
सप्तहोतृ-विधानम् एवं इन्द्रिय–मनःसंवादः (The Seven Hotṛs and the Debate of Senses and Mind)
Upa-parva: Indriya–Manas Saṃvāda (Dialogue of the Senses and the Mind)
A brāhmaṇa introduces an “ancient itihāsa” concerning the prescribed arrangement (vidhāna) of seven hotṛs, identified as the five sensory faculties—smell (ghrāṇa), sight (cakṣus), taste (jihvā), touch (tvak), hearing (śrotra)—together with mind (manas) and intellect (buddhi). Though co-present in a subtle locus, they do not apprehend one another’s objects, because each operates within its own guṇa-domain. The brāhmaṇa explains that each faculty fails to grasp the object-range of the others: smell alone grasps odors; taste alone grasps flavors; sight alone grasps forms; touch alone grasps tactile contacts; hearing alone grasps sounds; mind alone apprehends doubt and deliberative fluctuation; intellect alone reaches niṣṭhā (settled determination/decision). The chapter then stages a disputation: mind claims superiority by asserting that without it the senses cannot function, likening sense activity without mind to empty houses or extinguished fires. The senses respond by challenging the mind to enjoy or cognize without them, and by issuing cross-assignment tests (e.g., grasp form by smell), implying functional interdependence. The exchange concludes with a balanced thesis: each remains attached to its own capacity, lacks direct access to the others’ capacities, and yet mutual cooperation is required for lived cognition and satisfaction.
Chapter Arc: ब्राह्मण प्राचीन इतिहासनुमा उपदेश छेड़ता है—मन, बुद्धि और पाँच इन्द्रियाँ मानो ‘सप्त होता’ बनकर भीतर के यज्ञ में नियुक्त हैं; वे सूक्ष्म अवकाश में रहते हुए भी एक-दूसरे को नहीं ‘देखते’ (अर्थात् नहीं जानते)। → इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों का दावा करती हैं और परस्पर सीमाएँ खींचती हैं—घ्राण, रसना, त्वचा, श्रोत्र, मन, बुद्धि रूप-ज्ञान का अधिकार नहीं रखते; चक्षु उसे ग्रहण करता है। ‘गुण-अज्ञान’ और ‘गुण-ज्ञान’ की बहस उठती है: गुणों में रमे हुए ये होता एक-दूसरे के स्वभाव को भी ठीक से नहीं पहचानते। → संवाद तीखा होकर उलट-पुलट हो जाता है—श्रोत्र से गन्ध, घ्राण से शब्द, रसना से स्पर्श जैसे असंगत ‘विनिमय’ का प्रस्ताव रखकर यह दिखाया जाता है कि विषय-ग्रहण का अभिमान भ्रम है; इन्द्रियाँ और मन-बुद्धि वस्तुतः परस्पर-आश्रित हैं और ‘मैं ही जानता/भोगता हूँ’ का दावा टिकता नहीं। → ब्राह्मण स्वप्न-जागरण के उदाहरण से निष्कर्ष देता है: मन अनेक संकल्पों और स्वप्न-आश्रयों से प्रेरित होकर विषयों की ओर दौड़ता है; पर प्राणक्षय/क्षय की घड़ी में वही विषय-आधारित संकल्प शांत हो जाते हैं—जैसे ईंधन-क्षय पर अग्नि स्वतः बुझती है।
