
अन्नदान-प्रशंसा (Praise of the Gift of Food) | Annadāna-Praśaṃsā
Upa-parva: Dāna-dharma Anuśāsana (Food-Gift Discourse Unit)
Yudhiṣṭhira asks which gifts a king intent on giving should offer to highly qualified brāhmaṇas, how such recipients are pleased, and what fruits arise in this world and beyond. Bhīṣma replies that Nārada had earlier addressed this question and relays Nārada’s doctrine: food (anna) is praised by devas and ṛṣis as the foundation of ritual (yajña), social order, and life itself. The chapter repeatedly asserts annadāna’s unsurpassed status—no gift equals it—because prāṇa and worldly functioning rest on nourishment. Norms of giving include honoring the weary traveler and the elderly guest, abandoning anger and envy, and not despising any petitioner; the merit of a gift does not perish even if given to socially marginal figures. The text recommends giving without interrogating a brāhmaṇa’s lineage or learning when he begs for food, and it frames annadāna as producing both immediate goodwill and long-range merit (including described heavenly abodes). A cosmological account links rain, crops, bodily vitality, and procreation to food, concluding that the wise should give food across the three worlds’ moral economy.
Chapter Arc: युधिष्ठिर का कौतूहल जाग उठता है—‘वह कौन-सा दान है जो दाता का अनुगमन करता है?’ और वे भीष्म से दान-धर्म का रहस्य स्पष्ट करने की प्रार्थना करते हैं। → भीष्म दान की सूक्ष्म कसौटियाँ रखते हैं: भय-निवारण, संकट में अनुग्रह, याचक की तृषा/आवश्यकता के अनुसार इच्छित वस्तु देना, और ऐसा दान जो देकर भी ‘मैंने दिया’ का अहं न जगाए। साथ ही वे ब्राह्मणों के सत्कार की अनिवार्यता बताते हैं—क्षत्रिय का तेज और तप भी ब्राह्मण-तपस्या के सामने शान्त हो जाता है; और क्रुद्ध ब्राह्मण ‘आशीविष’ समान हो सकते हैं। → भीष्म सत्य-प्रतिज्ञा के स्वर में घोषणा करते हैं कि ब्राह्मणों के प्रति किए गए उपकारों पर उन्हें कोई पश्चात्ताप नहीं—उसी सत्य के बल पर वे शान्तनु के लोकों की ओर गमन की कामना करते हैं; दान का सर्वोच्च रूप वही है जो दाता के साथ चलता है और दाता के भीतर ‘दत्तं मन्येत’—देकर भी न देने का भाव—उत्पन्न कर दे। → अध्याय दान-धर्म का निष्कर्ष देता है: श्रेष्ठ दान वह है जो अभय, करुणा, याचक-हित और अहं-शून्यता से युक्त हो; और समाज-धर्म की धुरी ब्राह्मण-सत्कार तथा उनके प्रति सावधानी/मर्यादा है। → भीष्म संकेत करते हैं कि आगे वे ‘सनातन धार्मिक व्यवहार’ और वर्ण-व्यवहार की परंपरागत मर्यादाओं का विस्तार से निरूपण करेंगे।
Verse 1
ऑपनआक्ाा बछ। आर: 2 एकोनषशष्टितमो< ध्याय: भीष्मद्वारा उत्तम दान तथा उत्तम ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करते हुए उनके सत्कारका उपदेश युधिछिर उवाच यानीमानि बहिर्वेद्यां दानानि परिचक्षते | तेभ्यो विशिष्ट कि दानं मतं ते कुरुपुंगव
যুধিষ্ঠির বললেন—হে কুরুশ্রেষ্ঠ! বেদির বাইরে যে সব দানের কথা বলা হয়, সেগুলির মধ্যে আপনার মতে কোন দান সর্বশ্রেষ্ঠ?
