Adhyaya 60
Anushasana ParvaAdhyaya 6045 Verses

Adhyaya 60

Adhyāya 60: Dāna vs. Yajña—Royal Giving, Protection, and Karmic Share

Upa-parva: Dāna-Dharma Anuśāsana (Gifts, Recipient-Worthiness, and Royal Purification)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to clarify, with precision, which yields greater post-mortem fruit: dāna (charity) or yajña-kriyā (sacrificial/ritual action), and under what conditions of time, method, and recipient. He further inquires about gifts made within the sacrificial precinct (antarvedī) with faith and compassion, and whether such giving leads to niḥśreyasa (the highest good). Bhīṣma replies by characterizing kṣatriya life as persistently ‘raudra’ (involving force and punitive power), and therefore requiring purifying counter-practices: Vedic rites and sustained giving. He notes that the virtuous may avoid accepting gifts from sinful rulers; thus, the king should perform yajñas with properly obtained fees and, where accepted, give daily with supreme faith. The chapter then outlines a royal program of patronage: satisfying learned and disciplined brāhmaṇas, supplying food and dakṣiṇā, and providing practical goods (cows, oxen, grain, shelter, clothing, footwear, vehicles, beds). It emphasizes discreet or open support to those impoverished by livelihood, prioritizing non-contemptible recipients. Bhīṣma links this to political ethics: by protecting subjects, the king receives a share (here framed as a ‘fourth’) of their virtue and also of their wrongdoing if he fails to protect. The ruler is urged to guard livelihoods—his own and others’—care for servants and subjects as for children, and maintain the continuous welfare (yogakṣema) of brāhmaṇas. The chapter closes with a strong accountability doctrine: a ruler who claims to protect but does not may be collectively removed, while a well-protecting king becomes the sustaining source for all dependents, likened to rain for beings and a great tree for birds.

Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह के वचनों को सुनकर भी भीतर से काँप उठते हैं—राज्य-लाभ के पीछे छिपी करोड़ों हत्याओं का भार उन्हें ‘श्री’ के प्रकाश में भी अँधेरा दिखाता है। → वे स्वीकार करते हैं कि पृथ्वी जीतकर सैकड़ों राज्यों पर अधिकार मिला, पर उसी के लिए अपने कुटुम्बी कौरवों और सुहृदों का वध हुआ; उन्हें नरक-पतन का निश्चय-सा प्रतीत होता है। इस अपराध-बोध के बीच भीष्म विविध तपों और दानों के फलों का क्रमशः प्रतिपादन करते हैं—मानो युधिष्ठिर के भीतर उठे प्रश्न का उत्तर कर्म-मार्ग से दिया जा रहा हो। → दान की शक्ति का निर्णायक रूपक उभरता है—जैसे महासागर में वायु-युक्त नाव डूबते को पार लगाती है, वैसे ही ‘गवां दान’ (गौ-दान) तीव्र अंधकार वाले नरक में गिरते मनुष्य को परलोक में तार देता है; साथ ही अन्न-जल-रस, आश्रय और वस्त्र देने वाले को वही रस-समृद्धि और संरक्षण लौटकर मिलता है। → भीष्म के उपदेश से युधिष्ठिर का दृष्टिकोण शोक से कर्म-प्रायश्चित्त की ओर मुड़ता है। वे पाण्डवों से कहते हैं कि ‘वीर-मार्ग/धर्म-मार्ग’ के विषय में पितामह का कथन ही उन्हें रुचिकर और ग्राह्य मानना चाहिए—अर्थात् पश्चात्ताप को निष्क्रिय ग्लानि न बनाकर दान-तप के अनुशासन में ढालना। → पाण्डवों की स्वीकृति के बाद भी प्रश्न शेष रहता है—कौन-सा दान, किस भाव और किस पात्र को, युधिष्ठिर के पाप-भार को वास्तव में हल्का करेगा?

