Adhyaya 66
Anushasana ParvaAdhyaya 6653 Verses

Adhyaya 66

Pānīya-dāna and Anna-dāna: The Primacy of Life-Sustaining Gifts (पानीयदान-प्रशंसा / अन्नदान-प्रशंसा)

Upa-parva: Dāna-dharma (Charitable Giving Discourses) — Water and Food Gifts

Chapter 13.66 opens with Yudhiṣṭhira acknowledging prior teaching on the fruits of charity and requesting a detailed explanation of why pānīya-dāna (gift of water) is considered supremely fruitful. Bhīṣma replies by establishing a hierarchy of necessity: there is, in his assessment, no gift superior to providing food and water to one who receives and consumes them. He argues that living beings proceed and function through food; from food arise strength (bala) and radiance/energy (tejas), hence food-giving is praised as foremost among gifts. The discourse then deepens causality: food itself depends on water, and without water nothing proceeds—plants, herbs, and sustenance are described as water-born. The chapter extends the dependency logic cosmologically and ritually by associating water with Soma and with sacrificial utterances/offerings (amṛta, sudhā, svāhā, vaṣaṭ), and by mapping different beings to their sustaining “food” (e.g., devas and amṛta; pitṛs and svadhā). The ethical conclusion is programmatic: regular water-giving is urged for one seeking welfare (bhūti), bringing reputation, longevity, and release from demerit; the donor is said to attain enduring worlds, with a cited traditional authority (Manu). Throughout, the teaching frames charity as life-support (prāṇa-dāna by implication), grounding merit in sustaining the conditions of existence rather than in display or status.

Chapter Arc: युधिष्ठिर, दानधर्म के सूक्ष्म मार्ग में, भीष्म से पूछते हैं—किस वस्तु के दान से ब्राह्मण तुरंत तृप्त होते हैं, और कौन-सा दान इहलोक-परलोक दोनों में सर्वाधिक फलदायी है। → भीष्म उत्तर को केवल ‘दान’ की सूची नहीं बनाते; वे अन्न के बिना देह-धर्म के विघटन का चित्र खींचते हैं—अन्न-हानि से शरीर के धातु/तत्त्व बिखरते हैं, बल क्षीण होता है, और जीवन-यज्ञ की धुरी डगमगाती है। फिर वे ब्राह्मण को ‘श्रेष्ठ क्षेत्र’ कहकर दान के ‘बीज’ और ‘क्षेत्र’ का नैतिक-आध्यात्मिक गणित स्थापित करते हैं। → अन्नदान की महिमा अपने शिखर पर पहुँचती है: जो मनुष्य अन्न से देव, पितृ, ऋषि, ब्राह्मण और अतिथि को तृप्त करता है, उसे महान पुण्यफल मिलता है; और अन्नदाता को स्वर्गीय लोकों में श्वेत-मेघ-सम प्रासाद, सुवर्ण-दीप्त शय्या आदि दिव्य भोग प्राप्त होते हैं—इसलिए ‘अन्नप्रदो भव’ का घोष। → भीष्म निष्कर्ष देते हैं कि अन्नदान ही दानों में प्रधान है—मानव को प्रयत्नपूर्वक अन्न का दान करना चाहिए, क्योंकि वही जीवन, बल, धर्म-पालन और परलोक-गति का आधार है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल ९८३ श्लोक हैं) न२््च्स्स््तािस्ि ह्य £>ाभ्प्ट् त्रेषष्टितमोड्ध्याय: अन्नदानका विशेष माहात्म्य युधिछ्िर उवाच कानि दानानि लोके5स्मिन्‌ दातुकामो महीपति: । गुणाधिकेभ्यो विप्रेभ्यो दद्यात्‌ भरतसत्तम

যুধিষ্ঠির বললেন—হে ভারতসত্তম! এই জগতে দান করতে ইচ্ছুক কোনো রাজা গুণে শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণদের কী কী দান করবে?

