Adhyaya 53
Anushasana ParvaAdhyaya 5328 Verses

Adhyaya 53

Cavana’s Tests of Kuśika and the Queen (अध्याय ५३: च्यवन–कुशिक-परिक्षा)

Upa-parva: Dāna-Dharma and Vrata-Narratives (Cavana–Kuśika Episode)

Yudhiṣṭhira asks what Kuśika did after the sage vanished. Bhīṣma narrates that the king, ashamed and mentally shaken, returns home and finds Cavana resting there. The king and queen, astonished, attend the sage respectfully; Cavana requests oil massage and bathing arrangements, and they comply with costly, refined supplies. Cavana then dismisses these preparations and disappears again without eliciting anger or envy from the couple. Later, Cavana reappears, accepts offerings, and instructs Kuśika to prepare a fully equipped war-chariot; the king and queen are yoked to it and compelled to pull it slowly, while the king orders his attendants to give away wealth and valuables to passersby and Brahmins as requested. Despite wounds, hunger, and prolonged strain, the couple maintains composure. Observers remark on the ascetic’s power and the couple’s endurance. Satisfied, Cavana releases them, heals them by touch, grants a boon, and promises auspicious outcomes; the king returns home rejuvenated and radiant, while the sage establishes an extraordinary, jewel-like hermitage by his will.

Chapter Arc: युधिष्ठिर के प्रश्न के उत्तर में भीष्म गौओं की महिमा के प्रसंग से एक प्राचीन वृत्तान्त छेड़ते हैं—नहुष और महर्षि च्यवन का संवाद, जिसमें करुणा और धर्म का असाधारण संगम होने वाला है। → महर्षि च्यवन, महान् व्रतधारी और सर्वभूतहितैषी, जलचरों तक को आश्रय देने वाले चन्द्रमा-सम शीतल स्वभाव से नदी-तट पर रहते हैं। उधर निषाद मछलियों के लिए विस्तृत, नव-सूत्रकृत जाल जल में डालते हैं; जलचर परस्पर संहृष्ट होकर उसमें फँसते जाते हैं। → जाल खींचे जाने पर मछलियाँ स्थल-संस्पर्श से त्रस्त होकर व्याकुल होने लगती हैं; उसी जाल के साथ महर्षि च्यवन भी नदी से बाहर आ जाते हैं। मुनि का निर्णायक वचन गूँजता है—वे जल में बसे इन मत्स्यों का साथ छोड़ने को तैयार नहीं: ‘मैं इन मछलियों के साथ ही प्राण-त्याग या प्राण-रक्षा करूँगा; इनके बिना नहीं रहूँगा।’ → मुनि के इस अद्भुत संकल्प से निषाद भय-कम्पित हो उठते हैं, विवर्ण मुख से जाकर राजा नहुष को समस्त घटना निवेदित करते हैं—अब राजधर्म की परीक्षा निकट है। → नहुष तक समाचार पहुँच चुका है; क्या वह मुनि और जलचरों के प्रति करुणा-धर्म निभाएगा, या राज्य-हित/आजीविका के तर्क से निषादों का पक्ष लेगा?

Shlokas

Verse 1

भीकम (2 अमान पज्चाशत्तमो<्ध्याय: गौओंकी महिमाके प्रसंगमें च्यवन मुनिके उपाख्यानका आरम्भ

যুধিষ্ঠির বললেন— পিতামহ! কেবল দর্শনে কেমন স্নেহ জন্মায়, আর সহবাসে কেমন স্নেহ বৃদ্ধি পায়? আর গাভীদের মহাসৌভাগ্য ও মাহাত্ম্য কী? অনুগ্রহ করে তা আমাকে বিস্তারে ব্যাখ্যা করুন।

Verse 2

भीष्म उवाच हन्त ते कथयिष्यामि पुरावृत्तं महाद्युते । नहुषस्य च संवादं महर्षेश््यवनस्य च