Shlokas

Verse 1

अफड---रा+ >> सप्तपञ्चाशत्तमो<्ध्याय: विविध प्रकारके तप और दानोंका फल युधिछिर उवाच मुह्यामीव निशम्याद्य चिन्तयान: पुन: पुनः । हीनां पार्थिवसंघातै: श्रीमद्धि: पृथिवीमिमाम्‌

যুধিষ্ঠির বললেন— পিতামহ! এ কথা শুনে এবং বারবার চিন্তা করতে করতে আমি যেন বারবার মূর্ছিত হয়ে পড়ি। এই পৃথিবীকে সেই সমৃদ্ধ রাজসমূহের সমাবেশ থেকে শূন্য দেখে আমার মন গভীর উদ্বেগে আচ্ছন্ন হয়।

Verse 2

प्राप्प राज्यानि शतशो महीं जित्वाथ भारत । कोटिश: पुरुषान्‌ हत्वा परितप्ये पितामह

যুধিষ্ঠির বললেন— হে ভারত! পৃথিবী জয় করে আমি শত শত রাজ্য লাভ করেছি; কিন্তু কোটি কোটি পুরুষকে বধ করে, হে পিতামহ, আমি অনুতাপে দগ্ধ হচ্ছি।

Verse 3

भरतनन्दन! पितामह! यद्यपि मैंने इस पृथ्वीको जीतकर सैकड़ों देशोंके राज्योंपर अधिकार पाया है तथापि इसके लिये जो करोड़ों पुरुषोंकी हत्या करनी पड़ी है, उसके कारण मेरे मनमें बड़ा संताप हो रहा है ।।

যুধিষ্ঠির বললেন— হে ভরতনন্দন, হে পিতামহ! যদিও আমি এই পৃথিবী জয় করে শত শত দেশের রাজ্যে অধিকার লাভ করেছি, তবু কোটি কোটি পুরুষ বধের মূল্যেই তা অর্জিত—এই কারণে আমার হৃদয় তীব্র দুঃখে দগ্ধ। যে মহীয়সী নারীরা স্বামী, পুত্র, মামা ও ভ্রাতাদের থেকে বঞ্চিত হয়েছে—তাদের পরিণতি কী হবে?

Verse 4

वयं हि तान्‌ कुरून्‌ हत्वा ज्ञातींश्व सुहददोडपि वा । अवाकु्‌शीर्षा: पतिष्यामो नरके नात्र संशय:

আমরা যদি সেই কুরুদের—নিজ আত্মীয়স্বজন ও সুহৃদদের—বধ করি, তবে নিঃসন্দেহে অধোমুখে নরকে পতিত হব।

Verse 5

शरीर योक्तुमिच्छामि तपसोग्रेण भारत । उपदिष्टमिहेच्छामि तत्त्वतो5हं विशाम्पते

যুধিষ্ঠির বললেন— হে ভারত! কঠোর তপস্যার দ্বারা আমি দেহকে সংযত করতে চাই। হে প্রজাপতি, এই বিষয়ে তত্ত্বতঃ সত্য উপদেশ আমি আপনার কাছ থেকে পেতে চাই।

Verse 6

वैशम्पायन उवाच युधिष्ठटिरस्य तद्‌ वाकयं श्रुत्वा भीष्मो महामना: । परीक्ष्य निपुणं बुद्ध्या युधिष्ठिरमभाषत

বৈশম্পায়ন বললেন— হে জনমেজয়! যুধিষ্ঠিরের এই বাক্য শুনে মহামনা ভীষ্ম বুদ্ধি দিয়ে সূক্ষ্মভাবে বিচার করে যুধিষ্ঠিরকে এইভাবে বললেন।

Verse 7

रहस्यमद्भुतं चैव शृणु वक्ष्यामि यत्‌ त्वयि । या गति: प्राप्यते येन प्रेत्यभावे विशाम्पते

বৈশম্পায়ন বললেন— হে প্রজানাথ! শোনো, আমি তোমাকে এক আশ্চর্য রহস্য বলছি। মৃত্যুর পরে কোন কর্মে মানুষ কোন গতি লাভ করে—তা শোনো।

