
Yudhiṣṭhira’s Procession, Encampment (Niveśa), and Auspicious Timing for Ritual Action
Upa-parva: Āśvamedha-yātrā and Niveśa-vidhi (Encampment and Ritual Preparations)
Vaiśaṃpāyana describes Yudhiṣṭhira’s forward movement with a delighted retinue, the earth resonating with the heavy sound of chariots while sūtas, māgadhas, and vandins offer formal praises. Yudhiṣṭhira appears under a white parasol, receives victory-blessings from people on the road according to propriety, and is followed by troops whose collective acclaim rises skyward. The party traverses lakes, rivers, forests, and groves, then reaches a region suitable for the enterprise and establishes an encampment on level, favorable ground. Brahmins—ascetic, learned, and disciplined—are placed in front, together with a purohita proficient in Veda and Vedāṅgas. Protective śānti rites are performed; the king and ministers are positioned centrally; the dvijas arrange the camp with specified pathways and structured stations, including proper placement for powerful elephants. Yudhiṣṭhira requests that the Brahmins determine the auspicious nakṣatra and day so that no delay occurs. The Brahmins affirm the present time as especially meritorious, instructing immediate fasting and a water-based observance; the kings spend the night on kuśa-grass as in a sacrifice with kindled fires. At dawn, after the night passes with Brahmanical recitation, the leading Brahmins address Dharmasuta again, indicating the next procedural step.
Chapter Arc: जनमेजय, व्यास-वचन से उद्वेलित होकर, उस गुप्त धन-निधान का रहस्य पूछता है—मरुत्त ने जो रत्न-सम्पदा पृथ्वी में छिपाई, वह युधिष्ठिर को कैसे प्राप्त होगी? → वैशम्पायन बताते हैं कि धर्मराज युधिष्ठिर व्यास के अद्भुत निर्देश सुनकर अपने सभी भाइयों को बुलाते हैं। वे परामर्श करते हैं कि अश्वमेध-यज्ञ की पूर्ति हेतु उस धन को लाना आवश्यक है, पर वह धन रौद्र किन्नरों द्वारा रक्षित है और देवाधिदेव महेश्वर तथा उनके अनुचरों की प्रसन्नता के बिना उपलब्ध नहीं। → युधिष्ठिर-भ्राता दल विधिवत् स्वस्तिवाचन कराकर, महेश्वर (कपर्दिन्, वृषभध्वज) की पूजा-अर्चना करता है—‘वाणी, बुद्धि और कर्म’ से प्रसाद-याचना करते हुए। यही क्षण निर्णायक बनता है: वे समझते हैं कि बल से नहीं, आराधना से ही रक्षक-गण वश में होंगे। → पूजा के उपरान्त वे प्रसन्नचित्त होकर प्रस्थान करते हैं और संकल्प लेते हैं कि शिव तथा उनके अनुचरों को संतुष्ट करके ही धन-निधान को सुरक्षित रूप से लाएँगे; रौद्र किन्नर भी वृषभध्वज के प्रसन्न होने पर अधीन हो जाएँगे। → धन-स्थल तक पहुँचकर रक्षक किन्नरों से सामना और धन-प्राप्ति की वास्तविक परीक्षा अभी शेष है।
