ী রথকে বহন করে এগিয়ে চলল।
Verse 68
तथैव भीमसेनो<पि धर्मराजेन पूजित: । प्रायात् सात्यकिना सार्थमभिवाद्य युधिष्टिरम्,इसी प्रकार धर्मराजसे सम्मानित भीमसेन भी युधिष्ठिरको प्रणाम करके सात्यकिके साथ चले
তেমনি ধর্মরাজের দ্বারা সম্মানিত ভীমসেনও যুধিষ্ঠিরকে প্রণাম করে সাত্যকির সঙ্গে যাত্রা করল।
Verse 69
तौ दृष्टवा प्रविविक्षन्ती तव सेनामरिंदमौ । संयत्तास्तावका: सर्वे तस्थुद्रोणपुरोगमा:
সেই দুই শত্রুদমন বীরকে তোমার সেনায় প্রবেশ করতে উদ্যত দেখে দ্রোণাচার্যকে অগ্রে রেখে তোমার সকল সৈন্য সতর্ক হয়ে দাঁড়াল।
Verse 70
संनद्धमनुगच्छन्तं दृष्टवा भीमं स सात्यकि: । अभिनन्द्राब्रवीद् वीरस्तदा हर्षकरं वच:
সেই সময় বর্ম-অস্ত্রে সজ্জিত ভীমকে পেছনে আসতে দেখে বীর সাত্যকি তাঁকে অভিনন্দন জানিয়ে আনন্দবর্ধক বাক্য বলল।
Verse 71
त्वं भीम रक्ष राजानमेतत् कार्यतमं हि ते । अहं भित्त्वा प्रवेक्ष्यामि कालपक्वमिदं बलम्
‘হে ভীম, রাজা যুধিষ্ঠিরকে রক্ষা কর—এটাই তোমার সর্বোচ্চ কর্তব্য। আর আমি কাল দ্বারা পরিপক্ব এই সেনাবাহিনীকে ভেদ করে ভিতরে প্রবেশ করব।’
Verse 72
आयत्यां च तदात्वे च श्रेयो राज्ञोडभिरक्षणम् | जानीषे मम वीर्य त्वं तव चाहमरिंदम
ভবিষ্যৎ ও বর্তমান—উভয় সময়েই রাজার রক্ষা তোমার দ্বারাই শ্রেয়। তুমি আমার বীর্য জানো, আর আমি তোমার বীর্য জানি, হে শত্রুদমন।
Verse 73
तथोक्त: सात्यकिं प्राह व्रज त्वं कार्यसिद्धये
এভাবে বলা হলে তিনি সাত্যকিকে বললেন—“যাও, যাতে কাজ সিদ্ধ হয়।”
Verse 74
अहं राज्ञ: करिष्यामि रक्षां पुरुषसत्तम | सात्यकिके ऐसा कहनेपर भीमसेनने उनसे कहा--'अच्छा भैया! तुम कार्यसिद्धिके लिये आगे बढ़ो। पुरुषप्रवर! मैं राजाकी रक्षा करूँगा” || ७३ $ ।।
“হে পুরুষশ্রেষ্ঠ! আমি রাজার রক্ষা করব।” এ কথা বলার পরও ভীমসেন তাঁকে বললেন—“ভাল, ভ্রাতা! কার্যসিদ্ধির জন্য তুমি অগ্রসর হও। হে পুরুষপ্রবর! আমি রাজার প্রহরা করব।” এভাবে সম্বোধিত হয়ে সেই মাধব (কৃষ্ণ) ভীমসেনকে প্রত্যুত্তর দিলেন।
Verse 75
यन्मे गुणानुरक्तश्न त्वमद्य वशमास्थित:
“ভীমসেন! তুমি আমার গুণে অনুরক্ত হয়ে আজ আমার বশে এসেছ; আর এই মুহূর্তে যে শুভ লক্ষণগুলি দেখা দিচ্ছে, সেগুলিও তাই জানাচ্ছে। তাই মনে হয়—মহাত্মা অর্জুন পাপী জয়দ্রথকে বধ করলে আমি নিশ্চিতই ফিরে এসে ধর্মাত্মা রাজা যুধিষ্ঠিরকে আলিঙ্গন করব।”
Verse 76
निमित्तानि च धन्यानि यथा भीम वदन्ति माम् । निहते सैन्धवे पापे पाण्डवेन महात्मना
“ভীম যেমন আমাকে বলছে, তেমনই লক্ষণগুলি ধন্য ও শুভ—কারণ মহাত্মা পাণ্ডব সেই পাপী সৈন্ধবকে নিধন করেছেন।”