Verse 2
कौतूहलं हि परम तत्र मे विद्यते प्रभो । दातारं दत्तमन्वेति यद् दान॑ तत् प्रचक्ष्व मे,प्रभो! इस विषयमें मुझे महान् कौतूहल हो रहा है; अतः जिस दानका पुण्य दाताका अनुसरण करता हो, वह मुझे बताइये
প্রভু! এ বিষয়ে আমার গভীর কৌতূহল জেগেছে; অতএব যে দানের পুণ্য দাতার অনুসরণ করে, সেই দানের কথা আমাকে বলুন।
Verse 3
भीष्म उवाच अभयं सर्वभूतेभ्यो व्यसने चाप्यनुग्रह: । यच्चाभिलषितं दद्यात् तृषितायाभियाचते
ভীষ্ম বললেন—সকল জীবকে অভয় দান করা উচিত এবং বিপদের সময়েও অনুগ্রহ দেখানো উচিত। আর যখন কোনো তৃষার্ত ব্যক্তি ভিক্ষা চাইতে আসে, তখন সামর্থ্য অনুযায়ী তার অভিলষিত বস্তু দিয়ে তার তৃষ্ণা সত্যিই নিবারণ করা উচিত।
Verse 4
दत्तं मन्येत यद् दत्त्वा तद् दान श्रेष्ठमुच्यते । दत्तं दातारमन्वेति यद् दानं भरतर्षभ
ভীষ্ম বললেন—হে ভারতশ্রেষ্ঠ! যে দান দান করে দাতা মনে করে, ‘এটি সত্যিই দান করা হয়েছে’, সেই দানই শ্রেষ্ঠ। আর যে দান একবার দেওয়ার পরও দাতাকে অনুসরণ করে—তার পুণ্যফল ও পরিণামসহ—সেই দানই প্রকৃত দান।
Verse 5
भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! सम्पूर्ण प्राणियोंकों अभयदान देना
ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! সকল প্রাণীকে অভয় দান করা, বিপদের সময় তাদের প্রতি অনুগ্রহ দেখানো, প্রার্থনাকারীকে তার অভীষ্ট বস্তু দেওয়া, আর তৃষ্ণায় কাতর হয়ে জল চাইলে তাকে জল পান করানো—এটাই পরম দান। আর যে দান দিয়ে মনে হয় ‘দেওয়া সম্পূর্ণ হলো’, যেখানে মমতার গন্ধও অবশিষ্ট থাকে না, সেই দানই শ্রেষ্ঠ; হে ভারতশ্রেষ্ঠ, সেই দানই দাতাকে অনুসরণ করে। আরও, স্বর্ণদান, গোদান ও ভূমিদান—এই তিনটি পবিত্র দান; এগুলি দুষ্কর্মীকে পর্যন্ত পাপের ফল থেকে পার করে দেয়।
Verse 6
एतानि पुरुषव्याप्र साधुभ्यो देहि नित्यदा | दानानि हि नरं पापान्मोक्षयन्ति न संशय:
হে পুরুষব্যাঘ্র! এই দানগুলি সদা সাধুজনদেরই দিও। দান মানুষকে পাপ থেকে মুক্ত করে—এতে কোনো সন্দেহ নেই।
Verse 7
यद् यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दयितं गृहे । तत् तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता
ভীষ্ম বললেন—জগতে যা যা সর্বাধিক প্রিয়, আর নিজের ঘরে যা যা হৃদয়প্রিয়—সেই সেই বস্তুই গুণবান ব্যক্তিকে দান করা উচিত। যে নিজের দানের ফল অক্ষয় করতে চায়, তার জন্য এটাই যথার্থ পথ।
Verse 8
प्रियाणि लभते नित्यं प्रियद: प्रियकृत् तथा । प्रियो भवति भूतानामिह चैव परत्र च
ভীষ্ম বললেন—যে অন্যকে প্রিয় বস্তু দান করে এবং তাদের প্রিয় কাজ করে, সে সর্বদা প্রিয় বস্তুই লাভ করে। সে ইহলোক ও পরলোক—উভয়ত্রই—সকল প্রাণীর প্রিয় হয়ে ওঠে।
Verse 9
याचमानमभीमानादनासक्तमकिंचनम् । यो नार्चति यथाशक्ति स नृशंसो युधिष्ठिर,युधिष्ठि!! जो आसक्तिरहित अकिंचन याचकका अहंकारवश अपनी शक्तिके अनुसार सत्कार नहीं करता है, वह मनुष्य निर्दयी है
ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! যে ব্যক্তি অহংকারবশত আসক্তিহীন, নিঃস্ব প্রার্থনাকারীকে নিজের সামর্থ্য অনুযায়ী সম্মান করে না, সে নিষ্ঠুর।
Verse 10
अमित्रमपि चेद् दीनं शरणैषिणमागतम् | व्यसने यो<नुगृह्नाति स वै पुरुषसत्तम:,शत्रु भी यदि दीन होकर शरण पानेकी इच्छासे घरपर आ जाय तो संकटके समय जो उसपर दया करता है, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ है
ভীষ্ম বললেন—শত্রুও যদি দীন হয়ে আশ্রয়প্রার্থী হয়ে আসে, বিপদের সময় যে তাকে অনুগ্রহ করে, সেই-ই পুরুষোত্তম।
Verse 11
कृशाय कृतविद्याय वृत्तिक्षीणाय सीदते | अपहन्यात् क्षुधां यस्तु न तेन पुरुष: सम:
ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি বিদ্বান হয়েও জীবিকা ক্ষীণ হয়ে কৃশ, দীন ও দুঃখে নিমজ্জিত, তার ক্ষুধা যে নিবারণ করে—তার সমান পুণ্যবান আর কেউ নেই।
Verse 12
क्रियानियमितान् साधुन् पुत्रदारैश्व॒ कर्शितान् अयाचमानान् कौन्तेय सर्वोपायैर्निमन्त्रयेत्
ভীষ্ম বললেন—হে কৌন্তেয়! যারা সৎকর্মে নিয়মনিষ্ঠ, কিন্তু স্ত্রী-পুত্রের ভারে ক্লিষ্ট, তবু কারও কাছে ভিক্ষা করে না—এমন সাধুজনকে সর্ব উপায়ে আহ্বান করে সাহায্য করা উচিত।
Verse 13
आशिषं ये न देवेषु न च मर्त्येषु कुर्वते । अर्लन्तो नित्यसंतुष्टास्तथा लब्धोपजीविन:
ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! যারা দেবতা বা মানুষের কাছে কিছুই কামনা করে না, অল্পেচ্ছু, সদা সন্তুষ্ট এবং যা মেলে তাই দিয়ে জীবনধারণ করে—এমন পূজনীয় শ্রেষ্ঠ দ্বিজদের দূতদের দ্বারা খুঁজে এনে নিমন্ত্রণ করো। হে ভারত! তারা দুঃখে পড়লে বিষধর সাপের মতো ভয়ংকর হয়ে ওঠে; অতএব তাদের যথোচিত সম্মানে নিজেকে রক্ষা করো। হে কুরুনন্দন! দাস-পরিচারক ও প্রয়োজনীয় সামগ্রীসমৃদ্ধ সুখদ গৃহে এনে প্রতিদিন পূর্ণ আতিথ্য দাও।