Verse 1
ऑपन--मा_जल बछ। अकाल त्रेषष्टितमो<् ध्याय: युधिष्ठिरका अपने भाइयोंके साथ परामर्श करके सबको साथ ले धन ले आनेके लिये प्रस्थान करना जनमेजय उवाच श्रुत्वैतद् वचन ब्रह्मन् व्यासेनोक्त महात्मना | अश्वमेधं प्रति तदा कि भूय: प्रचकार ह,जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन! महात्मा व्यासका कहा हुआ यह वचन सुनकर राजा युधिष्ठिरने अश्वमेध यज्ञके सम्बन्धमें फिर क्या किया? राजा मरुत्तने जो रत्न पृथ्वीतलपर रख छोड़ा था, उसे उन्होंने किस प्रकार प्राप्त किया? द्विजश्रेष्ठ]ी यह सब मुझे बताइये
জনমেজয় বললেন—হে ব্রাহ্মণ! মহাত্মা ব্যাসের বলা এই বচন শুনে রাজা যুধিষ্ঠির অশ্বমেধ যজ্ঞ সম্বন্ধে পরে কী করলেন? আর রাজা মরুত্ত যে ধনরত্ন পৃথিবীর উপর রেখে গিয়েছিলেন, তা তিনি কীভাবে লাভ করলেন? হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, এ সবই আমাকে বলুন।
Verse 2
रत्नं च यन्मरुत्तेन निहितं वसुधातले । तदवाप कथं चेति तनमे ब्रूहि द्विजोत्तम,जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन! महात्मा व्यासका कहा हुआ यह वचन सुनकर राजा युधिष्ठिरने अश्वमेध यज्ञके सम्बन्धमें फिर क्या किया? राजा मरुत्तने जो रत्न पृथ्वीतलपर रख छोड़ा था, उसे उन्होंने किस प्रकार प्राप्त किया? द्विजश्रेष्ठ]ी यह सब मुझे बताइये
হে দ্বিজোত্তম! রাজা মরুত্ত যে রত্নধন পৃথিবীর উপর ন্যস্ত করেছিলেন, তা কীভাবে প্রাপ্ত হল—আমাকে বলুন। আর মহাত্মা ব্যাসের বচন শুনে শ্রেষ্ঠ রাজা যুধিষ্ঠির অশ্বমেধ সম্বন্ধে পরে কী করলেন—তাও বলুন।
Verse 3
वैशम्पायन उवाच श्रुत्वा द्वैयायनवचो धर्मराजो युधिष्ठिर: । भ्रातृ्न् सर्वान् समानाय्य काले वचनमनब्रवीत्
বৈশম্পায়ন বললেন—দ্বৈপায়নের (ব্যাসের) বচন শুনে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির সকল ভ্রাতাকে একত্র করলেন এবং যথোচিত সময়ে তাদের উদ্দেশে কথা বললেন।
Verse 4
श्रुतं वो वचनं वीरा: सौहृदाद् यन्महात्मना
বৈশম্পায়ন বললেন— “হে বীরগণ, সেই মহাত্মা সৌহার্দ্যবশত যে বাক্য বলেছেন, তা আমি শুনেছি।”
Verse 5
तपोवृद्धेन महता सुहृदां भूतिमिच्छता
বৈশম্পায়ন বললেন— “এ কাজটি করেছিলেন তিনি—তপস্যায় মহাবলে বলীয়ান—যিনি সুহৃদদের মঙ্গল ও সমৃদ্ধি কামনা করতেন।”
Verse 6
गुरुणा धर्मशीलेन व्यासेनाद्भुतकर्मणा । भीष्मेण च महाप्राज्ञा गोविन्देन च धीमता
বৈশম্পায়ন বললেন— “এ কথা/কর্ম ধর্মনিষ্ঠ, আশ্চর্যকর্মা গুরু ব্যাস, এবং মহাপ্রাজ্ঞ ভীষ্ম, ও ধীমান গোবিন্দ—তাঁরাও বলেছেন/করেছেন।”
Verse 7