Verse 77
एतावदुक्त्वा भीम॑ तु विसृज्य च महायशा:
সঞ্জয় বললেন—এতটুকু বলেই মহাযশস্বী বীর ভীমকে মুক্ত করে দিলেন এবং তাকে যেতে দিলেন; যুদ্ধের হিংসার মাঝেও সংযম রেখে তিনি সেই কথোপকথনের ইতি টানলেন।
Verse 78
त॑ं दृष्टवा प्रविविक्षन्तं सैन्यं तव जनाधिप,भूय एवाभवन्मूढं सुभृशं चाप्यकम्पत । नरेश्वर! सात्यकिको अपने भीतर प्रवेश करनेके लिये उत्सुक देख आपकी सेनापर पुनः: मोह छा गया और वह बारंबार काँपने लगी
সঞ্জয় বললেন—হে জনাধিপ! সাত্যকিকে তোমার সৈন্যদলে প্রবেশ করতে উদ্গ্রীব দেখে তোমার সেনা আবার মোহগ্রস্ত হলো এবং প্রবলভাবে কাঁপতে লাগল।
Verse 79
।। ततः प्रयात: सहसा तव सैन्यं स सात्यकि:
সঞ্জয় বললেন—তখন সাত্যকি বিলম্ব না করে হঠাৎই তোমার সেনার দিকে অগ্রসর হলো।
Verse 111
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें युधिष्ठिर और सात्यकिका संवादविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত জয়দ্রথবধপর্বে যুধিষ্ঠির ও সাত্যকির সংলাপবিষয়ক একশো এগারোতম অধ্যায় সমাপ্ত হলো।
Verse 112
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिक््रवेशे दादशाधिकशततमो<ध्याय:
ইতি শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত জয়দ্রথবধপর্বে সাত্যকিপ্রবেশবিষয়ক একশো বারোতম অধ্যায়।
Verse 153
इष्वस्त्रवरसम्बाधं क्षोभयिष्ये बलार्णवम् | 'प्रभो! मुझे जहाँ जाना है
সঞ্জয় বললেন—উত্তম ধনুর্বাণ ও নানাবিধ অস্ত্রশস্ত্রে ঘনসন্নিবিষ্ট শত্রুসেনা-রূপী সেই বলসমুদ্রকে আমি মথিত করে প্রবলভাবে ক্ষুব্ধ করে তুলব।
Verse 183
अन्यत्र हि वधादेषां नास्ति राजन् पराजय: । 'राजन्! ये हाथी मेघोंकी घटाके समान दिखायी देते हैं और पानी बरसानेवाले बादलोंके समान मदकी वर्षा करते हैं। हाथीसवारोंके हाँकनेपर ये कभी युद्धसे पीछे नहीं हटते हैं। महाराज! वधके अतिरिक्त और किसी उपायसे इनकी पराजय नहीं हो सकती
সঞ্জয় বললেন—রাজন! এদের পরাজিত করার উপায় বধ ব্যতীত আর নেই; যুদ্ধের ঘোর চাপে এরা ভয়ে নত হয় না, কেবল হটিয়ে দিলেও দমে না—ধ্বংসই এদের পরাজয়।
Verse 266
प्रयास्यामि तत: पश्चात् पदवीं सव्यसाचिन: । 'दुर्योधनके आदेशसे ये निश्चय ही मुझसे युद्ध करनेके लिये खड़े हैं। कुरुनन्दन! मैं आपका प्रिय करनेके लिये इन सबको संग्राममें मथकर सव्यसाची अर्जुनके मार्गपर जाऊँगा
সঞ্জয় বললেন—তারপর আমি সব্যসাচী অর্জুনের পথেই অগ্রসর হব। দুর্যোধনের আদেশে যারা দৃঢ়সংকল্পে আমার সঙ্গে যুদ্ধ করতে দাঁড়িয়েছে, হে কুরু-নন্দন, তোমার অভিপ্রায় সিদ্ধ করতে আমি তাদের রণক্ষেত্রে মথিত করব, তারপর অর্জুনের পথ ধরব।
