
Suvarṇa-dāna: Kārttikeya’s Origin and the Defeat of Tāraka (सुवर्णदान-प्रसङ्गे कार्त्तिकेय-उत्पत्ति तथा तारकवधः)
Upa-parva: Dāna-dharma (Suvarṇa-dāna and the Kārttikeya–Tāraka exemplum)
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to restate, with full detail, how the dānava Tāraka—earlier characterized as difficult to overcome—ultimately attains death, and how this relates to the previously stated rationale for suvarṇa’s origin and merit in gifting. Bhīṣma recounts that, when the devas and ṛṣis face crisis, the Kṛttikās are urged toward a protective maternal role. Agni’s potent tejas is borne by six Kṛttikās, who, unable to find ease due to its intensity, deliver the embryo together; the sixfold locus becomes unified and is received by the Earth near Kāntīpura, then grows in a divine śaravaṇa (reed-bed). The child is identified as Kārttikeya/Skanda/Guha, described with multiple faces and arms, and is celebrated by devas, ṛṣis, and gandharvas. Various beings offer emblems and companions (including the peacock and other gifts), establishing his martial and royal iconography. As Skanda matures, Tāraka attempts various means to overcome him but fails; the devas appoint Skanda as senāpati, and he kills Tāraka with an unfailing śakti, restoring Indra’s sovereignty. The chapter concludes by linking suvarṇa’s auspiciousness to Kārttikeya’s innate association with Agni’s brilliance, and by citing a precedent (Vasiṣṭha’s narration to Rāma) where suvarṇa-dāna leads to purification and an elevated celestial attainment.
Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर को गोदान की महिमा का द्वार खोलते हैं—यज्ञ का प्राण दधि-घृत है और उसका मूल गौ है; अतः समस्त दानों में गोदान सर्वोपरि है। → वर्णन क्रमशः लौकिक उपयोग से दैवी उत्कर्ष की ओर चढ़ता है: गौएँ पयस् और हवि से प्रजा का धारण करती हैं, उनके पुत्र (बैल) कृषि का आधार हैं, और इसी से अन्न-बीज की उत्पत्ति तथा समाज-धर्म का प्रवाह चलता है; फिर भीष्म इन्द्र को संबोधित ब्रह्मा-कथन के माध्यम से गोलोक और सुरभि-गौओं के दिव्य लोक का विस्तार करते हैं। → गोलोक का चरम चित्र उभरता है—सहस्राक्ष इन्द्र के लिए वह लोक ‘सर्वकामसमन्वित’ है, जहाँ मृत्यु, जरा और दाह का प्रवेश नहीं; दिव्य वन-भवन और इच्छानुसार चलने वाले विमान हैं, और वहाँ अशुभ-दुर्भाग्य का नाम नहीं। → भीष्म निष्कर्ष बाँधते हैं कि विविध दान, तीर्थसेवन, तप, इन्द्रियसंयम और पुण्यकर्म से गोलोक की प्राप्ति संभव है; पर इन सबमें गोसेवा-गोदान का विशेष प्रशस्त्य है क्योंकि वही यज्ञ, अन्न और जीवन-धारण की जड़ है।