संस्मृत्य तदहं सम्यक् कर्तुमिच्छामि पाण्डवा: । आयत्यां च तदात्वे च सर्वेषां तद्धि नो हितम्
বৈশম্পায়ন বললেন— “সে বিষয়টি যথাযথ স্মরণ করে, হে পাণ্ডবগণ, আমি তা সঠিকভাবে সম্পন্ন করতে চাই। কারণ ভবিষ্যতেও এবং বর্তমানেও, সেটিই আমাদের সকলের মঙ্গল।”
Verse 8
'सुहदोंकी भलाई चाहनेवाले महान् तपोवृद्ध महात्मा धर्मशील गुरु व्यासने, अद्भुत पराक्रमी भीष्मने तथा बुद्धिमान् गोविन्दने समय-समयपर जो सलाह दी है, उसे याद करके मैं उनके आदेशका भलीभाँति पालन करना चाहता हूँ। महाप्राज्ञ पाण्डवो! उन महात्माओंका यह वचन भविष्य और वर्तमानमें भी हम सबके लिये हितकारक है || ५-- ७।। अनुबन्धे च कल्याणं यद् वचो ब्रह्मवादिन: । इयं हि वसुधा सर्वा क्षीणरत्ना कुरूद्वहा:
বৈশম্পায়ন বললেন— “ব্রহ্মবাদী ঋষিদের বাক্য পরিণামে কল্যাণকর। কারণ, হে কুরুশ্রেষ্ঠ, এই সমগ্র পৃথিবী তার রত্নসম্ভার হারিয়ে ক্ষীণ হয়ে গেছে।”
Verse 9
तच्चाचष्ट तदा व्यासो मरुत्तस्य धन नृपा: । “ब्रह्मवादी महात्मा व्यासजीका वचन परिणाममें हमारा कल्याण करनेवाला है। कौरवो! इस समय इस सारी पृथ्वीपर रत्न एवं धनका नाश हो गया है; अतः हमारी आर्थिक कठिनाई दूर करनेके लिये व्यासजीने उस दिन हमें मरुत्तके धनका पता बताया था ।। ८६ || यद्येतद् वो बहुमतं मन्यध्वं वा क्षमं यदि
তখন ব্যাস মুনি রাজাদের কাছে মরুত্তের ধনের সংবাদ প্রকাশ করলেন। তিনি বললেন—“যদি তোমাদের কাছে এটি গ্রহণযোগ্য হয় এবং তোমরা একে যথোচিত মনে কর, তবে…”—কারণ তখন পৃথিবীতে রত্ন ও ধনের ক্ষয় ঘটেছিল; তাই তিনি উপায় দেখালেন, কিন্তু সিদ্ধান্ত যেন ধর্মসম্মত ও মনোনীত হয়—এই কথাই নির্দেশ করলেন।
Verse 10
इत्युक्तवाक्ये नृपती तदा कुरुकुलोद्वह,व्यासाख्यातस्य वित्तस्य समुपानयन प्रति । कुरुकुलशिरोमणे! राजा युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर भीमसेनने हाथ जोड़कर उन नृपश्रेष्ठठे इस प्रकार कहा--“महाबाहो! आपने जो कुछ कहा है, व्यासजीके बताये हुए धनको लानेके विषयमें जो विचार व्यक्त किया है, वह मुझे बहुत पसंद है
কুরুবংশের শ্রেষ্ঠ রাজা এ কথা বললে, ব্যাসপ্রদত্ত ধন আনবার বিষয়ে ভীমসেন করজোড়ে সেই নৃপশ্রেষ্ঠকে বললেন—“রাজন, আপনার এই সংকল্প আমার কাছে অত্যন্ত যথোচিত ও প্রিয়।”
Verse 11
भीमसेनो नृपश्रेष्ठ प्राउजलियवरक्यमब्रवीत् । रोचते मे महाबाहो यदिदं भाषितं त्वया
তখন ভীমসেন করজোড়ে বললেন—“মহাবাহো! আপনি যা বলেছেন, তা আমার কাছে প্রীতিকর।”
Verse 12
यदि तत् प्राप्रुयामेह धनमाविक्षितं प्रभो
“প্রভো, যদি আমরা এখানে সেই রক্ষিত ও সংরক্ষিত ধন লাভ করতে পারি…”
Verse 13
ते वयं प्रणिपातेन गिरीशस्य महात्मन:
“তখন আমরা সাষ্টাঙ্গ প্রণাম করে মহাত্মা গিরীশ (শিব)-এর শরণে গেলাম।”
Verse 14
तद् वित्तं देवदेवेशं तस्यैवानुचरांश्ष तान्
