Adhyaya 160
Anushasana ParvaAdhyaya 16036 Verses

Adhyaya 160

Chapter Arc: पवन (वायु) अर्जुन से एक प्राचीन, विस्मयकारी आख्यान आरम्भ करते हैं—जब एक राजा ने ‘भूमि’ को ही ब्राह्मणों को दक्षिणा में देने का संकल्प किया, और स्वयं पृथ्वी-देवी उस दान की बात सुनकर विचलित हो उठीं। → भूमि-देवी सोचती हैं कि जो समस्त प्राणियों को धारण करती है, उसे ‘दान’ कैसे किया जा सकता है; यदि राजा का ऐसा विचार है तो वे भूमित्व त्यागकर ब्रह्मलोक चली जाएँगी। इसी धारा में वायु कश्यप-ऋषि के अद्भुत प्रभाव का संकेत देते हैं और कथा को उतथ्य मुनि, उनकी पत्नी भद्रा, तथा वरुण के प्रसंग की ओर मोड़ते हैं—जहाँ लोकपाल वरुण भद्रा के साथ जललोक में रमण करने लगते हैं। नारद इस अपमान/हरण का समाचार उतथ्य तक पहुँचाते हैं; उतथ्य नारद को कठोर संदेश देकर वरुण के पास भेजते हैं, पर वरुण भद्रा को छोड़ने से इनकार कर देता है। → उतथ्य का तीखा प्रश्न और धर्म-आह्वान वरुण के सम्मुख गूँजता है—‘मेरी पत्नी को छोड़ो; तुमने उसे क्यों हर लिया?’ पर वरुण प्रत्युत्तर देता है कि भद्रा उसे अत्यन्त प्रिय है और वह उसे छोड़ नहीं सकता। लोकपाल की सत्ता बनाम ऋषि-धर्म का यह टकराव कथा का शिखर बनता है। → कथा का निष्कर्ष दान-धर्म के व्यापक संकेत में बैठता है—दान का अधिकार, दान की सीमा, और ‘जो धारण करती है’ (भूमि/पत्नी/मर्यादा) उसे वस्तु की तरह देने-लेने की असंगति। वायु अर्जुन को यह बोध कराते हैं कि दान का तेज तभी धर्म है जब वह अन्याय, हरण और अहंकार से रहित हो। → वरुण के अडिग इनकार के बाद प्रश्न खुला रह जाता है—क्या लोकपाल अपने आसन-धर्म के नाम पर ऋषि के गृह-धर्म का अतिक्रमण कर सकता है, और इस संघर्ष का दैवी-नैतिक परिणाम क्या होगा?

Shlokas

Verse 1

ऑपनआक्राता बछ। 2 चतुष्पञ्चाशर्दाधिकशततमो< ध्याय: ब्राह्मणशिरोमणि उतथ्यके प्रभावका वर्णन वायुरुवाच इमां भूमिं द्विजातिभ्यो दित्सुर्वैं दक्षिणां पुरा । अड्ढी नाम नृपो राजंस्तततक्रिन्तां मही ययौ

বায়ুদেব বললেন—হে রাজন! প্রাচীনকালে অঙ্গ নামে এক নৃপতি এই পৃথিবীকেই দ্বিজদের (ব্রাহ্মণদের) দক্ষিণা-রূপে দান করতে চেয়েছিলেন। তা জানতে পেরে পৃথিবী গভীর উদ্বেগে নিমগ্ন হল।

Verse 2

धारिणीं सर्वभूतानामयं प्राप्प वरो नूपः । कथमिच्छति मां दातु द्विजेभ्यो ब्रह्मण: सुताम्‌

সে ভাবতে লাগল—‘আমি সর্বভূতধারিণী, আর ব্রহ্মার কন্যা। আমাকে লাভ করে এই শ্রেষ্ঠ নৃপতি কেন আমাকে দ্বিজদের (ব্রাহ্মণদের) দান করতে চান?’

Verse 3

साहं त्यक्त्वा गमिष्यामि भूमित्व॑ं ब्रह्मण: पदम्‌ | अयं सराष्ट्रो नृपतिर्मा भूदिति ततोडगमत्‌

“যদি তার এমনই মত হয়, তবে আমিও ভূমিত্ব—লোকধারণরূপ ধর্ম—ত্যাগ করে ব্রহ্মলোকে চলে যাব, যাতে এই রাজা রাজ্যসহ বিনষ্ট হয়।” এই স্থির সিদ্ধান্ত করে পৃথিবী প্রস্থান করল।

Verse 4

ततस्तां कश्यपो दृष्टवा व्रजन्तीं पृथिवीं तदा । प्रविवेश महीं सद्यो मुक्त्वा55त्मानं समाहित:

তখন পৃথিবীকে প্রস্থান করতে দেখে মহর্ষি কশ্যপ যোগের আশ্রয় নিলেন; সমাহিতচিত্তে দেহ ত্যাগ করে তিনি তৎক্ষণাৎ ভূমির স্থূল রূপে প্রবেশ করলেন।

Verse 5

ऋद्धा सा सर्वतो जज्ञे तृणीषधिसमन्विता । धर्मोत्तरा नष्टभया भूमिरासीत्‌ ततो नृप

নরেশ্বর! তাঁর প্রবেশে পৃথিবী পূর্বের চেয়েও অধিক সমৃদ্ধ হল। চারিদিকে ঘাস-পাতা ও ঔষধির প্রাচুর্য দেখা দিল। ধর্ম ক্রমে ক্রমে বৃদ্ধি পেল এবং ভয় দূর হয়ে গেল।

Verse 6

एवं वर्षसहस्राणि दिव्यानि विपुलब्रत: । त्रिंशत: कश्यपो राजन्‌ भूमिरासीदतन्द्रित:

রাজন! এইভাবে অলসতাহীন, মহাব্রতধারী মহর্ষি কশ্যপ ত্রিশ হাজার দিব্য বছর পৃথিবীর রূপে স্থিত রইলেন।

Verse 7

अथागम्य महाराज नमस्कृत्य च कश्यपम्‌ | पृथिवी काश्यपी जज्ञे सुता तस्य महात्मन:

মহারাজ! তারপর পৃথিবী ব্রহ্মলোক থেকে ফিরে এসে মহাত্মা কশ্যপকে প্রণাম করে তাঁর কন্যারূপে অবস্থান করল। সেই সময় থেকেই তার নাম হল কাশ্যপী।

Verse 8

एष राजन्नीदृशो वै ब्राह्मण: कश्यपो5 भवत्‌ । अन्य प्रब्रृहि वा त्वं च कश्यपात्‌ क्षत्रियं वरम्‌

অর্জুন বললেন—হে রাজন! কশ্যপ ব্রাহ্মণ সত্যই এমনই ছিলেন; তাঁর সেইরূপ প্রভাব প্রত্যক্ষ দেখা গেছে। কশ্যপের থেকেও শ্রেষ্ঠ কোনো অন্য ক্ষত্রিয়-বরকে যদি তুমি জানো, তবে বলো।

Verse 9

तूष्णीं बभूव नृपति: पवनस्त्वब्रवीत्‌ पुन: । शृणु राजन्नुतथ्यस्य जातस्याड्विरसे कुले

রাজা নীরব রইলেন। তখন পবনদেব পুনরায় বললেন—“হে রাজন! এখন অঙ্গিরার বংশে জন্ম নেওয়া উতথ্যের বৃত্তান্ত শোনো।”

Verse 10

भद्रा सोमस्य दुहिता रूपेण परमा मता | तस्यास्तुल्यं पतिं सोम उतथ्यं समपश्यत

সোমের কন্যা ভদ্রা রূপে অতুলনীয়া বলে গণ্য ছিল। সোম তার উপযুক্ত, তারই সমতুল্য স্বামী হিসেবে উতথ্যকেই দেখলেন।

Verse 11

सा च तीव्रं तपस्तेपे महाभागा यशस्विनी । उतथ्यार्थ तु चार्वज्ी परं नियममास्थिता

সেই মহাভাগ্যা যশস্বিনী ভদ্রা উতথ্যকে স্বামী হিসেবে লাভ করার জন্য সর্বোচ্চ নিয়ম অবলম্বন করে কঠোর তপস্যায় প্রবৃত্ত হলেন।

Verse 12

तत आहूय सोतथ्यं ददावत्रिरयशस्विनीम्‌ | भार्यार्थे स च जग्राह विधिवद्‌ भूरिदक्षिण:

তারপর কিছু কাল পরে সোমের পিতা মহর্ষি অত্রি উতথ্যকে আহ্বান করে তাঁর যশস্বিনী পৌত্রী (ভদ্রা)-কে বিবাহে দান করলেন। প্রচুর দক্ষিণাদাতা উতথ্য বিধি অনুসারে তার হাত গ্রহণ করে তাকে পত্নীরূপে গ্রহণ করলেন।

Verse 13

तां त्वकामयत श्रीमान्‌ वरुण: पूर्वमेव ह । स चागम्य वनप्रस्थं यमुनायां जहार ताम्‌

শ্রীমান বরুণদেব সেই কন্যাকে প্রথম থেকেই কামনা করতেন। তিনি বনবাসী মুনির আশ্রমের নিকটে এসে যমুনায় স্নানরত অবস্থায় তাকে অপহরণ করে নিয়ে গেলেন।

