
Bhūmi-dānasya Māhātmya (The Pre-eminence of Land-Gift)
Upa-parva: Dāna-Dharma Anuśāsana (Bhūmi-dāna Praśaṃsā Episode)
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to identify the unsurpassed gift amid scriptural injunctions that repeatedly commend giving. Bhīṣma answers by asserting the supremacy of bhūmi-dāna (land donation), describing earth as stable, inexhaustible, and a generative source of clothing, gems, livestock, and grain; thus, donating land is portrayed as encompassing multiple forms of charity. The chapter advances a merit-theory: the donor prospers for as long as the earth endures, gains durable fame, and is protected from punitive consequences; even serious wrongdoing is claimed to be purified through land-gift. The discourse specifies recipient ideals (notably learned, disciplined brāhmaṇas) and warns against retracting a promised or already-given grant, associating such reversal with severe demerit. A supporting exemplum narrates Indra’s question to Bṛhaspati about the gift that yields imperishable heavenly well-being; Bṛhaspati again prioritizes bhūmi-dāna, placing it above gold and cattle. The chapter concludes with a phala-oriented closure: land-gift yields lasting worlds, social honor, and ritual efficacy (including śrāddha recitation benefits), reinforcing dāna as both personal ethics and public policy.
Chapter Arc: युधिष्ठिर, कुरुकुल-श्रेष्ठ भीष्म से पूछते हैं—उद्यान लगाने और जलाशय बनवाने का फल क्या है? दानधर्म के सूक्ष्म मार्ग में यह ‘लोक-उपकार’ का प्रश्न बनकर उभरता है। → भीष्म क्रमशः बताते हैं कि तालाब/तड़ाग केवल मनुष्यों की सुविधा नहीं, बल्कि देव, गन्धर्व, पितर, नाग, राक्षस और स्थावर प्राणियों तक का आश्रय हैं—अर्थात् एक जलाशय अनेक लोकों को जोड़ने वाला पुण्य-केन्द्र है। फिर ऋतु-ऋतु तक जल टिके रहने के अनुसार फल की सीढ़ियाँ रखी जाती हैं, जिससे ‘कितना स्थायी उपकार’—यह निर्णायक कसौटी बनती है। → भीष्म का निर्णायक प्रतिपादन—जिसके तड़ाग में शिशिर तक जल रहे, उसे अग्निष्टोम-यज्ञ के तुल्य फल; और जो वसन्त तक प्यासों का महाश्रय बने, वह और भी उच्च यज्ञ-फल का अधिकारी। यहाँ कर्म का मूल्य ‘जीवों की निरन्तर तृप्ति’ से मापा जाता है। → वृक्षारोपण को भी उसी लोक-कल्याण की धारा में रखकर भीष्म कहते हैं—वृक्ष लगाने वाले के लिए वे वृक्ष पुत्र-तुल्य हैं और परलोक में अव्यय लोकों की प्राप्ति होती है। निष्कर्ष रूप में उपदेश आता है: तड़ाग बनवाओ, उद्यान लगाओ, यज्ञ करो और सत्य बोलो—ये चारों मिलकर मनुष्य का उज्ज्वल पथ बनाते हैं।
Verse 2
युधिष्ठिरने कहा--कुरुकुलपुंगव! भरतश्रेष्ठ! बगीचे लगाने और जलाशय बनवानेका जो फल होता है, उसीको अब मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ।।