ভীষ্ম বললেন—হে মহাতেজস্বী নৃপ! শোনো, আমি তোমাকে এক প্রাচীন বৃত্তান্ত বলছি—রাজা নহুষ ও মহর্ষি চ্যবনের সংলাপ; এই পুরাকথার দ্বারা ধর্মের আলোকে বিষয়টি স্পষ্ট হবে।

Verse 3

पुरा महर्षिक्ष्यवनो भार्गवों भरतर्षभ । उदवासकृतारम्भो बभूव स महाव्रत:,भरतश्रेष्ठ! पूर्वकालकी बात है, भृगुके पुत्र महर्षि च्यवनने महान्‌ व्रतका आश्रय ले जलके भीतर रहना आरम्भ किया

হে ভারতশ্রেষ্ঠ! প্রাচীন কালে ভৃগুবংশীয় মহর্ষি চ্যবন মহাব্রত গ্রহণ করে জলের মধ্যে বাস করার তপস্যা আরম্ভ করেছিলেন।

Verse 4

निहत्य मान क्रोध॑ च प्रहर्ष शोकमेव च । वर्षाणि द्वादश मुनिर्जलवासे धृतव्रत:,वे अभिमान, क्रोध, हर्ष और शोकका परित्याग करके दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हुए बारह वर्षो-तक जलके भीतर रहे

অহংকার ও ক্রোধ দমন করে, এবং হর্ষ ও শোকও ত্যাগ করে, দৃঢ়ব্রতী সেই মুনি বারো বছর জলের মধ্যে বাস করেছিলেন।

Verse 5

आदधत्‌ सर्वभूतेषु विश्रम्भं॑ परमं शुभम्‌ | जलेचरेषु सर्वेषु शीतरश्मिरिव प्रभु:

সক্ষম সেই মুনি শীতল-কিরণ চন্দ্রের ন্যায় ছিলেন; তিনি সকল প্রাণীর মধ্যে, বিশেষত সকল জলচর জীবের মধ্যে, পরম মঙ্গলময় আস্থা স্থাপন করেছিলেন।

Verse 6

स्थाणुभूत: शुचिर्भूत्वा दैवते भ्य: प्रणम्य च । गंगायमुनयोर्मध्ये जलं सम्प्रविवेश ह

এক সময় তিনি শুচি হয়ে দেবতাদের প্রণাম করে গঙ্গা-যমুনার সঙ্গমে জলের মধ্যে প্রবেশ করলেন এবং সেখানে কাঠের মতো স্থির হয়ে বসে রইলেন।

Verse 7

गंगायमुनयोवेंगं सुभीम॑ं भीमनि:स्वनम्‌ | प्रतिजग्राह शिरसा वातवेगसमं जवे

ভীষ্ম বললেন—গঙ্গা ও যমুনার স্রোত ছিল অতিশয় ভয়ংকর, ভীষণ গর্জনে মুখর। বায়ুবেগসম দ্রুত ও অসহ্য সেই প্রবাহও মুনি মাথায় গ্রহণ করে সহ্য করলেন।

Verse 8

गंगा च यमुना चैव सरितश्न सरांसि च । प्रदक्षिणमृषिं चक्रुर्न चैनं पर्यपीडयन्‌,परंतु गंगा-यमुना आदि नदियाँ और सरोवर ऋषिकी केवल परिक्रमा करते थे, उन्हें वष्ट नहीं पहुँचाते थे

ভীষ্ম বললেন—গঙ্গা, যমুনা এবং অন্যান্য নদী ও সরোবর শ্রদ্ধায় সেই ঋষির প্রদক্ষিণ করত; তাঁকে চাপ দিত না, কোনো ক্ষতিও করত না।

Verse 9

अन्तर्जलेषु सुष्वाप काष्ठ भूतो महामुनि: । ततश्रोर्ध्वस्थितो धीमानभवद्‌ भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! वे बुद्धिमान्‌ महामुनि कभी पानीमें काठकी भाँति सो जाते और कभी उसके ऊपर खड़े हो जाते थे