Verse 14
आशीविषसमेभ्यश्ष तेभ्यो रक्षस्व भारत । तान् युक्तैरुपजिज्ञास्यस्तथा द्विजवरोत्तमान्
ভীষ্ম বললেন—হে ভারত (যুধিষ্ঠির)! বিষধর সাপের মতো যাঁরা, এমন লোকদের থেকে নিজেকে রক্ষা করো। যোগ্য দূতদের দ্বারা সেই শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণ-ঋষিদের খোঁজ নাও—যাঁরা দেবতা বা মানুষের কাছে কিছুই কামনা করেন না, সদা সন্তুষ্ট থাকেন, আর যা অযাচিতভাবে আসে তাই দিয়ে জীবনধারণ করেন। তাঁদের খুঁজে নিমন্ত্রণ করো এবং প্রতিদিন পূর্ণ আতিথ্য ও সম্মানে তাঁদের সেবা করো; কারণ এমন পূজনীয় তপস্বীরা কষ্ট পেলে বিষধর সাপের মতো ভয়ংকর হয়ে ওঠেন। অতএব দাস-পরিচারক ও প্রয়োজনীয় সামগ্রীসহ, সর্বকাম-সুখদায়ক গৃহ-আসনে তাঁদের নিত্য সমাদর করো।
Verse 15
कृतैरावस थेैरननित्य॑ संप्रेष्यै: सपरिच्छदै: । निमन्त्रयेथा: कौरव्य सर्वकामसुखावहै:
ভীষ্ম বললেন—হে কৌরব্য (যুধিষ্ঠির)! দূত পাঠিয়ে সেই পূজনীয় ব্রাহ্মণ-ঋষিদের খোঁজ নাও—যাঁরা দেবতা বা মানুষের কাছে কিছুই চান না, সদা সন্তুষ্ট থাকেন এবং অযাচিত যা আসে তাই দিয়ে জীবনধারণ করেন। আগে থেকেই প্রস্তুত আবাস, প্রয়োজনীয় সামগ্রী ও পরিচারকসহ—যা সকল ন্যায্য আরাম-সুখ আনে—তেমন ব্যবস্থায় তাঁদের নিমন্ত্রণ করো। তাঁদের নিত্য সত্কার করো; কারণ তাঁরা কষ্ট পেলে বিষধর সাপের মতো ভয়ংকর হয়ে ওঠেন—অতএব সম্মান দ্বারাই আত্মরক্ষা করো।
Verse 16
यदि ते प्रतिगृह्नीयु: श्रद्धापूतं युधिष्ठिर । कार्यमित्येव मन्वाना धार्मिका: पुण्यकर्मिण:
হে যুধিষ্ঠির! যদি তোমার দান শ্রদ্ধায় পবিত্র হয় এবং কেবল কর্তব্যবুদ্ধি থেকেই করা হয়, তবে পুণ্যকর্মে রত সেই ধর্মাত্মা পুরুষেরা তাকে ‘কর্তব্য’ জেনে গ্রহণ করবেন।
Verse 17
विद्यास्नाता व्रतस्नाता ये व्यपाश्रित्य जीविन: । गूढस्वाध्यायतपसो ब्राह्मणा: संशितव्रता:
ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! যে ব্রাহ্মণেরা বিদ্যায় স্নাত ও ব্রতাচরণে পরিশুদ্ধ; যারা কোনো ধনীর আশ্রয় না নিয়ে জীবনধারণ করে; যারা নিজেদের স্বাধ্যায় ও তপস্যা গোপন রাখে; এবং কঠোর ব্রতে অবিচল—এমন শুদ্ধ, ইন্দ্রিয়সংযমী, নিজ ধর্মপত্নীতেই সন্তুষ্ট পুরুষদের জন্য তুমি যা কিছু করবে, তা এই জগতে তোমার কল্যাণ সাধন করবে।