Verse 1
ऑपन-आक्षात बछ। अं क्ाज तग्रय्शीतितमो<ध्याय: ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गौओंका उत्कर्ष बताना और गौओंको वरदान देना भीष्म उवाच येचगां सम्प्रयच्छन्ति हुतशिष्टाशिनश्न ये । तेषां सत्राणि यज्ञाश्न नित्यमेव युधिष्ठिर
ভীষ্ম বললেন—“যুধিষ্ঠির! যারা নিয়ত গোদান করে এবং যজ্ঞে অর্পিত আহুতির অবশিষ্ট অন্ন ভক্ষণ করে, তারা সর্বদাই সত্রযজ্ঞ ও যজ্ঞকর্মের ফল লাভ করে। তাদের দৈনন্দিন আচরণ যেন অবিরাম যজ্ঞে পরিণত হয়।”
Verse 2
ऋते दधि घृतेनेह न यज्ञ: सम्प्रवर्तते । तेन यज्ञस्य यज्ञत्वमतो मूलं च कथ्यते,दही और गोघृतके बिना यज्ञ नहीं होता। उन्हींसे यज्ञका यज्ञत्व सफल होता है। अतः गौओंको यज्ञका मूल कहते हैं
“দধি ও ঘৃত ব্যতীত এ জগতে যজ্ঞ সঠিকভাবে প্রবৃত্ত হয় না। এদের দ্বারাই যজ্ঞের ‘যজ্ঞত্ব’ সম্পূর্ণ হয়; অতএব (গো-উৎপন্ন দ্রব্যের কারণে) গাভীকেই যজ্ঞের মূল বলা হয়।”
Verse 3
दानानामपि सर्वेषां गवां दान प्रशस्यते । गाव: श्रेष्ठा: पवित्राश्न॒ पावन होतदुत्तमम्,सब प्रकारके दानोंमें गोदान ही उत्तम माना जाता है; इसलिये गौएँ श्रेष्ठ, पवित्र तथा परम पावन हैं
“সমস্ত দানের মধ্যে গোদান বিশেষভাবে প্রশংসিত। তাই গাভীকে শ্রেষ্ঠ ও পবিত্র বলা হয়; আর গাভী দানকে পরম পবিত্রকারী ও উত্তম দান গণ্য করা হয়।”
Verse 4
पुष्ट्यर्थमेता: सेवेत शान्त्यर्थमपि चैव ह | पयोदधिघृतं चासां सर्वपापप्रमोचनम्
“দেহের পুষ্টির জন্য এবং সকল প্রকার বিঘ্ন-উপদ্রবের শান্তির জন্যও এই গাভীদের সেবা করা উচিত। এদের দুধ, দধি ও ঘৃতকে সর্বপাপ-নাশক বলা হয়েছে।”
Verse 5
गावस्तेज: परं प्रोक्तमिह लोके परत्र च । न गोभ्य: परमं किंचित् पवित्र भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! गौएँ इहलोक और परलोकमें भी महान् तेजोरूप मानी गयी हैं। गौओंसे बढ़कर पवित्र कोई वस्तु नहीं है
ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! গাভী এই লোকেও এবং পরলোকেও পরম তেজরূপ বলে ঘোষিত। গাভীর চেয়ে অধিক পবিত্র আর কিছুই নেই।
Verse 6
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । पितामहस्य संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर,युधिष्ठिर! इस विषयमें विद्वान् पुरुष इन्द्र और ब्रह्माजीके इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं
ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! এ বিষয়েও পণ্ডিতেরা এক প্রাচীন ইতিবৃত্তের দৃষ্টান্ত দেন—পিতামহ (ব্রহ্মা) ও ইন্দ্রের সংলাপ।
Verse 7
पराभूतेषु दैत्येषु शक्रस्त्रिभुवने श्वर: । प्रजा: समुदिता: सर्वा: सत्यधर्मपरायणा:
ভীষ্ম বললেন—প্রাচীন কালে দেবতারা দানবদের পরাজিত করলে শক্র (ইন্দ্র) ত্রিভুবনের অধীশ্বর হন। তখন সকল প্রজা একত্র হয়ে আনন্দিত হয়ে সত্য ও ধর্মে নিবিষ্ট হয়।
Verse 8
अथर्षय: सगन्धर्वा: किन्नरोरगराक्षसा: । देवासुरसुपर्णाश्न प्रजानां पतयस्तथा