ভীষ্ম বললেন—সেই মহামুনি জলের ভিতরে কাঠের মতো নিথর হয়ে শুয়ে থাকতেন; তারপর, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, সেই জ্ঞানী মুনি জলের উপর উঠে দাঁড়াতেন।

Verse 10

जलौकसां स सत्त्वानां बभूव प्रियदर्शन: । उपाजिघ्रन्त च तदा तस्योष्ठ॑ हृष्टमानसा:

ভীষ্ম বললেন—জলবাসী প্রাণীদের কাছে তিনি ছিলেন অতি মনোহর। তখন তারা আনন্দচিত্তে কাছে এসে তাঁর ঠোঁট শুঁকতে লাগল।

Verse 11

वे जलचर जीवोंके बड़े प्रिय हो गये थे। जल-जन्तु प्रसन्नचित्त होकर उनका ओठ सूँघा करते थे ।। तत्र तस्यासत: काल: समतीतो5भवन्महान्‌ । ततः कदाचित्‌ समये कसम्मिंश्वचिन्मत्स्यजीविन:

ভীষ্ম বললেন—সেখানে অবস্থান করতে করতে তাঁর দীর্ঘ সময় অতিবাহিত হল। তারপর এক সময় আকস্মিকভাবে কয়েকজন মৎস্যজীবী সেখানে এসে পড়ল।

Verse 12

त॑ं देशं समुपाजग्मुर्जालहस्ता महाद्युते । निषादा बहवस्तत्र मत्स्योद्धरणनिश्चया:

ভীষ্ম বললেন— “হে মহাতেজস্বী! হাতে জাল নিয়ে বহু নিষাদ সেখানে উপস্থিত হল; তারা মাছ ধরে তুলে নিয়ে যাওয়ার দৃঢ় সংকল্প করেছিল।”

Verse 13

महातेजस्वी नरेश! इस तरह उन्हें पानीमें रहते बहुत दिन बीत गये। तदनन्तर एक समय मछलियोंसे जीविका चलानेवाले बहुत-से मल्‍लाह मछली पकड़नेका निश्चय करके जाल हाथमें लिये हुए उस स्थानपर आये ।।

ভীষ্ম বললেন— “হে মহারাজ! জলে বাস করতে করতে তাদের বহু দিন কেটে গেল। তারপর এক সময় মাছের ওপর নির্ভর করে জীবিকা চালানো বহু জেলে হাতে জাল নিয়ে, মাছ ধরার দৃঢ় সংকল্পে সেই স্থানে এল। তারা পরিশ্রমী, বলবান, বীর, এবং জলে নামতে কখনও পিছপা হত না; জাল ফেলার কাজে অটল মন নিয়ে তারা সেই দেশে অগ্রসর হল।”

Verse 14

जालं॑ ते योजयामासुर्नि:शेषेण जनाधिप । मत्स्योदक॑ समासाद्य तदा भरतसत्तम,भरतवंशशिरोमणि नरेश! उस समय जहाँ मछलियाँ रहती थीं, उतने गहरे जलमें जाकर उन्होंने अपने जालको पूर्णरूपसे फैला दिया

ভীষ্ম বললেন— “হে জনাধিপ! তখন তারা সম্পূর্ণভাবে জাল ছড়িয়ে দিল। যেখানে মাছ থাকে সেই গভীর জলে পৌঁছে—হে ভরতশ্রেষ্ঠ—তারা তা পুরোপুরি ফেলল।”

Verse 15

ततस्ते बहुभियोंगै: कैवर्ता मत्स्यकाड्क्षिण: । गंगायमुनयोरवारि जालैरभ्यकिरंस्तत:,मछली प्राप्त करनेकी इच्छावाले केवटोंने बहुत-से उपाय करके गंगा-यमुनाके जलको जालोंसे आच्छादित कर दिया

ভীষ্ম বললেন— “তারপর মাছ ধরার আকাঙ্ক্ষায় সেই কৈবর্তরা নানা কৌশল অবলম্বন করে গঙ্গা-যমুনার জলকে যেন জালের জালিতে ঢেকে দিল।”

