
Vipula’s Guru-Obedience, Divine Flowers, and the Peril of Others’ Oaths (विपुलोपाख्यानम्—पुष्पप्राप्तिः शपथ-प्रसङ्गश्च)
Upa-parva: Dāna–Dharma Exempla: The Episode of Vipula and the Divine Flowers (Book 13, Adhyāya 42)
Bhīṣma narrates that Vipula, having performed severe tapas in accordance with his guru’s command, becomes confident in his merit and moves about acclaimed. In the same timeframe, Ruci (associated with wealth and giving) encounters divine, fragrant flowers that have fallen near an āśrama from a celestial woman passing through the sky. Ruci gathers them, is invited onward, and the kinship network is clarified: her elder sister Prabhāvatī is married to Citraratha of Aṅga. When the flowers are noticed, the matter is reported, and the ascetic Devaśarman instructs Vipula to retrieve such flowers. Vipula obeys without deliberation, goes to the place where the blossoms fell, and collects the divine, unfading, fragrant flowers—framed as attained through his tapas. Returning swiftly toward Campā to deliver them to his guru, Vipula witnesses a human couple engaged in a circular contest and quarrel about who is moving faster; their rivalry escalates into an oath that invokes Vipula’s post-mortem destiny as a punitive benchmark for whoever lies. Vipula becomes distressed, interpreting the invocation as a potential contamination of his karmic trajectory. He then sees gamblers similarly making a vow that anyone acting unfairly through greed should attain Vipula’s otherworldly fate. Vipula, unable to locate prior wrongdoing, burns inwardly with anxiety over being named in others’ speech-acts, reflecting that even strict austerity can be burdened by social discourse. After many days of rumination, he concludes he had earlier committed a fault by not speaking truthfully to his guru through deceptive sign-making, and he proceeds to Campā, offers the flowers to the guru, and worships him according to rule—reasserting disciplined submission as the stabilizing axis of dharma.
Chapter Arc: युधिष्ठिर लोक-प्रसिद्ध सत्य को सामने रखकर प्रश्न उठाते हैं—पुरुष बार-बार स्त्रियों में क्यों आसक्त होते हैं, और स्त्रियाँ भी पुरुषों में ही क्यों रजती हैं; इस पारस्परिक आकर्षण के भीतर कौन-सा नियम, कौन-सा भय और कौन-सी मर्यादा काम करती है? → प्रश्न तीखा होता जाता है: ‘पुरुष स्त्रियों का संग क्यों करते हैं? स्त्रियाँ किनमें रजती हैं और फिर क्यों विरजती हैं?’ साथ ही स्त्री-स्वभाव के विषय में प्रचलित कथनों/नीतिवचनों का भार बढ़ता है—सम्मान पाने पर भी मन को विकृत कर देना, अवसर देखकर प्रिय-अप्रिय को वाणी से साध लेना, और सत्य-असत्य को उलट देने जैसी बातें शंका को और गहरा करती हैं। → युधिष्ठिर का निर्णायक प्रश्न उभरता है—‘जिनके विषय में यह कहा गया कि वे झूठ को सच और सच को झूठ ठहरा देती हैं, ऐसी स्त्रियों की रक्षा (संरक्षा) पुरुष कैसे करें?’ यह क्षण अध्याय को ‘आकर्षण’ से उठाकर ‘रक्षा, मर्यादा और नीति’ के कठोर धरातल पर ले आता है। → उत्तर-परंपरा (नीतिशास्त्रीय निष्कर्षों और आचार्य-वचनों के संकेत) के सहारे यह स्थापित किया जाता है कि स्त्री-पुरुष संबंध केवल काम-आकर्षण नहीं, बल्कि बुद्धि, वाणी, सम्मान, तिरस्कार, और काल-योग (समय/परिस्थिति) से संचालित एक सूक्ष्म सामाजिक-धर्मिक तंत्र है; इसलिए ‘रक्षा’ का अर्थ केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि विवेक, मर्यादा, और उचित सम्मान-व्यवहार की नीति भी है। → स्त्री-स्वभाव पर उठी शंकाओं के बाद अगला स्वाभाविक प्रश्न खुला रह जाता है—व्यवहार में कौन-सी ठोस मर्यादाएँ/नीतियाँ अपनाकर गृहस्थ-धर्म और स्त्री-रक्षा दोनों सुरक्षित हों?
