Shloka 45

युधिछिर उवाच कथं जयेय॑ संग्रामे भवनन्‍्तमपराजितम्‌ । एतन्मे मन्त्रय हित॑ यदि श्रेय: प्रपश्यसि,युधिष्ठिर बोले--पितामह! आप तो किसीसे पराजित होनेवाले हैं नहीं, फिर मैं आपको युद्धमें कैसे जीत सकूँगा? यदि आप मेरा कल्याण देखते और सोचते हैं तो मेरे हितकी सलाह दीजिये

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! আপনি তো অপরাজেয়; তবে যুদ্ধে আমি কীভাবে আপনাকে জয় করব? যদি আপনি আমার মঙ্গল কামনা করেন, তবে আমার হিতের উপদেশ দিন।

युधिछिर उवाच