বৈশম্পায়ন বললেন—সেই ধন এবং কেবল তাঁরই অধীন সেই পরিচারকরাও দেবদেবেশ্বরের উদ্দেশ্যে সমর্পিত হল।
Verse 15
रक्षन्ते ये च तद् द्रव्यं किन्नरा रौद्रदर्शना:
বৈশম্পায়ন বললেন—আর সেই ধন রক্ষা করে রৌদ্রদর্শন ভয়ংকর কিন্নররা।
Verse 16
(स हि देव: प्रसन्नात्मा भक्तानां परमेश्वर: । ददात्यमरतां चापि कि पुनः काउ्चन प्रभु: ।। “सदा प्रसन्नचित्त रहनेवाले वे सर्वसमर्थ परमेश्वर महादेव अपने भक्तोंको अमरत्व भी दे देते हैं; फिर सुवर्णकी तो बात ही क्या? ।। वनस्थस्य पुरा जिष्णोरस्त्रं पाशुपतं महत् । रोद्रे ब्रह्मशिरश्नादात् प्रसन्न: कि पुनर्धनम् ।। 'पूर्वकालमें वनमें रहते समय अर्जुनपर प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने उन्हें महान् पाशुपतास्त्र, रौद्रास्त्र तथा ब्रह्मास्त्र भी प्रदान किये थे। फिर धन दे देना उनके लिये कौन बड़ी बात है ।। वयं सर्वे च॒ तद्धक्ता: स चास्माकं प्रसीदति । तत्प्रसादाद् वयं राज्यं प्राप्ता: कौरवनन्दन ।। अभिमन्योर्वधे वृत्ते प्रतिज्ञाते धनंजये । जयद्रथवधार्थाय स्वप्ने लोकगुरुं निशि ।। प्रसाद्य लब्धवानस्त्रमर्जुन: सहकेशव: । “कौरवनन्दन! हम सब लोग उनके भक्त हैं और वे हम लोगोंपर प्रसन्न रहते हैं। उन्हींकी कृपासे हमने राज्य प्राप्त किया है। अभिमन्युका वध हो जानेपर जब अर्जुनने जयद्रथको मारनेकी प्रतिज्ञा की थी, उस समय स्वप्नमें अर्जुनने श्रीकृष्णके साथ रहकर रातमें उन्हीं लोकगुरु महेश्वरको प्रसन्न करके दिव्यास्त्र प्राप्त किया था ।। ततः प्रभातां रजनीं फाल्गुनस्याग्रत: प्रभु: ।। जघान सैन्यं शूलेन प्रत्यक्षं सव्यसाचिन: । “तदनन्तर जब रात बीती और प्रातःकाल हुआ, तब भगवान् शिवने अर्जुनके आगे रहकर अपने त्रिशूलसे शत्रुओंकी सेनाका संहार किया था। यह बात अर्जुनने प्रत्यक्ष देखी थी।। कस्तां सेनां महाराज मनसापि प्रधर्षयेत् ।। द्रोणकर्णमुखैर्युक्तां महेष्वासै: प्रहारिभि: । ऋते देवान्महेष्वासाद् बहुरूपान्महेश्वरात् ।। “महाराज! द्रोणाचार्य और कर्ण-जैसे प्रहारकुशल महाथधनुर्धरोंसे युक्त उस कौरवसेनाको महान् पाशुपतधारी अनेक रूपवाले महेश्वर महादेवके सिवा दूसरा कौन मनसे भी पराजित कर सकता था ।। तस्यैव च प्रसादेन निहता: शत्रवस्तव । अश्वमेधस्य संसिद्धि स तु सम्पादयिष्यति ।।) उन्हींके कृपाप्रसादसे आपके शत्रु मारे गये हैं। वे ही अश्वमेध यज्ञको सफलतापूर्वक सम्पन्न करेंगे” ।। श्रुत्वैवं वदतस्तस्य वाक््यं भीमस्य भारत,भारत! भीमसेनका यह कथन सुनकर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुन आदिने भी बहुत ठीक कहकर उन्हींकी बातका समर्थन किया
বৈশম্পায়ন বললেন—তিনি সেই দেব, সদা প্রসন্নচিত্ত, ভক্তদের পরমেশ্বর; তিনি অমরতাও দান করেন—তবে সোনা দান করা তাঁর কাছে কীই বা কঠিন?