যুধিষ্ঠির বললেন—কুরু-কুলপুঙ্গব! ভরতশ্রেষ্ঠ! উদ্যান রোপণ ও জলাশয় নির্মাণের যে ফল, তা এখন আমি আপনার মুখে শুনতে চাই। ভীষ্ম বললেন—রাজন! যে ভূমি দর্শনে মনোহর, শক্তিশালী ও উর্বর, বিচিত্র এবং নানা ধাতুতে ভূষিত, আর যেখানে সর্বপ্রকার জীবের বাস—এই ভূমিই এখানে শ্রেষ্ঠ বলে কথিত।
Verse 3
तस्या: क्षेत्रविशेषाश्व॒ तडागानां च बन्धनम् । औदकानि च सर्वाणि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वश:
এখন আমি ক্রমানুসারে ভূমির নানা প্রকার ও তাদের বিশেষ ক্ষেত্র, পুকুর নির্মাণ ও বাঁধ-বাঁধাই, এবং কূপ প্রভৃতি সকল জলকর্ম—এসবের প্রয়োজনীয় বিধান ব্যাখ্যা করব।
Verse 4
तडागानां च वक्ष्यामि कृतानां चापि ये गुणा: । त्रिषु लोकेषु सर्वत्र पूजनीयस्तडागवान्
নির্মিত পুকুর ও জলাধারের যে গুণফল, তাও আমি বর্ণনা করব। যে ব্যক্তি পুকুর নির্মাণ করে ও তা রক্ষা করে, সে ত্রিলোকে সর্বত্র পূজ্য হয়।
Verse 5
अथवा मित्रसदन मैत्र॑ मित्रविवर्धनम् । कीर्तिसंजनन श्रेष्ठ तडागानां निवेशनम्
অথবা পুকুর-জলাধার নির্মাণ বন্ধুর গৃহ প্রতিষ্ঠার মতোই উপকারী; তা মৈত্রীর কারণ, বন্ধুসমাজ বৃদ্ধি করে, এবং সুকীর্তি বিস্তারের শ্রেষ্ঠ উপায়।
Verse 6
धर्मस्यार्थस्य कामस्य फलमाहुर्मनीषिण: । तडागसुकृतं देशे क्षेत्रमेक॑ महाश्रयम्
মনীষীরা বলেন—দেশ বা গ্রামে একটি পুকুর নির্মাণের সৎকর্ম ধর্ম, অর্থ ও কাম—তিনেরই ফল দেয়; আর পুকুরে শোভিত সেই স্থান সর্বপ্রাণীর জন্য মহাশ্রয় হয়ে ওঠে।
Verse 7
चतुर्विधानां भूतानां तडागमुपलक्षयेत् तडागानि च सर्वाणि दिशन्ति श्रियमुत्तमाम्,तालाबको चारों प्रकारके प्राणियोंके लिये बहुत बड़ा आधार समझना चाहिये। सभी प्रकारके जलाशय उत्तम सम्पत्ति प्रदान करते हैं
পুকুরকে চার প্রকার জীবের জন্য মহা-আধার বলে গণ্য করা উচিত। সত্যই, সকল প্রকার জলাধার উৎকৃষ্ট সমৃদ্ধি দান করে।
Verse 8
देवा मनुष्यगन्धर्वा: पितरोरगराक्षसा: । स्थावराणि च भूतानि संश्रयन्ति जलाशयम्,देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पितर, नाग, राक्षस तथा समस्त स्थावर प्राणी जलाशयका आश्रय लेते हैं
দেবতা, মানুষ, গন্ধর্ব, পিতৃগণ, নাগ ও রাক্ষস—এমনকি সকল স্থাবর প্রাণীও জলাশয়ের আশ্রয় গ্রহণ করে।
Verse 9
तस्मात् तांस्ते प्रवक्ष्यामि तडागे ये गुणा: स्मृता: । या च तत्र फलावाप्तिऋषिभि: समुदाहता
অতএব, পুকুর সম্বন্ধে যে গুণাবলি স্মৃতিতে বর্ণিত আছে এবং ঋষিগণ যে ফলপ্রাপ্তির কথা ঘোষণা করেছেন—সেগুলি আমি তোমাকে বলছি।
Verse 10
वर्षाकाले तडागे तु सलिलं यस्य तिष्ठति । अग्निहोत्रफलं तस्य फलमाहुर्मनीषिण:,जिसके खोदवाये हुए तालाबमें बरसात भर पानी रहता है, उसके लिये मनीषी पुरुष अन्निहोत्रके फलकी प्राप्ति बताते हैं
যার খননকৃত পুকুরে বর্ষাকাল জুড়ে জল স্থির থাকে, জ্ঞানীগণ বলেন—তার প্রাপ্ত পুণ্য অগ্নিহোত্র যজ্ঞের ফলের সমান।
Verse 11