Verse 1
अपन बछ। है २ >> द्ाविशोदष्ध्याय: मन-बुद्धि और इन्द्रियरूप सप्त होताओंका, यज्ञ तथा मन- इन्द्रिय-संवादका वर्णन ब्राह्मण उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । सुभगे सप्तहोतृणां विधानमिह यादृशम्,ब्राह्मणने कहा--सुभगे! इसी विषयमें इस पुरातन इतिहासका भी उदाहरण दिया जाता है। सात होताओंके यज्ञका जैसा विधान है, उसे सुनो
ব্রাহ্মণ বললেন—এই বিষয়েই আবার এক প্রাচীন ঐতিহ্যকথা উদাহরণরূপে বলা হয়। সৌভাগ্যবতী! এখানে যেভাবে সপ্ত হোতার যজ্ঞবিধান নিরূপিত হয়েছে, তা শোনো।
Verse 2
घ्राणश्नक्षुश्न जिह्ना च त्वक् श्रोत्रं चैव पञजचमम् | मनो बुद्धिश्व सप्तैते होतार: पृथगाश्रिता:,नासिका, नेत्र, जिह्ठदा, त्वचा और पाँचवाँ कान, मन और बुद्धि--ये सात होता अलग- अलग रहते हैं। यद्यपि ये सभी सूक्ष्म शरीरमें ही निवास करते हैं तो भी एक-दूसरेको नहीं देखते हैं। शोभने! इन सात होताओंको तुम स्वभावसे ही पहचानो
ব্রাহ্মণ বললেন—নাসিকা, চক্ষু, জিহ্বা, ত্বক এবং পঞ্চম কর্ণ; আর মন ও বুদ্ধি—এই সাতজন হোতা পৃথক পৃথকভাবে অবস্থান করে। যদিও তারা সকলেই সূক্ষ্ম দেহের মধ্যেই বাস করে, তবু পরস্পরকে উপলব্ধি করে না। হে সুন্দরী, স্বভাবতই এই সপ্ত হোতাকে চিনে নাও।
Verse 3
सूक्ष्मेअवकाशे तिष्ठन्तो न पश्यन्तीतरेतरम् । एतान् वै सप्तहोतृस्त्वं स्वभावाद् विद्धि शोभने,नासिका, नेत्र, जिह्ठदा, त्वचा और पाँचवाँ कान, मन और बुद्धि--ये सात होता अलग- अलग रहते हैं। यद्यपि ये सभी सूक्ष्म शरीरमें ही निवास करते हैं तो भी एक-दूसरेको नहीं देखते हैं। शोभने! इन सात होताओंको तुम स्वभावसे ही पहचानो
সূক্ষ্ম অন্তঃস্থলে অবস্থান করেও তারা পরস্পরকে দেখে না। হে সুন্দরী, স্বভাবতই এদেরই সপ্ত হোতা বলে জানো—একই সূক্ষ্ম দেহে থেকেও প্রত্যেকে নিজ নিজ কর্মে পৃথক।
Verse 4
ब्राह्मण्युवाच सूक्ष्मेअवकाशे सन्तस्ते कं नान्योन्यदर्शिन: । कथंस्वभावा भगवन्नेतदाचक्ष्व मे प्रभो,ब्राह्मणीने पूछा--भगवन्! जब सभी सूक्ष्म शरीरमें ही रहते हैं, तब एक-दूसरेको देख क्यों नहीं पाते? प्रभो! उनके स्वभाव कैसे हैं? यह बतानेकी कृपा करें
ব্রাহ্মণী জিজ্ঞাসা করলেন—ভগবন! তারা সকলেই যখন সূক্ষ্ম অন্তঃস্থলে থাকে, তখন কেন পরস্পরকে দেখে না? প্রভু! তাদের স্বভাব কী রকম—এ কথা আমাকে বলুন।
Verse 5
ब्राह्मण उवाच गुणाज्ञानमविज्ञानं गुणज्ञानमभिज्ञता | परस्परं गुणानेते नाभिजानन्ति कह्िचित्,ब्राह्मणने कहा--प्रिये! (यहाँ देखनेका अर्थ है, जानना) गुणोंको न जानना ही गुणवानको न जानना कहलाता है और गुणोंको जानना ही गुणवान्को जानना है। ये नासिका आदि सात होता एक-दूसरेके गुणोंको कभी नहीं जान पाते हैं (इसीलिये कहा गया है कि ये एक-दूसरेको नहीं देखते हैं)