ভীষ্ম বললেন—হে কুন্তীনন্দন! তখন ঋষিগণ, গন্ধর্বগণ, কিন্নর, নাগ, রাক্ষস, দেব, অসুর, সুপর্ণ (গরুড়জাতি) এবং প্রজাদের অধিপতি প্রজাপতিরাও সেখানে উপস্থিত ছিলেন।
Verse 9
पर्युपासन्त कौन्तेय कदाचिद् वै पितामहम् । नारद: पर्वतश्चैव विश्वावसुर्हहाहुहू:
ভীষ্ম বললেন—হে কৌন্তেয়! এক সময় তারা পিতামহ (ব্রহ্মা)-এর সেবায় উপস্থিত ছিল। নারদ ও পর্বত, আর গন্ধর্ব বিশ্বাবসু, হাহা ও হূহূ—দিব্য গানে তাঁকে উপাসনা করছিল।
Verse 10
दिव्यतानेषु गायन्त: पर्युपासन्त त॑ प्रभुम् तत्र दिव्यानि पुष्पाणि प्रावहत् पवनस्तदा
ভীষ্ম বললেন—দিব্য তানে গান গেয়ে তাঁরা সেই প্রভুর উপাসনা করছিলেন। তখন বায়ুদেব সেখানে দিব্য পুষ্প ভাসিয়ে নিয়ে যাচ্ছিলেন।
Verse 11
आजहुर्ऋतवश्चापि सुगन्धीनि पृथक् पृथक् । तस्मिन् देवसमावाये सर्वभूतसमागमे
ভীষ্ম বললেন—ঋতুগণও প্রত্যেকে নিজ নিজভাবে সুগন্ধি উপহার নিবেদন করছিল। সেই দেবসমাবেশে, যেখানে সকল প্রাণী সমবেত হয়েছিল।
Verse 12
दिव्यवादित्रसंघुष्टे दिव्यस्त्रीचारणावृते । इन्द्र: पप्रच्छ देवेशमभिवाद्य प्रणम्य च
ভীষ্ম বললেন—দিব্য বাদ্যের ধ্বনিতে মুখর এবং দিব্য নারীগণ ও চারণদের দ্বারা পরিবেষ্টিত সেই সভায় ইন্দ্র দেবেশ্বরকে অভিবাদন করে প্রণাম জানিয়ে প্রশ্ন করলেন।
Verse 13
देवानां भगवन् कस्माल्लोकेशानां पितामह । उपरिष्टाद् गवां लोक एतदिच्छामि वेदितुम्
ভীষ্ম বললেন—হে ভগবান, হে লোক ও দেবগণের পিতামহ! গাভীদের লোক কেন সর্বোচ্চে স্থাপিত—এ কথা আমি জানতে চাই।
Verse 14
“भगवन्! पितामह! गोलोक समस्त देवताओं और लोकपालोंके ऊपर क्यों है? मैं इसे जानना चाहता हूँ ।।
ভীষ্ম বললেন—হে ভগবান, হে পিতামহ! গোলোক কেন সকল দেবতা ও লোকপালদেরও ঊর্ধ্বে? আমি তা জানতে চাই। হে প্রভু! গাভীগণ এখানে কোন তপস্যা বা ব্রহ্মচর্য পালন করেছিল, যার ফলে তারা রজোগুণের ধূলি থেকে মুক্ত হয়ে দেবতাদেরও ঊর্ধ্বে স্থানে সুখে বাস করে?
Verse 15
ततः प्रोवाच ब्रह्मा तं शक्रं बलनिषूदनम् । अवज्ञातास्त्वया नित्यं गावो बलनिषूदन
তখন ব্রহ্মা বলাসুর-নিধনকারী শক্র (ইন্দ্র)-কে বললেন— “বলনিষূদন! তুমি সর্বদা গাভীদের অবজ্ঞা করেছ। তাই তাদের মাহাত্ম্য তুমি যথার্থ জানো না। দেবশ্রেষ্ঠ! শোনো, আমি গাভীদের মহান প্রভাব ও পবিত্র মহিমা বর্ণনা করছি।”
Verse 16
तेन त्वमासां माहात्म्यं वेत्सि शृणु यत् प्रभो । गवां प्रभाव परमं माहात्म्यं च सुरर्षभ
এই কারণেই, হে প্রভু, তুমি এদের (গাভীদের) মাহাত্ম্য জানো না। শোনো, হে স্বামী। হে দেবশ্রেষ্ঠ, আমি গাভীদের পরম প্রভাব ও পবিত্র মাহাত্ম্য বলছি।
Verse 17
यज्ञांगं कथिता गावो यज्ञ एव च वासव । एताभिश्न विना यज्ञो न वर्तेत कथंचन
হে বাসব! গাভীদের যজ্ঞের অঙ্গ—বরং যজ্ঞ স্বয়ং—বলা হয়েছে; কারণ এদের ছাড়া কোনোভাবেই যজ্ঞ চলতে পারে না।
Verse 18
धारयन्ति प्रजाश्नैव पयसा हविषा तथा । एतासां तनयाश्वापि कृषियोगमुपासते