Verse 8

तपसा प्राप्यते स्वर्गस्तपसा प्राप्यते यश: । आयु: प्रकर्षो भोगाश्व लभ्यन्ते तपसा विभो

বৈশম্পায়ন বললেন— হে প্রভু! তপস্যায় স্বর্গ লাভ হয়, তপস্যায় যশ লাভ হয়। হে মহাবলবান! তপস্যায় দীর্ঘায়ু, উৎকর্ষ এবং শ্রেষ্ঠ ভোগও লাভ হয়।

Verse 9

ज्ञानं विज्ञानमारोग्यं रूपं सम्पत्‌ तथैव च | सौभाग्यं चैव तपसा प्राप्यते भरतर्षभ,'भरतश्रेष्ठ! ज्ञान, विज्ञान, आरोग्य, रूप, सम्पत्ति तथा सौभाग्य भी तपस्यासे प्राप्त होते हैं

বৈশম্পায়ন বললেন— হে ভরতশ্রেষ্ঠ! তপস্যায় জ্ঞান, বিজ্ঞান, আরোগ্য, রূপ, সম্পদ এবং সৌভাগ্যও লাভ হয়।

Verse 10

धन प्राप्रोति तपसा मौनेनाज्ञां प्रयच्छति । उपभोगांस्तु दानेन ब्रह्मचर्येण जीवितम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন— তপস্যায় মানুষ ধন লাভ করে; মৌনব্রতে সে আদেশ দেওয়ার ক্ষমতা পায়। দানে ভোগের উপকরণ লাভ হয়, আর ব্রহ্মচর্যে জীবন—অর্থাৎ দীর্ঘায়ু—লাভ হয়।

Verse 11

अहिंसाया: फल रूप॑ दीक्षाया जन्म वै कुले । फलमूलाशिनां राज्यं स्वर्ग: पर्णाशिनां भवेत्‌

বৈশম্পায়ন বললেন— অহিংসা-রূপ দীক্ষার ফল হলো উত্তম কুলে জন্ম। যারা ফল-মূল ভক্ষণ করে জীবনধারণ করে, তাদের পুরস্কার রাজ্য; আর যারা পাতা খেয়ে থাকে, তাদের পুরস্কার স্বর্গ।

Verse 12

“अहिंसाका फल है रूप और दीक्षाका फल है उत्तम कुलमें जन्म। फल-मूल खाकर रहनेवालोंको राज्य और पत्ता चबाकर तप करनेवालोंको स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है ।।

বৈশম্পায়ন বললেন— যে কেবল দুধে জীবনধারণ করে, সে স্বর্গ লাভ করে; দান করলে ধন-সম্পদ বৃদ্ধি পায়। গুরুর সেবায় সত্য বিদ্যা লাভ হয়, আর নিয়মিত শ্রাদ্ধ করলে সন্তানের প্রাপ্তি হয়।

Verse 13

गवाढ्यः शाकदीक्षाभ्रि: स्वर्गमाहुस्तृणाशिनाम्‌ | स्त्रियस्त्रिषवर्णं स्नात्वा वायुं पीत्वा क्रतुं लभेत्‌

বৈশম্পায়ন বললেন— তাঁরা বলেন, যে গোধনে সমৃদ্ধ এবং শাক-দীক্ষা (শাকভোজনের ব্রত) ধারণ করেছে, সে তৃণ খেয়েও স্বর্গ লাভ করে। তদ্রূপ, নারী তিন সময়ে স্নান করে এবং বায়ু পান করার মতো (বায়ুতেই) জীবনধারণ করলে যজ্ঞের ফল লাভ করতে পারে।

Verse 14

“जो केवल साग खाकर रहनेका नियम लेता है वह गोधनसे सम्पन्न होता है। तृण खाकर रहनेवाले मनुष्योंको स्वर्गकी प्राप्ति होती है। तीनों कालमें स्नान करनेसे बहुतेरी स्त्रियोंकी प्राप्ति होती है और हवा पीकर रहनेसे मनुष्यको यज्ञका फल प्राप्त होता है ।।