Verse 1
ऑपनआक्रात छा सं: एकोनचत्वारिशोड ध्याय: स्त्रियोंकी रक्षाके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न युधिछिर उवाच इमे वै मानवा लोके स्त्रीषु सज्जन्त्यभीक्षणश: । मोहेन परमाविष्टा देवसृष्टेन पार्थिव
যুধিষ্ঠির বললেন—হে পৃথিবীনাথ! এই জগতে মানুষ বারবার নারীদের প্রতি আসক্ত হয়। বিধাতার সৃষ্ট সেই প্রবল মোহে সম্পূর্ণ আচ্ছন্ন হয়ে তারা পুনঃপুন সেই আকর্ষণের দিকেই টেনে যায়।
Verse 2
स्त्रियश्न पुरुषेष्वेव प्रत्यक्ष लोकसाक्षिकम् | अतन्र मे संशयस्तीव्रो हृदि सम्परिवर्तते
যুধিষ্ঠির বললেন—তদ্রূপ নারীরাও পুরুষের প্রতিই আসক্ত হয়; এ কথা প্রত্যক্ষ, এবং সমগ্র লোকই তার সাক্ষী। তাই আমার হৃদয়ে এক তীব্র সংশয় বারবার আবর্তিত হচ্ছে।
Verse 3
कथमासां नरा: सड़ू कुर्वते कुरुनन्दन । स्त्रियो वा केषु रज्यन्ते विरज्यन्ते च ता: पुन:
যুধিষ্ঠির বললেন—হে কুরুনন্দন! কোন কারণে পুরুষেরা নারীদের সঙ্গ কামনা করে? আর নারীরা কোন নিমিত্তে পুরুষের প্রতি অনুরক্ত হয়, এবং আবার কোন কারণে তাদের থেকে বিরক্ত হয়ে সরে যায়?
Verse 4
इति ता: पुरुषव्यापत्र कथं शक््यास्तु रक्षितुम् । प्रमदा: पुरुषेणेह तन्मे व्याख्यातुमहसि
যুধিষ্ঠির বললেন—“যদি নারীরা পুরুষজনিত এমন বিপদের মুখোমুখি হয়, তবে এই জগতে একজন পুরুষ কীভাবে সত্যিই তাদের রক্ষা করতে পারে? দয়া করে আমাকে ব্যাখ্যা করুন।”
Verse 5
पुरुषसिंह! पुरुष यौवनसे उन्मत्त स्त्रियोंकी रक्षा कैसे कर सकता है? यह विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ।।
যুধিষ্ঠির বললেন—“হে পুরুষসিংহ! যৌবনের উন্মাদনায় উচ্ছৃঙ্খল নারীদের থেকে একজন পুরুষ কীভাবে নিজেকে রক্ষা করবে? দয়া করে বিস্তারিত বলুন। কারণ প্রেমক্রীড়ায় মত্ত থেকেও তারা এখানে পুরুষদের প্রতারণা করে; আর তাদের কবলে পড়া কোনো পুরুষই সহজে মুক্ত হতে পারে না।”
Verse 6
गावो नवतृणानीव गृह्नन्त्येता नवं नवम् | शम्बरस्य च या माया माया या नमुचेरपि
যুধিষ্ঠির বললেন—“এ (প্রতারণার কৌশল) বারবার নতুন নতুন করে গ্রহণ করা হয়—যেমন গাভী বারবার নতুন ঘাস গ্রহণ করে। শম্বরের মায়াও এমনই ছিল, আর নমুচির মায়াও তেমনই ছিল।”
Verse 7
हसन्तं प्रहसन्त्येता रुदन्तं प्ररुदन्ति च
যুধিষ্ঠির বললেন—“কেউ হাসলে এরা-ও হাসে; আর কেউ কাঁদলে এরা-ও সঙ্গে কাঁদে।”
Verse 8
उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च वेद बृहस्पति:
যুধিষ্ঠির বললেন—“উশনা (শুক্রাচার্য) যে শাস্ত্র জানেন, আর বৃহস্পতিও যে শাস্ত্র জানেন—”
Verse 9