Verse 283
स्वलंकृतांस्तदा प्रेष्पानिच्छन् जीवितमात्मन: । “महाराज! जिन दूसरे इन सात सौ हाथियोंको आप देख रहे हैं
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! আপনি যে আরও সাতশো হাতি দেখছেন—কবচে আচ্ছাদিত, সুসজ্জিত এবং কিরাত যোদ্ধাদের আরূঢ়—এরা সেই হাতিগণই, যাদের দিগ্বিজয়ের সময় প্রাণরক্ষার আশায় কিরাতরাজ সব্যসাচী অর্জুনকে উপহার দিয়েছিল। সে সময়ে, রাজন, এরা আপনার সেবায় ছিল।
Verse 296
त्वामेवाद्य युयुत्सन्ते पश्य कालस्य पर्ययम् । “महाराज! यह कालचक्रका परिवर्तन तो देखिये--जो पूर्वकालमें दृढ़तापूर्वक आपकी सेवा करनेवाले थे, वे आज आपफसे ही युद्ध करना चाहते हैं
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! আজ তারা কেবল আপনার সঙ্গেই যুদ্ধ করতে চায়; কালের এই উলটফের দেখুন—যারা একদা দৃঢ় ভক্তিতে আপনার সেবা করত, আজ তারাই রণে আপনার সম্মুখে দাঁড়িয়েছে।
Verse 366
अनेकयोनयश्चान्ये तथा मानुषयोनय: । 'वे कर्कश स्वभाववाले तथा श्रेष्ठ योद्धा हैं। उन्होंने काले लोहेके बने हुए कवच धारण कर रखे हैं। उनमेंसे बहुत-से दस्यु गायोंके पेटसे उत्पन्न हुए हैं। कितने ही बंदरियोंकी संतानें हैं। कुछ ऐसे भी हैं
আরও অনেকে আছে, যারা নানা বিচিত্র ও মিশ্র যোনি থেকে জন্মেছে; আবার কেউ কেউ মানবযোনিজাত। তারা স্বভাবে রূঢ়, তবু শ্রেষ্ঠ যোদ্ধা; কালো লোহার নির্মিত বর্ম ধারণ করে আছে। তাদের মধ্যে বহু দস্যু গাভীর গর্ভ থেকে উৎপন্ন, কতক বানরীর সন্তান; আবার কারও মধ্যে বহু যোনির সংমিশ্রণ, এবং অনেকেই মানবসন্তান।
Verse 373
म्लेच्छानां पापकर्तुणां हिमदुर्गनिवासिनाम् । “यहाँ एकत्र हुए हिमदुर्गनिवासी पापाचारी म्लेच्छोंकी यह सेना धूएँके समान काली प्रतीत होती है
হিমাবৃত দুর্গে বসবাসকারী পাপাচারী ম্লেচ্ছদের এই সেনা এখানে সমবেত হয়েছে; ধোঁয়ার স্তূপের মতো কালো দেখায়।
Verse 396
कृतार्थमथ चात्मानं मन््यते कालचोदित: । “कालसे प्रेरित हुआ दुर्योधन इन समस्त राजाओंके समुदायको तथा रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य
কালের প্রেরণায় দুঃশাসিত দুঃর্যোধন নিজেকে কৃতার্থ মনে করে। এই রাজসমূহের সমাবেশ এবং রথীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ দ্রোণাচার্য, কৃপাচার্য, ভুরিশ্রবা, জয়দ্রথ ও কর্ণকে পেয়ে সে পাণ্ডবদের অবমাননা করে, আর নিজের উদ্দেশ্য সিদ্ধ হয়েছে বলে ভাবে।
Verse 403