বৈশম্পায়ন বললেন— যে নিত্য স্নান করে সে দক্ষ ও সক্ষম হয়; আর যে দ্বিজ দুই সন্ধিক্ষণে (প্রভাত ও সায়ং) জপ করে, সে পুণ্য লাভ করে। হে রাজন, যে মরুভূমিতে কঠোর সাধনা করে সে স্বর্গ লাভ করে; আর যে অনাহারে (কেবল বায়ুতে) বাঁচে, সে যজ্ঞের ফল পায়।

Verse 15

“राजन! जो द्विज नित्य स्नान करके दोनों समय संध्योपासना और गायत्री-जप करता है वह चतुर होता है। मरुकी साधना-जलका परित्याग करनेवाले तथा निराहार रहनेवालेको स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है ।।

বৈশম্পায়ন বললেন— হে রাজন, যে দ্বিজ নিত্য স্নান করে দুই সময়ে সন্ধ্যোপাসনা ও গায়ত্রী-জপ করে, সে বিচক্ষণ ও প্রজ্ঞাবান হয়। যারা কঠোর তপস্যায় দেহসুখের জন্য জল ত্যাগ করে এবং যারা অনাহারে থাকে, তারা স্বর্গলোক লাভ করে। যারা খালি মাটিতে শয়ন করে, তারা গৃহ ও শয্যা পায়; আর যারা চীর ও বল্কল পরিধান করে, তারা উৎকৃষ্ট বস্ত্র ও অলংকার লাভ করে।

Verse 16

शय्यासनानि यानानि योगयुक्ते तपोधने । अन्निप्रवेशे नियतं ब्रह्मलोके महीयते

বৈশম্পায়ন বললেন— যোগে সংযত ও তপস্যাধনে সমৃদ্ধ তপস্বীর জন্য শয্যা, আসন ও যান প্রাপ্ত হয়। আর যে নিয়মপূর্বক অগ্নিতে প্রবেশ করে (ব্রতরূপে), সে ব্রহ্মলোকে সম্মানিত হয়—ব্রহ্মার লোকেই তার মহিমা প্রতিষ্ঠিত হয়।

Verse 17

रसानां प्रतिसंहारात्‌ सौभाग्यमिह विन्दति । आमिषप्रतिसंहारात्‌ प्रजा ह्यायुष्मती भवेत्‌

বৈশম্পায়ন বললেন— রসাসক্তি ত্যাগ করলে মানুষ এই লোকেই সৌভাগ্য লাভ করে। আর মাংসাহার ত্যাগ করলে তার সন্তান দীর্ঘায়ু হয়।

Verse 18

उदवासं वसेद्‌ यस्तु स नराधिपतिर्भवेत्‌ सत्यवादी नरश्रेष्ठ दैवतैः सह मोदते,“जो जलमें निवास करता है वह राजा होता है। नरश्रेष्ठ) सत्यवादी मनुष्य स्वर्गमें देवताओंके साथ आनन्द भोगता है

বৈশম্পায়ন বললেন— যে জলবাসের ব্রত পালন করে, সে রাজপদ লাভ করে। আর হে নরশ্রেষ্ঠ, সত্যভাষী মানুষ স্বর্গে দেবতাদের সঙ্গে আনন্দ করে।

Verse 19

कीर्तिर्भवति दानेन तथा5<5रोग्यमहिंसया । द्विजशुश्रूषया राज्यं द्विजत्वं चापि पुष्कलम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন— দানে কীর্তি লাভ হয়, আর অহিংসায় আরোগ্য। দ্বিজদের (ব্রাহ্মণদের) সেবায় রাজ্যলাভ হয়, এবং প্রভূত ব্রাহ্মণ্য (আধ্যাত্মিক পুণ্য-প্রতিষ্ঠা)ও অর্জিত হয়।

Verse 20

“दानसे यश, अहिंसासे आरोग्य तथा ब्राह्मणोंकी सेवासे राज्य एवं अतिशय ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है ।।