Verse 2

केन तुष्यन्ति ते सद्यः किं तुष्टा: प्रदिशन्ति च । शंस मे तन्‍्महाबाहो फल पुण्यकृतं महत्‌

কোন দানে তারা তৎক্ষণাৎ তুষ্ট হয়? আর তুষ্ট হয়ে কী প্রদান করে? হে মহাবাহো, দানজনিত মহান পুণ্যের ফল আমাকে বলো।

Verse 3

दत्तं किं फलवद्‌ राजन्निह लोके परत्र च | भवतः: श्रोतुमिच्छामि तन्मे विस्तरतो वद

হে রাজন! ইহলোকে ও পরলোকে কোন দান বিশেষ ফলদায়ক? আমি তা আপনার মুখে শুনতে চাই। অনুগ্রহ করে বিস্তারিত বলুন।

Verse 4

भीष्म उवाच इममर्थ पुरा पृष्टो नारदो देवदर्शन: । यदुक्तवानसौ वाक्यं तन्मे निगदत: शृणु

ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! এই বিষয়েই আমি একদা দেবদর্শী নারদকে প্রশ্ন করেছিলাম। তখন তিনি যে বাক্য বলেছিলেন, এখন আমি তা তোমাকে বলছি—শোনো।

Verse 5

नारद उवाच अन्नमेव प्रशंसन्ति देवा ऋषिगणास्तथा । लोकततन्त्र हि संज्ञाश्न सर्वमन्ने प्रतेष्ठितम्‌

নারদ বললেন—দেবতারা এবং ঋষিগণ অন্নেরই প্রশংসা করেন। লোকজীবনের বিধান ও ধারাবাহিকতা অন্নের উপরই নির্ভরশীল; অন্ন থেকেই চেতনা ও বুদ্ধির স্বচ্ছতা জাগে, এবং সত্যই সবকিছু অন্নেই প্রতিষ্ঠিত।

Verse 6

अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति । तस्मादन्नं विशेषेण दातुमिच्छन्ति मानवा:,अन्नके समान न कोई दान था और न होगा। इसलिये मनुष्य अधिकतर अन्नका ही दान करना चाहते हैं

নারদ বললেন—অন্নের সমান কোনো দান অতীতে ছিল না, ভবিষ্যতেও হবে না। তাই মানুষ তার বিশেষ মহিমা জেনে সর্বাধিক অন্নদান করতে চায়।

Verse 7

अन्नमूर्जस्करं लोके प्राणाश्षान्ने प्रतिष्ठिता: । अन्नेन धार्यते सर्व विश्व जगदिदं प्रभो

নারদ বললেন—হে প্রভু! জগতে অন্নই শক্তিবর্ধক। প্রাণ অন্নের উপরই প্রতিষ্ঠিত, এবং এই সমগ্র বিশ্ব—চরাচর জগৎ—অন্ন দ্বারাই ধারণ করা হয়।

Verse 8

अन्नाद्‌ गृहस्था लोकेउस्मिन्‌ भिक्षवस्तापसास्तथा । अन्नाद्‌ भवन्ति वै प्राणा: प्रत्यक्ष नात्र संशय:

নারদ বললেন—এই জগতে গৃহস্থ, ভিক্ষাজীবী সন্ন্যাসী এবং তপস্বী—সকলেই অন্নের দ্বারাই জীবিত থাকে। অন্ন থেকেই প্রাণের অস্তিত্ব; এটি প্রত্যক্ষ, এতে কোনো সন্দেহ নেই।

Verse 9

कुटुम्बिने सीदते च ब्राह्मणाय महात्मने । दातव्यं भिक्षवे चान्नामात्मनो भूतिमिच्छता

নারদ বললেন—যে নিজের কল্যাণ ও সমৃদ্ধি কামনা করে, সে অন্নদান করুক—বিশেষত দুঃখী গৃহস্থকে, মহাত্মা ব্রাহ্মণকে এবং ভিক্ষা প্রার্থনাকারী ভিক্ষুককেও।

Verse 10

ब्राह्मणायाभिरूपाय यो दद्यादन्नमर्थिने । विदधाति निर्धि श्रेष्ठ पारलीकिकमात्मन:,जो याचना करनेवाले सुपात्र ब्राह्मणको अन्नदान देता है, वह परलोकमें अपने लिये एक अच्छी निधि (खजाना) बना लेता है