ব্রাহ্মণ বললেন—গুণ না জানা-ই অজ্ঞানতা, আর গুণ জানা-ই প্রকৃত প্রজ্ঞা। কিন্তু এরা পরস্পরের গুণকে চেনে না; কেউই অন্যকে সম্পূর্ণভাবে উপলব্ধি করতে পারে না।
Verse 6
जिद्दा चक्षुस्तथा श्रोत्रं वाड्मनो बुद्धिरेव च । न गन्धानधिगच्छन्ति प्राणस्तानधिगच्छति,जीभ, आँख, कान, त्वचा, मन और बुद्धि--ये गन्धोंको नहीं समझ पाते, किंतु नासिका उसका अनुभव करती है
ব্রাহ্মণ বললেন—জিহ্বা, চক্ষু, কর্ণ, ত্বক, মন ও বুদ্ধি—এরা গন্ধ উপলব্ধি করতে পারে না; ঘ্রাণেন্দ্রিয়ের আশ্রয়ে প্রাণই গন্ধ গ্রহণ করে।
Verse 7
घ्राणं चक्षुस्तथा श्रोत्रं वाड्मनो बुद्धिरेव च । न रसानधिगच्छन्ति जिह्नला तानधिगच्छति,नासिका, कान, नेत्र, त्वचा, मन और बुद्धि--ये रसोंका आस्वादन नहीं कर सकते। केवल जिह्नला उसका स्वाद ले सकती है
ব্রাহ্মণ বললেন—ঘ্রাণ, চক্ষু, কর্ণ, বাক্, মন ও বুদ্ধি—এরা রস উপলব্ধি করতে পারে না; কেবল জিহ্বাই রস গ্রহণ করে।
Verse 8
घ्राणं जिह्ना तथा श्रोत्रं वाड्मनो बुद्धिरेव च । न रूपाण्यधिगच्छन्ति चक्षुस्तान्यधिगच्छति,नासिका, जीभ, कान, त्वचा, मन और बुद्धि--ये रूपका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते; किंतु नेत्र इनका अनुभव करते हैं
ব্রাহ্মণ বললেন—ঘ্রাণ, জিহ্বা, কর্ণ, বাক্, মন ও বুদ্ধি—এরা রূপ উপলব্ধি করতে পারে না; কেবল চক্ষুই রূপ গ্রহণ করে।
Verse 9
घ्राणं जिद्दा ततदश्नक्षुः श्रोत्रं बुद्धिर्मनस्तथा । न स्पर्शानधिगच्छन्ति त्वक् च तानधिगच्छति,नासिका, जीभ, आँख, कान, बुद्धि और मन--ये स्पर्शका अनुभव नहीं कर सकते; किंतु त्वचाको उसका ज्ञान होता है
ব্রাহ্মণ বললেন—ঘ্রাণ, জিহ্বা, চক্ষু, কর্ণ, বুদ্ধি ও মন—এরা স্পর্শ উপলব্ধি করতে পারে না; ত্বকই কেবল স্পর্শ গ্রহণ করে।
Verse 10
घ्राणं जिह्ना च चक्षुश्न॒ वाड्मनो बुद्धिरेव च । न शब्दानधिगच्छन्ति श्रोत्रं तानधिगच्छति,नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, मन और बुद्धि--इन्हें शब्दका ज्ञान नहीं होता; किंतु कानको होता है
ব্রাহ্মণ বললেন—ঘ্রাণ, জিহ্বা, চক্ষু, ত্বক, মন ও বুদ্ধি—এরা শব্দ উপলব্ধি করতে পারে না; কর্ণই কেবল শব্দ গ্রহণ করে।
Verse 11
घ्राणं जिह्ना च चक्षुश्न त्वक् श्रोत्रं बुद्धिरेव च । संशयं नाधिगच्छन्ति मनस्तमधिगच्छति,नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान और बुद्धि--ये संशय (संकल्प-विकल्प) नहीं कर सकते। यह काम मनका है
ব্রাহ্মণ বললেন— নাসিকা, জিহ্বা, চক্ষু, ত্বক, কর্ণ এবং বুদ্ধি—এরা নিজেরা সংশয় বা দ্বিধা সৃষ্টি করতে পারে না। সেই দোদুল্যমানতায় মনই পৌঁছে এবং মনই তা উৎপন্ন করে। অতএব নৈতিক স্থৈর্য ও যথার্থ বিবেচনা ইন্দ্রিয়কে দোষারোপে নয়, মনকে সংযত করাতেই নির্ভর করে।
