Adhyaya 98
Anushasana ParvaAdhyaya 9835 Verses

Adhyaya 98

छत्रोपानहदानफलप्रशंसा — Praise of the Merit of Donating Umbrella and Footwear

Upa-parva: Dāna-Dharma (Charity Instructions) — Chatra-Upānaha Dāna Episode

Yudhiṣṭhira inquires about Jamadagni’s response when Sūrya (Bhāskara), seeking something, approached him. Bhīṣma recounts that Jamadagni, radiant like fire, initially does not incline to calmness; Sūrya speaks gently in the guise of a brāhmaṇa and raises an epistemic challenge: how can a moving deity be reliably targeted by a ‘moving sign’? Jamadagni replies that through inner knowledge (jñānacakṣuṣ) he knows Sūrya whether stationary or moving, and specifies a precise temporal locus—Sūrya’s brief pause in the afternoon—asserting certainty of encounter. Sūrya concedes Jamadagni’s capacity but identifies himself as a wrongdoer who has come for refuge (śaraṇāgata). Jamadagni then reframes the ethical boundary: harming one who has sought refuge violates foundational virtues and is equated with grave transgressions; instead, Sūrya should devise a resolution that makes the sun-heated path easier for people. Sūrya institutes a remedy by gifting an umbrella (to shield from rays) and leather footwear (to protect the feet), declaring the practice will circulate in the world and yield imperishable merit. Bhīṣma concludes by recommending that such gifts be given to brāhmaṇas, detailing stated rewards (comfort after death, honored residence in celestial realms) and summarizing the phalaśruti of donating umbrella and footwear.

Chapter Arc: युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं—छत्र और उपानह (पादुका/जूता) की उत्पत्ति कैसे हुई, और इनका दान केवल श्राद्ध में ही नहीं, अन्य पुण्य अवसरों पर भी क्यों दिया जाता है। → भीष्म एक प्राचीन आख्यान खोलते हैं: भार्गव-जमदग्नि दिव्य धनुष लेकर सूर्य की ओर बार-बार बाण संधान करते हैं; रेणुका उन तेजस्वी बाणों को उठाती-लाती रहती है। ज्येष्ठ मास की प्रचण्ड धूप बढ़ती जाती है और रेणुका का सिर व पाँव संतप्त होने लगते हैं—वह वृक्षों की छाया में रुक-रुक कर चलती है, पर पति के शाप/आज्ञाभय से फिर उठ खड़ी होती है। → सूर्यदेव ब्राह्मण-वेष में प्रकट होकर जमदग्नि से प्रश्न करते हैं—‘सूर्य ने आपका क्या अपराध किया?’—और इस टकराव में तप, तेज और मर्यादा का चरम संघर्ष उभर आता है: एक ओर ऋषि का क्रोध-पराक्रम, दूसरी ओर लोक-नियम का अधिष्ठाता सूर्य। → भीष्म इस प्रसंग को दान-धर्म से जोड़ते हैं: प्रचण्ड धूप से रक्षा और पथिक-जीवन की मर्यादा हेतु छत्र और उपानह का महत्व प्रतिष्ठित होता है—ये वस्तुएँ केवल श्राद्ध नहीं, अनेक पुण्य-निमित्तों में दान योग्य मानी जाती हैं क्योंकि वे कष्ट-निवारण और लोक-हित का प्रत्यक्ष साधन हैं। → सूर्य और भार्गव-तप के संवाद/समाधान की आगे की परिणति तथा दान-विधि के सूक्ष्म नियम अगले भाग में विस्तार पाते हैं।

Shlokas

Verse 1

ऑपन-- माल छा जज पञ्चनवतितमो< ध्याय: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप युधिछिर उवाच यदिदं श्राद्धकृत्येषु दीयते भरतर्षभ । छत्र॑ चोपानहौ चैव केनैतत्‌ सम्प्रवर्तितम्‌

যুধিষ্ঠির বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! শ্রাদ্ধকর্মে যে দান দেওয়া হয়—বিশেষত ছত্র ও উপানহ (পাদুকা/জুতো)—এই প্রথা কে প্রবর্তন করেছিলেন?

Verse 2

कथं चैतत्‌ समुत्पन्नं किमर्थ चैव दीयते । न केवल श्राद्धकृत्ये पुण्यकेष्वपि दीयते

এই প্রথা কীভাবে উৎপন্ন হল, আর কোন উদ্দেশ্যে এই দান দেওয়া হয়?

