
प्राग्ज्योतिषे वज्रदत्त-धनंजय-समागमः (Vajradatta Confronts Dhanaṃjaya at Prāgjyotiṣa)
Upa-parva: Aśvamedha-anugamana (Horse-Tracking Campaign Episodes)
Vaiśaṃpāyana reports that the consecrated horse enters Prāgjyotiṣa territory, prompting Vajradatta—Bhagadatta’s son and a battle-hardened ruler—to emerge and contest the intrusion (1–3). Arjuna (Dhanaṃjaya), recognizing the challenge, advances rapidly with Gāṇḍīva prepared, treating the encounter as a regulated engagement tied to the horse’s protection (4). Vajradatta is temporarily disoriented by Arjuna’s arrow-work, releases the horse, and charges Arjuna directly (5). He then re-enters the city to re-arm and returns mounted on a foremost elephant, accompanied by royal insignia (parasol and white fly-whisk), and issues a challenge shaped by youthful pride and confusion in combat (6–8). Vajradatta drives the massive elephant toward Arjuna’s white horse; the elephant is described as disciplined for warfare and violently energetic (9–11). Arjuna fights the elephant-mounted adversary from the ground, meeting the charge with controlled archery (12). Vajradatta hurls blazing tomara-spears; Arjuna intercepts and fragments them mid-air with Gāṇḍīva arrows (13–14). Vajradatta counters with arrow volleys; Arjuna replies with faster, gold-feathered shafts, wounding Vajradatta, who falls but retains composure (15–17). Remounting, Vajradatta renews the contest; Arjuna sends serpent-like arrows, severely wounding the elephant, which bleeds profusely and is likened to a mountain with many streams (18–20). The chapter emphasizes ritualized sovereignty-testing through calibrated martial display rather than annihilative warfare.
Chapter Arc: यज्ञ का पवित्र अश्व पाण्डव-सीमा पर आता है, और सीमा-रक्षक वीर उसे घेरकर पकड़ने को उद्यत हो उठते हैं—यज्ञ की शान्ति के भीतर युद्ध का बीज फूट पड़ता है। → त्रिगर्त-वीर रथों पर, बद्ध-तूणीरा और सुसज्जित अश्वों सहित, यज्ञाश्व को घेरते हैं। किरीटी अर्जुन उनके अभिप्राय को भाँपकर पहले सान्त्व-नीति से रोकना चाहता है, परन्तु प्रतिरोध बढ़ता जाता है और वाणी का पुल टूटने लगता है। → सूर्यवर्मा अर्जुन पर तीव्र, लघु-अस्त्र-प्रदर्शन सहित शर-वर्षा करता है; अर्जुन रक्त पोंछकर दिव्य धनुष उठाता है और विष-सदृश तीक्ष्ण बाणों से प्रतिघात कर त्रिगर्तों की पंक्तियाँ तोड़ देता है—यज्ञाश्व की रक्षा हेतु उसका क्रोध निर्णायक बन जाता