Verse 16

जाल सुविततं तेषां नवसूत्रकृतं तथा । विस्तारायामसम्पन्नं यत्‌ तत्र सलिले$क्षिपन्‌

ভীষ্ম বললেন— “তারা জলে এক সু-বিস্তৃত জাল ফেলল—নতুন সুতোয় গাঁথা, প্রস্থ ও দৈর্ঘ্যে সম্পূর্ণ।”

Verse 17

ततस्ते सुमहच्चैव बलवच्च सुवर्तितम्‌ । अवतीर्य ततः सर्वे जालं चकृषिरे तदा

তারপর তারা সেই অতি বৃহৎ, দৃঢ় ও সু-বোনা জালটি নামাল। অতঃপর সকলেই নেমে পড়ে তখনই জাল টানতে লাগল।

Verse 18

अभीतरूपा: संहृष्टा अन्योन्यवशवर्तिन: । बबन्धुस्तत्र मत्स्यांश्व तथान्यान्‌ जलचारिण:

নিজেদের মনোহর রূপে মুগ্ধ ও উল্লসিত হয়ে তারা পরস্পরের বশে চলতে লাগল। আর সেখানে তারা মাছ এবং অন্যান্য জলচর প্রাণীকেও বেঁধে ফেলল।

Verse 19

उनका वह जाल नये सूतका बना हुआ और विशाल था तथा उसकी लंबाई-चौड़ाई भी बहुत थी एवं वह अच्छी तरहसे बनाया हुआ और मजबूत था। उसीको उन्होंने वहाँ जलपर बिछाया था। थोड़ी देर बाद वे सभी मल्लाह निडर होकर पानीमें उतर गये। वे सभी प्रसन्न और एक-दूसरेके अधीन रहनेवाले थे। उन सबने मिलकर जालको खींचना आरम्भ किया। उस जालमें उन्होंने मछलियोंके साथ ही दूसरे जल-जन्तुओंको भी बाँध लिया था ।। १६-- १८ || तथा मत्स्यै: परिवृतं च्यवनं भृगुनन्दनम्‌ । आकर्षयन्महाराज जालेनाथ यदृच्छया

ভীষ্ম বললেন—মহারাজ! জাল টানতে টানতে জেলেরা দৈবক্রমে সেই জালেই মাছের বেষ্টনীতে থাকা ভৃগুনন্দন ঋষি চ্যবনকেও টেনে তুলল।

Verse 20

नदीशैवलदिग्धाडुं हरिश्मश्रुजटाधरम्‌ । लग्नै: शड्खनखेैगत्रि क्रोडैश्वित्रिरिवार्पितम्‌

ভীষ্ম বললেন—তাঁর সমগ্র দেহ নদীর শৈবাল-লেপে মাখামাখি ছিল। গোঁফ, দাড়ি ও জটা সবুজ হয়ে গিয়েছিল; আর শঙ্খ প্রভৃতি জলচরদের নখের আঁচড়ে তাঁর অঙ্গে বিচিত্র রেখা ফুটে উঠেছিল—যেন শূকরের অদ্ভুত রোমে অলংকৃত।

Verse 21

तं जालेनोद्धृतं दृष्टवा ते तदा वेदपारगम्‌ । सर्वे प्राजजलयो दाशा: शिरोभि: प्रापतन्‌ भुवि,वेदोंके पारंगत उन विद्वान महर्षिको जालके साथ खिंचा देख सभी मल्लाह हाथ जोड़ मस्तक झुका पृथ्वीपर पड़ गये

ভীষ্ম বললেন—জালের সঙ্গে টেনে তোলা বেদপारগ ঋষিকে দেখে, সকল জেলে করজোড়ে মাথা নত করে ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল।

