अतिष्ठदाहवे भीष्मो भिद्यमानेषु मर्मसु । वहाँ ऊँची और नीची भूमिका भी कुछ ज्ञान नहीं हो पाता था, दसवें दिनके उस युद्धमें अपने मर्मस्थानोंके विदीर्ण होते रहनेपर भी भीष्मजी दस हजार योद्धाओंको मारकर वहाँ खड़े हुए थे || ७८ ह ।। ततः सेनामुखे तस्मिन् स्थित: पार्थों धनुर्धर:
দশম দিনের সেই যুদ্ধে মর্মস্থানে বিদীর্ণ হতে থাকলেও ভীষ্ম যুদ্ধক্ষেত্রে অচল রইলেন। সেখানে উঁচু-নিচু ভূমিরও বোধ থাকত না; তবু তিনি দশ সহস্র যোদ্ধাকে বধ করে সেখানেই স্থির দাঁড়িয়ে ছিলেন। তারপর সেই সেনামুখে ধনুর্ধর পার্থ (অর্জুন) অবস্থান করলেন।
संजय उवाच