है। → त्रिगर्त-सेना भगदड़ में टूटती है। पराजित राजागण विनीत होकर आज्ञा माँगते हैं; अर्जुन उन्हें जीवन-रक्षा का उपदेश देता है—‘प्राण बचाओ, शासन स्वीकार करो’—और यज्ञाश्व का मार्ग सुरक्षित कर देता है। → पराजितों का समर्पण तो हो गया, पर अश्व की आगे की यात्रा में कौन-सा नया राज्य चुनौती देगा—यह अनकहा रह जाता है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वरमें अ्जुनिके द्वारा अश्वका अनुसरणविषयक तिह्तत्तववाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७३ ॥। अपने-आप बछ। आर: 2 चतु:सप्ततितमो< ध्याय: अर्जुनके द्वारा त्रिगर्तोंकी पराजय वैशम्पायन उवाच त्रिगर्तैरभवद् युद्ध कुतवैरै: किरीटिन: । महारथसमज्ञातैहतानां पुत्रनप्तृभि:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! कुरुक्षेत्रके युद्धमें जो त्रिगर्त वीर मारे गये थे, उनके महारथी पुत्रों और पौत्रोंने किरीटधारी अर्जुनके साथ वैर बाँध लिया था। त्रिगर्तदेशमें जानेपर अर्जुनका उन त्रिगर्तोंक साथ घोर युद्ध हुआ था
বৈশম্পায়ন বললেন—রাজন! কুরুক্ষেত্রযুদ্ধে যে ত্রিগর্ত বীরেরা নিহত হয়েছিল, তাদের মহারথী পুত্র ও পৌত্রেরা মুকুটধারী অর্জুনের প্রতি বৈর স্থির করেছিল। ত্রিগর্তদেশে পৌঁছালে অর্জুনের সঙ্গে তাদের ভয়ংকর যুদ্ধ সংঘটিত হল।
Verse 2
ते समाज्ञाय सम्प्राप्तं यज्ञियं तुरगोत्तमम् । विषयान्तं ततो वीरा दंशिता: पर्यवारयन्,'पाण्डवोंका यज्ञसम्बन्धी उत्तम अश्व हमारे राज्यकी सीमामें आ पहुँचा है” यह जानकर त्रिगर्तीीर कवच आदिसे सुसज्जित हो पीठपर तरकस बाँधे सजे-सजाये अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर निकले और उस अश्वको उन्होंने चारों ओरसे घेर लिया। राजन! घोड़ेको घेरकर वे उसे पकड़नेका उद्योग करने लगे
“যজ্ঞ-সম্পর্কিত শ্রেষ্ঠ অশ্ব আমাদের সীমান্তে এসে পৌঁছেছে”—এ কথা জেনে সেই বীরেরা সজ্জিত হয়ে চারিদিক থেকে তাকে ঘিরে ধরল এবং তাকে ধরবার উদ্যোগ নিল।
Verse 3
रथिनो बद्धतूणीरा: सदश्वैः समलंकृतै: । परिवार्य हयं राजन ग्रहीतुं सम्प्रचक्रमु:,'पाण्डवोंका यज्ञसम्बन्धी उत्तम अश्व हमारे राज्यकी सीमामें आ पहुँचा है” यह जानकर त्रिगर्तीीर कवच आदिसे सुसज्जित हो पीठपर तरकस बाँधे सजे-सजाये अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर निकले और उस अश्वको उन्होंने चारों ओरसे घेर लिया। राजन! घोड़ेको घेरकर वे उसे पकड़नेका उद्योग करने लगे
রাজন! রথী যোদ্ধারা পিঠে তূণীর বেঁধে, উৎকৃষ্ট অশ্বযোজিত সুসজ্জিত রথে আরূঢ় হয়ে সেই অশ্বকে চারিদিক থেকে ঘিরে তাকে ধরবার জন্য উদ্যোগী হল।
Verse 4
ततः किरीटी संचिन्त्य तेषां तत्र चिकीर्षितम् । वारयामास तान् वीरान् सान्त्वपूर्वमरिंदम:,शत्रुओंका दमन करनेवाले अर्जुन यह जान गये कि वे क्या करना चाहते हैं। उनके मनोभावका विचार करके वे उन्हें शान्तिपूर्वक समझाते हुए युद्धसे रोकने लगे