তারা দুধ দ্বারা এবং যজ্ঞোপযোগী হবি দ্বারা প্রজাদের ধারণ-পালন করে; আর এদের সন্তানরাও (বলদ প্রভৃতি) কৃষিকর্মে নিয়োজিত থাকে।
Verse 19
ततो यज्ञा: प्रवर्तन्ते हव्यं कव्यं च सर्वश:
তখন তাদের দ্বারাই যজ্ঞসমূহ প্রবৃত্ত হয়, এবং হব্য ও কব্য—উভয়েরই সর্বতোভাবে নির্বাহ হয়।
Verse 20
पयोदधिधघृतं चैव पुण्याश्चैता: सुराधिप । वहन्ति विविधान् भारान् क्षुत्तष्णापरिपीडिता:
ভীষ্ম বললেন—হে দেবাধিপ! এই গাভীগণ থেকেই দুধ, দই ও ঘি উৎপন্ন হয়; তারা নিঃসন্দেহে পরম পবিত্র। আর বলদরা ক্ষুধা-তৃষ্ণায় কাতর হয়েও নানা প্রকার ভার বহন করে চলে।
Verse 21
मुनींश्व धारयन्तीह प्रजाश्वैवापि कर्मणा । वासवाकूटवाहिन्य: कर्मणा सुकृतेन च
ভীষ্ম বললেন—এই গাভীগণ নিজেদের কর্মের দ্বারাই ঋষি ও প্রজাদের ধারণ-পালন করে। হে বাসব! তাদের আচরণে কোনো ছলনা নেই; সুকৃত ও ধর্মকর্মে তারা সদা শুভকার্যে নিয়োজিত থাকে।
Verse 22
उपरिष्टात् ततो5स्माकं वसन्त्येता: सदैव हि । एवं ते कारणं शक्र निवासकृतमद्य वै
ভীষ্ম বললেন—এই কারণেই এই গাভীগণ আমাদের ঊর্ধ্বে এক উচ্চ স্থানে চিরকাল বাস করে। হে শক্র! তোমার প্রশ্ন অনুসারে আমি ব্যাখ্যা করলাম কেন গাভীরা দেবতাদেরও ঊর্ধ্বলোকে অবস্থান করে। আর হে শতক্রতু ইন্দ্র! তারা নিজেরাও বর লাভ করেছে এবং প্রসন্ন হলে অন্যকে বর দান করার শক্তিও রাখে।
Verse 23
गवां देवोपरिष्टाद्धि समाख्यातं शतक्रतो । एता हि वरदत्ताश्न वरदाक्षापि वासव
ভীষ্ম বললেন—হে শতক্রতু! ঘোষণা করা হয়েছে যে গাভীগণ দেবতাদেরও ঊর্ধ্বে এক স্থানে বাস করে। তোমার প্রশ্ন অনুসারে আমি কারণ জানালাম—কেন তারা দেবলোকেরও ঊর্ধ্বে অবস্থান করে। আর হে বাসব! তারা নিজেরাও বরপ্রাপ্ত; প্রসন্ন হলে অন্যকে বর দিতেও সক্ষম।
Verse 24
सुरभ्य: पुण्यकर्मिण्य: पावना: शुभलक्षणा: । यदर्थ गां गताश्चैव सुरभ्य: सुरसत्तम
ভীষ্ম বললেন—সুরভী গাভীগণ পুণ্যকর্মে রত, স্বভাবতই পবিত্র এবং শুভ লক্ষণে চিহ্নিত। হে দেবশ্রেষ্ঠ! কী উদ্দেশ্যে এই সুরভীরা এখানে এসেছে—গোর বিষয়ে তাদের অভিপ্রায়ই বা কী?
Verse 25
पुरा देवयुगे तात देवेन्द्रेषु महात्मसु
ভীষ্ম বললেন—হে তাত, প্রাচীন দেবযুগে, যখন মহাত্মা দেবগণ ও ইন্দ্রসম অধিপতিরা বিদ্যমান ছিলেন…
Verse 26
त्रींललोकाननुशासत्सु विष्णौ गर्भत्वमागते । अदित्यास्तप्यमानायास्तपो घोर सुदुश्चरम्
ভীষ্ম বললেন—তিন লোকের শাসক বিষ্ণু যখন গর্ভাবস্থায় প্রবিষ্ট হলেন, তখন অদিতি সেই দিব্য উদ্দেশ্যে ভয়ংকর ও অতিদুরূহ তপস্যা গ্রহণ করলেন।
Verse 27
पुत्रार्थममरश्रेष्ठ पादेनैकेन नित्यदा । तां तु दृष्टवा महादेवीं तप्यमानां महत्तप:
ভীষ্ম বললেন—হে অমরশ্রেষ্ঠ! পুত্রলাভের জন্য তিনি নিত্য এক পায়ে দাঁড়িয়ে থাকতেন। সেই মহাদেবীকে মহাতপস্যায় রত দেখে…
Verse 28
दक्षस्य दुहिता देवी सुरभी नाम नामतः । अतप्यत तपो घोरें हृष्टा धर्मपरायणा
ভীষ্ম বললেন—দক্ষের কন্যা, সুরভী নামে দেবী, ধর্মে অবিচল ও হর্ষে উজ্জ্বল হয়ে, ঘোর তপস্যায় প্রবৃত্ত হলেন।
Verse 29
