अक्षरब्रह्मयोग (Akṣara-Brahma-Yoga) — Knowledge of the Imperishable, Prakṛti, and Devotion
भी्न्मार (2) अमन ३. गीताके दूसरे अध्यायके उनचालीसवें श्लोकमें कर्मयोगका वर्णन आरम्भ करनेकी प्रतिज्ञा करके भगवानने उस अध्यायके अन्ततक कर्मयोगका ही भलीभाँति प्रतिपादन किया। उसके बाद भी तीसरे अध्यायके अन्ततक प्राय: कर्मयोगका ही अंग-प्रत्यंगोंसहित प्रतिपादन किया गया। इसके सिवा इस योगकी परम्परा बतलाते हुए भगवानने यहाँ जिन “सूर्य” और “मनु” आदिके नाम गिनाये हैं
অর্জুন বললেন—হে কৃষ্ণ! আপনি কখনও কর্মের সন্ন্যাসের, আবার কর্মযোগের প্রশংসা করেন। অতএব এই দুটির মধ্যে যে একটিই আমার জন্য নিশ্চিতভাবে শ্রেয়, তা আমাকে বলুন।
अर्जुन उवाच