Adhyaya 14
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 1420 Verses

Adhyaya 14

Āśvamedhika-parva, Adhyāya 14 (Consolation of Yudhiṣṭhira; Rites and Gifts; Return to Hastināpura)

Upa-parva: Āśvamedhika-parva (Opening: Royal Consolation, Funeral Rites, and Resolve for Sacrifice)

Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira, overwhelmed by bereavement, is consoled through varied and authoritative counsel delivered by ascetic sages and senior figures. The king’s mental anguish subsides as he accepts guidance from Vyāsa (Kṛṣṇa Dvaipāyana), Nārada, and other respected interlocutors, alongside his immediate family network. Regaining composure, he performs worship of deities and Brahmins and completes funerary and post-death obligations connected with the fallen, including rites associated with Bhīṣma’s passing. The narrative underscores extensive dāna (major gifts) to Brahmins as part of aurdhvadaihika observances. Yudhiṣṭhira then resumes governance of the earth, characterized as bounded by ocean, and re-enters Gajasāhvaya (Hastināpura), honoring Dhṛtarāṣṭra and administering the kingdom with his brothers. The chapter closes with Yudhiṣṭhira’s statement of clarity—no lingering duplicity in his mind—and his intention to proceed toward a major sacrificial undertaking under elder protection, oriented toward restoring order after crisis.

Chapter Arc: भीष्म-निधन के पश्चात शोक और कर्तव्य के संगम पर युधिष्ठिर ऋषियों के सत्कार में कृतज्ञता प्रकट करते हैं—और तभी महर्षियों का अद्भुत अन्तर्धान सबको विस्मित कर देता है। → राजा के मन में युद्धोत्तर अपराध-बोध, कुल-क्षय का शोक और राज्य-धर्म का भार एक साथ उठता है; शौचकर्म, और्ध्वदैहिक क्रियाएँ और ब्राह्मण-पूजन के बीच यह प्रश्न गूंजता है कि अब धर्मराज्य कैसे स्थापित हो। → सबके देखते-देखते महर्षियों का वहीं अदर्शन हो जाना और उसके बाद युधिष्ठिर द्वारा भीष्म, कर्ण आदि कुरुवंशियों के निमित्त श्राद्ध/और्ध्वदैहिक कर्म का विधिवत संपादन—यही अध्याय का शिखर है, जहाँ शोक कर्म में रूपांतरित होता है। → युधिष्ठिर ब्राह्मणों को बहुधन दान देते हैं, देवताओं-ब्राह्मणों का पूजन करते हैं, धृतराष्ट्र को अग्र में रखकर हस्तिनापुर (गजसाह्वय) में प्रवेश करते हैं और समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी का धर्मपूर्वक शासन आरम्भ करते हैं। → हस्तिनापुर में धर्मराज्य की स्थापना के साथ आगे के राजधर्म, प्रायश्चित्त और अश्वमेध-योजना की भूमिका बनती है।

Shlokas

Verse 1

अफ--रू- चतुर्दशो 5 ध्याय: ऋषियोंका अन्तर्धान होना, भीष्म आदिका श्राद्ध करके युधिष्ठिर आदिका हस्तिनापुरमें जाना तथा युधिष्ठिरके धर्मराज्यका वर्णन वैशम्पायन उवाच एवं बहुविधैर्वाक्यैर्मुनिभिस्तैस्तपो धनै: । समाश्वस्यत राजर्षिहतबन्धुर्युधिष्ठिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार साक्षात्‌ विष्टरश्रवा (विस्तृत यशवाले) भगवान्‌ श्रीकृष्ण, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, देवस्थान, नारद, भीमसेन, नकुल, द्रौपदी, सहदेव, बुद्धिमान्‌ अर्जुन तथा अन्यान्य श्रेष्ठ पुरुषों और शास्त्रदर्शी ब्राह्मणों एवं तपोधन मुनियोंके बहुविध वचनोंद्वारा समझाने-बुझानेपर जिनके भाई-बन्धु मारे गये थे, उन राजर्षि युधिष्ठिरका मन शान्त हुआ और उन्होंने शोकजनित दुःख तथा मानसिक संतापको त्याग दिया