Verse 12
घ्राणं जिह्ना च चक्षुश्न त्वक् श्रोत्र मन एव च | न निष्ठामधिगच्छन्ति बुद्धिस्तामधिगच्छति,इसी प्रकार नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान, और मन--वे किसी बातका निश्चय नहीं कर सकते। निश्चयात्मक ज्ञान तो केवल बुद्धिको होता है
ব্রাহ্মণ বললেন— নাসিকা, জিহ্বা, চক্ষু, ত্বক, কর্ণ এবং মন—এরা কোনো বিষয়ে দৃঢ় নিশ্চয়ে পৌঁছাতে পারে না। নিশ্চিত জ্ঞান কেবল বুদ্ধিরই অধিকার।
Verse 13
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । इन्द्रियाणां च संवादं मनसश्लैव भामिनि,भामिनि! इस विषयमें इन्द्रियों और मनके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है
হে সুন্দরী! এ বিষয়েও এক প্রাচীন ইতিহাসের দৃষ্টান্ত বলা হয়—ইন্দ্রিয়সমূহ ও মনের মধ্যে যে সংলাপ হয়েছিল। এই উপাখ্যানটি বিষয়টির অর্থ স্পষ্ট করতেই উদ্ধৃত।
Verse 14
मन उवाच नाप्राति मामृते प्राणं रसं जिदह्दा न वेत्ति च । रूप॑ चक्षुर्न गृह्नाति त्वक् स्पर्श नावबुध्यते,एक बार मनने इन्द्रियोंसे कहा--मेरी सहायताके बिना नासिका सूँघ नहीं सकती, जीभ रसका स्वाद नहीं ले सकती, आँख रूप नहीं देख सकती, त्वचा स्पर्शका अनुभव नहीं कर सकती और कानोंको शब्द नहीं सुनायी दे सकता। इसलिये मैं सब भूतोंमें श्रेष्ठ और सनातन हूँ
মন বলল— “আমাকে বাদ দিয়ে নাসিকা তার কর্মে প্রবৃত্ত হতে পারে না; জিহ্বা রস জানতে পারে না; চক্ষু রূপ গ্রহণ করতে পারে না; ত্বক স্পর্শ উপলব্ধি করতে পারে না। এইভাবে সকল ইন্দ্রিয়ই আমার আশ্রয়ে নিজ নিজ বিষয় লাভ করে।”
Verse 15
न श्षोत्रं बुध्यते शब्द मया हीन॑ कथंचन । प्रवरं सर्वभूतानामहमस्मि सनातनम्,एक बार मनने इन्द्रियोंसे कहा--मेरी सहायताके बिना नासिका सूँघ नहीं सकती, जीभ रसका स्वाद नहीं ले सकती, आँख रूप नहीं देख सकती, त्वचा स्पर्शका अनुभव नहीं कर सकती और कानोंको शब्द नहीं सुनायी दे सकता। इसलिये मैं सब भूतोंमें श्रेष्ठ और सनातन हूँ
মন বলল— “আমাকে বাদ দিলে কর্ণ কোনোভাবেই শব্দ উপলব্ধি করতে পারে না। অতএব আমি সকল জীবের মধ্যে শ্রেষ্ঠ এবং সনাতন।”
Verse 16
अगाराणीव शून्यानि शान्तार्चिष इवाग्नय: । इन्द्रियाणि न भासन्ते मया हीनानि नित्यश:,“मेरे बिना समस्त इन्द्रियाँ बुझी लपटोंवाली आग और सूने घरकी भाँति सदा श्रीहीन जान पड़ती हैं
মন বলল— আমার ছাড়া ইন্দ্রিয়গুলি কখনও সত্যভাবে দীপ্ত হয় না। আমার অনুপস্থিতিতে তারা চিরকাল শ্রীহীন মনে হয়— যেন জনশূন্য গৃহ, কিংবা নিভে-যাওয়া শিখাযুক্ত অগ্নি।
Verse 17
काष्ठानीवार्द्रशुष्काणि यतमानैरपीन्द्रियै: । गुणार्थान् नाधिगच्छन्ति मामृते सर्वजन्तव:,संसारके सभी जीव इन्द्रियोंके यत्न करते रहनेपर भी मेरे बिना उसी प्रकार विषयोंका अनुभव नहीं कर सकते, जिस प्रकार कि सूखे-गीले काष्ठ कोई अनुभव नहीं कर सकते
