भीष्मपर्व — अध्याय ११०: पार्थभीमयोः प्रहारः तथा भीष्माभिमुखं संग्रामविस्तारः
Arjuna and Bhima’s pressure; escalation toward Bhishma
सोमकांश्व जितान् दृष्टवा निरुत्साहान् महारथान् | (निशामुखं च सम्प्रेक्ष्य घोररूपं भयानकम् ।) चिन्तयित्वा ततो राजा अवहारमरोचयत्,भरतनन्दन! तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने देखा कि संध्या हो गयी। भीष्मके द्वारा गहरी चोट खाकर मेरी सेनाने भयसे व्याकुल हो हथियार डाल दिया है। किसीमें लड़नेका उत्साह नहीं रह गया है। सारी सेना बाणोंसे क्षत-विक्षत हो अत्यन्त पीड़ित हो गयी है। कितने ही सैनिक युद्धसे विमुख हो भागने लग गये हैं। उधर महारथी भीष्म क्रोधमें भरकर युद्धस्थलमें सबको पीड़ा दे रहे हैं। सोमकवंशी महारथी पराजित होकर अपना उत्साह खो बैठे हैं और घोररूप भयानक प्रदोषकाल आ पहुँचा है। इन सब बातोंपर विचार करके राजा युधिष्ठिरने सेनाको युद्धसे लौटा लेना ही ठीक समझा
saumakāṁś ca jitān dṛṣṭvā nirutsāhān mahārathān | (niśāmukhaṁ ca samprekṣya ghorarūpaṁ bhayānakam |) cintayitvā tato rājā avahāram arocayat, bharatanandana |
সঞ্জয় বললেন—হে ভরতনন্দন, সোমক মহারথীদের পরাজিত ও নিরুৎসাহ দেখে এবং ভয়ংকর রূপে রাত্রির আগমন লক্ষ্য করে, রাজা সব বিবেচনা করে রণক্ষেত্র থেকে সেনা প্রত্যাহার স্থির করলেন।
संजय उवाच