“तात! पहले सत्ययुगमें जब महामना देवेश्वरगण तीनों लोकोंपर शासन करते थे और अमरश्रेष्ठ] जब देवी अदिति पुत्रके लिये नित्य एक पैरसे खड़ी रहकर अत्यन्त घोर एवं दुष्कर तपस्या करती थी और उस तपस्यासे संतुष्ट होकर साक्षात् भगवान् विष्णु ही उनके गर्भमें पदार्पण करनेवाले थे उन्हीं दिनोंकी बात है, महादेवी अदितिको महान् तप करती देख दक्षकी धर्मपरायणा पुत्री सुरभी देवीने बड़े हर्षक साथ घोर तपस्या आस्मभ की ।। २५ --२८ || कैलासशिखरे रम्ये देवगन्धर्वसेविते । व्यतिष्ठदेकपादेन परमं योगमास्थिता,“कैलासके रमणीय शिखरपर जहाँ देवता और गन्धर्व सदा विराजते रहते हैं, वहाँ वह उत्तम योगका आश्रय ले ग्यारह हजार वर्षोतक एक पैरसे खड़ी रही। उसकी तपस्यासे देवता, ऋषि और बड़े-बड़े नाग भी संतप्त हो उठे
ভীষ্ম বললেন—তাত! পূর্বে সত্যযুগে, যখন মহামনা দেবেশ্বরগণ তিন লোক শাসন করতেন, তখন, হে অমরশ্রেষ্ঠ, দেবী অদিতি পুত্রলাভের জন্য নিত্য এক পায়ে দাঁড়িয়ে ভয়ংকর ও অতিদুরূহ তপস্যা করতেন। তাঁর তপস্যায় সন্তুষ্ট হয়ে স্বয়ং ভগবান বিষ্ণুই তাঁর গর্ভে প্রবেশ করতে উদ্যত ছিলেন। সেই সময়েই মহাদেবী অদিতিকে মহাতপস্যায় নিমগ্ন দেখে, দক্ষের ধর্মপরায়ণা কন্যা দেবী সুরভী আনন্দসহ ঘোর তপস্যা আরম্ভ করলেন। কৈলাসের মনোরম শিখরে—যেখানে দেবতা ও গন্ধর্বেরা সেবায় নিয়ত উপস্থিত—তিনি পরম যোগে প্রতিষ্ঠিত হয়ে এক পায়ে দাঁড়িয়ে রইলেন; এগারো হাজার বছর সেখানেই স্থির ছিলেন। তাঁর তপস্যায় দেবতা, ঋষি ও মহাবল নাগগণও ব্যথিত হলেন; তাঁর একাগ্র তপ তিন লোককে কাঁপিয়ে তুলত।
Verse 30
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । संतप्तास्तपसा तस्या देवा: सर्षिमहोरगा:
কৈলাসের মনোরম শিখরে, যেখানে দেবতা ও গন্ধর্বেরা সদা বিরাজ করেন, সেখানে সে উত্তম যোগের আশ্রয় নিয়ে এগারো হাজার বছর এক পায়ে দাঁড়িয়ে তপস্যা করল। তার তপস্যায় দেবতা, ঋষি এবং মহাবল নাগগণও দগ্ধবৎ ব্যাকুল হয়ে উঠলেন।
Verse 31
तत्र गत्वा मया सार्ध पर्युपासन्त तां शुभाम् । अथाहमनब्रुवं तत्र देवीं तां तपसान्विताम्,“वे सब लोग मेरे साथ ही उस शुभलक्षणा तपस्विनी सुरभी देवीके पास जाकर खड़े हुए। तब मैंने वहाँ उससे कहा--
তাঁরা সকলেই আমার সঙ্গে সেখানে গিয়ে সেই শুভলক্ষণী তপস্বিনী দেবী সুরভীর নিকটে দাঁড়িয়ে সেবা-উপাসনা করতে লাগলেন। তারপর আমি সেই স্থানে তপস্যায় বিভূষিতা সেই দেবীকে বললাম—
Verse 32
किमर्थ तप्यसे देवि तपो घोरमनिन्दिते । प्रीतस्ते5हं महाभागे तपसानेन शो भने
হে দেবী, অনিন্দিতা! তুমি কেন এমন ঘোর তপস্যায় নিজেকে ক্লিষ্ট করছ? হে শোভনে, মহাভাগ্যে! তোমার এই তপস্যায় আমি অত্যন্ত প্রসন্ন। হে দেবী, ইচ্ছামতো বর প্রার্থনা করো।
Verse 33
वरयस्व वरं देवि दातास्मीति पुरंदर
পুরন্দর বললেন—“হে দেবী, বর বেছে নাও; আমি দান করতে প্রস্তুত।”
Verse 34
युरभ्युवाच वरेण भगवन् महां कृतं लोकपितामह । एष एव वरो मेडद्य यत् प्रीतोडसि ममानघ