বৈশম্পায়ন বললেন— দানে যশ, অহিংসায় আরোগ্য, আর ব্রাহ্মণসেবায় রাজ্য ও অতিশয় ব্রাহ্মণ্য লাভ হয়। পানীয় জল দান করলে অক্ষয় কীর্তি হয়, আর অন্নদান করলে কাম ও ভোগের বিষয়ে সম্পূর্ণ তৃপ্তি লাভ হয়।

Verse 21

सान्त्वद: सर्वभूतानां सर्वशोकैर्विमुच्यते । देवशुश्रूषया राज्यं दिव्यं रूपं नियच्छति

যে সকল প্রাণীকে সান্ত্বনা দেয়, সে সমস্ত শোক থেকে মুক্ত হয়। আর দেবতাদের সেবাভক্তিতে রাজ্য ও দিব্য রূপ লাভ করে।

Verse 22

दीपालोक प्रदानेन चक्षुष्मान्‌ भवते नर: । प्रेक्षणीयप्रदानेन स्मृतिं मेधां च विन्दति

বৈশম্পায়ন বললেন—মন্দিরে প্রদীপের আলো দান করলে মানুষের দৃষ্টি সুস্থ ও তীক্ষ্ণ হয়। আর দর্শনীয়, মনোহর বস্তু দান করলে স্মৃতিশক্তি ও মেধা লাভ হয়।

Verse 23

गन्धमाल्यप्रदानेन कीर्तिर्भवति पुष्कला । केशश्मश्रु धारयतामग्रया भवति संतति:

বৈশম্পায়ন বললেন—সুগন্ধি ও পুষ্পমালা দান করলে প্রভূত খ্যাতি লাভ হয়। আর যারা কেশ ও দাড়ি-গোঁফ ধারণ করে (নিয়মরক্ষায় স্থিত), তাদের উৎকৃষ্ট সন্তান লাভ হয়।

Verse 24

उपवासं च दीक्षां च अभिषेकं च पार्थिव । कृत्वा द्वादशवर्षाणि वीरस्थानाद्‌ विशिष्यते

বৈশম্পায়ন বললেন—হে পার্থিব! যে বারো বছর উপবাস, দীক্ষা এবং অভিষেক (নিয়মিত স্নান-অনুষ্ঠান) পালন করে, সে বীরস্থান থেকেও শ্রেষ্ঠ গতি লাভ করে।

Verse 25

दासीदासमलड्कारान्‌ क्षेत्राणि च गृहाणि च । ब्रह्मदेयां सुतां दत्त्वा प्राप्नोति मनुजर्षभ

বৈশম্পায়ন বললেন—হে মনুষ্যশ্রেষ্ঠ! যে ব্যক্তি ব্রহ্মদেয় (ব্রাহ্ম-বিবাহ) বিধিতে যোগ্য বরকে কন্যাদান করে, সে দাস-দাসী, অলংকার, ক্ষেত্র ও গৃহ লাভ করে।

Verse 26

क्रतुभिश्नोपवासैश्व त्रिदिवं याति भारत । लभते च शिवं ज्ञानं फलपुष्पप्रदो नर:

বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত! যজ্ঞ ও উপবাসের দ্বারা মানুষ স্বর্গলোকে গমন করে; আর যে ফল ও ফুল দান করে, সে কল্যাণকর, মোক্ষপথগামী জ্ঞান লাভ করে।

Verse 27

सुवर्णशंगैस्तु विराजितानां गवां सहस्नस्यथ नर: प्रदानात्‌ । प्राप्नोति पुण्यं दिवि देवलोक- मित्येवमाहुर्दिवि देवसंघा:

বৈশম্পায়ন বললেন—যে ব্যক্তি সোনায় অলংকৃত শৃঙ্গবিশিষ্ট এক সহস্র গাভী দান করে, সে পুণ্য লাভ করে স্বর্গে দেবলোক প্রাপ্ত হয়—এ কথা স্বর্গবাসী দেবসমূহ ঘোষণা করেন।