Verse 3

बहुष्वपि निमित्तेषु पुण्यमाश्रित्य दीयते । एतद्‌ू विस्तरशो राजन्‌ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः

বহু উপলক্ষে পুণ্যলাভের উদ্দেশ্যে এই দান দেওয়া হয়। হে রাজন, আমি তত্ত্বতঃ—বিস্তারিতভাবে—এ কথা শুনতে চাই।

Verse 4

भीष्म उवाच शृणु राजन्नवहितश्छत्रोपानहविस्तरम्‌ । यथैतत्‌ प्रथितं लोके यथा चैतत्‌ प्रवर्तितम्‌

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! মনোযোগ দিয়ে ছত্র ও উপানহের বিষয়টি বিস্তারিত শোনো—এটি লোকের মধ্যে কীভাবে প্রসিদ্ধ হল এবং কীভাবে এই প্রথা প্রবর্তিত হল।

Verse 5

यथा चाक्षय्यतां प्राप्तं पुण्यतां च यथा गतम्‌ | सर्वमेतदशेषेण प्रवक्ष्यामि नराधिप

হে নরাধিপ, নরেশ্বর! দান কীভাবে অক্ষয় হয় এবং কীভাবে পুণ্যলাভের কারণ হয়—এই সমস্ত কথা আমি একটিও বাদ না দিয়ে সম্পূর্ণভাবে আপনাকে বলব।

Verse 6

जमदम्नेश्व संवाद सूर्यस्य च महात्मन: । पुरा स भगवान्‌ साक्षाद्धनुषाक्रीडयत्‌ प्रभो

প্রভো! এ বিষয়ে মহর্ষি জমদগ্নি ও মহাত্মা ভগবান সূর্যের প্রাচীন সংলাপ বর্ণিত হয়। অতীতে পূজনীয় জমদগ্নি নিজে ধনুর্বিদ্যার ক্রীড়ায় রত ছিলেন। তখন তাঁর পত্নী রেণুকা বারংবার সেই তীরগুলি এনে তাঁকে পুনরায় প্রদান করতেন।

Verse 7

संधाय संधाय शरांक्षिक्षेप किल भार्गव: । तान्‌ क्षिप्तान्‌ रेणुका सर्वास्तस्येषून्दीप्ततेजस:

ভার্গব বারংবার তীর সংধান করে নিক্ষেপ করলেন। নিক্ষিপ্ত সেই দীপ্ততেজ তীরগুলিকে রেণুকা সকলই (দেখে/সংগ্রহ করে) নিলেন।

Verse 8

अथ तेन स शब्देन ज्यायाश्रैव शरस्य च

তখন ধনুকের জ্যা-ঝংকার ও তীরের শোঁ শোঁ শব্দে (সেই মুহূর্তটি চিহ্নিত হল)।

Verse 9

ततो मध्याद्वमारूढे ज्येष्ठामूले दिवाकरे

তারপর জ্যৈষ্ঠ মাসে সূর্য যখন মধ্যাহ্নে উঠল, তখন জমদগ্নি রেণুকাকে বললেন—“হে সুভ্রু, বিশালনয়না! শীঘ্র যাও, আমার ধনুক থেকে ছুটে যাওয়া এই তীরগুলি এনে দাও, যাতে আমি আবার এগুলি ধনুকে বসিয়ে ছাড়তে পারি।”

Verse 10

स सायकान्‌ द्विजो मुक्‍त्वा रेणुकामिदमब्रवीत्‌ । गच्छानय विशालाक्षि शरानेतान्‌ धनुश्च्युतान्‌

বাণ নিক্ষেপ করে সেই দ্বিজ রেণুকাকে বললেন—“বিশালাক্ষি! যাও, ধনুক থেকে পতিত এই বাণগুলি এনে দাও।”

Verse 11

सा गच्छन्त्यन्तरा छायां वृक्षमाश्रित्य भामिनी

সে ভামিনী চলতে চলতে এক বৃক্ষের আশ্রয় নিয়ে তার ছায়ার মধ্যে রইল।

Verse 12

स्थिता सा तु मुहूर्त वै भर्तु: शापभयाच्छुभा

শুভস্বভাবা সে নারী স্বামীর শাপের ভয়ে কিছুক্ষণ সেখানেই স্থির রইল।

Verse 13

प्रत्याजगाम च शरांस्तानादाय यशस्विनी

যশস্বিনী, সুন্দর অঙ্গের রেণুকা সেই বাণগুলি নিয়ে ফিরে এল; তখন সে গভীরভাবে ক্লিষ্ট ছিল। পায়ের দাহযন্ত্রণা কোনোমতে সহ্য করে, স্বামীর ভয়ে কাঁপতে কাঁপতে সে তাঁর কাছে পৌঁছাল।