সুরভী বললেন—“ভগবন, নিষ্পাপ লোকপিতামহ! আমার কোনো বর প্রয়োজন নেই। আমার জন্য আজ এই-ই সর্বশ্রেষ্ঠ বর—আপনি আমার প্রতি প্রসন্ন হয়েছেন, হে অনঘ।”
Verse 35
ब्रह्मोवाच तामेवं ब्रुवतीं देवीं सुरभिं त्रिदशेश्वर । प्रत्यब्रुवं यद् देवेन्द्र तच्निबोध शचीपते
ব্রহ্মা বললেন—ত্রিদশদের অধীশ্বর! দেবেন্দ্র! শচীপতে! দেবী সুরভী যখন এইভাবে বলছিলেন, তখন আমি তাঁকে যে উত্তর দিলাম, তা শোনো।
Verse 36
चल हक पका हा मट दहा ? कक पक जे (4. 3-3... अलोभकाम्यया देवि तपसा च शुभानने । प्रसन्नो5हं वरं तस्मादमरत्वं ददामि ते
আমি বললাম—দেবী! শুভাননে! তুমি লোভ ও কামনা ত্যাগ করেছ। নিষ্কাম তপস্যায় আমি প্রসন্ন; অতএব তোমাকে অমরত্বের বর দিচ্ছি।
Verse 37
त्रयाणामपि लोकानामुपरिष्टान्निवत्स्यसि । मत्प्रसादाच्च विख्यातो गोलोक: सम्भविष्यति,तुम मेरी कृपासे तीनों लोकोंके ऊपर निवास करोगी और तुम्हारा वह धाम “गोलोक' नामसे विख्यात होगा
আমার কৃপায় তুমি তিন লোকেরও ঊর্ধ্বে বাস করবে, আর তোমার সেই ধাম ‘গোলোক’ নামে খ্যাত হবে।
Verse 38
मानुषेषु च कुर्वाणा: प्रजा: कर्म शुभास्तव । निवत्स्यन्ति महाभागे सर्वा दुहितरश्न ते,महाभागे! तुम्हारी सभी शुभ संतानें--समस्त पुत्र और कन्याएँ मानवलोकमें उपयुक्त कर्म करती हुई निवास करेंगी
মহাভাগ্যে! তোমার সকল সন্তান—পুত্র ও কন্যা—মানবলোকে শুভ ও উপযুক্ত কর্ম করে বাস করবে।
Verse 39
मनसा चिन्तिता भोगास्त्वया वै दिव्यमानुषा: । यच्च स्वर्गे सुखं देवि तत् ते सम्पत्स्यते शुभे
দেবী! শুভে! তুমি মনে যে দিব্য বা মানব ভোগের চিন্তা করবে, আর স্বর্গে যে সুখ আছে—সবই তোমার কাছে আপনিই এসে পৌঁছাবে।
Verse 40
तस्या लोका: सहस्राक्ष सर्वकामसमन्विता: । न तत्र क्रमते मृत्युर्न जरा न च पावक:
ভীষ্ম বললেন—হে সহস্রাক্ষ (ইন্দ্র)! তাঁর লোকসমূহ সর্বকাম-সমন্বিত। সেখানে মৃত্যু প্রবেশ করে না, জরা নেই; অগ্নিরও কোনো প্রভাব চলে না।
Verse 41
नदैवं नाशुभं किंचिद् विद्यते तत्र वासव | तत्र दिव्यान्यरण्यानि दिव्यानि भवनानि च
ভীষ্ম বললেন—হে বাসব (ইন্দ্র)! সেই লোকেতে ভাগ্যবশত কোনো অনিষ্ট নেই, কোনো অশুভও নেই। সেখানে দিব্য অরণ্য আছে, দিব্য ভবনও আছে।
Verse 42
ब्रह्म॒चर्येण तपसा यत्नेन च दमेन च
ভীষ্ম বললেন—হে পুষ্করেক্ষণ (কমলনয়ন) ইন্দ্র! ব্রহ্মচর্য, তপস্যা, অধ্যবসায় এবং ইন্দ্রিয়দমন দ্বারাই গোলোক লাভ করা যায়।
Verse 43
दानैश्न विविधै: पुण्यैस्तथा तीर्थानुसेवनात् । तपसा महता चैव सुकृतेन च कर्मणा
ভীষ্ম বললেন—বহুবিধ পুণ্যদানে, তীর্থসেবনে, মহাতপে এবং সুকৃত কর্মাচরণে (মানুষ ধর্মপথে অগ্রসর হয়)।
Verse 44
एतत् ते सर्वमाख्यातं मया शक्रानुपृच्छते,असुरसूदन शक्र! इस प्रकार तुम्हारे पूछनेके अनुसार मैंने सारी बातें बतलायी हैं। अब तुम्हें गौओंका कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिये
ভীষ্ম বললেন—হে শক্র, অসুরসূদন! তোমার প্রশ্নের উত্তরে আমি এ সবই বিস্তারিত বলেছি। অতএব তুমি কখনও গাভীদের তিরস্কার কোরো না।