তখন মুকুটধারী অর্জুন সেখানে সেই বীরদের অভিপ্রায় চিন্তা করলেন। তাদের অন্তরের উদ্দেশ্য বুঝে শত্রুদমনকারী অর্জুন প্রথমে সান্ত্বনাময় কোমল বাক্যে শান্তি স্থাপনের জন্য তাদের যুদ্ধ থেকে নিবৃত্ত করতে লাগলেন।
Verse 5
तदनादृत्य ते सर्वे शरैरभ्यहनंस्तदा । तमोरजोभ्यां संछन्नांस्तान् किरीटी न्यवारयत्,किंतु वे सब उनकी बातकी अवहेलना करके उन्हें बाणोंद्वारा चोट पहुँचाने लगे। तमोगुण और रजोगुणके वशीभूत हुए उन त्रिगर्तोंको किरीटीने युद्धसे रोकनेकी पूरी चेष्टा की
কিন্তু তারা তাঁর কথা অগ্রাহ্য করে তখন শরবৃষ্টি করে আঘাত করতে লাগল। তমস ও রজসে আচ্ছন্ন সেই ত্রিগর্তদের কিরীটি যুদ্ধ থেকে নিবৃত্ত করতে সর্বশক্তি প্রয়োগ করলেন।
Verse 6
तानब्रवीत् ततो जिष्णु: प्रहसन्निव भारत । निवर्तध्वमधर्मज्ञा: श्रेयो जीवितमेव च,भारत! तदनन्तर विजयशील अर्जुन हँसते हुए-से बोले--'धर्मको न जाननेवाले पापात्माओ! लौट जाओ। जीवनकी रक्षामें ही तुम्हारा कल्याण है”
তখন জিষ্ণু অর্জুন যেন মৃদু হাসি হেসে বললেন—“হে ভারত! অধর্মজ্ঞ পাপাত্মারা, ফিরে যাও; জীবনের রক্ষাতেই তোমাদের কল্যাণ।”
Verse 7
स हि वीर: प्रयास्यन् वै धर्मराजेन वारितः । हतबान्धवा न ते पार्थ हन्तव्या: पार्थिवा इति,वीर अर्जुनने ऐसा इसलिये कहा कि चलते समय धर्मराज युधिष्ठिरने यह कहकर मना कर दिया था कि “कुन्तीनन्दन! जिन राजाओंके भाई-बन्धु कुरुक्षेत्रके युद्धमें मारे गये हैं, उनका तुम्हें वध नहीं करना चाहिये”
বৈশম্পায়ন বললেন—যখন সেই বীর অর্জুন যাত্রা করতে উদ্যত হলেন, তখন ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির তাঁকে নিবৃত্ত করে বললেন—“হে পার্থ! যাদের আত্মীয়স্বজন কুরুক্ষেত্রযুদ্ধে নিহত হয়েছে, সেই রাজাদের তুমি বধ করো না।”
Verse 8
स तदा तद् वच: श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः । तान् निवर्तध्वमित्याह न न्यवर्तन्त चापि ते,बुद्धिमान् धर्मरमाजके इस आदेशको सुनकर उसका पालन करते हुए ही अर्जुनने त्रिगर्तोंकी लौट जानेकी आज्ञा दी तथापि वे नहीं लौटे
তখন প্রজ্ঞাবান ধর্মরাজের বাক্য শুনে, সেই আদেশ মান্য করে অর্জুন তাদের বললেন—“ফিরে যাও।” তবু তারা ফিরে গেল না।
Verse 9
ततल्त्रिगर्तराजानं सूर्यवर्माणमाहवे । विचित्य शरजालेन प्रजहास धनंजय:,तब उस युद्धस्थलमें त्रिगर्तराज सूर्यव्माके सारे अंगोंमें बाण धँसाकर अर्जुन हँसने लगे
তখন রণক্ষেত্রে ধনঞ্জয় অর্জুন ত্রিগর্তরাজ সূর্যবর্মাকে লক্ষ্য করে বাণজালে আচ্ছন্ন করলেন, আর বিজয়গর্বে হাসলেন।
Verse 10
ततस्ते रथघोषेण रथनेमिस्वनेन च । पूरयन्तो दिश: सर्वा धनंजयमुपाद्रवन्,यह देख त्रिगर्तदेशीय वीर रथकी घरघराहट और पहियोंकी आवाजसे सारी दिशाओंको गुँजाते हुए वहाँ अर्जुनपर टूट पड़े