মন বলল— যেমন ভেজা বা শুকনো কাঠ নিজে কিছুই ‘অনুভব’ করতে পারে না, তেমনি সকল জীব, ইন্দ্রিয়ের যত চেষ্টা থাকুক না কেন, আমার ছাড়া বিষয় ও তার গুণের যথার্থ উপলব্ধি করতে পারে না।
Verse 18
इच्धियाण्यूचु: एवमेतद् भवेत् सत्यं यथैतन्मन्यते भवान् | ऋते<5स्मानस्मदर्थास्त्वं भोगान् भुड्क्ते भवान् यदि,यह सुनकर इन्द्रियोंने कहा--महोदय! यदि आप भी हमारी सहायता लिये बिना ही विषयोंका अनुभव कर सकते तो हम आपकी इस बातको सच मान लेतीं
ইন্দ্রিয়গুলি বলল— মহাশয়! আপনি যেমন ভাবছেন, তেমনটি তখনই সত্য হবে, যদি আমাদের ছাড়া—যেহেতু আমরা সেই উদ্দেশ্যেই বিদ্যমান—আপনি ভোগ্য বিষয় উপভোগ করতে পারেন।
Verse 19
यद्यस्मासु प्रलीनेषु तर्पणं प्राणधारणम् । भोगान् भुद्क्ते भवान् सत्यं यथैतन्मन्यते तथा,हमारा लय हो जानेपर भी आप तृप्त रह सकें, जीवन धारण कर सकें और सब प्रकारके भोग भोग सकें तो आप जैसा कहते और मानते हैं, वह सब सत्य हो सकता है
মন বলল— যদি আমাদের লীন হয়ে যাওয়ার পরও তোমরা তৃপ্ত থাকতে পারো, প্রাণ ধারণ করতে পারো এবং ভোগ উপভোগ করতে পারো, তবে তোমরা যা বলছ ও ভাবছ তা সত্য হতে পারে।
Verse 20
अथवास्मासु लीनेषु तिष्ठत्सु विषयेषु च । यदि संकल्पमात्रेण भुद्ुक्ते भोगान् यथार्थवत्,अथवा हम सब इन्द्रियाँ लीन हो जायँ या विषयोंमें स्थित रहें, यदि आप अपने संकल्पमात्रसे विषयोंका यथार्थ अनुभव करनेकी शक्ति रखते हैं और आपको ऐसा करनेमें सदा ही सफलता प्राप्त होती है तो जरा नाकके द्वारा रूपका तो अनुभव कीजिये, आँखसे रसका तो स्वाद लीजिये और कानके द्वारा गन्धोंको तो ग्रहण कीजिये। इसी प्रकार अपनी शक्तिसे जिह्लाके द्वारा स्पर्शका, त्वचाके द्वारा शब्दका और बुद्धिके द्वारा स्पर्शका तो अनुभव कीजिये
মন বলল— অথবা আমরা ইন্দ্রিয়গুলি লীন হয়ে যাই কিংবা বিষয়গুলির সঙ্গে যুক্তই থাকি; যদি কেবল সংকল্পমাত্রে তুমি ভোগকে যথার্থভাবে অনুভব করতে পারো এবং তাতে কখনও ব্যর্থ না হও, তবে পরীক্ষা করো— নাক দিয়ে রূপ উপলব্ধি করো, চোখ দিয়ে রসের স্বাদ নাও, আর কান দিয়ে গন্ধ গ্রহণ করো। তেমনি জিহ্বা দিয়ে স্পর্শ জানো, ত্বক দিয়ে শব্দ ধরো, এবং বুদ্ধি দিয়ে স্পর্শ অনুভব করো।
Verse 21
अथ चेन्मन्यसे सिद्धिमस्मदर्थेषु नित्यदा । प्राणेन रूपमादत्स्व रसमादत्स्व चक्षुषा,अथवा हम सब इन्द्रियाँ लीन हो जायँ या विषयोंमें स्थित रहें, यदि आप अपने संकल्पमात्रसे विषयोंका यथार्थ अनुभव करनेकी शक्ति रखते हैं और आपको ऐसा करनेमें सदा ही सफलता प्राप्त होती है तो जरा नाकके द्वारा रूपका तो अनुभव कीजिये, आँखसे रसका तो स्वाद लीजिये और कानके द्वारा गन्धोंको तो ग्रहण कीजिये। इसी प्रकार अपनी शक्तिसे जिह्लाके द्वारा स्पर्शका, त्वचाके द्वारा शब्दका और बुद्धिके द्वारा स्पर्शका तो अनुभव कीजिये