নারদ বললেন—যে ভিক্ষাপ্রার্থী যোগ্য ও সম্মানিত ব্রাহ্মণকে অন্ন দান করে, সে নিজের জন্য পরলোকে শ্রেষ্ঠ এক ধনভাণ্ডার সঞ্চয় করে।

Verse 11

श्रान्तमध्वनि वर्तन्तं वृद्धमर्हमुपस्थितम्‌ । अर्चयेद्‌ भूतिमन्विच्छन्‌ गृहस्थो गृहमागतम्‌

পথ চলতে চলতে ক্লান্ত কোনো বৃদ্ধ ও শ্রদ্ধেয় অতিথি যদি গৃহে উপস্থিত হন, তবে নিজের কল্যাণ কামনাকারী গৃহস্থের উচিত তাঁর যথোচিত সৎকার করা।

Verse 12

क्रोधमुत्पतितं हित्वा सुशीलो वीतमत्सर: । अन्नदः प्राप्तुते राजन्‌ दिवि चेह च यत्सुखम्‌

নারদ বললেন—হে রাজন! যে ব্যক্তি উদিত ক্রোধ ত্যাগ করে, ঈর্ষা পরিত্যাগ করে, সুশীল হয়ে অন্নদান করে, সে ইহলোকে ও স্বর্গলোকে উভয়ত্রই সুখ লাভ করে।

Verse 13

नावमन्येदभिगतं न प्रणुद्यात्‌ कदाचन । अपि श्वपाके शुनि वा न दानं विप्रणश्यति

নারদ বললেন—যে গৃহে এসেছে তাকে কখনো অপমান করা উচিত নয়, কখনো তাড়িয়েও দেওয়া উচিত নয়; কারণ চাণ্ডালকে বা কুকুরকেও দেওয়া অন্নদান নষ্ট হয় না—তা বৃথা যায় না।

Verse 14

यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते | आर्तायादृष्टपूर्वाय स महद्धर्ममाप्तुयात्‌,जो मनुष्य कष्टमें पड़े हुए अपरिचित राहीको प्रसन्नतापूर्वक अन्न देता है, उसे महान्‌ धर्मकी प्राप्ति होती है

যে ব্যক্তি অনিচ্ছা বা ক্লেশ না করে পথে চলতে থাকা কোনো পথিককে—বিশেষত দুঃখিত ও পূর্বে অপরিচিত জনকে—আনন্দসহকারে অন্ন দান করে, সে মহৎ ধর্মফল লাভ করে।

Verse 15

पितृन्‌ देवानृषीन्‌ विप्रानतिथींश्व॒ जनाधिप । यो नर: प्रीणयत्यन्नैस्तस्य पुण्यफलं महत्‌

হে জনাধিপ! যে ব্যক্তি অন্ন দান করে পিতৃগণ, দেবগণ, ঋষিগণ, ব্রাহ্মণগণ ও অতিথিদের তৃপ্ত করে, তার পুণ্যফল মহৎ।

Verse 16

कृत्वातिपातकं कर्म यो दद्यादन्नमर्थिने | ब्राह्मणाय विशेषेण न स पापेन मुहाते,जो महान्‌ पाप करके भी याचक मनुष्यको, उसमें भी विशेषत: ब्राह्मणको अन्न देता है, वह अपने पापके कारण मोहमें नहीं पड़ता है

যে ব্যক্তি মহাপাপ করেও প্রার্থনাকারীকে—বিশেষত ব্রাহ্মণকে—অন্ন দান করে, সে সেই পাপের কারণে মোহগ্রস্ত হয় না।

Verse 17

ब्राह्मणेष्वक्षयं दानमन्न शूद्रे महाफलम्‌ | अन्नदानं हि शूद्रे च ब्राह्मणे च विशिष्यते

ব্রাহ্মণকে অন্ন দান করলে অক্ষয় ফল হয়, আর শূদ্রকে দিলে মহৎ ফল হয়; কারণ শূদ্র হোক বা ব্রাহ্মণ—অন্নদান বিশেষভাবে পুণ্যদায়ক।

Verse 18

न पृच्छेद्‌ गोत्रचरणं स्वाध्यायं देशमेव च । भिक्षितो ब्राह्मणेनेह दद्यादन्न॑ प्रयाचित:

