Adhyaya 172
Anushasana ParvaAdhyaya 17218 Verses

Adhyaya 172

Chapter Arc: जनमेजय जिज्ञासा करता है—जब भीष्म शरशय्या पर शान्त पड़े थे और पाण्डव उनकी सेवा में उपस्थित थे, तब आगे क्या हुआ? उसी क्षण व्यास का आगमन कथा को नई दिशा देता है। → युधिष्ठिर दान-धर्म और धर्म-आगम सुनकर संशय-रहित हो चुके हैं, पर राज्य-व्यवस्था और कुटुम्ब-घाव अभी शेष हैं। व्यास, भीष्म से निवेदन कराते हैं कि युधिष्ठिर को नगर-प्रवेश और शासन-कार्य हेतु अनुमति दें—क्योंकि शोक-ग्रस्त मन को अब कर्तव्य में स्थिर करना है। → व्यास के वचन पर भीष्म की ‘अनुज्ञा’ निर्णायक बनती है—युधिष्ठिर को कृष्ण सहित आगे बढ़ने, प्रजा को रज्जयित करने, प्रकृतियों (मंत्री-वर्ग आदि) को सान्त्वना देने और सुहृदों का सत्कार करने का आदेश/उपदेश मिलता है। → युधिष्ठिर धृतराष्ट्र को अग्र में रखकर, पतिव्रता गान्धारी तथा ऋषियों, भ्राताओं और केशव के साथ हस्तिनापुर (वारणसाह्वय) में प्रवेश करते हैं; नगरजन, जनपद और वृद्ध मंत्री साथ होते हैं—राज्य पुनः व्यवस्था की ओर लौटता है। → नगर-प्रवेश के बाद शासन की वास्तविक कठिनाइयाँ—विजय के बाद का शोक, वैराग्य और प्रजा-धर्म—अब किस प्रकार निभेंगे?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमयहाभारत अनुशासनपवके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें देवता आदिके वंशका वर्णन नामक एक सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १६५ ॥/ षट्षष्ट्यधिकशततमोड< ध्याय: भीष्मकी अनुमति पाकर युधिष्ठटिरका सपरिवार हस्तिनापुरको प्रस्थान जनमेजय उवाच शरतल्पगते भीष्मे कौरवाणां धुरन्धरे । शयाने वीरशयने पाण्डवै: समुपस्थिते

জনমেজয় বললেন—কৌরবদের ধুরন্ধর ভীষ্ম যখন শরশয্যায় পতিত, বীরশয্যায় শায়িত, আর পাণ্ডবেরা তাঁকে ঘিরে উপস্থিত—তখন কাহিনি যুদ্ধের হিংসা থেকে সরে ধর্মোপদেশের দিকে প্রবাহিত হল।

Verse 2

युधिष्ठिरो महाप्राज्ञो मम पूर्वपितामह: । धर्माणामागमं श्रुत्वा विदित्वा सर्वसंशयान्‌

জনমেজয় বললেন—আমার পূর্বপুরুষ মহাপ্রাজ্ঞ যুধিষ্ঠির ধর্মের প্রামাণ্য উপদেশ শুনে এবং তা জেনে সকল সংশয় দূর করলেন…

Verse 3

दानानां च विधिं श्रुत्वा च्छिन्नर्मार्थसंशय: । यदन्यदकरोद्‌ विप्र तन्मे शंसितुमरहसि

জনমেজয় বললেন— দানের বিধি ও নিয়ম শুনে আমার অর্থ-সম্পর্কিত সংশয় কেটে গেছে। হে ব্রাহ্মণ, এরপর তিনি আর যা করেছিলেন, তা আমাকে বলুন; আপনি তা বলার যোগ্য।

Verse 4

जनमेजयने पूछा--विप्रवर! कुरुकुलके धुरन्धर वीर भीष्मजी जब वीरोंके सोनेयोग्य बाणशय्यापर सो गये और पाण्डवलोग उनकी सेवामें उपस्थित रहने लगे