Verse 28

प्रयच्छते य: कपिलां सवत्सां कांस्योपदोहां कनकाग्रशृंगीम्‌ । तैस्तैर्गुणै: कामदुहास्य भूत्वा नरं प्रदातारमुपैति सा गौ:

বৈশম্পায়ন বললেন—যে ব্যক্তি বাছুরসহ কপিলা গাভী দান করে, সঙ্গে কাঁসার দোহনপাত্র দেয়, আর যার শৃঙ্গের অগ্রভাগ সোনায় মণ্ডিত—সে গাভী সেই সকল গুণে কামধেনু হয়ে দাতার নিকট ফলরূপে উপস্থিত হয়।

Verse 29

यावन्ति रोमाणि भवन्ति धेन्वा- स्तावत्‌ काल प्राप्प स गोप्रदानात्‌ पुत्रांश्व पौत्रांश्ष कुलं च सर्व- मासप्तमं तारयते परत्र

বৈশম্পায়ন বললেন—গাভীর দেহে যত লোম আছে, গোদানফলে তত বছর মানুষ স্বর্গীয় সুখ ভোগ করে। শুধু তাই নয়—সে দান পরলোকে তার পুত্র, পৌত্র এবং সমগ্র বংশকে সপ্তম পুরুষ পর্যন্ত উদ্ধার করে।

Verse 30

सदक्षिणां काञउ्चनचारुशंगीं कांस्योपदोहां द्रविणोत्तरीयाम्‌ । धेनुं तिलानां ददतो द्विजाय लोका वसूनां सुलभा भवन्ति

বৈশম্পায়ন বললেন—যে ব্যক্তি ব্রাহ্মণকে ‘তিল-ধেনু’ দান করে—দক্ষিণাসহ, সোনার সুন্দর শৃঙ্গযুক্ত, কাঁসার দোহনপাত্রসহ এবং মূল্যবান উত্তরীয় প্রদান করে—তার জন্য বসুদের লোক সহজলভ্য হয়।

Verse 31

स्वकर्मभिर्मानवं संनिरुद्धं तीव्रान्धकारे नरके पतन्तम्‌ । महार्णवे नौरिव वायुयुक्ता दानं गवां तारयते परत्र

বৈশম্পায়ন বললেন—নিজ কর্মে আবদ্ধ হয়ে যে মানুষ তীব্র অন্ধকারময় নরকে পতিত হয়, তাকে পরলোকে গোদান পার করে দেয়; যেমন মহাসমুদ্রে নৌকা বায়ুর সহায়তায় অপর তীরে পৌঁছে দেয়।

Verse 32

यो ब्रह्मदेयां तु ददाति कन्यां भूमिप्रदानं च करोति विदप्रे । ददाति चान्न॑ विधिवच्च यश्न स लोकमाप्रोति पुरंदरस्य

যে ব্যক্তি ব্রাহ্ম-বিধিতে কন্যাদান করে, ব্রাহ্মণকে ভূমিদান করে এবং বিধিপূর্বক অন্নদান করে—সে পুরন্দর (ইন্দ্র)-লোক লাভ করে।

Verse 33

नैवेशिकं सर्वगुणोपपन्नं ददाति वै यस्तु नरो द्विजाय । स्वाध्यायचारित्र्यगुणान्विताय तस्यापि लोका: कुरुषूत्तरेषु

যে ব্যক্তি স্বাধ্যায় ও সদাচারে সমন্বিত দ্বিজ ব্রাহ্মণকে সর্বগুণসম্পন্ন বাসগৃহ দান করে—তার জন্য উত্তর কুরুদেশে লোকসমূহ লাভ হয়।

Verse 34

“जो मनुष्य स्वाध्यायशील और सदाचारी ब्राह्मणको सर्वगुणसम्पन्न गृह और शय्या आदि गृहस्थीके सामान देता है, उसे उत्तर कुरुदेशमें निवास प्राप्त होता है ।।