Verse 22

परिखेदपरित्रासाज्जालस्यथाकर्षणेन च । मत्स्या बभूवुर्व्यापन्ना: स्थलसंस्पर्शनेन च

ভীষ্ম বললেন—জালের তীব্র ক্লান্তি ও আতঙ্কে, জাল টেনে তোলার কষ্টে, আর শুষ্ক ভূমির স্পর্শে বহু মাছ প্রাণ হারাল। মাছদের এই নিধন দেখে মুনি করুণায় আচ্ছন্ন হলেন এবং বারবার দীর্ঘ নিশ্বাস ফেলতে লাগলেন।

Verse 23

स मुनिस्तत्‌ तदा दृष्टवा मत्स्यानां कदनं कृतम्‌ । बभूव कृपयाविष्टो नि:श्वसंश्व॒ पुन: पुन:

মুনি যখন দেখলেন যে মাছদের নিধন সম্পন্ন হয়েছে, তখন তিনি করুণায় আচ্ছন্ন হলেন এবং বারবার গভীর নিশ্বাস ফেলতে লাগলেন।

Verse 24

निषादा ऊचु. अज्ञानाद्‌ यत्‌ कृतं पापं प्रसाद तत्र नः कुरु । करवाम प्रियं कि ते तन्नो ब्रूहि महामुने

নিষাদরা বলল—হে মহামুনি! অজ্ঞানতাবশত আমরা যে পাপ করেছি, তাতে আমাদের ক্ষমা করে প্রসন্ন হোন। আর বলুন, আমরা আপনার কোন প্রিয় কাজটি করব?

Verse 25

इत्युक्तो मत्स्यमध्यस्थश्ष्यवनोवाक्यमत्रवीत्‌ । यो मेडद्य परम: कामस्तं शृणुध्वं समाहिता:

তাদের কথা শুনে মাছদের মাঝখানে বসে থাকা মহর্ষি চ্যবন বললেন—“হে জেলেরা, আজ এই মুহূর্তে আমার সর্বোচ্চ ইচ্ছা কী, মনোযোগ দিয়ে শোনো।”

Verse 26

प्राणोत्सर्ग विसर्ग वा मत्स्यैर्यास्याम्यहं सह । संवासान्नोत्सहे त्यक्तुं सलिलेडध्युषितानहम्‌

“প্রাণত্যাগ হোক বা প্রাণরক্ষা—আমি এই মাছদের সঙ্গেই তা গ্রহণ করব। এরা আমার সহবাসী; বহুদিন আমি এদের সঙ্গে জলে বাস করেছি, তাই এদের ত্যাগ করতে আমার সাহস হয় না।”

Verse 27

जालके साथ नदीमेंसे निकाले गये महर्षि च्यवन इत्युक्तास्ते निषादास्तु सुभुशं॑ भयकम्पिता: । सर्वे विवर्णवदना नहुषाय न्यवेदयन्‌

ভীষ্ম বললেন—যখন নিষাদরা শুনল যে জালের সঙ্গে নদী থেকে যাঁকে টেনে তোলা হয়েছে তিনি মহর্ষি চ্যবন, তখন তারা প্রবল ভয়ে কাঁপতে লাগল। সবার মুখ ফ্যাকাশে হয়ে গেল; তারা তৎক্ষণাৎ রাজা নহুষের কাছে গিয়ে সম্পূর্ণ সংবাদ নিবেদন করল।

Verse 50

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनोपाख्याने पज्चाशत्तमोडथध्याय:

ইতি শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে চ্যবনোপাখ্যানের পঞ্চাশত্তম অধ্যায় সমাপ্ত।

Frequently Asked Questions

Whether royal duty and ethical composure can be sustained when an authority figure imposes humiliating, costly, and physically punishing demands—testing the boundary between service and resentment.

Dharma is validated by inner steadiness: the chapter presents non-anger, non-envy, and disciplined giving as practices that convert trial into purification and social credibility, rather than as mere ideals.

A direct phalaśruti formula is not foregrounded; instead, the narrative itself supplies the result: restoration of youth and health, receipt of a boon, and the assurance of desired outcomes—framing ethical endurance as causally efficacious within the epic’s moral logic.