Vyāsa’s Inquiry into Dhṛtarāṣṭra’s Tapas and the Identification of Vidura with Dharma
प्राप्तं पुत्रफलं त्वत्त: प्रीतिर्मे परमा त्वयि | न मे मन्युर्महाबाहो गम्यतां पुत्र मा चिरम्,“बेटा! तुम्हारे साथ रहकर तथा तुम-जैसे रक्षकसे सुरक्षित होकर मैं उसी तरह आनन्दका अनुभव कर रहा हूँ, जैसे पहले हस्तिनापुरमें करता था। विद्वन्! प्रियजनोंकी सेवामें लगे रहनेवाले तुम्हारे द्वारा मुझे पुत्रका फल प्राप्त हो गया। तुमपर मेरा बहुत प्रेम है। महाबाहो! पुत्र! मेरे मनमें तुम्हारे प्रति किंचिन्मात्र भी क्रोध नहीं है; अतः तुम राजधानीको जाओ, अब विलम्ब न करो
prāptaṃ putraphalaṃ tvattaḥ prītir me paramā tvayi | na me manyur mahābāho gamyatāṃ putra mā ciram ||
তোমার দ্বারা আমি পুত্রলাভের সত্য ফল পেয়েছি; তোমার প্রতি আমার স্নেহ সর্বোচ্চ। হে মহাবাহু, তোমার প্রতি আমার মনে বিন্দুমাত্র ক্রোধ নেই। অতএব বৎস, রাজধানীতে যাও—বিলম্ব কোরো না।
वैशम्पायन उवाच