মন বলল—“যদি তুমি মনে কর যে আমাদের উদ্দেশ্যে তুমি সর্বদাই সিদ্ধি লাভ কর, তবে ইন্দ্রিয়গুলির স্বাভাবিক ক্রম উল্টে দাও: শ্বাসের দ্বারা রূপ গ্রহণ কর, আর চোখের দ্বারা রসের স্বাদ নাও।”
Verse 22
श्रोत्रेण गन्धानादत्स्व स्पर्शानादत्स्व जिह्दया । त्वचा च शब्दमादत्स्व बुद्धया स्पर्शभथापि च,अथवा हम सब इन्द्रियाँ लीन हो जायँ या विषयोंमें स्थित रहें, यदि आप अपने संकल्पमात्रसे विषयोंका यथार्थ अनुभव करनेकी शक्ति रखते हैं और आपको ऐसा करनेमें सदा ही सफलता प्राप्त होती है तो जरा नाकके द्वारा रूपका तो अनुभव कीजिये, आँखसे रसका तो स्वाद लीजिये और कानके द्वारा गन्धोंको तो ग्रहण कीजिये। इसी प्रकार अपनी शक्तिसे जिह्लाके द्वारा स्पर्शका, त्वचाके द्वारा शब्दका और बुद्धिके द्वारा स्पर्शका तो अनुभव कीजिये इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु द्वाविंशोडध्याय:
মন বলল—“কানে গন্ধ গ্রহণ কর, জিহ্বায় স্পর্শ অনুভব কর; ত্বকে শব্দ গ্রহণ কর, আর বুদ্ধিতেও স্পর্শ অনুভব করে দেখাও।”
Verse 23
बलवन्तो हानियमा नियमा दुर्बलीयसाम् । भोगानपूर्वानादत्स्व नोच्छिष्टं भोक्तुमहति,आप-जैसे बलवान् लोग नियमोंके बन्धनमें नहीं रहते, नियम तो दुर्बलोंके लिये होते हैं। आप नये ढंगसे नवीन भोगोंका अनुभव कीजिये। हमलोगोंकी जूठन खाना आपको शोभा नहीं देता
মন বলল—“বলবানদের জন্য নিয়ম নয়; নিয়ম দুর্বলের জন্য। নতুন রীতিতে অভূতপূর্ব ভোগ গ্রহণ কর; অন্যের উচ্ছিষ্ট ভক্ষণ করা তোমার শোভা পায় না।”
Verse 24
यथा हि शिष्य: शास्तारं श्र॒त्यर्थमभिधावति । ततः श्रुतमुपादाय श्रुत्यर्थमुपतिछठति,जैसे शिष्य श्रुतिके अर्थको जाननेके लिये उपदेश करनेवाले गुरुके पास जाता है और उनसे श्रुतिके अर्थका ज्ञान प्राप्त करके फिर स्वयं उसका विचार और अनुसरण करता है, वैसे ही आप सोते और जागते समय हमारे ही दिखाये हुए भूत और भविष्य-विषयोंका उपभोग करते हैं
“যেমন শিষ্য শ্রুতির অর্থ জানার জন্য আচার্যের কাছে ধাবিত হয়, আর যা শুনেছে তা গ্রহণ করে মনন ও আচরণে সেই অর্থে স্থিত থাকে; তেমনি তুমি নিদ্রা ও জাগরণে আমাদেরই দেখানো বিষয়সমূহই অনুভব কর।”
Verse 25
विषयानेवमस्माभिर्दर्शितानभिमन्यसे । अनागतानतीतांक्ष स्वप्ने जागरणे तथा,जैसे शिष्य श्रुतिके अर्थको जाननेके लिये उपदेश करनेवाले गुरुके पास जाता है और उनसे श्रुतिके अर्थका ज्ञान प्राप्त करके फिर स्वयं उसका विचार और अनुसरण करता है, वैसे ही आप सोते और जागते समय हमारे ही दिखाये हुए भूत और भविष्य-विषयोंका उपभोग करते हैं
মন বলল—“এইভাবে আমাদের দেখানো বিষয়গুলিকেই তুমি সত্য বলে মানো। স্বপ্নে হোক বা জাগরণে—ভবিষ্যৎ ও অতীতের বিষয়ও তুমি ঠিক তেমনই অনুভব কর, যেমন আমরা দেখাই।”
Verse 26
वैमनस्यं गतानां च जन्तूनामल्पचेतसाम् | अस्मदर्थ कृते कार्य दृश्यते प्राणधारणम्,जो मनरहित हुए मन्दबुद्धि प्राणी हैं, उनमें भी हमारे लिये ही कार्य किये जानेपर प्राण- धारण देखा जाता है