যে ব্যক্তি স্বাধ্যায়শীল ও সদাচারী ব্রাহ্মণকে সর্বগুণসম্পন্ন গৃহ, শয্যা প্রভৃতি গৃহস্থালির সামগ্রী দান করে—সে উত্তর কুরুদেশে নিবাস লাভ করে। ভারবাহী বলদ ও গাভী দান করলে মানুষ বসুগণের লোক পায়। স্বর্ণালংকার দান স্বর্গপ্রাপ্তিদায়ক বলা হয়েছে, আর বিশুদ্ধ পরিশোধিত স্বর্ণ দান তার থেকেও শ্রেষ্ঠ ফল দেয়।

Verse 35

छत्रप्रदानेन गृहं वरिष्ठ यान॑ तथोपानहसम्प्रदाने । वस्त्रप्रदानेन फल॑ सुरूप॑ं गन्धप्रदानात्‌ सुरभिर्नर: स्थात्‌

ছাতা দান করলে উৎকৃষ্ট গৃহ, জুতো দান করলে বাহন, বস্ত্র দান করলে সুন্দর রূপ, আর সুগন্ধি দান করলে সুগন্ধিত দেহ লাভ হয়।

Verse 36

पुष्पोपगं वाथ फलोपगं वा यः पादपं स्पर्शयते द्विजाय । सश्रीकमृद्ध॑ बहुरत्नपूर्ण लभत्ययत्नोपगतं गृहं वै

যে ব্যক্তি ব্রাহ্মণকে ফুলে বা ফলে ভরা বৃক্ষ দান করে, সে অনায়াসে ধনসম্পন্ন, সমৃদ্ধ ও বহু রত্নে পরিপূর্ণ গৃহ লাভ করে।

Verse 37

भक्ष्यानज्नपानीयरसप्रदाता सर्वान्‌ समाप्रोति रसान्‌ प्रकामम्‌ । प्रतिश्रयाच्छादनसम्प्रदाता प्राप्नोति तान्येव न संशयो5त्र

বৈশম্পায়ন বললেন— যে ব্যক্তি আহার্য খাদ্য, পানীয় জল ও মনোরম রস দান করে, সে ইচ্ছামতো সকল প্রকার ভোগরস লাভ করে। আর যে বাসের জন্য আশ্রয় ও আচ্ছাদনের জন্য বস্ত্র প্রদান করে, সে-ও সেই বস্তুসমূহই প্রত্যাবর্তে পায়—এতে কোনো সন্দেহ নেই।

Verse 38

स्रग्धूपगन्धाननुलेपनानि स्‍्नानानि माल्यानि च मानवो यः । दद्याद्‌ द्विजेभ्य: स भवेदरोग- स्तथाभिरूपक्ष नरेन्द्र लोके

বৈশম্পায়ন বললেন— যে ব্যক্তি ব্রাহ্মণদের ফুলের মালা, ধূপ, সুগন্ধি দ্রব্য, অনুলেপন, স্নানের উপকরণ এবং পুষ্পালংকার দান করে, সে, হে রাজেন্দ্র, এই লোকেই রোগমুক্ত ও মনোহর রূপসম্পন্ন হয়।

Verse 39

“नरेन्द्र! जो मनुष्य ब्राह्मणोंको फ़ूलोंकी माला, धूप, चन्दन, उबटन, नहानेके लिये जल और पुष्प दान करता है, वह संसारमें नीरोग और सुन्दर रूपवाला होता है ।।

বৈশম্পায়ন বললেন— হে নরেন্দ্র! যে ব্যক্তি ব্রাহ্মণদের ফুলের মালা, ধূপ, চন্দন, সুগন্ধি উবটান, স্নানের জন্য জল ও পুষ্প দান করে, সে এই লোকেই রোগমুক্ত ও সুন্দররূপী হয়—এতে সন্দেহ নেই। আর হে রাজন, যে ব্যক্তি দ্বিজকে বীজ-শস্যে পরিপূর্ণ ও শয্যাসম্পন্ন গৃহ দান করে, সে পুণ্যে মনোরম ও বহু রত্নে পূর্ণ উৎকৃষ্ট আবাস লাভ করে।

