Adhyāya 112: Bhīṣma-prati Arjunasya Pravṛttiḥ
Arjuna’s Forward Drive Toward Bhīṣma
सिंहवद् विनदन्नुच्चैर्धनुरज्या विक्षिपन् मुहुः । शरौघान् विसृजन् पार्थो व्यचरत् कालवदू रणे,वे कुन्तीकुमार सिंहके समान उच्चस्वरसे गर्जना करते हुए बारंबार अपने धनुषकी डोरी खींचते और बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए रणक्षेत्रमें कालके समान विचरते थे
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কুন্তীপুত্র পার্থ সিংহের মতো উচ্চস্বরে গর্জন করে, বারবার ধনুকের জ্যা টেনে, তীরের স্রোত বর্ষণ করতে করতে রণক্ষেত্রে কালের ন্যায় বিচরণ করছিলেন।
संजय उवाच