যে মন্দবুদ্ধি প্রাণীরা বিষণ্ণ হয়ে মনোবল হারায়, তাদের মধ্যেও আমাদের জন্য কোনো কাজ করা হলে প্রাণধারণের প্রবৃত্তি দেখা যায়।
Verse 27
बहूनपि हि संकल्पान् मत्वा स्वप्लानुपास्य च बुभुक्षया पीड्यमानो विषयानेव धावति,बहुत-से संकल्पोंका मनन और स्वप्लोंका आश्रय लेकर भोग भोगनेकी इच्छासे पीड़ित हुआ प्राणी विषयोंकी ओर ही दौड़ता है
বহু সংকল্প মনে করে এবং স্বপ্নের আশ্রয় নিয়ে, ভোগলালসায় পীড়িত প্রাণী কেবল বিষয়ের দিকেই ছুটে যায়।
Verse 28
अगारमद्वारमिव प्रविश्य संकल्पभोगान् विषये निबद्धान् | प्राणक्षये शान्तिमुपैति नित्यं दारुक्षयेडग्निज्वलितो यथैव,विषय-वासनासे अनुविद्ध संकल्पजनित भोगोंका उपभोग करके प्राणशक्तिके क्षीण होनेपर मनुष्य बिना दरवाजेके घरमें घुसे हुए मनुष्यकी भाँति उसी तरह शान्त हो जाता है, जैसे समिधाओंके जल जानेपर प्रज्वलित अग्नि स्वयं ही बुझ जाती है
বিষয়-বাসনায় বিদ্ধ সংকল্পজাত ভোগ ভোগ করে, প্রাণশক্তি ক্ষীণ হলে মানুষ দরজাহীন ঘরে ঢুকে পড়া লোকের মতো নীরব শান্তিতে থেমে যায়; যেমন জ্বালানি কাঠ পুড়ে গেলে প্রজ্বলিত অগ্নি আপনিই নিভে যায়।
Verse 29
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मण-गीताविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,काम तु नः स्वेषु गुणेषु सड़: काम च नान्योन्यगुणोपलब्धि: । अस्मान् विना नास्ति तवोपलब्धि- स्तावदते त्वां न भजेत् प्रहर्ष:. भले ही हमलोगोंकी अपने-अपने गुणोंके प्रति आसक्ति हो और भले ही हम परस्पर एक-दूसरेके गुणोंको न जान सकें; किंतु यह बात सत्य है कि आप हमारी सहायताके बिना किसी भी विषयका अनुभव नहीं कर सकते। आपके बिना तो हमें केवल हर्षसे ही वंचित होना पड़ता है
ব্রাহ্মণ বললেন—ধরা যাক আমরা প্রত্যেকে নিজের নিজের গুণে আসক্ত, এবং ধরা যাক আমরা পরস্পরের গুণ সম্পূর্ণরূপে উপলব্ধি করতে পারি না; তবু এ সত্য যে আমাদের ব্যতীত তুমি কোনো বিষয়ই উপলব্ধি করতে পারো না। আর তোমাকে ছাড়া আমাদের কেবল হর্ষই থাকে না—আনন্দ থেকে আমরা বঞ্চিত হই।
It addresses misattribution of agency and knowledge: whether mind can claim independent supremacy, or whether ethical self-governance requires acknowledging the bounded authority and necessary cooperation of each cognitive faculty.
Cognition is modular yet coordinated: each sense apprehends only its own object-field, mind mediates doubt and intention, intellect stabilizes decision, and practical clarity arises when no faculty overreaches its proper scope.
No explicit phalaśruti appears in this excerpt; the meta-function is pedagogical—clarifying the architecture of perception and inner governance to support disciplined conduct and sound judgment.