न विमोक्ष्यन्ति कौन्तेय यद्यपि स्युर्मनोजवा: । “कुन्तीनन्दन! वे सब लोग आज मेरे नाराचोंके लक्ष्य बने हुए हैं। वे मनके समान वेगशाली हों तो भी मेरे हाथोंसे छूट नहीं सकेंगे
হে কুন্তীনন্দন! আজ তারা সকলেই আমার নারাচের লক্ষ্য হয়েছে; মনসম বেগবান হলেও তারা আমার হাত থেকে রেহাই পাবে না।
Verse 413
विनाशमुपयास्यन्ति मच्छरौघनिपीडिता: । 'दूसरोंके बलपर जीनेवाले दुर्योधनने इन सब लोगोंका सदा आदसरपूर्वक भरण-पोषण किया है; परंतु ये मेरे बाणसमूहोंसे पीड़ित होकर आज विनष्ट हो जायँगे
আমার তীরবৃষ্টির চাপে পিষ্ট হয়ে তারা বিনাশের পথে যাবে। পরের বলের ওপর নির্ভরশীল দুর্যোধন তাদের সর্বদা বাহ্যিক সম্মান দিয়ে পালন করেছে; তবু আজ আমার শরবৃষ্টিতে পীড়িত হয়ে তারা সকলেই ধ্বংস হবে।
Verse 423
एते दुर्वारणा नाम काम्बोजा यदि ते श्रुता: । “राजन! ये जो सोनेकी ध्वजावाले रथी दिखायी देते हैं, ये दुर्वारण नामवाले काम्बोज सैनिक हैं। आपने इनका नाम सुना होगा
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, এরা দুর্বারণ নামে খ্যাত কাম্বোজ রথী—যাদের দমন করা ও পরাজিত করা দুরূহ; তাদের নাম আপনি নিশ্চয়ই শুনেছেন।
Verse 433
संहताश्न भशं होते अन्योन्यस्य हितैषिण: । 'ये शूर, विद्वान् तथा धरनुर्वेदमें परिनिष्ठित हैं। इनमें परस्पर बड़ा संगठन है। ये एक-दूसरेका हित चाहनेवाले हैं
সঞ্জয় বললেন—তারা পরস্পরের মঙ্গলকামী, ঘনিষ্ঠভাবে ঐক্যবদ্ধ এবং অত্যন্ত উল্লসিত ছিল। তারা বীর, বিদ্বান এবং ধনুর্বিদ্যায় সুপ্রতিষ্ঠিত।
Verse 463
रथे कुर्वन्तु मे राजन् यथावद् रथकल्पका: । 'परंतु जैसे आग तिनकोंको जला डालती है
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, রথ-নির্মাতা ও পরিচারকেরা যথাবিধি ও যথাক্রমে আমার রথটি সুসজ্জিত করুক।
Verse 476
यथोपदिष्टमाचार्य: कार्य: पजचगुणो रथ: । “इस संग्राममें नाना प्रकारके आयुधोंका उसी प्रकार संग्रह कर लेना चाहिये
সঞ্জয় বললেন—আচার্যরা যেমন উপদেশ দিয়েছেন, রথ তেমনই প্রস্তুত করা উচিত। এই যুদ্ধে নানা প্রকার অস্ত্র সেই বিধি অনুসারে সংগ্রহ করে যথাক্রমে সাজাতে হবে, এবং রথে রাখা যুদ্ধ-উপকরণ আগেভাগেই পাঁচগুণ করে রাখতে হবে।
Verse 493
लालितै: सतत राज्ञा दुर्योधनहितैषिभि: । “दुर्योधनका हित चाहनेवाले और विषके समान घातक उन प्रहारकुशल किरात-योद्धाओंके साथ भी संग्राम करूँगा, जिनका राजा दुर्योधनने सदा ही लालन-पालन किया है
সঞ্জয় বললেন—আমি সেই কিরাত যোদ্ধাদের সঙ্গেও যুদ্ধ করব, যারা আঘাতে দক্ষ, বিষের মতো প্রাণঘাতী, দুর্যোধনের মঙ্গলকামী, এবং যাদের রাজা সর্বদা লালন-পালন করেছেন।