Verse 14

सा वै खिन्ना सुचार्वगी पदभ्यां दुःखं नियच्छती । उपाजगाम भर्तरें भयाद्‌ भर्तु: प्रवेषती

সে সুচারুঅঙ্গী রেণুকা অত্যন্ত ক্লিষ্ট হয়ে, পায়ের দাহযন্ত্রণা কোনোমতে দমন করে সহ্য করতে করতে, স্বামীর ভয়ে কাঁপতে কাঁপতে স্বামীর কাছে গেল।

Verse 15

स तामृषिस्तदा क्रुद्धो वाक्यमाह शुभाननाम्‌ | रेणुके कि चिरेण त्वमागतेति पुन: पुन:

তখন ঋষি ক্রুদ্ধ হয়ে শুভমুখী রেণুকাকে বারবার বললেন— “রেণুকে! এত দেরিতে কেন এলে?”

Verse 16

रेणुकोवाच शिरस्तावत्‌ प्रदीप्तं मे पादौ चैव तपोधन । सूर्यतेजोनिरुद्धाहं वृक्षच्छायां समाश्रिता

রেণুকা বলল— “তপোধন! আমার মাথা জ্বলছিল, পা দুটোও দগ্ধ হচ্ছিল। সূর্যের প্রচণ্ড তেজে বাধাপ্রাপ্ত হয়ে আমি গাছের ছায়ায় আশ্রয় নিয়ে কিছুক্ষণ দাঁড়িয়ে বিশ্রাম নিয়েছিলাম।”

Verse 17

एतस्मात्‌ कारणाद्‌ ब्रह्मंश्चवितयैतत्‌ कृतं मया । एतच्छुत्वा मम विभो मा क्रुधस्त्वं तपोधन

“ব্রাহ্মণ! এই কারণেই আমি আপনার কাজটি কিছু বিলম্বে সম্পন্ন করেছি। তপোধন প্রভু! আমার কথা শুনে আপনি ক্রুদ্ধ হবেন না।”

Verse 18

जगदग्निरुवाच अद्यैनं दीप्तकिरणं रेणुके तव दुःखदम्‌ । शरैर्निपातयिष्यामि सूर्यमस्त्राग्नितेजसा

জমদগ্নি বললেন— “রেণুকে! যে দীপ্তকিরণ সূর্য তোমাকে দুঃখ দিয়েছে, আজ আমি অস্ত্রাগ্নির তেজে দীপ্ত আমার বাণে তাকে ভূমিতে নামিয়ে দেব।”

Verse 19

भीष्म उवाच स विस्फार्य धर्नुर्दिव्यं गृहीत्वा च शरान्‌ बहून्‌ । अतिष्ठत्‌ सूर्यममभितो या तो याति ततो मुख:

ভীষ্ম বললেন— তিনি দিব্য ধনুক টেনে বহু বাণ হাতে নিয়ে সূর্যের দিকে মুখ করে দাঁড়ালেন—যেদিকে সূর্য গমন করে, সেই দিকেই মুখ স্থির করলেন।

Verse 20

भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठि!! ऐसा कहकर महर्षि जमदग्निने अपने दिव्य धनुषकी प्रत्यंचा खींची और बहुत-से बाण हाथमें लेकर सूर्यकी ओर मुँह करके वे खड़े हो गये। जिस दिशाकी ओर सूर्य जा रहे थे, उसी ओर उन्होंने भी अपना मुँह कर लिया था ।।

ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! এ কথা বলে মহর্ষি জমদগ্নি তাঁর দিব্য ধনুকের প্রত্যঞ্চা টানলেন, হাতে বহু বাণ নিয়ে সূর্যের দিকে মুখ করে দাঁড়ালেন। সূর্য যে দিকে অগ্রসর হচ্ছিলেন, তিনিও সেই দিকেই মুখ ফিরিয়েছিলেন। তাঁকে সজ্জিত দেখে সূর্যদেব কাছে এসে বললেন—“কৌন্তেয়! ব্রাহ্মণ-রূপে দাঁড়িয়ে আছ; সূর্য তোমার কী অপরাধ করেছে?”