বৈশম্পায়ন বললেন—এইভাবে তপোধন মুনিদের নানাবিধ বাক্যে সান্ত্বনা পেয়ে, স্বজনহারা রাজর্ষি যুধিষ্ঠির শান্ত হলেন এবং স্থৈর্য লাভ করলেন।

Verse 2

सो<नुनीतो भगवता विष्टरश्रवसा स्वयम्‌ | द्वैधायनेन कृष्णेन देवस्थानेन वा विभु:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार साक्षात्‌ विष्टरश्रवा (विस्तृत यशवाले) भगवान्‌ श्रीकृष्ण, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, देवस्थान, नारद, भीमसेन, नकुल, द्रौपदी, सहदेव, बुद्धिमान्‌ अर्जुन तथा अन्यान्य श्रेष्ठ पुरुषों और शास्त्रदर्शी ब्राह्मणों एवं तपोधन मुनियोंके बहुविध वचनोंद्वारा समझाने-बुझानेपर जिनके भाई-बन्धु मारे गये थे, उन राजर्षि युधिष्ठिरका मन शान्त हुआ और उन्होंने शोकजनित दुःख तथा मानसिक संतापको त्याग दिया

বৈশম্পায়ন বললেন—এইভাবে স্বয়ং বিস্তরশ্রবা ভগবান শ্রীকৃষ্ণ, কৃষ্ণদ্বৈপায়ন ব্যাস এবং দেবস্থান প্রমুখের উপদেশ ও সান্ত্বনায় সেই মহাবীর (যুধিষ্ঠির) স্থিরচিত্ত হলেন।

Verse 3

नारदेनाथ भीमेन नकुलेन च पार्थिव । कृष्णया सहदेवेन विजयेन च धीमता,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार साक्षात्‌ विष्टरश्रवा (विस्तृत यशवाले) भगवान्‌ श्रीकृष्ण, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, देवस्थान, नारद, भीमसेन, नकुल, द्रौपदी, सहदेव, बुद्धिमान्‌ अर्जुन तथा अन्यान्य श्रेष्ठ पुरुषों और शास्त्रदर्शी ब्राह्मणों एवं तपोधन मुनियोंके बहुविध वचनोंद्वारा समझाने-बुझानेपर जिनके भाई-बन्धु मारे गये थे, उन राजर्षि युधिष्ठिरका मन शान्त हुआ और उन्होंने शोकजनित दुःख तथा मानसिक संतापको त्याग दिया

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন, নারদ, ভীম, নকুল, কৃষ্ণা (দ্রৌপদী), সহদেব এবং বুদ্ধিমান বিজয় (অর্জুন) প্রমুখও নানাভাবে উপদেশ দিয়ে তাঁকে সান্ত্বনা দিলেন।

Verse 4

अन्यैश्व पुरुषव्याघ्रैग्राह्मणै: शास्त्रदृष्टिभि: व्यजहाच्छोकजं दु:खं संतापं चैव मानसम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार साक्षात्‌ विष्टरश्रवा (विस्तृत यशवाले) भगवान्‌ श्रीकृष्ण, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, देवस्थान, नारद, भीमसेन, नकुल, द्रौपदी, सहदेव, बुद्धिमान्‌ अर्जुन तथा अन्यान्य श्रेष्ठ पुरुषों और शास्त्रदर्शी ब्राह्मणों एवं तपोधन मुनियोंके बहुविध वचनोंद्वारा समझाने-बुझानेपर जिनके भाई-बन्धु मारे गये थे, उन राजर्षि युधिष्ठिरका मन शान्त हुआ और उन्होंने शोकजनित दुःख तथा मानसिक संतापको त्याग दिया

বৈশম্পায়ন বললেন—আরও বহু শ্রেষ্ঠ পুরুষ, শাস্ত্রদর্শী ব্রাহ্মণ ও তপস্বীদের উপদেশে তিনি শোকজাত দুঃখ এবং মনের দহন ত্যাগ করলেন।

Verse 5

अर्चयामास देवांश्र ब्राह्मणांश्व युधिष्ठिर: । कृत्वाथ प्रेतकार्याणि बन्धूनां स पुनर्न॒प:

বৈশম্পায়ন বললেন—রাজা যুধিষ্ঠির যথাবিধি দেবতাদের পূজা করলেন এবং ব্রাহ্মণদের সম্মান জানালেন। প্রয়াত স্বজনদের শ্রাদ্ধ-প্রেতকার্য সম্পন্ন করে তিনি পুনরায় ধর্ম-শাসন ও ন্যায়-প্রতিষ্ঠার অভিপ্রায়ে রাজকার্যে প্রবৃত্ত হলেন।

Verse 6

प्रशान्तचेता: कौरव्य: स्वराज्यं प्राप्प केवलम्‌ । व्यासं च नारदं चैव तांश्वान्यानब्रवीन्नूप:,चित्त शान्त होनेपर केवल अपना राज्य ग्रहण करके कुरुवंशी नरेश युधिष्ठिरने व्यास, नारद तथा अन्यान्य मुनिवरोंसे कहा--

চিত্ত প্রশান্ত হলে কৌরব-রাজ যুধিষ্ঠির নির্বিকারভাবে নিজের রাজ্য গ্রহণ করলেন। তারপর তিনি ব্যাস, নারদ এবং অন্যান্য শ্রেষ্ঠ মুনিদের উদ্দেশে কথা বললেন।

Verse 7

आश्चासितोऊ हं प्राग्वृद्धैर्भवद्धिर्मुनिपुड़वै: । न सूक्ष्ममपि मे किंचिद्‌ व्यलीकमिह विद्यते,“महानुभावो! आप सब लोग वृद्ध और मुनियोंमें श्रेष्ठ हैं। आपकी बातोंसे मुझे बड़ी सान्त्वना मिली है। अब मेरे मनमें तनिक भी दुःख नहीं है

বৈশম্পায়ন বললেন—মহানুভাবগণ! আপনারা বয়োজ্যেষ্ঠ এবং মুনিদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ। আপনাদের বাক্যে আমি গভীর সান্ত্বনা পেয়েছি; এখন আমার অন্তরে সামান্যতম দুঃখও অবশিষ্ট নেই।

Verse 8

अर्थश्न सुमहान्‌ प्राप्तो येन यक्ष्यामि देवता: । पुरस्कृत्याद्य भवत: समानेष्यामहे मखम्‌,“इधर पर्याप्त धन भी मिल गया, जिससे मैं भलीभाँति देवताओंका यजन भी कर सकूँगा। अब आपलोगोंको आगे करके हमलोग उस धनको अपनी यज्ञशालामें ले आवेंगे

বৈশম্পায়ন বললেন—এখন এক মহৎ ধনভাণ্ডার লাভ হয়েছে, যার দ্বারা আমি যথাবিধি দেবতাদের যজন করতে পারব। আজ আপনাদের অগ্রে স্থাপন করে আমরা সেই ধন যজ্ঞশালায় নিয়ে যাব এবং যজ্ঞের আয়োজন সম্পন্ন করব।

Verse 9

हिमवन्तं त्वया गुप्ता गमिष्याम: पितामह । बह्वाश्चर्यो हि देश: स श्रूयते द्विजसत्तम,द्विजश्रेष्ठ पितामह! हमलोग आपसे ही सुरक्षित होकर हिमालय पर्वतकी यात्रा करेंगे। सुना जाता है, वह प्रदेश अनेक आश्वर्यजनक दृश्योंसे भरा हुआ है

বৈশম্পায়ন বললেন—হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ পিতামহ! আপনার রক্ষায় আমরা হিমবন্তে যাত্রা করব। শোনা যায়, সে দেশ বহু বিস্ময়কর দৃশ্যে পরিপূর্ণ।

Verse 10

तथा भगवता चित्र कल्याणं बहुभाषितम्‌ | देवर्षिणा नारदेन देवस्थानेन चैव ह,“आपने, देवर्षि नारदने तथा मुनिवर देवस्थानने बहुत-सी अद्भुत बातें बतायी हैं, जो मेरा कल्याण करनेवाली हैं

বৈশম্পায়ন বললেন—এইভাবে দেবর্ষি নারদ এবং মহর্ষি দেবস্থান আমার কল্যাণসাধক বহু বিস্ময়কর বিষয় বিস্তারে বলেছেন।