शरत्काले तु सलिलं तडागे यस्य तिष्ठति । गोसहस्रस्य स प्रेत्य लभते फलमुत्तमम्,जिसके तालाबमें शरत्कालतक पानी ठहरता है, वह मृत्युके पश्चात् एक हजार गोदानका उत्तम फल पाता है
যার পুকুরে শরৎকাল পর্যন্ত জল স্থির থাকে, সে মৃত্যুর পরে সহস্র গোদান-এর উত্তম ফল লাভ করে।
Verse 12
हेमनतकाले सलिलं तडागे यस्य तिष्ठति । स वै बहुसुवर्णस्य यज्ञस्य लभते फलम्,जिसके तालाबमें हेमनत (अगहन-पौष) तक पानी रुकता है, वह बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणासे युक्त महान् यज्ञके फलका भागी होता है
যার পুকুরে হেমন্তকাল পর্যন্ত জল স্থির থাকে, সে বহু স্বর্ণদক্ষিণাযুক্ত মহাযজ্ঞের ফল লাভ করে।
Verse 13
यस्य वै शैशिरे काले तडागे सलिलं भवेत् । तस्याग्निष्टोमयज्ञस्यथ फलमाहुर्मनीषिण:
ভীষ্ম বললেন—যার পুকুরে শীতঋতু (মাঘ-ফাল্গুন) পর্যন্ত জল থাকে, জ্ঞানীরা বলেন, সে অগ্নিষ্টোম যজ্ঞের সমান পুণ্যফল লাভ করে।
Verse 14
तडागं सुकृतं यस्य वसन्ते तु महाश्रयम् । अतितात्रस्य यज्ञस्य फलं स समुपाश्चुते
ভীষ্ম বললেন—যার নির্মিত সুসজ্জিত পুকুর বসন্তঋতু পর্যন্ত জল ধরে রেখে তৃষ্ণার্ত প্রাণীদের মহাশ্রয় হয়ে থাকে, সে ‘অতিরাত্র’ যজ্ঞের ফল লাভ করে।
Verse 15
निदाघकाले पानीयं तडागे यस्य तिष्ठति । वाजिमेधफलं तस्य फल वै मुनयो विदु:,जिसके तालाबमें ग्रीष्म ऋतुतक पानी रुका रहता है, उसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है--ऐसा मुनियोंका मत है
ভীষ্ম বললেন—যার পুকুরে গ্রীষ্মের তীব্র তাপেও জল স্থির থাকে, মুনিগণ বলেন, সে বাজিমেধ (অশ্বমেধ) যজ্ঞের সমান ফল লাভ করে।
Verse 16
स कुलं॑ तारयेत् सर्व यस्य खाते जलाशये । गाव: पिबन्ति सलिलं साधवश्नल नरा: सदा,जिसके खोदवाये हुए जलाशयमें सदा साधु पुरुष और गौएँ पानी पीती हैं, वह अपने समस्त कुलका उद्धार कर देता है
ভীষ্ম বললেন—যার খনন করানো জলাশয় থেকে সদা সাধুজন ও গাভী জল পান করে, সে তার সমগ্র কুলকে উদ্ধার করে।
Verse 17
तडागे यस्य गावस्तु पिबन्ति तृषिता जलम् | मृगपक्षिमनुष्याश्व सो5श्वमेधफलं लभेत्,जिसके तालाबमें प्यासी गौएँ पानी पीती हैं तथा मृग, पक्षी और मनुष्योंको भी जल सुलभ होता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है
ভীষ্ম বললেন—যার পুকুরে তৃষিত গাভী জল পান করে এবং যেখানে হরিণ, পাখি, মানুষ ও অশ্বেরও জল সহজলভ্য, সে অশ্বমেধ যজ্ঞের ফল লাভ করে।
Verse 18
यत् पिबन्ति जल तत्र स्नायन्ते विश्रमन्ति च । तडागे यस्य तत् सर्व प्रेत्यानन्त्याय कल्पते
ভীষ্ম বললেন—যাঁর পুকুরে লোকেরা জল পান করে, স্নান করে এবং বিশ্রাম নেয়, সেই সকল পুণ্যই পুকুর-স্বামীর ভাগে জমা হয়; মৃত্যুর পরে তা অক্ষয় কল্যাণের কারণ হয়।
Verse 19
दुर्लभ सलिलं तात विशेषेण परत्र वै पानीयस्य प्रदानेन प्रीतिर्भवति शाश्वती
ভীষ্ম বললেন—বৎস, জল দুর্লভ সম্পদ; বিশেষত পরলোকে তা আরও দুর্লভ। যারা পানীয় জল দান করে, তারা সেই জলদানের পুণ্যে সেখানে চিরস্থায়ী তৃপ্তি লাভ করে।
Verse 20
तिलान् ददत पानीयं दीपान् ददत जाग्रत । ज्ञातिभि: सह मोदध्वमेतत् प्रेत्य सुदुर्लभम्