Verse 17
प्रीतो धर्मात्मजो राजा बभूवातीव भारत । अर्जुनप्रमुखाश्नापि तथेत्येवाब्रुवन् वच:,भारत! भीमसेनका यह कथन सुनकर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुन आदिने भी बहुत ठीक कहकर उन्हींकी बातका समर्थन किया
বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত! ধর্মাত্মা রাজা (যুধিষ্ঠির) অত্যন্ত প্রসন্ন হলেন। অর্জুন প্রমুখও “তথাস্তु” বলে সেই কথার সমর্থন করলেন।
Verse 18
कृत्वा तु पाण्डवा: सर्वे रत्नाहरणनिश्चयम् । सेनामाज्ञापयामास;ुर्नक्षत्रेडहनि च ध्रुवे,इस प्रकार समस्त पाण्डवोंने रत्न लानेका निश्चय करके ध्रुवसंज्ञक- नक्षत्र एवं दिनमें सेनाको यात्राके लिये तैयार होनेकी आज्ञा दी
বৈশম্পায়ন বললেন—তারপর সকল পাণ্ডব রত্ন আনবার সংকল্প করে ধ্রুব নক্ষত্রযুক্ত শুভ দিনে সেনাকে যাত্রার জন্য প্রস্তুত হতে আদেশ দিলেন।
Verse 19
ततो ययु: पाण्डुसुता ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च । अर्चयित्वा सुरश्रेष्ठ॑ पूर्वमेव महेश्वरम्,तदनन्तर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर सुरश्रेष्ठ महेश्वरकी पहले ही पूजा करके मिष्टात्न, खीर, पूआ तथा फलके गूदोंसे उन महेश्वरको तृप्त करके उनका आशीर्वाद ले समस्त पाण्डवोंने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक यात्रा प्रारम्भ की
তখন পাণ্ডুপুত্রেরা ব্রাহ্মণদের দ্বারা স্বস্তিবাচন করিয়ে, সর্বপ্রথম দেবশ্রেষ্ঠ মহেশ্বরের পূজা করলেন। তাঁর অনুগ্রহ ও ধর্মসম্মত আশ্বাস লাভ করে, তাঁরা পরম প্রীতচিত্তে যাত্রা আরম্ভ করলেন।
Verse 20
मोदकै: पायसेनाथ मांसापूपैस्तथैव च । आशास्य च महात्मानं प्रययुर्मुदिता भूशम्,तदनन्तर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर सुरश्रेष्ठ महेश्वरकी पहले ही पूजा करके मिष्टात्न, खीर, पूआ तथा फलके गूदोंसे उन महेश्वरको तृप्त करके उनका आशीर्वाद ले समस्त पाण्डवोंने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक यात्रा प्रारम्भ की
তারপর মোদক, পায়স, মাংসাপূপ প্রভৃতি নিবেদন করে সেই মহাত্মা মহেশ্বরকে তৃপ্ত করে, তাঁর আশীর্বাদ প্রার্থনা করলেন। আশীর্বাদ পেয়ে পাণ্ডব রাজারা পরম আনন্দে যাত্রা করলেন।
Verse 21
तेषां प्रयास्यतां तत्र मज़लानि शुभान्यथ । प्राहु: प्रहष्टमनसो द्विजाग्रया नागराश्न ते,जब वे यात्राके लिये उद्यत हुए, उस समय समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों और नागरिकोंने प्रसन्नचित्त होकर उनके लिये शुभ मंगल-पाठ किया
যখন তাঁরা সেখান থেকে যাত্রার জন্য উদ্যত হলেন, তখন শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণগণ ও নগরবাসীরা আনন্দচিত্তে তাঁদের জন্য শুভ-মঙ্গল পাঠ করলেন।
Verse 22
ततः प्रदक्षिणीकृत्य शिरोभि: प्रणिपत्य च | ब्राह्मणानग्निसहितान् प्रययु: पाण्डुनन्दना:,तत्पश्चात् पाण्डवोंने अग्निसहित ब्राह्मणोंकी परिक्रमा करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर वहाँसे प्रस्थान किया
তারপর পাণ্ডুনন্দনগণ অগ্নিসহিত ব্রাহ্মণদের প্রদক্ষিণা করে এবং তাঁদের চরণে মস্তক নত করে সেখান থেকে প্রস্থান করলেন।
Verse 23