Verse 21

कुन्तीनन्दन! उन्हें युद्धके लिये तैयार देख सूर्यदेव ब्राह्मणका रूप धारण करके उनके पास आये और बोले--'ब्रह्मन! सूर्यने आपका क्या अपराध किया है? ।।

কুন্তীনন্দন! তাঁকে যুদ্ধের জন্য প্রস্তুত দেখে সূর্যদেব ব্রাহ্মণরূপ ধারণ করে তাঁর কাছে এসে বললেন—“ব্রাহ্মণ! সূর্য তোমার কী অপরাধ করেছে? আকাশে অবস্থান করে সবিতা তাঁর কিরণদ্বারা পৃথিবীর রস টেনে নেন, আর বর্ষাকালে দিবাকর সেই রসই আবার বৃষ্টি করে ফিরিয়ে দেন।”

Verse 22

ततो>न्न॑ जायते विप्र मनुष्याणां सुखावहम्‌ । अन्न प्राणा इति यथा वेदेषु परिपठ्यते

“হে বিপ্র! সেই (বৃষ্টির) থেকেই অন্ন জন্মায়, যা মানুষের কল্যাণ ও সুখ আনে। ‘অন্নই প্রাণ’—বেদে যেমন বারংবার পাঠ করা হয়।”

Verse 23

अथाम्रेषु निगूढश्न रश्मिभि: परिवारित: । सप्तद्वीपानिमान ब्रह्मन्‌ वर्षेणाभिप्रवर्षति

“হে ব্রহ্মণ! কিরণসমূহে পরিবেষ্টিত সূর্যদেব মেঘের অন্তরালে লুকিয়ে এই সাত দ্বীপের পৃথিবীতে বর্ষার জল ঢেলে দেন।”

Verse 24

ततस्तदौषधीनां च वीरुधां पुष्पपत्रजम्‌ । सर्व वर्षाभिनिर्वत्तमन्न॑ं सम्भवति प्रभो

“সেই (বৃষ্টির) থেকেই নানাবিধ ঔষধি, লতা-গুল্ম এবং তাদের ফুল-পাতা জন্মায়। প্রভো! সাধারণত সব রকম অন্নই বর্ষার জলে উৎপন্ন হয়।”

Verse 25

जातकर्माणि सर्वाणि व्रतोपनयनानि च । गोदानानि विवाहाश्न तथा यज्ञसमृद्धयः

ভীষ্ম বললেন—জাতকর্ম থেকে আরম্ভ করে ব্রত, উপনয়ন, গোদান, বিবাহ এবং যজ্ঞের সমৃদ্ধি—এই সকল কর্মই অন্নের আশ্রয়ে সম্পন্ন হয়; কারণ প্রাণীদের ধারণ অন্নেই।

Verse 26

शास्त्राणि दानानि तथा संयोगा वित्तसंचया: । अन्नतः सम्प्रवर्तन्ते तथा त्वं वेत्थ भार्गव

শাস্ত্র, দান, সংযোগ এবং ধনসঞ্চয়—এসবই অন্ন থেকেই প্রবৃত্ত হয়; হে ভার্গব, তুমি এ কথা জানো।

Verse 27

रमणीयानि यावन्ति यावदारम्भकाणि च । सर्वमन्नात्‌ प्रभवति विदितं कीर्तयामि ते

যত কিছু মনোরম বস্তু আছে এবং যত কিছু উদ্যোগ-উপকরণ আছে—সবই অন্ন থেকে উৎপন্ন; আমি তোমাকে সেই কথাই বলছি যা তোমার জানা।

Verse 28

सर्व हि वेत्थ विप्र त्वं यदेतत्‌ कीर्तितं मया । प्रसादये त्वां विप्रषषे कि ते सूर्य निपात्य वै

হে বিপ্রবর, ব্রহ্মর্ষি! আমি যা বলেছি, তা সবই তুমি জানো। সূর্যকে পতিত করলে তোমার কী লাভ? অতএব বিনীত প্রার্থনায় তোমাকে প্রসন্ন করতে চাই—এই সংকল্প ত্যাগ করো।

Verse 76

आनीय सा तदा तस्मै प्रादादसकृदच्युत । प्रभो! इस विषयमें महर्षि जमदग्नि और महात्मा भगवान्‌ सूर्यके संवादका वर्णन किया जाता है। पूर्वकालकी बात है

ভীষ্ম বললেন—হে অচ্যুত! সে (রেণুকা) সেই বাণগুলি এনে বারংবার তাঁকে ফিরিয়ে দিত। প্রভো, এই প্রসঙ্গে মহর্ষি জমদগ্নি ও মহাত্মা ভগবান সূর্যের সংলাপ বর্ণিত হয়। প্রাচীন কালে একদিন ভৃগুবংশীয় জমদগ্নি ধনুর্বিদ্যার ক্রীড়ায় রত ছিলেন। হে ধর্মনিষ্ঠ যুধিষ্ঠির! তিনি বারবার ধনুকে বাণ সংযোজিত করে সেই তেজস্বী বাণগুলি নিক্ষেপ করতেন, আর তাঁর পত্নী রেণুকা সেগুলি পুনঃপুন এনে তাঁকে প্রদান করতেন।

