भीष्मपर्व — अध्याय ६६: तुमुलसंग्रामवर्णनम्
The Tumult of Battle Described
सेनाका वह अनन्त वेग देवताओंके लिये भी दुःसह था। पूर्णिमाको बढ़े हुए समुद्रके समान अपार जान पड़ता था ।। रथनागाश्चवकलिलं शड्खदुन्दुभिनादितम् | अनन्तरथपादातं रजसा सर्वतो वृतम्,वह सैन्य-समुद्र रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरा हुआ था। शंख और दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे कोलाहलपूर्ण हो रहा था। उसमें रथ और पैदलोंकी संख्या नहीं बतायी जा सकती थी तथा उस सेनामें सब ओर धूल व्याप्त हो रही थी
sa senā ca vah ananta-vegaḥ devatānām api duḥsahaḥ āsīt | pūrṇimāyāṃ vardhamāna-samudra iva apāraḥ pratibhāti || ratha-nāgāśva-kalilaṃ śaṅkha-dundubhi-nāditam | ananta-ratha-pādātaṃ rajasā sarvato vṛtam ||
সেই সেনা অনন্ত বেগে অগ্রসর হচ্ছিল—দেবতাদের পক্ষেও দুঃসহ—এবং পূর্ণিমায় স্ফীত সমুদ্রের মতোই অপরিসীম মনে হচ্ছিল। রথ, হাতি ও অশ্বে তা ঘন সন্নিবিষ্ট; শঙ্খ ও দুন্দুভির ধ্বনিতে চারদিক মুখর। রথ ও পদাতিকের সংখ্যা গণনার অতীত, আর ধূলি সর্বত্র ছেয়ে গেল।
संजय उवाच