Verse 506
अग्निकल्पैर्दरा धर्ष: प्रदीप्तिरिव पावकै: । 'प्रजलित अग्निके समान तेजस्वी, दुर्धर्ष एवं इन्द्रके समान पराक्रमी शकोंके साथ भी आज मैं भिड़ जाऊँगा
সঞ্জয় বললেন—তিনি প্রজ্বলিত অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান, শিখার মতো জ্যোতির্ময় এবং অদম্য। ইন্দ্রসম পরাক্রমী, উগ্র শকগণের বিরুদ্ধেও আজ আমি সমরে অবতীর্ণ হব।
Verse 523
उपावत्ताश्न पीताश्न पुनर्युज्यन्तु मे रथे । “इसलिये उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न श्रेष्ठ घोड़े, जो विश्राम कर चुके हों, जिन्हें ट॒हलाया गया हो और पानी भी पिला दिया गया हो, पुनः मेरे रथमें जोते जायूँ
সঞ্জয় বললেন—অতএব আমার রথে পুনরায় জোতা হোক সেই উৎকৃষ্ট লক্ষণযুক্ত শ্রেষ্ঠ অশ্বগণ—যারা বিশ্রাম নিয়েছে, হাঁটিয়ে দেওয়া হয়েছে এবং জল পান করেছে।
Verse 536
रथे चास्थापयद् राजा शस्त्राणि विविधानि च | संजय कहते हैं--महाराज! तदनन्तर राजा युधिष्ठटिरने सात्यकिके रथपर भरे हुए तरकसों, समस्त उपकरणों तथा भाँति-भाँतिके शस्त्रोंको रखवा दिया
সঞ্জয় বললেন—তারপর রাজা রথের উপর তূণীরসহ সমস্ত উপকরণ এবং নানাবিধ অস্ত্র স্থাপন করালেন।
Verse 726
तस्माद् भीम निवर्तस्व मम चेदिच्छसि प्रियम् । “शत्रुदमन वीर! इस समय और भविष्यमें भी राजाकी रक्षा करना ही श्रेयस्कर है। तुम मेरा बल जानते हो और मैं तुम्हारा। अतः भीमसेन! यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो लौट जाओ
সঞ্জয় বললেন—অতএব, হে ভীম, যদি আমার প্রিয় করতে চাও তবে ফিরে এসো। শত্রুদমন বীর! এখন এবং ভবিষ্যতেও রাজার রক্ষা করাই শ্রেয়। তুমি আমার বল জানো, আর আমি তোমার।
Verse 746
गच्छ गच्छ ध्रुवं पार्थ ध्रुवी हि विजयो मम । भीमसेनके ऐसा कहनेपर सात्यकिने उनसे कहा--“कुन्तीकुमार! तुम जाओ। निश्चय ही लौट जाओ। मेरी विजय अवश्य होगी
সঞ্জয় বললেন—ভীমসেনের কথা শুনে সাত্যকি তাকে বললেন—“হে পার্থ, যাও, যাও; নিশ্চয়ই ফিরে যাও। কারণ আমার বিজয় অবশ্যম্ভাবী।”
Verse 763
परिष्वजिष्ये राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । 'भीमसेन! तुम जो मेरे गुणोंमें अनुरक्त होकर मेरे वशमें हो गये हो तथा इस समय दिखायी देनेवाले शुभ शकुन मुझे जैसी बात बता रहे हैं
সঞ্জয় বললেন—“আমি ধর্মাত্মা রাজা যুধিষ্ঠিরকে আলিঙ্গন করব। হে ভীমসেন! তুমি আমার গুণে অনুরক্ত হয়ে আমার বশে এসেছ, আর এই মুহূর্তে যে শুভ লক্ষণগুলি দেখা দিচ্ছে, সেগুলিও আমাকে এই কথাই জানাচ্ছে—মহাত্মা অর্জুন পাপী জয়দ্রথকে বধ করলে আমি নিশ্চিতই ফিরে এসে ধর্মাত্মা রাজা যুধিষ্ঠিরকে বাহুবন্ধনে আবদ্ধ করব।”