তারপর তারা রথের গর্জন ও চাকার ঘূর্ণিধ্বনিতে সর্বদিক মুখর করে ধনঞ্জয় অর্জুনের ওপর ঝাঁপিয়ে পড়ল।
Verse 11
सूर्यवर्मा ततः पार्थे शराणां नतपर्वणाम् | शतान्यमुज्चद् राजेन्द्र लघ्वस्त्रमभिदर्शयन्,राजेन्द्र! तदनन्तर सूर्यवर्माने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए अर्जुनपर झुकी हुई गाँठवाले एक सौ बाणोंका प्रहार किया
হে রাজেন্দ্র! তারপর সূর্যবর্মা অস্ত্রচালনায় ক্ষিপ্রতা প্রদর্শন করে পার্থ অর্জুনের দিকে বাঁকা গাঁটযুক্ত একশো বাণ নিক্ষেপ করল।
Verse 12
तथैवान्ये महेष्वासा ये च तस्यानुयायिन: । मुमुचु: शरवर्षाणि धनंजयवधैषिण:,इसी प्रकार उसके अनुयायी वीरोंमें भी जो दूसरे-दूसरे महान् धनुर्धर थे, वे भी अर्जुनको मार डालनेकी इच्छासे उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे
ঠিক তেমনই তার অনুচর অন্যান্য মহাধনুর্ধররাও ধনঞ্জয় অর্জুনকে বধ করার বাসনায় তাঁর ওপর বাণবৃষ্টি বর্ষণ করতে লাগল।
Verse 13
स तान् ज्यामुखनिर्मुक्तिबहुभि: सुबहून् शरान् । चिच्छेद पाण्डवो राजंस्ते भूमौ न्न्यपतंस्तदा,राजन! पाण्डुपुत्र अर्जुनने अपने धनुषकी प्रत्यंचासे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंद्वारा शत्रुओंके बहुत-से बाणोंको काट डाला। वे कटे हुए बाण टुकड़े-टुकड़े होकर पृथ्वीपर गिर पड़े
হে রাজন! পাণ্ডব অর্জুন ধনুকের জ্যা থেকে ছুটে যাওয়া অসংখ্য বাণে শত্রুপক্ষের বহু বাণ কেটে দিলেন; কাটা বাণগুলি খণ্ড খণ্ড হয়ে ভূমিতে ঝরে পড়ল।
Verse 14
केतुवर्मा तु तेजस्वी तस्यैवावरजो युवा । युयुधे भ्रातुरर्थाय पाण्डवेन यशस्विना,(सूर्यवर्माके परास्त होनेपर) उसका छोटा भाई केतुवर्मा जो एक तेजस्वी नवयुवक था, अपने भाईका बदला लेनेके लिये यशस्वी वीर पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा
বৈশম্পায়ন বললেন—সূর্যবর্মা পরাজিত হলে তারই কনিষ্ঠ ভ্রাতা, তেজস্বী যুবা কেতুবর্মা, ভ্রাতার পক্ষ রক্ষা ও প্রতিশোধ সাধনের জন্য যশস্বী পাণ্ডব অর্জুনের সঙ্গে যুদ্ধে প্রবৃত্ত হল।
Verse 15
तमापततन्तं सम्प्रेक्ष्य केतुवर्माणमाहवे । अभ्यष्नन्निशितैर्बाणैर्बीभत्सु: परवीरहा,केतुवर्माको युद्धस्थलमें धावा करते देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने अपने तीखे बाणोंसे उसे मार डाला
বৈশম্পায়ন বললেন—রণক্ষেত্রে কেতুবর্মাকে প্রবল বেগে ধেয়ে আসতে দেখে, শত্রুবীর-সংহারী বীভৎসু অর্জুন ধারালো বাণে তাকে বিদ্ধ করে ভূমিতে লুটিয়ে দিলেন।
Verse 16
केतुवर्मण्यभिहते धृतवर्मा महारथ: । रथेनाशु समुत्पत्य शरैर्जिष्णुमवाकिरत्,केतुवर्माके मारे जानेपर महारथी धृतवर्मा रथके द्वारा शीघ्र ही वहाँ आ धमका और अर्जुनपर बाणोंकी वर्षा करने लगा
কেতুবর্মা নিহত হলে মহারথী ধৃতবর্মা রথে চড়ে দ্রুত এগিয়ে এসে জিষ্ণু অর্জুনের উপর বাণের বর্ষা নামাল।