Verse 45
न ते परिभव: कार्यो गवामसुरसूदन,असुरसूदन शक्र! इस प्रकार तुम्हारे पूछनेके अनुसार मैंने सारी बातें बतलायी हैं। अब तुम्हें गौओंका कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिये
ভীষ্ম বললেন—হে অসুরসूदন, হে শক্র (ইন্দ্র)! গাভীদের প্রতি কখনও অবজ্ঞা করো না। তোমার প্রশ্নানুসারে আমি সমস্ত কথা সম্পূর্ণভাবে বলেছি; অতএব আর কখনও গাভীদের নিন্দা বা তিরস্কার কোরো না।
Verse 46
भीष्म उवाच एतच्छूत्वा सहस्राक्ष: पूजयामास नित्यदा । गाश्षक्रे बहुमानं च तासु नित्यं युधिष्ठिर
ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! ব্রহ্মার এই বাক্য শুনে সহস্রনেত্রধারী ইন্দ্র প্রতিদিন গাভীদের পূজা করতে লাগলেন এবং সর্বদা তাদের প্রতি গভীর সম্মান প্রদর্শন করলেন।
Verse 47
एतत् ते सर्वमाख्यातं पावनं च महाद्युते । पवित्र परमं चापि गवां माहात्म्यमुत्तमम्,महाद्युते! यह सब मैंने तुमसे गौओंका परम पावन, परम पवित्र और अत्यन्त उत्तम माहात्म्य कहा है
হে মহাদ্যুতে! গাভীদের এই পরম পবিত্র, পরম শুদ্ধ ও সর্বোত্তম মাহাত্ম্য—সমস্তই আমি তোমাকে বলে দিলাম।
Verse 48
कीर्तितं पुरुषव्याप्र सर्वपापविमोचनम् | य इदं कथयेन्नित्यं ब्राह्मणेभ्य:ः समाहित:
হে পুরুষব্যাঘ্র! এর কীর্তন সর্বপাপমোচন বলে ঘোষিত। যে একাগ্রচিত্তে নিত্য ব্রাহ্মণদের কাছে এই প্রসঙ্গ বর্ণনা করে—বিশেষত যজ্ঞে হব্য অর্পণের সময় এবং শ্রাদ্ধে কব্য নিবেদনের সময়—তার প্রদত্ত হব্য-কব্য ব্যর্থ হয় না; তা ন্যায়সঙ্গত সকল কামনা পূর্ণ করে এবং অক্ষয় পুণ্য হয়ে পিতৃগণের নিকট পৌঁছে যায়।
Verse 49
हव्यकव्येषु यज्ञेषु पितृकार्येषु चैव ह । सार्वकामिकमक्षय्यं पितृंस्तस्योपतिष्ठते
হে পুরুষসিংহ! হব্য-কব্যযুক্ত যজ্ঞসমূহে এবং পিতৃকার্যের সকল ক্রিয়ায় এই (কীর্তন) সর্বকামসিদ্ধিদায়ক ও অক্ষয় ফলপ্রদ; এর দ্বারা প্রদত্ত অর্ঘ্য অক্ষয় কল্যাণরূপে পিতৃগণের নিকট পৌঁছে এবং ন্যায়সঙ্গত সকল কামনা পূর্ণ করে।
Verse 50
गोषु भक्तश्न लभते यद् यदिच्छति मानव: । स्त्रियोडपि भक्ता या गोषु ताश्व काममवाप्रुयु:
গো-ভক্ত মানুষ যা-যা কামনা করে, তা-সবই সে লাভ করে। নারীদের মধ্যেও যারা গাভীর ভক্ত, তারাও মনোবাঞ্ছিত কামনা পূর্ণ করে।
Verse 51
पुत्रार्थी लभते पुत्र॑ कन्यार्थी तामवाप्लनुयात् धनार्थी लभते वित्तं धर्मार्थी धर्ममाप्तुयात्
পুত্রকামী পুত্র লাভ করে, কন্যাকামী কন্যা লাভ করে। ধনকামী ধন পায়, আর ধর্মকামী ধর্ম লাভ করে।
Verse 52
विद्यार्थी चाप्तुयाद् विद्यां सुखार्थी प्राप्तुयात् सुखम् । न किंचिद् दुर्लभं चैव गवां भक्तस्य भारत,विद्यार्थी विद्या पाता है और सुखार्थी सुख। भारत! गोभक्तके लिये यहाँ कुछ भी दुर्लभ नहीं है
বিদ্যার্থী বিদ্যা লাভ করে, সুখার্থী সুখ লাভ করে। হে ভারত! গাভীর ভক্তের জন্য এখানে কিছুই দুর্লভ নয়।
Verse 82