समनुज्ञाप्य राजानं पुत्रशोकसमाहतम् । धृतराष्ट्रं सभार्य॑ वै पृथां च पृुथुलोचनाम्,प्रस्थानके पूर्व उन्होंने पुत्रशोकसे व्याकुल राजा धूृतराष्ट्र, गान्धारी देवी तथा विशाललोचना कुन्तीसे आज्ञा ले ली थी
প্রস্থানপূর্বে তাঁরা পুত্রশোকে ব্যাকুল রাজা ধৃতরাষ্ট্রের, তাঁর পত্নী গান্ধারীর এবং বিশালনয়না পৃথা (কুন্তী)-র নিকট থেকে বিধিপূর্বক অনুমতি গ্রহণ করলেন।
Verse 24
मूले निक्षिप्य कौरव्यं युयुत्सुं धृतराष्ट्रजम् । सम्पूज्यमाना: पौरैश्न ब्राह्मणैश्वन मनीषिभि:,(प्रययु: पाण्डवा वीरा नियमस्था: शुचित्रता: ।) अपने कुलके मूलभूत धृतराष्ट्र गान्धारी और कुन्तीके समीप उनकी रक्षाके लिये कुरुवंशी धृतराष्ट्रपुत्र युयुत्सुको नियुक्त करके मनीषी ब्राह्मणों और पुरवासियोंसे पूजित होते हुए वीर पाण्डवोंने वहाँसे प्रस्थान किया। वे सब-के-सब उत्तम व्रतका पालन करते हुए शौच, संतोष आदि नियमोंमें दृढ़तापूर्वक स्थित थे
কুরুবংশের মূলরক্ষার জন্য ধৃতরাষ্ট্রপুত্র যুযুৎসুকে সেখানে নিযুক্ত করে, নগরবাসী ও মনীষী ব্রাহ্মণদের দ্বারা সম্মানিত বীর পাণ্ডবেরা সেখান থেকে প্রস্থান করলেন। তাঁরা সকলেই শুচিব্রতে স্থিত, শৌচ, সন্তোষ ও সংযমাদি নিয়মে দৃঢ় থেকে অগ্রসর হলেন।
Verse 33
अर्जुन भीमसेनं च माद्रीपुत्री यमावपि । वैशम्पायनजीने कहा--राजन्! व्यासजीकी बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव--इन सभी भाइयोंको बुलवाकर यह समयोचित वचन कहा--
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! ব্যাসের বাক্য শুনে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির ভীমসেন, অর্জুন এবং মাদ্রীর যমজ পুত্রদ্বয়কেও ডেকে পাঠালেন। সকল ভ্রাতাকে একত্র করে তিনি সময়োপযোগী, ধর্মানুগত আচরণ নির্দেশক বাক্য উচ্চারণ করলেন।
Verse 43
कुरूणां हितकामेन प्रोक्तं कृष्णेन धीमता । “वीर बन्धुओ! कौरवोंके हितकी कामना रखनेवाले बुद्धिमान् महात्मा श्रीकृष्णने सौहार्दवश जो बात कही थी, वह सब तो तुमने सुनी ही थी
কুরুদের মঙ্গলকামনায় প্রজ্ঞাবান কৃষ্ণ সৌহার্দবশত যে উপদেশ দিয়েছিলেন, তা তোমরা ইতিমধ্যেই সম্পূর্ণরূপে শুনেছ।
Verse 63
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि द्रव्यानयनोपक्रमे त्रिषष्टितमो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपवके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें द्रव्य लानेका उपक्रमविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের আশ্বমেধিক পর্বের অন্তর্গত অনুগীতা-পর্বে দ্রব্য আনার উপক্রম-বিষয়ক তেষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 93
तथा यथा55ह धर्मेण कथं वा भीम मन्यसे । “यदि तुमलोग उस धनको पर्याप्त समझो और उसे ले आनेकी अपनेमें सामर्थ्य देखो तो व्यासजीने जैसा कहा है, उसीके अनुसार धर्मतः उसे प्राप्त करनेका यत्न करो। अथवा भीमसेन! तुम बोलो, तुम्हारा इस सम्बन्धमें क्या विचार है?”
ধর্মানুসারে ঠিক তেমনই করো যেমন বলা হয়েছে। যদি তোমরা সেই ধনকে যথেষ্ট মনে করো এবং তা আনতে নিজেদের সামর্থ্য দেখো, তবে ব্যাস যেমন বলেছেন তেমনই ধর্মপূর্বক তা লাভের চেষ্টা করো। নতুবা, ভীমসেন—বলো, এ বিষয়ে তোমার মত কী?