Verse 17
तस्य तां शीघ्रतामीक्ष्य तुतोषातीव वीर्यवान् । गुडाकेशो महातेजा बालस्य धृतवर्मण:
তার সেই তৎপরতা দেখে মহাতেজস্বী পরাক্রমী গুড়াকেশ অর্জুন বালক ধৃতবর্মার প্রতি অত্যন্ত প্রসন্ন হলেন।
Verse 18
धृतवर्मा अभी बालक था तो भी उसकी उस फुर्तीको देखकर महातेजस्वी पराक्रमी अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए ।। न संदधानं ददृशे नाददानं च तं तदा । किरन्तमेव स शरान् ददृशे पाकशासनि:,वह कब बाण हाथमें लेता है और कब उसे धनुषपर चढ़ाता है, उसको इन्द्रकुमार अर्जुन भी नहीं देख पाते थे। उन्हें केवल इतना ही दिखायी देता था कि वह बाणोंकी वर्षा कर रहा है
বৈশম্পায়ন বললেন—সেই সময় পাকশাসনি ইন্দ্রপুত্র অর্জুনও দেখতে পেলেন না, সে কখন বাণ হাতে নেয় আর কখন ধনুকে সংযোজিত করে; তিনি কেবল দেখলেন—সে অবিরাম বাণের বর্ষা ঝরাচ্ছে।
Verse 19
स तु त॑ पूजयामास धृतवर्माणमाहवे । मनसा तु मुहूर्त वै रणे समभिहर्षयन्,उन्होंने रणभूमिमें थोड़ी देरतक मन-ही-मन धृतवर्माकी प्रशंसा की और युद्धमें उसका हर्ष एवं उत्साह बढ़ाते रहे
তিনি রণক্ষেত্রে ধৃতবর্মাকে সম্মান করলেন এবং অল্পক্ষণ মনে মনে তার প্রশংসা করে যুদ্ধের মধ্যে তার আনন্দ ও উদ্যমকে আরও দৃঢ় করলেন।
Verse 20
त॑ं पन्नगमिव क्रुद्धं कुरुवीर: स्मयन्निव । प्रीतिपूर्व महाबाहु: प्राणैर्न व्यपरोपयत्,यद्यपि धृतवर्मा सर्पके समान क्रोधमें भरा हुआ था तो भी कुरुवीर महाबाहु अर्जुन प्रेमपूर्वक मुसकराते हुए युद्ध करते थे। उन्होंने उसके प्राण नहीं लिये
ধৃতবর্মা সাপের মতো ক্রুদ্ধ হলেও, কুরুবীর মহাবাহু অর্জুন স্নিগ্ধ হাসি নিয়ে প্রীতিপূর্বক যুদ্ধ করলেন; তবু তিনি তার প্রাণ নিলেন না।
Verse 21
स तथा रक्ष्यमाणो वै पार्थनामिततेजसा । धृतवर्मा शरं दीप्त॑ मुमोच विजये तदा,इस प्रकार अमित तेजस्वी अर्जुनके द्वारा जानबूझकर छोड़ दिये जानेपर धृतवर्माने उनके ऊपर एक अत्यन्त प्रज्वलित बाण चलाया
এভাবে অমিততেজস্বী পার্থ অর্জুনের দ্বারা রক্ষিত—অর্থাৎ ইচ্ছাকৃতভাবে বাঁচিয়ে দেওয়া—ধৃতবর্মা তখন বিজয়ের তাড়নায় তাঁর দিকে এক জ্বলন্ত তীর নিক্ষেপ করল।
Verse 22
स तेन विजयस्तूर्णमासीद् विद्धा: करे भृशम् । मुमोच गाण्डिवं मोहात् तत् पपाताथ भूतले,उस बाणने तुरन्त आकर अर्जुनके हाथमें गहरी चोट पहुँचायी। उन्हें मूर्च्छा आ गयी और उनका गाण्डीव धनुष हाथसे छूटकर पृथ्वीपर जा पड़ा
সেই তীরে অর্জুনের হাত গভীরভাবে বিদ্ধ হলো; মোহ ও মূর্ছায় তিনি গাণ্ডীব ছেড়ে দিলেন, আর ধনুকটি ভূমিতে পড়ে গেল।
Verse 23
धनुष: पततस्तस्य सव्यसाचिकराद् विभो | बभूव सदृशं रूप॑ं शक्रचापस्य भारत,प्रभो! भरतनन्दन! अर्जुनके हाथसे गिरते हुए उस धनुषका रूप इन्द्रधनुषके समान प्रतीत होता था