বৈশম্পায়ন বললেন— ধর্মোপদেশ সমাপ্ত করে ভীষ্ম যখন নীরব হলেন, তখন কিছুক্ষণ সমগ্র রাজসভা স্থির হয়ে রইল—যেন কাপড়ে আঁকা চিত্র, নড়াচড়াহীন ও নিস্তব্ধ।

Verse 5

मुहूर्तमिव च ध्यात्वा व्यास: सत्यवतीसुतः । नृपं शयानं गाड़ेयमिदमाह वचस्तदा,तब दो घड़ीतक ध्यान करनेके पश्चात्‌ सत्यवती-नन्दन व्यासने वहाँ सोये हुए गंगानन्दन महाराज भीष्मजीसे इस प्रकार कहा--

বৈশম্পায়ন বললেন— কিছুক্ষণ ধ্যান করে সত্যবতীপুত্র ব্যাস তখন শরশয্যায় শায়িত গঙ্গাপুত্র রাজা ভীষ্মকে এই বাক্য বললেন।

Verse 6

राजन्‌ प्रकृतिमापन्न: कुरुराजो युधिष्ठिर: । सहितो भ्रातृभि: सर्व: पार्थिवैश्वानुयायिभि:

বৈশম্পায়ন বললেন— হে রাজন, কুরুদের রাজা যুধিষ্ঠির এখন স্বাভাবিক স্থৈর্যে ফিরে এসেছেন। তিনি তাঁর সকল ভ্রাতা এবং অনুসারী রাজন্যবর্গসহ আপনার সেবায় উপস্থিত। অতএব তাঁদের হস্তিনাপুরে গমনের অনুমতি দিন।

Verse 7

उपास्ते त्वां नरव्यात्र सह कृष्णेन धीमता । तमिमं पुरयानाय समनुज्ञातुमहसि

বৈশম্পায়ন বললেন— হে নরব্যাঘ্র, প্রজ্ঞাবান কৃষ্ণের সঙ্গে যুধিষ্ঠির আপনার সেবায় উপস্থিত। অতএব তাঁকে নগরে (হস্তিনাপুরে) গমনের অনুমতি দেওয়াই আপনার উচিত।

Verse 8

एवमुक्तो भगवता व्यासेन पृथिवीपति: । युधिष्ठटिरं सहामात्यमनुजज्ञे नदीसुत:,भगवान्‌ व्यासके ऐसा कहनेपर पृथ्वीपालक गंगापुत्र भीष्मने मन्त्रियोंसहित राजा युधिष्ठिरको जानेकी आज्ञा दी

ভগবান ব্যাস এভাবে বললে নদীপুত্র, পৃথিবীপতি ভীষ্ম মন্ত্রীদেরসহ রাজা যুধিষ্ঠিরকে প্রস্থান করার অনুমতি দিলেন।

Verse 9

उवाच चैन मधुरं नृपं शान्तनवो नृप: । प्रविशस्व पुरी राजन्‌ व्येतु ते मानसो ज्वरः

তখন শান্তনবপুত্র ভীষ্ম মধুর বাক্যে রাজাকে বললেন—“রাজন! এখন নগরে প্রবেশ করো; তোমার মনের জ্বর, সমস্ত উদ্বেগ দূর হোক।”

Verse 10

यजस्व विविधीर्यज्निर्बन्वन्नैः स्वाप्तदक्षिणै: । ययातिरिव राजेन्द्र श्रद्धादमपुर:सर:

রাজেন্দ্র! রাজা যযাতির ন্যায় শ্রদ্ধা ও ইন্দ্রিয়সংযমকে অগ্রে রেখে, প্রচুর অন্ন এবং যথোচিত দক্ষিণাসহ নানাবিধ যজ্ঞ সম্পাদন করো।

Verse 11

क्षत्रधर्मरत: पार्थ पितृन्‌ देवांश्व तर्पय । श्रेयसा योक्ष्यसे चैव व्येतु ते मानसो ज्वर:

পার্থ! ক্ষত্রধর্মে অবিচল থেকে পিতৃগণ ও দেবতাদের তৃপ্ত করো। তুমি অবশ্যই কল্যাণ লাভ করবে; অতএব তোমার মনের জ্বর, উদ্বেগ, দূর হোক।

Verse 12

रज्जयस्व प्रजा: सर्वा: प्रकृती: परिसान्त्वय । सुहृद: फलसत्कारैरर्चयस्व यथाहत:

সমস্ত প্রজাকে সন্তুষ্ট রাখো। মন্ত্রী প্রভৃতি রাষ্ট্রাঙ্গকে সান্ত্বনা দাও। সুহৃদদের ফল ও আতিথ্য-সত্কারের দ্বারা যোগ্যতানুসারে সম্মান করো।

Verse 13

अनु त्वां तात जीवन्तु मित्राणि सुहृदस्तथा । चैत्यस्थाने स्थितं वृक्षं फलवन्तमिव द्विजा:

বৈশম্পায়ন বললেন—বৎস! তোমার আশ্রয়ে তোমার বন্ধু ও সুহৃদগণ জীবিকা নির্বাহ করে বেঁচে থাকুক; যেমন পবিত্র চৈত্যস্থানের পাশে ফলভরা বৃক্ষে পাখিরা এসে বাসা বাঁধে।

Verse 14

आगन्तव्यं च भवता समये मम पार्थिव । विनिवृत्ते दिनकरे प्रवृत्ते चोत्तरायणे,'पृथ्वीनाथ! जब सूर्यनारायण दक्षिणायनसे निवृत्त हो उत्तरायणपर आ जाये, उस समय तुम फिर हमारे पास आना”

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! নির্ধারিত সময়ে তুমি আবার আমার কাছে আসবে—যখন সূর্য দক্ষিণায়ন ত্যাগ করে উত্তরায়ণে প্রবৃত্ত হবে।

Verse 15

तथेत्युक्त्वा च कौन्तेय: सो5भिवाद्य पितामहम्‌ । प्रययौँ सपरीवारो नगरं नागसाह्दयम्‌,तब “बहुत अच्छा” कहकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर पितामहको प्रणाम करके परिवारसहित हस्तिनापुरकी ओर चल दिये

বৈশম্পায়ন বললেন—“তথাস্তु” বলে কুন্তীপুত্র পিতামহকে প্রণাম করে, পরিজনসহ নাগসাহ্বয় নগরী (হস্তিনাপুর)-এর দিকে যাত্রা করলেন।

Verse 16

धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य गान्धारी च पतिव्रताम्‌ । सह तैर््रषिशभि: सर्वैर्गभ्रातृभि: केशवेन च

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! কুরুশ্রেষ্ঠ যুধিষ্ঠির রাজা ধৃতরাষ্ট্রকে অগ্রে রেখে এবং পতিব্রতা গান্ধারীকে সঙ্গে নিয়ে, সকল ঋষি, ভ্রাতৃগণ, কেশব (শ্রীকৃষ্ণ), নগর ও জনপদের লোকজন এবং প্রবীণ মন্ত্রীদের সহিত হস্তিনাপুরে প্রবেশ করলেন।

Verse 17

पौरजानपदैश्वैव मन्त्रिवृद्धैश्व पार्थिव । प्रविवेश कुरुश्रेष्ठ: पुरं वारणसाह्वयम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! কুরুশ্রেষ্ঠ যুধিষ্ঠির নগরবাসী, জনপদবাসী এবং প্রবীণ মন্ত্রীদের সহিত বারণসাহ্বয় (হস্তিনাপুর) নগরীতে প্রবেশ করলেন।

Verse 166

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि भीष्मानुज्ञायां षट्षष्ट्यधिकशततमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে, ভীষ্মের অনুমোদনের প্রসঙ্গে, একশো ছেষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।