Verse 11

नाभागधेय: पुरुष: कश्रिदेवंविधान्‌ गुरून्‌ । लभते व्यसन प्राप्प सुहृद: साधुसम्मतान्‌,“जो सौभाग्यशाली नहीं है, ऐसा कोई भी पुरुष संकटमें पड़नेपर आप-जैसे साधुसम्मानित हितैषी गुरुजनोंको नहीं पा सकता”

বৈশম্পায়ন বললেন—যে পুরুষ ভাগ্যহীন, সে বিপদে পড়লে আপনাদের মতো সাধুসম্মত হিতৈষী গুরুজন ও সুহৃদ লাভ করতে পারে না।

Verse 12

एवमुक्तास्तु ते राज्ञा सर्व एव महर्षय: । अभ्यनुज्ञाप्य राजानं तथोभौ कृष्णफाल्गुनौ,राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार कृतज्ञता प्रकट करनेपर सभी महर्षि राजा युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण तथा अर्जुनकी अनुमति ले सबके देखते-देखते वहाँसे अन्तर्धान हो गये। फिर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर उन्हें विदा करके वहीं बैठ गये

রাজা এভাবে বললে, সেই সকল মহর্ষি রাজা যুধিষ্ঠির এবং কৃষ্ণ ও ফাল্গুন (অর্জুন)—উভয়ের অনুমতি নিয়ে বিদায় নিলেন।

Verse 13

पश्यतामेव सर्वेषां तत्रैवादर्शनं ययु: । ततो धर्मसुतो राजा तत्रैवोपाविशत्‌ प्रभु:,राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार कृतज्ञता प्रकट करनेपर सभी महर्षि राजा युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण तथा अर्जुनकी अनुमति ले सबके देखते-देखते वहाँसे अन्तर्धान हो गये। फिर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर उन्हें विदा करके वहीं बैठ गये

সকলের চোখের সামনেই তাঁরা সেই স্থান থেকেই অদৃশ্য হয়ে গেলেন। তারপর ধর্মপুত্র রাজা যুধিষ্ঠির তাঁদের বিদায় দিয়ে সেখানেই আসন গ্রহণ করলেন।