হে প্রভু, হে ভারতনন্দন! সব্যসাচী অর্জুনের হাত থেকে পড়তে থাকা সেই ধনুকের রূপ শক্রের ধনু—ইন্দ্রধনুর—সদৃশ মনে হচ্ছিল।
Verse 24
तस्मिन् निपतिते दिव्ये महाधनुषि पार्थिव: । जहास सस्वनं हासं धृतवर्मा महाहवे,उस दिव्य महाधनुषके गिर जानेपर महासमरमें खड़ा हुआ धृतवर्मा ठहाका मारकर जोर-जोरसे हँसने लगा
সেই দিব্য মহাধনুক ভূমিতে পতিত হতেই মহাযুদ্ধের মাঝে দাঁড়িয়ে ধৃতবর্মা উচ্চস্বরে ঝংকারময় হাসিতে ফেটে পড়ল।
Verse 25
ततो रोषार्दितो जिष्णु: प्रमृज्य रुधिरं करात् । धनुरादत्त तद् दिव्यं शरवर्षैववर्ष च,इससे अर्जुनका रोष बढ़ गया। उन्होंने हाथसे रक्त पोंछकर उस दिव्य धनुषको पुनः उठा लिया और धृतवर्मापर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी
তখন ক্রোধে দগ্ধ জিষ্ণু (অর্জুন) হাতের রক্ত মুছে সেই দিব্য ধনুক আবার তুলে নিলেন এবং ধৃতবর্মার উপর তীরের বর্ষা শুরু করলেন।
Verse 26
ततो हलहलाशब्दो दिवस्पृणभवत् तदा । नानाविधानां भूतानां तत्कर्माणि प्रशंसताम्,फिर तो अर्जुनके उस पराक्रमकी प्रशंसा करते हुए नाना प्रकारके प्राणियोंका कोलाहल समूचे आकाशकमें व्याप्त हो गया
তারপর ‘হলহলা’ ধ্বনির মহাকোলাহল আকাশমণ্ডল ভরে উঠল; নানা প্রকার সত্তা সেই কীর্তির প্রশংসা করতে লাগল।
Verse 27
ततः सम्प्रेक्ष्य संक्रुद्धें कालान्तकयमोपमम् । जिष्णु त्रैगर्तका योधा: परीता: पर्यवारयन्,अर्जुनको काल, अन्तक और यमराजके समान कुपित हुआ देख त्रिगर्तदेशीय योद्धाओंने चारों ओरसे आकर उन्हें घेर लिया
তখন কাল, অন্তক ও যমের ন্যায় ক্রুদ্ধ জিষ্ণু (অর্জুন)কে দেখে ত্রিগর্তের যোদ্ধারা চারদিক থেকে ঘিরে ধরল।
Verse 28
अभिसृत्य परीप्सार्थ ततस्ते धृतवर्मण: । परिवत्रुर्गुडाकेशं तत्राक्रुद्धादू धनंजय:,धृतवर्माकी रक्षाके लिये सहसा आक्रमण करके त्रिगर्तोने गुडाकेश अर्जुनको जब सब ओरसे घेर लिया, तब उन्हें बड़ा क्रोध हुआ
তারপর ধৃতবর্মার পক্ষ নিয়ে তাকে ধরার অভিপ্রায়ে তারা ধেয়ে এসে গুড়াকেশ (অর্জুন)কে চারদিক থেকে ঘিরে ফেলল; তখন ধনঞ্জয় প্রবল ক্রোধে জ্বলে উঠলেন।
Verse 29
ततो योधान् जघानाशु तेषां स दश चाष्ट च । महेन्द्रवज़प्रतिमैरायसैर्बहुभि: शरै:,फिर तो उन्होंने इन्द्रके वजकी भाँति दुस्सह लौहनिर्मित बहुसंख्यक बाणोंद्वारा बात- की-बातमें उनके अठारह प्रमुख योद्धाओंको यमलोक पहुँचा दिया
তখন তিনি ইন্দ্রের বজ্রসম অসহ্য, লৌহ-নির্মিত অসংখ্য শর দ্বারা মুহূর্তেই তাদের দশ ও আট—অর্থাৎ আঠারো জন প্রধান যোদ্ধাকে যমলোকে পাঠালেন।
Verse 30
तान् सम्प्रभग्नान् सम्प्रेक्ष्य त्वरमाणो धनंजय: । शरैराशीविषाकारैर्जघान स्वनवद्धसन्,तब तो त्रिगर्तोंमें भगदड़ मच गयी। उन्हें भागते देख अर्जुनने जोर-जोरसे हँसते हुए बड़ी उतावलीके साथ सर्पाकार बाणोंद्वारा उन सबको मारना आरम्भ किया