स्त्रीबुद्ध्या न विशिष्येत तास्तु रक्ष्या: कथं नरै: । जिस नीतिशास्त्रको शुक्राचार्य जानते हैं, जिसे बृहस्पति जानते हैं, वह भी स्त्रीकी बुद्धिसे बढ़कर नहीं है। ऐसी स्त्रियोंकी रक्षा पुरुष कैसे कर सकते हैं ।।
স্ত্রীর বুদ্ধির তুলনা নেই; তবে পুরুষেরা কীভাবে তাদের রক্ষা করবে? শুক্রাচার্য ও বৃহস্পতির নীতিশাস্ত্র-জ্ঞানও স্ত্রীর বুদ্ধিকে অতিক্রম করতে পারে না—এমন নারীদের রক্ষা করবে কে?
Verse 10
स्त्रीणां बुद्ध्यर्थनिष्कर्षादर्थशास्त्राणि शत्रुहन्
হে শত্রুহন! নারীদের বুদ্ধির উদ্দেশ্য ও কার্যপ্রণালীকে টেনে বের করে স্পষ্ট করার প্রয়োজন থেকেই অর্থশাস্ত্রসমূহ প্রবর্তিত হয়েছে।
Verse 11
सम्पूज्यमाना: पुरुषैर्विकुर्वन्ति मनो नृषु
পুরুষদের দ্বারা বারবার সম্মানিত হলে তারা পুরুষদের প্রতি মনকে বিকৃত করে ফেলে।
Verse 12
इमा: प्रजा महाबाहो धार्मिक्य इति न: श्रुतम्
হে মহাবাহো! আমরা শুনেছি যে এই নারী-রূপিণী প্রজারা স্বভাবতই ধর্মপরায়ণা; তবু তারা সম্মানিত হোক বা অপমানিত—সদাই পুরুষের মনে বিকার জাগায়। তবে তাদের রক্ষা করবে কে? এটাই আমার মহাসংশয়।
Verse 13
सत्कृतासत्कृताश्चापि विकुर्वन्ति मन: सदा । कस्ता: शक्तो रक्षितुं स्थादिति मे संशयो महान्
নারীরা সম্মানিত হোক বা অপমানিত—সদাই মনে বিকার জাগায়। তবে তাদের রক্ষা করতে কে সক্ষম? এটাই আমার মহাসংশয়।
Verse 14
तथा ब्रूहि महाभाग कुरूणां वंशवर्धन । यदि शक्या कुरुश्रेष्ठ रक्षा तासां कदाचन ।।
অতএব, হে মহাভাগ, কুরুবংশবর্ধন! বলো—যদি কোনো কালে কোনো উপায়ে সেই নারীদের রক্ষা সম্ভব হয়, হে কুরুশ্রেষ্ঠ, তবে সেই উপায় আমাকে ব্যাখ্যা করো। আর যদি পূর্বে কখনও এমন রক্ষা সম্পন্ন হয়ে থাকে, তবে সেই দৃষ্টান্তও আমাকে বিস্তারে বর্ণনা করো।
Verse 38
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पंचचूडा और नारदका संवादविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে পঞ্চচূড়া ও নারদের সংলাপবিষয়ক অষ্টত্রিংশ অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 39
इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि स्त्रीस्वभावकथने एकोनचत्वारिंशो5ध्याय:
ইতি শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে স্ত্রীস্বভাবকথনবিষয়ক ঊনচল্লিশতম অধ্যায়।
Verse 63
बले: कुम्भीनसे श्वैव सर्वास्ता योषितो विदु: । जैसे गौएँ नयी-नयी घास चरती हैं
যুধিষ্ঠির বললেন—এই নারীরা বলি, কুম্ভীনস, শম্বর ও নমুচি প্রভৃতির মায়াবিদ্যা ভালোই জানে। যেমন গাভীরা সদা নতুন-নতুন ঘাস চরে, তেমনি এই যোষিতেরা নিত্য নতুন-নতুন পুরুষকে আশ্রয় করে—এমনই বলা হয়।