এখানে কোনো ব্রাহ্মণ ভিক্ষায় অন্ন চাইলে তার গোত্র, শাখা, স্বাধ্যায় বা বাসস্থান জিজ্ঞাসা করবে না; চাইবার সঙ্গে সঙ্গেই অন্ন দেবে।

Verse 19

अन्नदस्यान्नवक्षाश्व॒ सर्वकामफलप्रदा: । भवन्ति चेह चामुत्र नृपतेर्नात्र संशय:

হে নৃপতি! যে রাজা অন্ন দান করেন, তাঁর শস্যফসল ইহলোক ও পরলোক—উভয়ত্রই—সমস্ত কাম্য ফল প্রদানকারী হয়; এতে কোনো সন্দেহ নেই।

Verse 20

आशंसन्ते हि पितर: सुवृष्टिमिव कर्षका: । अस्माकमपि पुत्रो वा पौत्रो वान्नं प्रदास्यति

যেমন কৃষকেরা সময়মতো উত্তম বৃষ্টির আকাঙ্ক্ষা করে, তেমনি পিতৃগণও আশায় থাকেন—‘একদিন নিশ্চয়ই আমাদের পুত্র বা পৌত্র আমাদের অন্ন অর্পণ করবে।’

Verse 21

ब्राह्मणो हि महदभूतं स्वयं देहीति याचति । अकामो वा सकामो वा दत्त्वा पुण्यमवाप्रुयात्‌

ব্রাহ্মণ মহৎ সত্তা। তিনি যদি নিজে ‘আমাকে অন্ন দাও’ বলে প্রার্থনা করেন, তবে মানুষ কামনাসহ বা কামনাহীন—যেভাবেই হোক—তাঁকে অন্ন দান করে পুণ্য লাভ করুক।

Verse 22

ब्राह्मण: सर्वभूतानामतिथि: प्रसृताग्रभुक्‌ । विप्रा यदधिगच्छन्ति भिक्षमाणा गृहं सदा

ব্রাহ্মণ যেন সকল প্রাণীরই অতিথি—যিনি প্রসারিত হাতে যা দেওয়া হয় তাই গ্রহণ করেন। বিদ্বান ব্রাহ্মণগণ সর্বদা ভিক্ষা প্রার্থনা করে গৃহে গৃহে গমন করেন।

Verse 23

सत्कृताश्च निवर्तन्ते तदतीव प्रवर्धते । महाभागे कुले प्रेत्य जन्म चाप्रोति भारत

যাদের সম্মান করা হয়, তারা আবার ফিরে আসে; আর সেই সম্মান ক্রমে আরও বৃদ্ধি পায়। আর হে ভারত! মৃত্যুর পরে মানুষ অতি সৌভাগ্যশালী, মহৎ কুলে জন্ম লাভ করে।

Verse 24

भारत! ब्राह्मण सब मनुष्योंका अतिथि और सबसे पहले भोजन पानेका अधिकारी है। ब्राह्मण जिस घरपर सदा भिक्षा माँगनेके लिये जाते हैं और वहाँसे सत्कार पाकर लौटते हैं, उस घरकी सम्पत्ति अधिक बढ़ जाती है तथा उस घरका मालिक मरनेके बाद महान्‌ सौभाग्यशाली कुलमें जन्म पाता है ।।

নারদ বললেন—হে ভারত! ব্রাহ্মণই মানুষের মধ্যে শ্রেষ্ঠ অতিথি; তাঁরই প্রথমে ভোজনের অধিকার। যে গৃহে ব্রাহ্মণেরা নিত্য ভিক্ষার্থে আসেন এবং সৎকার পেয়ে প্রত্যাবর্তন করেন, সেই গৃহের ঐশ্বর্য ক্রমে বৃদ্ধি পায়; আর সেই গৃহস্বামী মৃত্যুর পরে মহাসৌভাগ্যশালী বংশে জন্ম লাভ করে। তদুপরি, যে ব্যক্তি এই লোকেতে অন্ন দান করে, উত্তম আসন/সম্মানস্থান প্রদান করে এবং নিয়ত মিষ্ট ও উৎকৃষ্ট ভোজন দান করে, সে দেবগণের সম্মানে স্বর্গলোকে বাস করে।