Verse 18
तेषु शुद्धेषु दान्तेषु स्वदारपरितोषिषु । यत् करिष्यसि कल्याण तत् ते लोके युधाम्पते
ভীষ্ম বললেন—হে যুধাম্পতি! যে ব্রাহ্মণেরা শুদ্ধ, দান্ত (ইন্দ্রিয়সংযমী) এবং নিজ ধর্মপত্নীতেই সন্তুষ্ট—তাঁদের প্রতি তুমি যে কোনো কল্যাণকর কর্ম করবে, তা এই জগতে তোমার কল্যাণের কারণ হবে।
Verse 19
यथान्निहोत्रं सुहुतं सायंप्रातर्द्धिजातिना । तथा दत्तं द्विजातिभ्यो भवत्यथ यतात्मसु
ভীষ্ম বললেন—যেমন সন্ধ্যা ও প্রাতে দ্বিজের দ্বারা বিধিপূর্বক অর্পিত অগ্নিহোত্র যথোচিত ফল দেয়, তেমনই আত্মসংযমী দ্বিজদেরকে প্রদত্ত দানও সেই একই পুণ্যফল উৎপন্ন করে।
Verse 20
एष ते विततो यज्ञ: श्रद्धापूत: सदक्षिण: । विशिष्ट: सर्वयज्ञेभ्यो ददतस्तात वर्तताम्
ভীষ্ম বললেন—হে প্রিয়! তোমার এই বিস্তৃত দান-যজ্ঞ শ্রদ্ধায় পবিত্র এবং যথোচিত দক্ষিণায় সমৃদ্ধ। এটি সকল যজ্ঞের চেয়ে শ্রেষ্ঠ। দান করতে করতে তোমার এই যজ্ঞ চিরকাল প্রবহমান থাকুক।
Verse 21
निवापदानसलिलस्तादृशेषु युधिष्ठिर । निवसन् पूजयंश्लैव तेष्वानृण्यं नियच्छति
ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! যে ব্যক্তি এমন লোকদেরকে দানরূপ জল দিয়ে তर्पণের ন্যায় তৃপ্ত করে, তাদেরকে আশ্রয় দিয়ে সম্মানসহ পূজা করে, সে দেবতা প্রভৃতির ঋণ থেকে মুক্তি লাভ করে। অতএব পূর্বোক্ত ব্রাহ্মণদেরকে দান-জলে সন্তুষ্ট রাখো, বাসস্থান ও আদর দাও।
Verse 22
य एवं नैव कुप्यन्ते न लुभ्यन्ति तृणेष्वपि । त एव नः पूज्यतमा ये चापि प्रियवादिन:
ভীষ্ম বললেন—যারা কখনও ক্রুদ্ধ হয় না, তৃণসম তুচ্ছ বস্তুর জন্যও লোভ করে না, এবং মধুর ও প্রিয় বাক্য বলে—তারাই আমাদের কাছে পরম পূজ্য।
Verse 23
एते न बहु मन्यन्ते न प्रवर्तन्ति चापरे । पुत्रवत् परिपाल्यास्ते नमस्तेभ्यस्तथाभयम्
ভীষ্ম বললেন—এরা (ব্রাহ্মণরা) অধিক কিছু মান্য করে না; আর তাদের মধ্যে কেউ কেউ ধনসঞ্চয়ের চেষ্টাতেও প্রবৃত্ত হয় না। এমন ব্রাহ্মণদেরকে পুত্রসম পালন করা উচিত। তাদের প্রতি বারংবার নমস্কার; তাদের দিক থেকে আমাদের কোনো ভয় নেই।
Verse 24