Verse 73
अप्रियं प्रियवाक्यैश्न गृह्लते कालयोगत: । पुरुषको हँसते देख ये स्त्रियाँ जोर-जोरसे हँसती हैं। उसे रोते देख स्वयं भी फूट- फ़ूटकर रोने लगती हैं और अवसर आनेपर अप्रिय पुरुषको प्रिय वचनोंद्वारा अपना लेती हैं
যুধিষ্ঠির বললেন—কাল ও সুযোগের যোগে নারীরা মধুর বাক্যে অপ্রিয় পুরুষকেও বশে আনতে পারে। পুরুষকে হাসতে দেখলে তারা উচ্চস্বরে হাসে; তাকে কাঁদতে দেখলে নিজেরাও অশ্রুসজল হয়ে কাঁদে। আর সুযোগ পেলে সুমধুর কথায় অননুকূলকেও আপন করে নেয়।
Verse 96
इति यास्ता: कथं वीर संरक्ष्या: पुरुषैरिह । वीर! जिनके झूठको भी सच और सचको भी झूठ बताया गया है, ऐसी स्त्रियोंकी रक्षा पुरुष यहाँ कैसे कर सकते हैं?
যুধিষ্ঠির বললেন—হে বীর! যাদের মিথ্যাকে সত্য আর সত্যকে মিথ্যা বলে প্রচার করা হয়, এমন নারীদের রক্ষা এই জগতে পুরুষেরা কীভাবে করবে?
Verse 103
बृहस्पतिप्रभृतिभिरमर्मन्ये सद्धि: कृतानि वै । शत्रुघाती नरेश! मुझे तो ऐसा लगता है कि स्त्रियोंकी बुद्धिमें जो अर्थ भरा है
যুধিষ্ঠির বললেন—হে শত্রুনাশক রাজা! আমার দৃঢ় বিশ্বাস, বৃহস্পতি প্রভৃতি মহর্ষিরা নারীদের বুদ্ধিতে নিহিত অর্থবোধ ও ব্যবহারিক প্রজ্ঞার সারটুকু আহরণ করেই নীতিশাস্ত্র রচনা করেছেন।
Verse 116
अपास्ताश्च तथा राजन् विकुर्वन्ति मनः स्त्रिय: । नरेश्वर! पुरुषोंद्वारा सम्मानित होनेपर भी ये रमणियाँ उनका मन विकृत कर देती हैं और उनके द्वारा तिरस्कृत होनेपर भी उनके मनमें विकार उत्पन्न कर देती हैं
যুধিষ্ঠির বললেন—হে নরেশ! নারীরা উভয়ভাবেই মনকে বিচলিত করে। পুরুষের সম্মান পেলেও তারা চিত্তকে টলিয়ে দেয়, আর তাদের দ্বারা প্রত্যাখ্যাত হলেও মনেই বিকার জাগায়।
Vipula’s disciplined merit is challenged not by his own overt action but by being used as a reference-point in others’ competitive oaths; the tension lies in how speech-acts can create perceived karmic exposure and moral anxiety for an uninvolved party.
Austerity and achievement do not substitute for vigilance in truthfulness and humility; dharma is stabilized through correct relation to the guru and careful speech, especially when social discourse attempts to instrumentalize another person’s destiny.
No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; the meta-commentary is implicit—ethical speech and guru-aligned conduct protect one’s moral trajectory, while reckless oath-making illustrates avoidable social harm.