ভীষ্ম বললেন—তিল দান করো, পানীয় জল দান করো, দীপ দান করো; কর্তব্যপথে সদা জাগ্রত থাকো। আত্মীয়স্বজনের সঙ্গে আনন্দ করো—কারণ মৃত্যুর পরে এমন সুযোগ অতি দুর্লভ।
Verse 21
बन्धुओ! तिलका दान करो, जल-दान करो, दीप-दान करो, सदा धर्म करनेके लिये सजग रहो तथा कुट॒म्बीजनोंके साथ सर्वदा धर्मपालनपूर्वक रहकर आनन्दका अनुभव करो। मृत्युके बाद इन सत्कर्मोंसे परलोकमें अत्यन्त दुर्लभ फलकी प्राप्ति होती है ।।
ভীষ্ম বললেন—হে স্বজনগণ, তিল দান করো, জল দান করো, দীপ দান করো। ধর্মাচরণে সদা সজাগ থেকো, এবং পরিবার-পরিজনের সঙ্গে ধর্মপথে থেকে আনন্দ অনুভব করো। মৃত্যুর পরে এই সৎকর্ম পরলোকে অতি দুর্লভ ফল প্রদান করে। হে নরশার্দূল, সকল দানের মধ্যে জলদান সর্বাধিক গুরুতর ও শ্রেষ্ঠ; অতএব তা অবশ্যই দানীয়।
Verse 22
एवमेतत् तडागस्य कीर्तितं फलमुत्तमम् । अत ऊर्ध्व॑ प्रवक्ष्यामि वृक्षाणामवरोपणम्,इस प्रकार यह मैंने तालाब बनवानेके उत्तम फलका वर्णन किया है। इसके बाद वृक्ष लगानेका माहात्म्य बतलाऊँगा
ভীষ্ম বললেন—এইভাবে আমি পুকুর নির্মাণের শ্রেষ্ঠ ফল বর্ণনা করলাম। এখন এর পর আমি বৃক্ষরোপণের মাহাত্ম্য বলব।
Verse 23
स्थावराणां च भूतानां जातय: षटू् प्रकीर्तिता: । वृक्षगुल्मलतावलल्ल्यस्त्वक्सारास्तृणजातय:
স্থাবর ভূতের ছয় প্রকার জাতি বলা হয়েছে—বৃক্ষ (বট-পিপল প্রভৃতি), গুল্ম (কুশ প্রভৃতি), লতা (গাছে জড়িয়ে ওঠা লতাগুল্ম), বল্লী (মাটিতে ছড়ানো লতা), ত্বকসার (বাঁশ প্রভৃতি) এবং তৃণ (ঘাস প্রভৃতি)।
Verse 24
एता जात्यस्तु वृक्षाणां तेषां रोपे गुणास्त्विमे । कीर्तिश्व मानुषे लोके प्रेत्य चैव फलं शुभम्
এগুলোই বৃক্ষের জাতি। এখন এগুলো রোপণ করলে যে গুণফল লাভ হয় তা বলা হচ্ছে। বৃক্ষরোপণকারী মানুষের এই লোকেতে স্থায়ী কীর্তি থাকে এবং মৃত্যুর পরে সে উৎকৃষ্ট শুভ ফল লাভ করে।
Verse 25
लभते नाम लोके च पितृभिश्न महीयते । देवलोके गतस्यापि नाम तस्य न नश्यति,संसारमें उसका नाम होता है, परलोकमें पितर उसका सम्मान करते हैं तथा देवलोकमें चले जानेपर भी यहाँ उसका नाम नष्ट नहीं होता
সে এই জগতে সুনাম লাভ করে; পিতৃলোকে পিতৃগণ তাকে সম্মান করেন; এবং দেবলোকে গমন করলেও তার যশ ক্ষয় হয় না।
Verse 26
अतीतानागते चोभे पितृवंशं च भारत । तारयेद् वृक्षरोपी च तस्माद् वक्षांश्ष रोपयेत्
হে ভারত! বৃক্ষরোপণকারী পুরুষ অতীতগত পূর্বপুরুষ ও ভবিষ্যৎ সন্তান—উভয়কেই, এবং সমগ্র পিতৃবংশকেও উদ্ধার করে। অতএব, হে ভরতকুলনন্দন, অবশ্যই বৃক্ষ রোপণ করা উচিত।
Verse 27
तस्य पुत्रा भवन्त्येते पादपा नात्र संशय: । परलोकगत: स्वर्ग लोकांश्चाप्रोति सोडव्ययान्
যে বৃক্ষ রোপণ করে, তার জন্য এই বৃক্ষগুলো পুত্রস্বরূপ হয়—এতে সন্দেহ নেই। সেই পুণ্যের বলেই পরলোকে গিয়ে সে স্বর্গ ও অক্ষয় লোকসমূহ লাভ করে।
Verse 28
पुष्प: सुरगणान् वृक्षा: फलैश्वापि तथा पितृन् | छायया चातिथ्थिं तात पूजयन्ति महीरुह:,तात! वृक्षणण अपने फूलोंसे देवताओंकी, फलोंसे पितरोंकी और छायासे अतिथियोंकी पूजा करते हैं