তাদের ভেঙে পড়ে পালাতে দেখে ধনঞ্জয় (অর্জুন) তৎপর হয়ে এগিয়ে গেলেন এবং উচ্চস্বরে হাসতে হাসতে বিষধর সাপের মতো আকৃতির শর দিয়ে তাদের আঘাত করতে লাগলেন।
Verse 31
ते भग्नमनस: सर्वे त्रैगर्तकमहारथा: । दिशोभिदुद्रुवू राजन् धनंजयशरार्दिता:,राजन! धनंजयके बाणोंसे पीड़ित हुए समस्त त्रिगर्तदेशीय महारथियोंका युद्धविषयक उत्साह नष्ट हो गया; अतः वे चारों दिशाओंमें भाग चले
হে রাজন, ধনঞ্জয়ের শরবিদ্ধ হয়ে ত্রিগর্তদেশের সেই সকল মহারথীর মনোবল ভেঙে গেল; তাই তারা চারদিকে ছুটে পালাল।
Verse 32
तमूचु: पुरुषव्याप्रं संशप्तकनिषूदनम् । तवास्म किंकरा: सर्वे सर्वे वै वशगास्तव,उनमेंसे कितने ही संशप्तकसूदन पुरुषसिंह अर्जुनसे इस प्रकार कहने लगे --'कुन्तीनन्दन! हम सब आपके आज्ञाकारी सेवक हैं और सभी सदा आपके अधीन रहेंगे
তখন তারা পুরুষব্যাঘ্র, সংশপ্তকনিষূদন অর্জুনকে বলল—“আমরা সকলেই আপনার দাস; আমরা সকলেই চিরকাল আপনার অধীন থাকব।”
Verse 33
आज्ञापयस्व न: पार्थ प्रद्दान् प्रेष्यानवस्थितान् । करिष्याम: प्रियं सर्व तव कौरवनन्दन,'पार्थ!! हम सभी सेवक विनीत भावसे आपके सामने खड़े हैं। आप हमें आज्ञा दें। कौरवनन्दन! हम सब लोग आपके समस्त प्रिय कार्य सदा करते रहेंगे”
“হে পার্থ, আমাদের আদেশ করুন; আমরা নিযুক্ত সেবক বিনীতভাবে উপস্থিত। হে কৌরবনন্দন, আপনার প্রিয় সকল কাজ আমরা সম্পন্ন করব।”
Verse 34
एतदाज्ञाय वचन सर्वास्तानब्रवीत् तदा । जीवितं रक्षत नृपा: शासन प्रतिगृह्यताम्,उनकी ये बातें सुनकर अर्जुनने उनसे कहा--'राजाओ! अपने प्राणोंकी रक्षा करो। इसका एक ही उपाय है, हमारा शासन स्वीकार कर लो”
পরিস্থিতির তাৎপর্য বুঝে তিনি তখন সকল রাজাকে বললেন—“হে নৃপগণ, প্রাণ রক্ষা করো। তোমাদের একমাত্র পথ—আমাদের অধিকার স্বীকার করো।”
Verse 74
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि त्रिगर्तपरा भवे चतुःसप्ततितमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের আশ্বমেধিক পর্বের অনুগীতা-পর্বে ত্রিগর্তদের পরাভব-বিষয়ক চুয়াত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Whether Prāgjyotiṣa will acknowledge the Aśvamedha’s implied suzerainty or contest it; the engagement functions as a public mechanism for validating political hierarchy under ritual law.
Power is to be exercised instrumentally and proportionately: Arjuna’s role is protection and stabilization of the ritual mandate, while the challenger’s response tests legitimacy within recognized norms of kṣatriya conduct.
No explicit phalaśruti appears in the provided verses; the meta-significance is implicit—this episode exemplifies how post-war order is reconstituted through ritualized diplomacy backed by controlled force.