Verse 25

अन्न प्राणा नराणां हि सर्वमन्ने प्रतेष्ठितम्‌ । अन्नदः पशुमान्‌ पुत्री धनवान्‌ भोगवानपि

নারদ বললেন—হে নরেশ্বর! অন্নই মানুষের প্রাণ; সবই অন্নের উপর প্রতিষ্ঠিত। অতএব অন্নদাতা পুরুষ গবাদি পশু, পুত্র, ধন এবং ভোগও লাভ করে। জগতে অন্নদানকারীকে প্রাণদাতা এবং সর্বদাতা বলা হয়।

Verse 26

प्राणवांश्वापि भवति रूपवांश्व तथा नृप । अन्नद: प्राणदो लोके सर्वद: प्रोच्यते तु सः

নারদ বললেন—হে নৃপ! অন্নদাতা প্রাণশক্তিসম্পন্ন এবং রূপবানও হয়। এই লোকেতে অন্নদাতাকে প্রাণদাতা বলা হয়, এবং তাকেই সর্বদাতা বলেও ঘোষণা করা হয়েছে।

Verse 27

अन्न हि दत्त्वातिथये ब्राह्मणाय यथाविधि । प्रदाता सुखमाप्रोति दैवतैश्नापि पूज्यते,अतिथि ब्राह्मणको विधिपूर्वक अन्नदान करके दाता परलोकमें सुख पाता है और देवता भी उसका आदर करते हैं

নারদ বললেন—অতিথিকে, বিশেষত ব্রাহ্মণকে, বিধিপূর্বক অন্ন দান করলে দাতা পরলোকে সুখ লাভ করে এবং দেবতারাও তাকে পূজা/সম্মান করেন।

Verse 28

ब्राह्मणो हि महदभूत॑ क्षेत्रभूतं युधिष्ठिर । उप्यते तत्र यद्‌ बीज॑ तद्धि पुण्यफलं महत्‌

নারদ বললেন—হে যুধিষ্ঠির! ব্রাহ্মণ মহান সত্তা; তিনি যেন পুণ্যের জন্য পবিত্র ক্ষেত্র। সেই ক্ষেত্রে যে ‘বীজ’ বপন করা হয়, তা মহৎ পুণ্যফল প্রদান করে।

Verse 29

प्रत्यक्ष प्रीतिजनन भोक्त्ुर्दातुर्भवत्युत । सर्वाण्यन्यानि दानानि परोक्षफलवन्त्युत

নারদ বললেন— অন্নদান দাতা ও ভোক্তা—উভয়েরই প্রত্যক্ষ তৃপ্তি জন্মায়। কিন্তু অন্যান্য সকল দানের ফল পরোক্ষভাবেই লাভ হয়।

Verse 30

अन्नाद्धि प्रसव यान्ति रतिरन्नाद्धि भारत । धर्मार्थावन्नतो विद्धि रोगनाशं तथान्नत:

নারদ বললেন— হে ভারত! অন্ন থেকেই সন্তানের জন্ম, অন্ন থেকেই রতির সিদ্ধি। ধর্ম ও অর্থের সিদ্ধিও অন্নের দ্বারাই জানো; আর অন্ন থেকেই রোগের বিনাশ ঘটে।

Verse 31

अन्न हामृतमित्याह पुराकल्पे प्रजापति: । अन्न भुवं दिवं खं च सर्वमन्ने प्रतेष्ठितम्‌,पूर्वकल्पमें प्रजापतिने अन्नको अमृत बतलाया है। भूलोक, स्वर्ग और आकाश अन्नरूप ही हैं; क्योंकि अन्न ही सबका आधार है

নারদ বললেন— প্রাচীন কালে প্রজাপতি বলেছিলেন— ‘অন্নই অমৃত।’ ভূলোক, স্বর্গলোক ও আকাশ—সবই অন্নের উপর প্রতিষ্ঠিত; সত্যই সবকিছু অন্নের আশ্রয়ে স্থিত।

Verse 32

अन्नप्रणाशे भिद्यन्ते शरीरे पजच धातव: । बल॑ बलवतो<पीह प्रणश्यत्यन्नहानित:

নারদ বললেন— অন্ন নষ্ট হলে শরীরের মধ্যে স্থিত পাঁচ ধাতু/তত্ত্ব বিচ্ছিন্ন হয়ে যায়। অন্নের অভাবে এ জগতে বলবানদেরও বল ক্ষয়প্রাপ্ত হয়।

Verse 33

आवाहाश्न विवाहाश्न यज्ञाश्चान्ञमृते तथा । निवर्तन्ते नरश्रेष्ठ ब्रह्म चात्र प्रलीयते,निमन्त्रण, विवाह और यज्ञ भी अन्नके बिना बंद हो जाते हैं। नरश्रेष्ठ! अन्न न हो तो वेदोंका ज्ञान भी भूल जाता है

নারদ বললেন— হে নরশ্রেষ্ঠ! অন্ন না থাকলে আহ্বান-সত্কার, বিবাহ এবং যজ্ঞ—সবই থেমে যায়। আর যেখানে অন্ন নেই, সেখানে বেদজ্ঞান (ব্রহ্ম)ও যেন লয়প্রাপ্ত হয়।

Verse 34

अन्नतः सर्वमेतद्धि यत्‌ किंचित्‌ स्थाणु जंगमम्‌ | त्रिषु लोकेषु धर्मार्थमन्नं देयमतो बुधै:

স্থাবর-জঙ্গম যা কিছুই আছে, সবই অন্নের আশ্রয়ে প্রতিষ্ঠিত। অতএব জ্ঞানীরা ধর্মার্থে তিন লোকেই অন্নদান অবশ্যই করবেন।

Verse 35

अन्नदस्य मनुष्यस्य बलमोजो यशांसि च । कीर्तिश्चि वर्थते शश्व॒त्‌ त्रिषु लोकेषु पार्थिव,पृथ्वीनाथ! अन्नदान करनेवाले मनुष्यके बल, ओज, यश और कीर्तिका तीनों लोकोंमें सदा ही विस्तार होता रहता है

হে পৃথিবীনাথ! অন্নদানকারী মানুষের বল, তেজ, যশ ও কীর্তি—তিন লোকেই চিরকাল বৃদ্ধি পেতে থাকে।

Verse 36

मेघेषूर्ध्व संनिधत्ते प्राणानां पवन: पति: । तच्च मेघगतं वारि शक्रो वर्षति भारत,भारत! प्राणोंका स्वामी पवन मेघोंके ऊपर स्थित होता है और मेघमें जो जल है, उसे इन्द्र धरतीपर बरसाते हैं

হে ভারত! প্রাণের অধিপতি পবন মেঘের ঊর্ধ্বে অবস্থান করেন, আর মেঘস্থিত জলকে শক্র (ইন্দ্র) পৃথিবীতে বর্ষণ করেন।

Verse 37

आदत्ते च रसान्‌ भौमानादित्य: स्वगभस्तिभि: । वायुरादित्यतस्तांश्व रसान्‌ देव: प्रवर्षति,सूर्य अपनी किरणोंसे पृथ्वीके रसोंको ग्रहण करते हैं। वायुदेव सूर्यसे उन रसोंको लेकर फिर भूमिपर बरसाते हैं

সূর্য নিজের কিরণে পৃথিবীর রস (আর্দ্রতা) গ্রহণ করেন। তারপর দেবতা বায়ু সূর্য থেকে সেই রস নিয়ে আবার ভূমিতে বর্ষণ করান।

Verse 38

तद्‌ यदा मेघतो वारि पतितं भवति क्षितौ | तदा वसुमती देवी स्निग्धा भवति भारत,भरतनन्दन! इस प्रकार जब मेघसे पृथ्वीपर जल गिरता है, तब पृथ्वीदेवी स्निग्ध (गीली) होती है

হে ভারতনন্দন! এভাবে যখন মেঘ থেকে জল ভূমিতে পতিত হয়, তখন দেবী বসুমতী স্নিগ্ধ—অর্থাৎ সিক্ত—হয়ে ওঠেন।

Verse 39

ततः सस्यानि रोहन्ति येन वर्तयते जगत्‌ | मांसमेदो<5स्थिशुक्राणां प्रादुर्भावस्तत: पुन:

তারপর সেই সিক্ত ভূমি থেকে শস্য অঙ্কুরিত হয়; সেই উৎপাদনেই জগৎ ধারণ হয়। আবার সেই অন্ন থেকেই জীবদেহে মাংস, মেদ, অস্থি ও শুক্রের প্রকাশ ঘটে।

Verse 40

सम्भवन्ति तत: शुक्रात्‌ प्राणिन: पृथिवीपते । अग्नीषोमौ हि तच्छुक्रे सृजतः पुष्यतश्न ह,पृथ्वीनाथ! उस वीर्यसे प्राणी उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार अग्नि और सोम उस वीर्यकी सृष्टि और पुष्टि करते हैं

হে পৃথিবীপতি, সেই শুক্র থেকেই প্রাণীদের জন্ম হয়। সত্যই, অগ্নি ও সোম সেই বীজে বিদ্যমান; তারা তাকে সৃষ্টি করে এবং পুষ্টও করে।

Verse 41

एवमन्नाद्धि सूर्यश्ष पवन: शुक्रमेव च । एक एव स्मृतो राशिस्ततो भूतानि जज्ञिरे,इस तरह सूर्य, वायु और वीर्य एक ही राशि हैं जो अन्नसे प्रकट हुए हैं। उन्हींसे समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है

এইভাবে অন্ন থেকেই সূর্য, বায়ু এবং শুক্র—সবই প্রকাশ পায়। এগুলিকে একটিই ‘রাশি’ বা একক উৎস বলে স্মরণ করা হয়; আর সেই উৎস থেকেই সকল প্রাণীর জন্ম।

Verse 42

प्राणान्‌ ददाति भूतानां तेजश्न भरतर्षभ । गृहमभ्यागतायाथ यो दद्यादन्नमर्थिने,भरतश्रेष्ठ) जो घरपर आये हुए याचकको अन्न देता है, वह सब प्राणियोंको प्राण और तेजका दान करता है

হে ভরতশ্রেষ্ঠ, যে ব্যক্তি গৃহে আগত প্রার্থনাকারীকে অন্ন দান করে, সে সকল প্রাণীর প্রাণ ও তেজ দান করে।

Verse 43

भीष्म उवाच नारदेनैवमुक्तो5हमदामन्नं सदा नृप । अनसूयुस्त्वमप्यन्नं तस्माद्‌ देहि गतज्वर:

ভীষ্ম বললেন—হে নৃপ, নারদ আমাকে এভাবে অন্নদানের মাহাত্ম্য বলার পর থেকে আমি সর্বদা অন্ন দান করে এসেছি। অতএব তুমিও নিন্দা-দৃষ্টি ও ঈর্ষা ত্যাগ করে অন্ন দান কর; তোমার দুঃখজ্বর দূর হোক।

Verse 44

दत्त्वान्नं विधिवद्‌ राजन विप्रेभ्यस्त्वमिति प्रभो | यथावदनुरूपेभ्यस्तत: स्वर्गमवाप्स्यसि,राजन! प्रभो! तुम सुयोग्य ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक अन्नका दान करके उसके पुण्यसे स्वर्गलोकको प्राप्त कर लोगे

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, হে প্রভু! বিধিপূর্বক যোগ্য ব্রাহ্মণদের অন্ন দান করলে, সেই দানের পুণ্যে তুমি স্বর্গলোক লাভ করবে।

Verse 45

अन्नदानां हि ये लोकास्तांस्त्वं शूणु जनाधिप । भवनानि प्रकाशन्ते दिवि तेषां महात्मनाम्‌

ভীষ্ম বললেন—হে জনাধিপ! অন্নদানকারীদের যে যে লোক প্রাপ্ত হয়, তা তুমি শোনো। স্বর্গে সেই মহাত্মা দাতাদের গৃহসমূহ দীপ্ত হয়ে প্রকাশিত থাকে।

Verse 46

तारासंस्थानि रूपाणि नानास्तम्भान्वितानि च । चन्द्रमण्डलशुभ्राणि किंकिणीजालवन्ति च