इस प्रकार श्रीमह्या भारत अनुशासनपरव्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लक्ष्मी और गौओंका संवादनामक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে ‘লক্ষ্মী ও গাভীদের সংলাপ’ নামক বিরাশিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 83
इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोलोकवर्णने त्रय्शीतितमो<5ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে গোলোক-বর্ণনা বিষয়ক তিরাশিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 186
जनयन्ति च धान्यानि बीजानि विविधानि च । “ये अपने दूध-घीसे प्रजाका भी पालन-पोषण करती हैं। इनके पुत्र (बैल) खेतीके काम आते तथा नाना प्रकारके धान्य एवं बीज उत्पन्न करते हैं
তারা নানা প্রকার শস্য ও বিচিত্র বীজও উৎপন্ন করে।
Verse 243
तच्च मे शृणु कारत्स्न्येन वदतो बलसूदन । 'सुरभी गौएँ पुण्यकर्म करनेवाली और शुभ-लक्षणा होती हैं। सुरश्रेष्ठ! बलसूदन! वे जिस उद्देश्यसे पृथ्वीपर गयी हैं, उसको भी मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ, सुनो
হে বলসূদন! আমি যা বলছি, তা সম্পূর্ণভাবে শোনো। সুরভি গাভীগণ পুণ্যকর্মের সাধিকা ও শুভলক্ষণযুক্ত; আর যে উদ্দেশ্যে তারা পৃথিবীতে অবতীর্ণ হয়েছে, তাও আমি বিস্তারিতভাবে বলছি—শোনো।
Verse 416
विमानानि सुयुक्तानि कामगानि च वासव । वासव! वहाँ न कोई दुर्भाग्य है और न अशुभ। वहाँ दिव्य वन, दिव्य भवन तथा परम सुन्दर एवं इच्छानुसार विचरनेवाले विमान मौजूद हैं
হে বাসব! সেখানে না কোনো দুর্ভাগ্য আছে, না কোনো অমঙ্গল। সেখানে দিব্য বন ও দিব্য প্রাসাদ আছে, আর অতিশয় সুন্দর, ইচ্ছামতো চলমান বিমানও বিদ্যমান।
Verse 433
शक््य: समासादयितुं गोलोकः: पुष्करेक्षण । कमलनयन इन्द्र! ब्रह्मचर्य
হে পদ্মনয়ন! গোলোক লাভ করা অবশ্যই সম্ভব; কিন্তু তা ব্রহ্মচর্য, তপস্যা, নিরন্তর প্রচেষ্টা, ইন্দ্রিয়সংযম, নানা প্রকার দান, পুণ্যসঞ্চয়, তীর্থসেবা, মহাতপ এবং অন্যান্য শুভ কর্মের অনুশীলন দ্বারাই হয়।
The interpretive problem is reconciling Tāraka’s reputed near-invulnerability with his eventual defeat; the chapter resolves this by locating the outcome in divinely sanctioned leadership (Skanda as senāpati) and in the emergence of a countervailing power aligned with cosmic order.
Suvarṇa is framed not merely as wealth but as condensed tejas associated with Agni and Kārttikeya; gifting it, when performed with discipline and right intention, is presented as a meritorious act that supports purification and social-religious continuity.
Yes: the closing reference to Rāma receiving Vasiṣṭha’s account and attaining release from faults through giving suvarṇa functions as a phalaśruti-style validation, presenting suvarṇa-dāna as yielding purification and a high, difficult-to-attain celestial station.