धृतराष्ट्रस्य वनप्रस्थानानुज्ञा | Permission for Dhṛtarāṣṭra’s Forest-Retirement
पुत्र संशाम्यतां तावन््ममापि बलवान् श्रम: । इत्युक्त्वा प्राविशद् राजा गान्धार्या भवनं तदा,“बेटा! अब शान्त रहो। मुझे बोलनेमें बड़ा परिश्रम होता है (अब तो मैं जानेकी ही अनुमति चाहता हूँ)।' ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्रने उस समय गान्धारीके भवनमें प्रवेश किया अपि तत्र न वो मन्दो दुर्बुद्धिरपराद्धवान् । दुर्योधनने जब अकण्टक राज्यका उपभोग किया था, उस समय उस खोटी बुद्धिवाले मूर्ख नरेशने भी आपलोगोंका कोई अपराध नहीं किया था (वह केवल पाण्डवोंके साथ अन्याय करता रहा) ।। ४ $ || तस्यापराधाद् दुर्बुद्धेरभिमानान्महीक्षिताम्
putra saṁśāmyatāṁ tāvan mamāpi balavān śramaḥ | ity uktvā prāviśad rājā gāndhāryā bhavanaṁ tadā ||
বৈশম্পায়ন বললেন—“(ধৃতরাষ্ট্র বললেন) ‘পুত্র, এখন কিছুক্ষণ শান্ত হও; আমার পক্ষেও কথা বলা বড় ক্লেশকর।’ এ কথা বলে রাজা ধৃতরাষ্ট্র তখন গান্ধারীর ভবনে প্রবেশ করলেন। সেই সময়ও, যখন দুর্যোধন নির্বিঘ্নে রাজ্য ভোগ করত, সেই মন্দবুদ্ধি তোমাদের প্রতি কোনো অপরাধ করেনি; কিন্তু সেই দুর্বুদ্ধি, রাজাদের অহংকারে মত্ত দুঃশাসিত—দুর্যোধনের—অপরাধের ফলে…”
वैशम्पायन उवाच