Verse 113
व्यासाख्यातस्य वित्तस्य समुपानयन प्रति । कुरुकुलशिरोमणे! राजा युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर भीमसेनने हाथ जोड़कर उन नृपश्रेष्ठठे इस प्रकार कहा--“महाबाहो! आपने जो कुछ कहा है, व्यासजीके बताये हुए धनको लानेके विषयमें जो विचार व्यक्त किया है, वह मुझे बहुत पसंद है
ব্যাসদেবের কথিত সেই ধন আনয়নের প্রসঙ্গে কুরুকুল-শিরোমণি রাজা যুধিষ্ঠির এমন বললে, ভীমসেন করজোড়ে নৃপশ্রেষ্ঠকে এইভাবে বলল— “মহাবাহো! আপনি যা বলেছেন, ব্যাসদেবের নির্দেশিত ধন আনার বিষয়ে যে মত প্রকাশ করেছেন, তা আমার অত্যন্ত প্রিয় হয়েছে।”
Verse 126
कृतमेव महाराज भवेदिति मतिर्मम । 'प्रभो! महाराज! यदि हमें मरुत्तका धन प्राप्त हो जाय तब तो हमारा सारा काम बन ही जाय। यही मेरा मत है
“মহারাজ! আমার বিচারে কাজটি সম্পূর্ণ সিদ্ধ হবে। প্রভু, মহারাজ! যদি আমরা মরুত্তের ধন লাভ করতে পারি, তবে আমাদের সকল উদ্দেশ্য পূর্ণ হবে এবং এই উদ্যোগ সম্পূর্ণ সফল হবে। এটাই আমার স্থির মত।”
Verse 136
तदानयाम भद्रं ते समभ्यर्च्य कपर्दिनम् “आपका कल्याण हो। हम महात्मा गिरीशके चरणोंमें प्रणाम करके उन जटाजूटधारी महेश्वरकी सम्यक् आराधना करके उस धनको ले आवें
“তোমার মঙ্গল হোক। আমরা মহাত্মা গিরীশের চরণে প্রণাম করে, জটাজূটধারী মহেশ্বরকে যথাবিধি পূজা করে, সেই ধন এখানে নিয়ে আসব।”
Verse 146
प्रसाद्यार्थमवाप्स्यामो नून॑ वाग्बुद्धि कर्मभि: | “हम बुद्धि, वाणी और क्रियाद्वारा आराधनापूर्वक देवाधिदेव महादेव तथा उनके अनुचरोंको प्रसन्न करके निश्चय ही उस धनको प्राप्त कर लेंगे
“আমরা বাক্য, বুদ্ধি ও কর্ম—এই তিনের দ্বারা আরাধনা করে প্রসাদ লাভ করব। দেবাধিদেব মহাদেবকে তাঁর অনুচরদের সঙ্গে শ্রদ্ধায় পূজা করে তাঁদের সন্তুষ্ট করলে, নিশ্চয়ই আমরা সেই ধন লাভ করব।”
Verse 156
ते च वश्या भविष्यन्ति प्रसन्ने वृषभध्वजे । 'जो रौद्ररूपधारी किन्नर उस धनकी रक्षा करते हैं, वे भी भगवान् शंकरके प्रसन्न होनेपर हमारे अधीन हो जायँगे
“বৃষভধ্বজ (শিব) প্রসন্ন হলে তারাও বশীভূত হবে। যে ভয়ংকর রূপধারী কিন্নররা সেই ধনের রক্ষা করে, শংকরের প্রসাদ লাভ হলে তারাও আমাদের অধীন হবে।”
The chapter frames a governance tension between urgency and correctness: Yudhiṣṭhira seeks timely action yet submits to Brahmanical determination of auspicious time and procedure, prioritizing legitimacy through disciplined compliance over personal preference.
Authority is stabilized by restraint and consultation: public power is presented as accountable to learned expertise, auspicious timing, and orderly social arrangement—dharma enacted through method rather than impulse.
No explicit phalaśruti appears in this extract; the meta-commentary is implicit in the narrative emphasis on śānti rites, fasting, and correct encampment as prerequisites for successful ritual action and social stability.