Verse 86

प्रहष्ट: सम्प्रचिक्षेप सा च प्रत्याजहार तान्‌ । धनुषकी प्रत्यंचाकी टंकारध्वनि और बाणके छूटनेकी सनसनाहटसे जमदग्नि मुनि बहुत प्रसन्न होते थे। अतः वे बार-बार बाण चलाते और रेणुका उन्हें दूरसे उठा-उठाकर लाया करती थीं

আনন্দিত হয়ে তিনি বারবার তীর নিক্ষেপ করতেন, আর রেণুকা দূর থেকে সেগুলি কুড়িয়ে এনে আবার ফিরিয়ে দিতেন। ধনুকের জ্যায়ের টংকারধ্বনি ও ছুটে যাওয়া তীরের তীক্ষ্ণ শোঁ-শোঁ শব্দে জমদগ্নি মুনি অত্যন্ত প্রসন্ন হতেন। তাই তিনি পুনঃপুনঃ শর ছাড়তেন, আর রেণুকা বারবার সেগুলি তুলে এনে তাঁর কাছে পৌঁছে দিতেন।

Verse 94

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शपथविधिनामक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে পবিত্র মহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে ‘শপথবিধি’ নামক চুরানব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 95

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि छत्रोपानहोत्पत्तिर्नाम पञ्चनवतितमो<ध्याय:

ইতি শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে ‘ছত্রোপানহোৎপত্তি’ নামক পঁচানব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত।

Verse 103

यावदेतान्‌ पुनः सुभ्रु क्षिपमीति जनाधिप । जनेश्वर! इस प्रकार बाण चलानेकी क्रीड़ा करते-करते ज्येष्ठ मासके सूर्य दिनके मध्यभागमें आ पहुँचे। विप्रवर जमदग्निने पुन: बाण छोड़कर रेणुकासे कहा--'सुभ्रु! विशाललोचने! जाओ

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, হে জনাধিপ! এভাবে বারবার তীর ছোড়ার ক্রীড়া চলতে চলতে জ্যৈষ্ঠ মাসে সূর্য মধ্যাহ্নে এসে পৌঁছাল। তখন ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ জমদগ্নি আবার তীর ছেড়ে রেণুকাকে বললেন—“সুভ্রু, বিশালনয়না! যাও, আমার ধনুক থেকে ছুটে যাওয়া এই তীরগুলি এনে দাও, যাতে আমি আবার এগুলি ধনুকে বসিয়ে পুনরায় ছাড়তে পারি।”

Verse 113

तस्थौ तस्या हि सन्तप्तं शिर: पादौ तथैव च । मानिनी रेणुका वृक्षोंक बीचसे होकर उनकी छायाका आश्रय ले जाती हुई बीच-बीचमें ठहर जाती थी; क्योंकि उसके सिर और पैर तप गये थे

তার মাথা ও পা দগ্ধ হয়ে উঠেছিল; তাই মানিনী রেণুকা গাছের ছায়ার আশ্রয় নিয়ে মাঝে মাঝে থেমে দাঁড়াত।

Verse 126

ययावानयितुं भूय: सायकानसितेक्षणा । कजरारे नेत्रोंवाली वह कल्याणमयी देवी एक जगह दो ही घड़ी ठहरकर पतिके शापके भयसे पुनः उन बाणोंको लानेके लिये चल दी

শ্যামলোচনা কল্যাণময়ী দেবী এক স্থানে মাত্র দু’দণ্ড স্থির থেকে, স্বামীর শাপের ভয়ে সেই বাণগুলি পুনরায় আনতে আবার যাত্রা করলেন।

Frequently Asked Questions

Whether a powerful agent should punish or harm a wrongdoer who approaches in surrender; the chapter resolves this by prioritizing śaraṇāgata protection and redirecting response toward welfare-producing restitution.

Ethical strength is demonstrated through restraint and constructive remedy: compassion is operationalized via gifts that prevent harm (heat, injury), and righteousness is measured by how one treats the vulnerable and the surrendered.

Yes. The text explicitly states enduring merit for initiating and performing chatra–upānaha dāna, including posthumous comfort and honored residence in celestial realms, and frames the practice as socially reproducible from that day onward.