Verse 40

“राजन! जो पुरुष ब्राह्मणको अन्न और शय्यासे सम्पन्न गृह दान करता है, उसे अत्यन्त पवित्र, मनोहर और नाना प्रकारके रत्नोंसे भरा हुआ उत्तम घर प्राप्त होता है ।।

বৈশম্পায়ন বললেন— হে রাজন! যে ব্যক্তি ব্রাহ্মণকে অন্ন ও শয্যাসম্পন্ন গৃহ দান করে, সে অতি পবিত্র, মনোরম এবং নানা রত্নে পরিপূর্ণ উৎকৃষ্ট গৃহ লাভ করে। আর যে ব্যক্তি ব্রাহ্মণকে সুগন্ধিযুক্ত, বিচিত্র আচ্ছাদন ও বালিশসহ শয্যা দান করে, সে অনায়াসে সুকুলজাত, সুন্দর কেশরাশি-সমন্বিতা, রূপবতী ও মনোহরিণী স্ত্রী লাভ করে।

Verse 41

पितामहस्यानवरो वीरशायी भवेन्नर: । नाधथिकं विद्यते यस्मादित्याहु: परमर्षय:

বৈশম্পায়ন বললেন— যে ব্যক্তি রণভূমিতে বীরশয্যায় শয়ন করে (অর্থাৎ যুদ্ধে বীরগতি লাভ করে), সে পিতামহ ব্রহ্মার সমান হয়। কারণ তাঁর চেয়ে উচ্চতর কিছু নেই—এমনই পরমর্ষিদের বাণী।

Verse 42

वैशम्पायन उवाच तस्य तद्‌ वचन श्रुत्वा प्रीतात्मा कुरुनन्दनः । नाश्रमेडरोचयद्‌ वासं वीरमार्गाभिकाडुक्षया

বৈশম্পায়ন বললেন—পিতামহের সেই বাক্য শুনে কুরু-নন্দন যুধিষ্ঠিরের অন্তর আনন্দিত হল। আর বীরধর্মের পথে আকাঙ্ক্ষা জাগায় তিনি আশ্রমবাসকে আর মনঃপূত মনে করলেন না।

Verse 43

ततो युधिष्ठिर: प्राह पाण्डवान्‌ पुरुषर्षभ । पितामहस्य यद्‌ वाक्यं तद्‌ वो रोचत्विति प्रभु:

তখন পুরুষর্ষভ যুধিষ্ঠির পাণ্ডবদের বললেন—“পিতামহ যে বাক্য বলেছেন, তা তোমাদের সকলেরই প্রিয় হোক; তোমরা তা গ্রহণ কর।”

Verse 44

पुरुषप्रवर! तब शक्तिशाली राजा युधिष्ठिरने पाण्डवोंसे कहा--“वीरमार्गके विषयमें पितामहका जो कथन है, उसीमें तुम सब लोगोंकी रुचि होनी चाहिये' ।।

তখন সকল পাণ্ডব এবং যশস্বিনী দ্রৌপদী যুধিষ্ঠিরের সেই বাক্যকে ‘বাঢ়ম্’—‘অতিশয় উত্তম’ বলে সম্মানসহ গ্রহণ করলেন।

Verse 56

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक छतप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে চ্যবন ও কুশিকের সংলাপবিষয়ক ছাপ্পান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

How a ruler should evaluate and practice dāna and yajña for lasting merit—specifically, which action is spiritually weightier and what conditions (intent, recipient, circumstance) make giving purifying rather than compromised.

Sustain daily, faith-grounded patronage of disciplined and learned recipients; materially support ritual and social dependents; and treat protection of livelihoods as a primary royal duty that directly shapes the ruler’s moral outcome.

Yes: it frames a doctrine of karmic participation—subjects’ good and bad actions partially accrue to the protecting or neglecting king (expressed as a ‘fourth’ share), making governance itself a moral amplifier.