ভীষ্ম বললেন—হে প্রিয়! বৃক্ষেরা তাদের ফুল দিয়ে দেবগণকে, ফল দিয়ে পিতৃগণকে এবং ছায়া দিয়ে অতিথিদের পূজা করে; বাক্য না বলেও তারা পরোপকারের দ্বারা ধর্মের আদর্শ স্থাপন করে।
Verse 29
किन्नरोरगरक्षांसि देवगन्धर्वमानवा: । तथा ऋषिगणाश्रैव संश्रयन्ति महीरुहान्
ভীষ্ম বললেন—কিন্নর, নাগ, রাক্ষস, দেবতা, গন্ধর্ব, মানুষ এবং ঋষিগণের সমূহ—সকলেই মহাবৃক্ষের আশ্রয় গ্রহণ করে।
Verse 30
किन्नर, नाग, राक्षस, देवता, गन्धर्व, मनुष्य और ऋषियोंके समुदाय--ये सभी वृक्षोंका आश्रय लेते हैं ।।
ভীষ্ম বললেন—কিন্নর, নাগ, রাক্ষস, দেবতা, গন্ধর্ব, মানুষ এবং ঋষিসমূহ—সকলেই বৃক্ষের আশ্রয় নেয়। পুষ্পিত ও ফলবতী বৃক্ষ এ জগতে মানুষকে তৃপ্ত করে; আর যে বৃক্ষ দান করে, সেই বৃক্ষই পুত্রসম হয়ে পরলোকে তাকে উদ্ধার করে।
Verse 31
तस्मात् तडागे सद्वृक्षा रोप्या: श्रेयोडर्थिना सदा । पुत्रवत् परिपाल्याश्ष पुत्रास्ते धर्मत: स्मृता:
ভীষ্ম বললেন—অতএব যে নিজের কল্যাণ কামনা করে, সে যেন নিজের খনন করানো পুকুরের তীরে সর্বদা উত্তম বৃক্ষ রোপণ করে এবং পুত্রের মতো তাদের পালন করে; কারণ ধর্মদৃষ্টিতে সেই বৃক্ষগুলো পুত্ররূপেই গণ্য।
Verse 32
तडागकृद् वृक्षरोपी इष्टयज्ञश्न यो द्विज: । एते स्वर्गे महीयन्ते ये चान्ये सत्यवादिन:
ভীষ্ম বললেন—যে দ্বিজ পুকুর নির্মাণ করে, বৃক্ষ রোপণ করে, বিধিপূর্বক যজ্ঞ সম্পাদন করে এবং সত্য ভাষণ করে—তারা স্বর্গলোকে সম্মানিত হয়; এবং অন্যান্য সত্যবাদীরাও তেমনি।
Verse 33
तस्मात् तडागं कुर्वीत आरामांश्वैव रोपयेत् । यजेच्च विविधैर्यज्जै: सत्यं च सततं वदेत्,इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह तालाब खोदाये, बगीचे लगाये, भाँति-भाँतिके यज्ञोंका अनुष्ठान करे तथा सदा सत्य बोले
অতএব মানুষের উচিত পুকুর খনন করানো, উপবন ও বাগান রোপণ করা, নানাবিধ যজ্ঞ সম্পাদন করা এবং সর্বদা সত্য কথা বলা।
Verse 58
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि आरामतडागवर्णनं नाम अष्टपज्चाशत्तमो<5ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বে দানধর্মপর্বের অন্তর্গত ‘আরাম ও তড়াগের বর্ণনা’ নামক অষ্টপঞ্চাশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Yudhiṣṭhira seeks a hierarchy of gifts—among many scripturally praised donations—asking which dāna is anuttama (unsurpassed) in value and consequence.
Bhīṣma’s instruction is that land-gift is uniquely comprehensive because earth sustains livelihoods and resources; therefore, donating land functions as a high-impact form of generosity tied to governance and social welfare.
Yes: it repeatedly asserts durable rewards (imperishable merit, fame, favorable post-mortem states) and adds that reciting the bhūmi-dāna praise in śrāddha contexts is described as producing protective and enduring ritual benefit.