Verse 773
सम्प्रैक्षत् तावकं सैन्यं व्याप्रो मृगगणानिव । भीमसेनसे ऐसा कहकर उन्हें विदा करनेके पश्चात् महायशस्वी सात्यकिने आपकी सेनाकी ओर उसी प्रकार देखा, जैसे बाघ मृगोंके झुंडकी ओर देखता है
সঞ্জয় বললেন—ভীমসেনকে এ কথা বলে বিদায় দিয়ে মহাযশস্বী সাত্যকি তোমাদের সেনার দিকে এমন দৃষ্টিতে তাকালেন, যেমন বাঘ হরিণের পালের দিকে চেয়ে থাকে।
Verse 793
दिदृक्षुरर्जुनं राजन् धर्मराजस्य शासनात् । राजन्! तदनन्तर धर्मराजकी आज्ञाके अनुसार अर्जुनसे मिलनेके लिये सात्यकि आपकी सेनाकी ओर वेगपूर्वक बढ़े
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের আদেশে অর্জুনকে দেখার আকাঙ্ক্ষায় সাত্যকি তখন দ্রুতগতিতে তোমাদের সেনার দিকে অগ্রসর হলেন, অর্জুনের সঙ্গে মিলিত হতে।
Verse 3236
सैन्धवस्य वधे यत्तमनुयास्यामि पाण्डवम् | 'राजन्! आज दुर्योधनके वशीभूत होकर ये मेरे साथ युद्ध करनेको तैयार खड़े हैं। इन रणदुर्मद किरातोंका अपने बाणोंद्वारा संहार करके मैं सिंधुराजके वधके प्रयत्नमें लगे हुए पाण्डुनन्दन अर्जुनके पास जाऊँगा
সঞ্জয় বললেন—“হে রাজন! সাইন্ধবকে বধ করতে উদ্যত যে পাণ্ডব, আমি তারই অনুসরণ করব। আজ দুর্যোধনের বশে এসে এই রণোন্মত্ত কিরাতেরা আমার সঙ্গে যুদ্ধ করতে প্রস্তুত হয়ে দাঁড়িয়ে আছে। আমি আমার বাণে এদের সংহার করে তারপর সিন্দুরাজ-বধে প্রবৃত্ত পাণ্ডুনন্দন অর্জুনের কাছে যাব।”
The implied dilemma concerns the boundary between fair contest and overpowering exploitation: once an opponent is rendered viratha through systematic disablement, the narrative tension shifts to whether pursuit should prioritize decisive elimination, restraint, or strategic withdrawal in view of wider obligations and reputational norms.
The chapter illustrates that outcomes in conflict are shaped as much by method and composure as by force: resolve must be paired with adaptability, and tactical intelligence (targeting mobility, supply, and signaling) can redirect a seemingly equal contest.
No explicit phalaśruti is presented in the cited passage; the chapter’s interpretive value lies in its narrative exemplification of duty, reputation-management, and the ethics of advantage within the broader Kurukṣetra framework.
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