Verse 14

एवं नातिमहान्‌ काल: स तेषां संन्यवर्तत । कुर्वतां शौचकार्याणि भीष्मस्य निधने तदा,भीष्मकी मृत्युके पश्चात्‌ शौचकार्य सम्पन्न करते हुए पाण्डवोंका कुछ काल वहीं व्यतीत हुआ (यथा मनुर्महाराजो रामो दाशरथिर्यथा । तथा भरतसिंहो5पि पालयामास मेदिनीम्‌ ।। जैसे महाराज मनु तथा दशरथनन्दन श्रीरामने इस पृथ्वीका पालन किया था, उसी प्रकार भरतसिंह युधिष्ठिर भी भूमण्डलकी रक्षा करने लगे ।। नाधर्म्यम भवत्‌ तत्र सर्वो धर्मरुचिर्जन: । बभूव नरशार्दूल यथा कृतयुगे तथा ।। उनके राज्यमें कहीं कोई अधर्मयुक्त कार्य नहीं होता था। सब लोग धर्मविषयक रुचि रखते थे। पुरुषसिंह! जैसे सत्ययुगमें समस्त प्रजा धर्मपरायण रहती थी, उसी प्रकार उस समय द्वापरमें भी हो गयी थी ।। कलिमासन्नमाविष्टं निवास्य नृपनन्दन: । भ्रातृभि: सहितो धीमान्‌ बभौ धर्मबलोद्धतः ।। कलियुगको समीप आया देख बुद्धिमान्‌ नृपनन्दन युधिष्ठिरने उसको भी निवास दिया और भाइयोंके साथ वे धर्मबलसे अजेय होकर शोभा पाने लगे ।। ववर्ष भगवान्‌ देव: काले देशे यथेप्सितम्‌ । निरामयं जगदभूत्‌ क्षुत्पिपासे न किंचन ।। भगवान्‌ पर्जन्यदेव उनके राज्यके प्रत्येक देशमें यथेष्ट वर्षा करते थे। सारा जगत्‌ रोग- शोकसे रहित हो गया था, किसीको भी भूख-प्यासका थोड़ा-सा भी कष्ट नहीं रह गया था।। आधिर्नास्ति मनुष्याणां व्यसने नाभवन्मति: । ब्राह्मणप्रमुखा वर्णास्ते स्वधर्मोत्तरा: शिवा: ।। धर्म: सत्यप्रधानश्न सत्यं सद्विषयान्वितम्‌ । मनुष्योंको मानसिक व्यथा नहीं सताती थी। किसीका मन दुर्व्यसनमें नहीं लगता था। ब्राह्मण आदि सभी वर्णोके लोग स्वधर्मको ही उत्कृष्ट मानकर उसमें लगे रहते थे। सभी मंगलयुक्त थे। धर्ममें सत्यकी प्रधानता थी और सत्य उत्तम विषयोंसे युक्त होता था ।। धर्मासनस्थ: सद्धरिः स स्त्रीबालातुरवृद्धकान्‌ ।। वर्णाश्रमान्‌ पूर्वकृतान्‌ सकलान्‌ रक्षणोद्यत: । धर्मके आसनपर बैठे हुए युधिष्छिर सत्पुरुषों, स्त्रियों, बालकों, रोगियों, बड़े-बूढ़ों तथा पूर्वनिर्मित सम्पूर्ण वर्णाश्रम-धर्मोकी रक्षाके लिये सदा उद्यत रहते थे ।। अवृत्तिवृत्तिदानाय्यर्यज्ञार्थ्दीपितैरपि । आमुष्मिकं भयं नास्ति ऐहिकं कृतमेव तु । स्वर्गलोकोपमो लोकस्तदा तस्मिन्‌ प्रशासति ।। बभूव सुखमेकाग्रं तद्विशिष्टतरं परम्‌ ।। वे जीविकाहीन मनुष्योंको जीविका प्रदान करते, यज्ञके लिये धन दिलाते तथा अन्यान्य उपायोंद्वारा प्रजाकी रक्षा करते थे। अतः इहलोकका सारा सुख तो सबको प्राप्त ही था, परलोकका भी भय नहीं रह गया था। उनके शासनकालमें सारा जगत्‌ स्वर्गलोकके समान सुखद हो गया था। यहाँका एकाग्र सुख स्वर्गसे भी विशिष्ट एवं उत्तम था ।। नार्य: पतिव्रता: सर्वा रूपवत्य: स्वलंकृता: । यथोक्त वृत्ता: स्वगुणैर्ब भूवु: प्रीतिहेतव: ।। उनके राज्यकी सारी स्त्रियाँ पतिव्रता, रूपवती, आभूषणोंसे विभूषित और शास्त्रोक्त सदाचारसे सम्पन्न होती थीं। वे अपने उत्तम गुणोंद्वारा पतिकी प्रसन्नताको बढ़ानेमें कारण होती थीं ।। पुमांस: पुण्यशीलाद्या: स्वं स्व॑ं धर्ममनुव्रता: । सुखिन: सूक्ष्ममप्येनो न कुर्वन्ति कदाचन ।। पुरुष पुण्यशील, अपने-अपने धर्ममें अनुरक्त और सुखी थे। वे कभी सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पाप भी नहीं करते थे ।। सर्वे नराश्च नार्यश्व॒ सततं प्रियवादिन: । अजिद्यममनस: शुक्ला: बभूवु: श्रमवर्जिता: ।। सभी स्त्री-पुरुष सदा प्रिय वचन बोलते थे, मनमें कुटिलता नहीं आने देते थे, शुद्ध रहते थे और कभी थकावटका अनुभव नहीं करते थे ।। भूषिता: कुण्डलैहरि: कटकै: कटिसूत्रकै: । सुवासस: सुगन्धाढ्या: प्रायश: पृथिवीतले ।। उन दिनों प्रायः भूतलके सभी मनुष्य कुण्डल, हार, कड़े और करधनीसे विभूषित थे। सुन्दर वस्त्र और सुन्दर गन्धसे सुशोभित होते थे ।। सर्वे ब्रह्म॒विदो विप्रा: सर्वत्र परिनिष्ठिता: । वलीपलितहीनास्तु सुखिनो दीर्घजीविन: ।। सभी ब्राह्मण ब्रह्मवेत्ता और समस्त शास्त्रोंमें परिनिष्ठित थे। उनके शरीरमें झुर्रियाँ नहीं पड़ती थीं, उनके बाल सफेद नहीं होते थे और वे सुखी तथा दीर्घजीवी होते थे ।। इच्छा न जायते<न्यत्र वर्णेषु च न संकर:ः । मनुष्याणां महाराज मर्यादासु व्यवस्थित: ।। महाराज! मनुष्योंकी इच्छा परायी स्त्रियोंके लिये नहीं होती थी, वर्णोमें कभी संकरता नहीं आती थी और सब लोग मर्यादामें स्थित रहते थे ।। तस्मिज्छासति राजेन्द्रे मृग्यालसरीसूपा: । अन्योन्यमपि चान्येषु न बाधन्ते कदाचन ।। राजेन्द्र युधिष्ठिरके शासनकालमें हिंसक पशु, सर्प और बिच्छू आदि न तो आपसमें और न दूसरोंको ही कभी बाधा पहुँचाते थे ।। गाव: सुक्षीर भूयिष्ठा: सुवालधिमुखोदरा: । अपीडिता: कर्षकाद्यै््वतव्याधितवत्सका: ।। गौएँ बहुत दूध देती थीं, उनके मुख, पूँछ और उदर सुन्दर होते थे। किसान आदि उन्हें पीड़ा नहीं देते थे और उनके बछड़े भी नीरोग होते थे ।। अवन्ध्यकाला मनुजा: पुरुषार्थेषु च क्रमात्‌ विषयेष्वनिषिद्धेषु वेदशास्त्रेषु चोद्यता: ।। उस समयके सभी मनुष्य अपने समयको व्यर्थ नहीं जाने देते थे। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष--इन पुरुषार्थोमें क्रमशः प्रवृत्त होते थे। शास्त्रमें जिनका निषेध नहीं किया गया है, उन्हीं विषयोंका सेवन करते और वेदशास्त्रोंके स्वाध्यायके लिये सदा उद्यत रहते थे ।। सुवृत्ता वृषभा: पुष्टा: सुस्वभावा: सुखोदया: । अतीव मधुर: शब्द: स्पर्शश्वातिसुखं रसम्‌ । रूप॑ दृष्टिक्षमं रम्यं मनोज्ञं गन्धवद्‌ बभौ ।। उस समयके बैल अच्छी चाल-ढालवाले, हृष्ट-पुष्ट, अच्छे स्वभाववाले और सुखकी प्राप्ति करानेवाले होते थे। उन दिनों शब्द और स्पर्श नामक विषय अत्यन्त मधुर होते थे। रस बहुत ही सुखद जान पड़ता था, रूप दर्शनीय एवं रमणीय प्रतीत होता था और गन्ध नामक विषय भी मनोरम जान पड़ता था |। धर्मार्थकामसंयुक्त मोक्षाभ्युदयसा धनम्‌ | प्रह्नादजननं पुण्यं सम्बभूवाथ मानसम्‌ ।। सबका मन धर्म, अर्थ और काममें संलग्न, मोक्ष और अभ्युदयके साधनमें तत्पर, आनन्दजनक और पवित्र होता था ।। स्थावरा बहुपुष्पाढ्या: फलच्छायावहास्तथा । सुस्पर्शा विषहीनाश्च सुपत्रत्वकृप्ररोहिण: ।। स्थावर (वृक्ष) बहुत-से फूलोंसे सुशोभित तथा फल और छाया देनेवाले होते थे। उनका स्पर्श सुखद जान पड़ता था और वे विषसे हीन तथा सुन्दर पत्र, छाल और अंकुरसे युक्त होते थे ।॥। मनो<नुकूला: सर्वेषां चेष्टा भूस्तापवर्जिता । यथा बभूव राजर्षिस्तद्वृत्तम भवद्‌ भुवि ।। सबकी चेष्टाएँ मनके अनुकूल होती थीं। पृथ्वीपर किसी प्रकारका संताप नहीं होता था। राजर्षि युधिष्ठिर स्वयं जैसे आचार-विचारसे युक्त थे, उसीका भूतलपर प्रसार हुआ था।। सर्वलक्षणसम्पन्ना: पाण्डवा धर्मचारिण: । ज्येष्ठानुवर्तिन: सर्वे बभूवु: प्रियदर्शना: ।। समस्त पाण्डव सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, धर्मांचरण करनेवाले और बड़े भाईकी आज्ञाके अधीन रहनेवाले थे। उनका दर्शन सभीको प्रिय था ।। सिंहोरस्का जितक्रोधास्तेजोबलसमन्विता: । आजानुबाहव: सर्वे दानशीला जितेन्द्रिया: ।। उनकी छाती सिंहके समान चौड़ी थी। वे क्रोधपर विजय पानेवाले और तेज एवं बलसे सम्पन्न थे। उन सबकी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी थीं। वे सभी दानशील एवं जितेन्द्रिय थे ।। तेषु शासत्सु धरणीमृतव: स्वगुणैर्बभु: । सुखोदयाय वर्तन्ते ग्रहास्तारागणै: सह ।। पाण्डव जब इस पृथ्वीका शासन कर रहे थे, उस समय सभी ऋतुएँ अपने गुणोंसे सुशोभित होती थीं। ताराओंसहित समस्त ग्रह सबके लिये सुखद हो गये थे ।। मही सस्यप्रबहुला सर्वरत्नगुणोदया । कामधुग्धेनुवद्‌ भोगान्‌ फलति सम सहस्रधा ।। पृथ्वीपर खेतीकी उपज बढ़ गयी थी। सभी रत्न और गुण प्रकट हो गये थे। कामधेनुके समान वह सहसोरं प्रकारके भोगरूप फल देती थी ।। मन्वादिश्रि: कृताः पूर्व मर्यादा मानवेषु या: । अनतिक्रम्य ता: सर्वा: कुलेषु समयानि च । अन्वशासन्त राजानो धर्मपुत्रप्रियंकरा: ।। पूर्वकालमें मनु आदि राजर्षियोंने मनुष्योंमें जो मर्यादाएँ स्थापित की थीं, उन सबका तथा कुलोचित सदाचारोंका उल्लंघन न करते हुए भूमण्डलके सभी राजा अपने-अपने राज्यका शासन करते थे। इस प्रकार सभी भूपाल धर्मपुत्र युधिष्ठिरका प्रिय करनेवाले थे ।। महाकुलानि धर्मिष्ठा वर्धयन्तो विशेषत: । मनुप्रणीतया कृत्या तेडन्वशासन्‌ वसुन्धराम्‌ ।। धर्मिष्ठ राजा श्रेष्ठ कुलोंको विशेष प्रोत्साहन देते थे। वे मनुकी बनायी हुई राजनीतिके अनुसार इस वसुधाका शासन करते थे ।। राजव॒त्तिहिं सा शश्व॒द्‌ धर्मिष्ठाभून्महीतले । प्रायो लोकमतिस्तात राजवृत्तानुगामिनी ।। तात! इस पृथ्वीपर राजाओंके बर्ताव सदा धर्मानुकूल होते थे। प्राय: लोगोंकी बुद्धि राजाके ही बर्तावका अनुसरण करनेवाली होती है ।। एवं भारतवर्ष स्वं राजा स्वर्ग सुरेन्द्रवत्‌ । शशास विष्णुना सार्ध गुप्तो गाण्डीवधन्चना ।।) जैसे इन्द्र स्वर्गका शासन करते हैं, उसी प्रकार गाण्डीवधारी अर्जुनसे सुरक्षित राजा युधिष्ठिर भगवान्‌ श्रीकृष्णके सहयोगसे अपने राज्य--भारतवर्षका शासन करते थे ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि चतुर्दशो5ध्याय:

বৈশম্পায়ন বললেন—ভীষ্মের মৃত্যুর পরে পাণ্ডবরা যখন শৌচকর্ম (শুদ্ধি ও শোকবিধি) সম্পাদন করছিলেন, তখন খুব বেশি সময় অতিবাহিত হয়নি; তাঁরা সেখানেই সেই কর্তব্যে নিয়োজিত ছিলেন।

Verse 15

महादानानि विप्रेभ्यो ददतामौर्ध्वदेहिकम्‌ । भीष्मकर्णपुरोगाणां कुरूणां कुरुसत्तम

বৈশম্পায়ন বললেন—হে কুরুশ্রেষ্ঠ! ভীষ্ম ও কর্ণের অগ্রণীতে কুরুবীরেরা ব্রাহ্মণদের মহাদান দিচ্ছিলেন এবং প্রয়াতদের উদ্দেশ্যে ঔর্ধ্বদৈহিক (শ্রাদ্ধাদি) ক্রিয়া ও দান সম্পাদন করছিলেন।

Verse 16

ततो दत्त्वा बहुधनं विप्रेभ्य: पाण्डवर्षभ:

তারপর পাণ্ডবদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ (যুধিষ্ঠির) ব্রাহ্মণদের বহু ধন দান করলেন।

Verse 17

स समाथ्चास्य पितरं प्रज्ञाचक्षुषमी श्वरम्‌ । अन्वशाद्‌ वै स धर्मात्मा पृथिवीं भ्रातृभि: सह,धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर प्रज्ञाचक्षु पितृव्य महाराज धृतराष्ट्रको सान्त्वना देकर भाइयोंके साथ पृथ्वीका राज्य करने लगे

বৈশম্পায়ন বললেন—ধর্মাত্মা রাজা যুধিষ্ঠির প্রজ্ঞাচক্ষু, অন্ধ পিতৃব্য ধৃতরাষ্ট্রকে সান্ত্বনা দিয়ে, ভ্রাতৃদের সঙ্গে ধর্মপথে পৃথিবী শাসন করতে লাগলেন।

Verse 56

अन्वशासच्च धर्मात्मा पृथिवीं सागराम्बराम्‌ । तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने देवताओं और ब्राह्मणोंका पूजन किया और मरे हुए बन्धु- बान्धवोंका श्राद्ध करके वे धर्मात्मा नरेश समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका शासन करने लगे

বৈশম্পায়ন বললেন—সেই ধর্মাত্মা রাজা সমুদ্রবেষ্টিত পৃথিবী শাসন করতে লাগলেন। এরপর রাজা যুধিষ্ঠির দেবতা ও ব্রাহ্মণদের পূজা করলেন; এবং প্রয়াত আত্মীয়স্বজনের শ্রাদ্ধ সম্পন্ন করে, সমুদ্রসীমা পর্যন্ত বিস্তৃত রাজ্য ধর্মপথে পরিচালনা করলেন।

Verse 153

सहितो धृतराष्ट्रेण स ददावौर्ध्वदेहिकम्‌ । कुरुश्रेष्ठ! धृतराष्ट्रसहित उन्होंने भीष्म और कर्ण आदि कुरुवंशियोंके निमित्त और्ध्वदैहिक क्रिया (श्राद्ध)-में ब्राह्मणोंको बड़े-बड़े दान दिये

বৈশম্পায়ন বললেন—ধৃতরাষ্ট্রকে সঙ্গে নিয়ে তিনি ঔর্ধ্বদৈহিক কর্ম (শ্রাদ্ধ) সম্পাদন করলেন। হে কুরুশ্রেষ্ঠ! ধৃতরাষ্ট্রসহ তিনি ভীষ্ম, কর্ণ প্রভৃতি কুরুবংশীয়দের উদ্দেশ্যে শ্রাদ্ধকালে ব্রাহ্মণদের মহাদান দিলেন।

Verse 163

धृतराष्ट्र पुरस्कृत्य विवेश गजसाह्वयम्‌ । तत्पश्चात्‌ ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन देकर पाण्डवशिरोमणि युधिष्ठिरने धृतराष्ट्रको आगे करके हस्तिनापुरमें प्रवेश किया

ধৃতরাষ্ট্রকে অগ্রে স্থাপন করে তিনি গজসাহ্বয় (হস্তিনাপুর) নগরে প্রবেশ করলেন। তারপর ব্রাহ্মণদের প্রচুর ধন দান করে পাণ্ডবশিরোমণি যুধিষ্ঠির ধৃতরাষ্ট্রকে সামনে রেখে হস্তিনাপুরে প্রবেশ করলেন।

Frequently Asked Questions

The chapter presents the ruler’s dilemma of governing while burdened by bereavement and remorse, requiring external counsel to transform grief into stable, duty-oriented action.

Legitimate rule is shown as counsel-led and duty-bound: ritual obligations, respectful treatment of elders, and public generosity function as mechanisms for restoring social equilibrium after systemic violence.

No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the chapter’s meta-function is implicit, positioning rites, dāna, and sage counsel as narrative validators of ethical reconstruction.