সেই গৃহগুলির আকৃতি তারার মতো দীপ্ত, নানাবিধ স্তম্ভে অলংকৃত। চন্দ্রমণ্ডলের ন্যায় শুভ্র উজ্জ্বল, আর তাতে ক্ষুদ্র ঘণ্টিকার জাল ঝুলে থাকে।

Verse 47

तरुणादित्यवर्णानि स्थावराणि चराणि च । अनेकशतभौमानि सान्तर्जलचराणि च

তাদের মধ্যে কতক গৃহ প্রভাতসূর্যের ন্যায় রক্তিম দীপ্তিতে উজ্জ্বল; কতক স্থির, আর কতক বিমানসম চলমান। তাতে শত শত কক্ষ ও তল থাকে; এবং সেই গৃহের ভিতরে জলচরসহ জলাশয়ও থাকে।

Verse 48

वैदूर्यार्फप्रकाशानि रौप्पयरुक्ममयानि च । सर्वकामफलाश्लापि वृक्षा भवनसंस्थिता:

কতক গৃহ বৈদূর্যমণির দীপ্তির মতো সূর্যসম উজ্জ্বল; কতক রৌপ্য ও স্বর্ণনির্মিত। সেই ভবনগুলিতে বহু বৃক্ষ শোভা পায়, যা সকল কাম্য ফল প্রদান করে।

Verse 49

वाप्यो वीथ्य: सभा: कूपा दीर्घिकाश्वैव सर्वश: । घोषवन्ति च यानानि युक्तान्यथ सहस्रश:

সেই সব নিবাসে সর্বত্র সোপান-কূপ (বাওড়ি) ও পথ-গলি, সভাগৃহ, কূপ এবং দীর্ঘ দীঘি ছিল; আর গভীর গর্জনধ্বনি তুলতে থাকা সহস্র সহস্র জোতা রথাদি যানও ছিল।

Verse 50

भक्ष्यभोज्यमया: शैला वासांस्याभरणानि च । क्षीरं स्रवन्ति सरितस्तथा चैवान्नपर्वता:,वहाँ भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंके पर्वत, वस्त्र और आभूषण हैं। वहाँकी नदियाँ दूध बहाती हैं। अन्नके पर्वतोपम ढेर लगे रहते हैं

সেখানে ভক্ষ্য-ভোজ্য দ্রব্যের পর্বত, বস্ত্র ও অলংকার আছে। সেখানকার নদীগুলি দুধ বয়ে চলে, আর শস্যের স্তূপ পর্বতের মতো উঁচু হয়ে থাকে।

Verse 51

प्रासादा: पाण्डुराभ्राभा: शय्याश्व॒ काज्चनोज्ज्वला: । तान्यन्नदा: प्रपद्यन्ते तस्मादन्नप्रदो भव

সেখানে শ্বেত মেঘের মতো উজ্জ্বল প্রাসাদ এবং স্বর্ণদীপ্ত শয্যা শোভা পায়। সেই মহলগুলি অন্নদাতাদেরই প্রাপ্য; অতএব তুমিও অন্নপ্রদাতা হও।

Verse 52

एते लोका: पुण्यकृता अन्नदानां महात्मनाम्‌ | तस्मादन्नं प्रयत्नेन दातव्यं मानवैर्भुवि

এই পুণ্যজাত লোকসমূহ অন্নদানকারী মহাত্মাদেরই প্রাপ্য। অতএব এই পৃথিবীতে মানুষের উচিত যত্নসহকারে অন্ন দান করা।

Verse 63

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अन्नदानप्रशंसायां त्रिषष्टितमो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें अन्नदानकी प्रशंसाविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে অন্নদান-প্রশংসা বিষয়ক তেষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira asks why pānīya-dāna (donation of water) is described as paramount and of great fruit, seeking an expanded, reasoned account rather than a brief assertion.

The highest charity is measured by sustaining life: food sustains beings directly, yet water is the enabling condition for food and for all biological and social processes; therefore water-giving is positioned as foundational welfare.

Yes. Regular water-giving is associated with prosperity, reputation, longevity, freedom from negative consequences, and attainment of enduring worlds; the teaching frames these outcomes as the ethical ‘fruit’ of supporting life’s prerequisites.