ऋ्विक्पुरोहिताचार्या मृदुब्रह्म॒धरा हि ते । क्षात्रेणापि हि संसृष्टं तेज: शाम्यति वै द्विजे
ঋত্বিক, পুরোহিত ও আচার্য—এরা সাধারণত মৃদুস্বভাব এবং বেদবিদ্যার ধারক। ক্ষত্রিয়ের তেজও ব্রাহ্মণের সংস্পর্শে এলে প্রশমিত হয়ে যায়।
Verse 25
अस्ति मे बलवानस्मि राजास्मीति युधिष्ठिर । ब्राह्मणान् मा च पर्यश्रीवसोभिरशनेन च
হে যুধিষ্ঠির, ‘আমার ধন আছে, আমি বলবান, আমি রাজা’—এই ভাব যেন না ওঠে। এমন অহংকারে ব্রাহ্মণদের অবজ্ঞা করে একা নিজের জন্য অন্ন ও বস্ত্র ভোগ কোরো না।
Verse 26
यच्छो भार्थ बलार्थ वा वित्तमस्ति तवानघ । तेन ते ब्राह्मणा: पूज्या: स्वधर्ममनुतिष्ठता
হে অনঘ, তোমার কাছে যে ধন আছে—দেহ ও গৃহের শোভা বাড়াতে কিংবা বল বৃদ্ধি করতে—সেই ধন দ্বারাই স্বধর্ম পালন করতে করতে ব্রাহ্মণদের পূজা ও প্রতিপালন করো।
Verse 27
नमस्कार्यास्तिथा विप्रा वर्तमाना यथातथम् । यथासुखं यथोत्साहं ललन्तु त्वयि पुत्रवत्
তোমার উচিত সেই ব্রাহ্মণদের সর্বদা প্রণাম করা। তারা নিজেদের রুচি অনুযায়ী যেমন ইচ্ছা তেমনই থাকুক। পুত্রসম স্নেহ পেয়ে তোমার আশ্রয়ে তারা যেন সুখে ও উৎসাহে আনন্দিত হয়ে বাস করে—এমন চেষ্টা করো।
Verse 28
को ह्ाक्षयप्रसादानां सुहृदामल्पतोषिणाम् । वृत्तिम् त्यवक्षेप्तुं त्ववन्य: कुरुसत्तम
হে কুরুশ্রেষ্ঠ, যাদের প্রসাদ অক্ষয়, যারা স্বভাবতই সকলের হিতৈষী এবং অল্পেই সন্তুষ্ট—এমন ব্রাহ্মণদের জীবিকা জোগাবে তোমাকে ছাড়া আর কে?
Verse 29
यथा पत्याश्रयो धर्म: स्त्रीणां लोके सनातन: । सदैव सा गतिर्नान्या तथास्माकं द्विजातय:
ভীষ্ম বললেন—যেমন এই জগতে নারীদের সনাতন ধর্ম সর্বদা স্বামীর আশ্রয়েই প্রতিষ্ঠিত, তেমনি আমাদের জন্য দ্বিজগণই চিরকাল আশ্রয়। তাঁদের ব্যতীত আমাদের আর কোনো আশ্রয় নেই।
Verse 30
यदि नो ब्राह्मणास्तात संत्यजेयुरपूजिता: । पश्यन्तो दारुणं कर्म सततं क्षत्रिये स्थितम्
ভীষ্ম বললেন—হে তাত, যদি আমাদের ব্রাহ্মণগণ অপ্রতিপূজিত থেকে, ক্ষত্রিয়ের নিত্য কঠোর কর্মধারা দেখে আমাদের পরিত্যাগ করেন, তবে (আমাদের মঙ্গল বিপন্ন হবে)।
Verse 31
अवेदानामयज्ञानामलोकानामवर्तिनाम् | कस्तेषां जीवितेनार्थस्त्वां विना ब्राह्मणाश्रयम्
যারা বেদবিহীন, যজ্ঞবিহীন এবং ধর্মপথে অবর্তমান—তাদের জীবনেরই বা কী অর্থ, বিশেষত যখন তারা তোমাকে ছাড়া থাকে, হে ব্রাহ্মণাশ্রয়?
Verse 32
तात! यदि ब्राह्मण क्षत्रियोंके द्वारा सम्मानित न हों तथा क्षत्रियमें सदा रहनेवाले निष्ठर कर्मको देखकर ब्राह्मण भी उनका परित्याग कर दें तो वे क्षत्रिय वेद
ভীষ্ম বললেন—হে তাত, যদি ক্ষত্রিয়েরা ব্রাহ্মণদের সম্মান না করে এবং ক্ষত্রিয়ের নিত্য নিষ্ঠুর কর্ম দেখে ব্রাহ্মণরাও তাদের পরিত্যাগ করেন, তবে সেই ক্ষত্রিয়েরা বেদ, যজ্ঞ, উত্তম লোক এবং জীবিকাও হারাবে। তখন ব্রাহ্মণাশ্রয় গ্রহণকারী তোমাকে ছাড়া অন্য ক্ষত্রিয়দের জীবিত থাকারই বা কী প্রয়োজন? আমি সনাতন ধর্ম অনুসারে তোমার অন্নজল-রক্ষণ করব; কারণ প্রাচীনকালে, হে রাজন, ক্ষত্রিয়েরা ব্রাহ্মণদের সেবা করত।
Verse 33
दूराच्छूद्रेणोपचर्यो ब्राह्मणो5ग्निरिव ज्वलन्
ভীষ্ম বললেন—অগ্নির মতো প্রজ্বলিত ব্রাহ্মণকে শূদ্রের উচিত দূর থেকেই সেবা করা।
Verse 34
संस्पर्शपरिचर्यस्तु वैश्येन क्षत्रियेण च । ब्राह्मण अग्निके समान तेजस्वी हैं; अतः शूद्रको दूरसे ही उनकी सेवा करनी चाहिये। उनके शरीरके स्पर्शपूर्वक सेवा करनेका अधिकार केवल क्षत्रिय और वैश्यको ही है ।।
ভীষ্ম বললেন— দেহ-স্পর্শসহ পরিচর্যা কেবল ক্ষত্রিয় ও বৈশ্যেরই অধিকার। ব্রাহ্মণরা অগ্নিসদৃশ তেজস্বী বলে গণ্য; অতএব শূদ্রের উচিত দূর থেকেই তাঁদের সেবা করা। দেহ-স্পর্শ করে সেবার অধিকার শুধু ক্ষত্রিয় ও বৈশ্যের। (তাঁরা) স্বভাবে কোমল, আচরণে সত্যনিষ্ঠ এবং সত্যধর্ম পালনে অবিচল।
Verse 35
अपरेषां परेषां च परेभ्यश्षापि ये परे,छोटे-बड़े और बड़ोंसे भी बड़े जो क्षत्रिय तेज और बलसे तप रहे हैं, उन सबके तेज और तप ब्राह्मणोंके पास जाते ही शान्त हो जाते हैं
ভীষ্ম বললেন— যারা ক্ষুদ্র, যারা বৃহৎ, এবং যারা বৃহত্তরদেরও ঊর্ধ্বে—সেই ক্ষত্রিয়েরা নিজেদের তেজ ও বলের উত্তাপে দগ্ধের মতো জ্বলে ওঠে; কিন্তু ব্রাহ্মণদের সান্নিধ্য ও পরিসরে এলেই তাদের সকলের তেজ ও তপ শান্ত হয়ে যায়।
Verse 36
क्षत्रियाणां प्रतपतां तेजसा च बलेन च | ब्राह्मणेष्वेव शाम्यन्ति तेजांसि च तपांसि च
তেজ ও বলের উত্তাপে জ্বলে ওঠা ক্ষত্রিয়দের তেজ ও তপ ব্রাহ্মণদের সান্নিধ্যে এলেই শান্ত হয়ে যায়।
Verse 37
न मे पिता प्रियतरो न त्वं तात तथा प्रिय: । न मे पितु: पिता राजन् न चात्मा न च जीवितम्
আমার কাছে পিতার চেয়ে প্রিয় কেউ নেই; আর হে তাত, তুমিও তেমনি প্রিয়। কিন্তু হে রাজন, না আমার পিতার পিতা, না আমার নিজের আত্মা, না-ই বা আমার জীবন—(ধর্মের) চেয়ে অধিক প্রিয়।
Verse 38
तात! मुझे ब्राह्मण जितने प्रिय हैं, उतने मेरे पिता, तुम, पितामह, यह शरीर और जीवन भी प्रिय नहीं हैं ।।
তাত! ব্রাহ্মণরা আমার কাছে যত প্রিয়, তত প্রিয় নয় আমার পিতা, তুমি, পিতামহ, এই দেহ কিংবা জীবনও। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! এই পৃথিবীতে তোমার চেয়ে প্রিয় আমার আর কেউ নেই; তবু ব্রাহ্মণরা তোমার চেয়েও অধিক প্রিয়।
Verse 39
ब्रवीमि सत्यमेतच्च यथाहं पाण्डुनन्दन । तेन सत्येन गच्छेयं लोकान् यत्र च शान्तनु:
হে পাণ্ডুনন্দন! আমি যাথার্থ্য সত্যই বলছি। সেই সত্যের প্রভাবে আমি যেন সেই সকল লোক প্রাপ্ত হই, যেখানে আমার পিতা শান্তনু গমন করেছেন।
Verse 40
पश्येयं च सतां लोकान् शुचीन् ब्रह्मपुरस्कृतान् | तत्र मे तात गन्तव्यमहद्बाय च चिराय च
এই সত্যের প্রভাবে আমি সৎপুরুষদের সেই পবিত্র লোকসমূহ দর্শন করছি, যেখানে ব্রাহ্মণগণ ও ব্রহ্মার প্রাধান্য। হে তাত! অচিরেই চিরকালের জন্য আমাকে সেখানেই গমন করতে হবে।
Verse 41
सो5हमेतादृशाल्लॉकान् दृष्टवा भरतसत्तम | यन्मे कृतं ब्राह्मणेषु न तप्ये तेन पार्थिव
হে ভরতশ্রেষ্ঠ, হে পৃথিবীনাথ! ব্রাহ্মণদের জন্য আমি যা করেছি তার ফলস্বরূপ এমন পুণ্যলোক দর্শন করে আমি তৃপ্ত হয়েছি। অতএব, রাজন, আমি শোক করি না, ‘আর কোনো পুণ্যকর্ম কেন করিনি’—এই ভাবনায়ও দগ্ধ হই না।
Verse 58
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बगीचा लगाने और तालाब बनानेका वर्णन नामक जअद्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে ‘উদ্যান রোপণ ও পুকুর নির্মাণের বর্ণনা’ নামক অষ্টপঞ্চাশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 59
इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकोनषष्टितमो5ध्याय:
ইতি শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে একষট্টিতম অধ্যায়।
Verse 346
आशीविषानिव क्रुद्धांस्तानुपाचरत द्विजान् | ब्राह्मण स्वभावत: कोमल
ভীষ্ম বললেন—ক্রুদ্ধ দ্বিজ ব্রাহ্মণদের সেবা করো, যেন ক্রুদ্ধ বিষধর সাপের নিকট আচরণ করা হয়। ব্রাহ্মণরা স্বভাবে কোমল, সত্যবাদী এবং সত্যধর্মে অবিচল; কিন্তু ক্রোধে উদ্দীপ্ত হলে তারা বিষাক্ত সর্পের মতো ভয়ংকর হয়ে ওঠে। অতএব সর্বদা ব্রাহ্মণদের সেবা ও সম্মান বজায় রাখো।
Verse 3236
वैश्यो राजन्यमित्येव शूद्रो वैश्यमिति श्रुति: । राजन! अब मैं तुम्हें सनातन कालका धार्मिक व्यवहार कैसा है
ভীষ্ম বললেন—শ্রুতি বলে: ‘বৈশ্য ক্ষত্রিয়ের সেবা করত, আর শূদ্র বৈশ্যের।’ হে রাজন, এখন আমি তোমাকে সনাতন কালের ধর্মসম্মত সামাজিক আচারের রীতি বলছি। আমরা শুনেছি, প্রাচীন কালে ক্ষত্রিয়রা ব্রাহ্মণদের, বৈশ্যরা ক্ষত্রিয়দের এবং শূদ্ররা বৈশ্যদের সেবা করত।
Yudhiṣṭhira seeks a ranked guidance on giving: which dānas should be offered to qualified recipients and what measurable outcomes (immediate and posthumous) follow from such gifts.
Food-giving is presented as the most consequential form of charity because it sustains life, supports ritual and society, and should be practiced with humility—without contempt, anger, or invasive questioning of petitioners.
Yes: it repeatedly attributes concrete results to annadāna—prosperity, strength, reputation, and favorable posthumous states—culminating in descriptions of luminous heavenly abodes associated with food-givers.