Verse 14

जलेश्वरस्तु हृत्वा तामनयत्‌ स्वं पुरं प्रति । परमाद्भुतसंकाशं षघट्सहस्रशतह्नदम्‌,'जलेश्वर वरुण उस स्त्रीको हरकर अपने परम अद्भुत नगरमें ले आये; जहाँ छ: हजार बिजलियोंका प्रकाश* छा रहा था

জলের অধিপতি বরুণ তাকে হরণ করে নিজের নগরের দিকে নিয়ে গেলেন—সে নগর ছিল পরম আশ্চর্য দীপ্তিময়, যেন অসংখ্য বিদ্যুৎ-ঝলকের আলো।

Verse 15

न हि रम्यतरं किंचित्‌ तस्मादन्यत्‌ पुरोत्तमम्‌ | प्रासादैरप्सरोभिश्व दिव्यै: कामैश्न शोभितम्‌

সেই শ্রেষ্ঠ নগরের চেয়ে অধিক মনোরম আর কিছুই ছিল না। অসংখ্য প্রাসাদ, অপ্সরা এবং দিব্য ভোগবিলাসে তা শোভিত ছিল।

Verse 16

तत्र देवस्तया सार्ध रेमे राजन्‌ जलेश्वर: । अथाख्यातमुतथ्याय तत: पत्न्यवमर्दनम्‌

হে রাজন, সেখানে জলের অধিপতি দেব বরুণ তার সঙ্গে ক্রীড়া-রতি করতে লাগলেন। তারপর নারদ উতথ্যকে সংবাদ দিলেন যে বরুণ তার পত্নীকে হরণ করে অপমানিত করেছেন।

Verse 17

तच्छुत्वा नारदात्‌ सर्वमुतथ्यो नारदं तदा । प्रोवाच गच्छ ब्रूहि त्वं वरुणं परुषं वच:

নারদের মুখে সব কথা শুনে উতথ্য তখন নারদকে বললেন—“তুমি যাও, বরুণকে আমার এই কঠোর বাক্য জানিয়ে দাও।”

Verse 18

मद्वाक्यान्मुज्च मे भार्या कस्मात्‌ तां हृतवानसि । लोकपालो<सि लोकानां न लोकस्य विलोपक:

আমার কথায় আমার স্ত্রীকে ছেড়ে দাও। কেন তুমি তাকে অপহরণ করেছ? তুমি তো লোকসমূহের লোকপাল, লোক-ব্যবস্থার বিনাশক নও। উতথ্য মুনির পত্নীকে ছেড়ে দাও—কেন তুমি তাকে হরণ করেছ?

Verse 19

सोमेन दत्ता भार्या मे त्वया चापद्ताद्य वै | इत्युक्तो वचनात्‌ तस्य नारदेन जलेश्वर:

সোম যে স্ত্রী আমাকে দান করেছিলেন, আজ তাকেই তুমি অপহরণ করেছ। নারদের বলা এই কথায় জলেশ্বর বরুণকে এভাবে সম্বোধন করা হল।

Verse 20

इति श्रुत्वा वचस्तस्य सो5थ तं वरुणो5ब्रवीत्‌

তার কথা শুনে তখন বরুণ তাকে উত্তর দিলেন।

Verse 21

इत्युक्तो वरुणेनाथ नारद: प्राप्य तं मुनिम्‌ । उतथ्यमब्रवीद्‌ वाक्‍्यं नातिहृष्टमना इव,“वरुणके इस प्रकार उत्तर देनेपर नारदजी उतथ्य मुनिके पास लौट गये और खिन्न-से होकर बोले--

বরুণের এমন উত্তর পেয়ে নারদ সেই মুনি উতথ্যের কাছে ফিরে গিয়ে, যেন মন খুব আনন্দিত নয়—এভাবে বার্তা বললেন।

Verse 22

गले गृहीत्वा क्षिप्तो5स्मि वरुणेन महामुने । न प्रयच्छति ते भार्या यत्‌ ते कार्य कुरुष्व तत्‌

মহামুনি! বরুণ আমার গলা ধরে আমাকে ছুঁড়ে ফেলে দিয়েছে। তিনি আপনার স্ত্রীকে ফিরিয়ে দিচ্ছেন না; এখন আপনার যা কর্তব্য, উদ্দেশ্যসিদ্ধির জন্য তাই করুন।

Verse 23

नारदस्य वच: श्रुत्वा क्रुद्धः प्राज्वलदड्धिरा: । अपिबत्‌ तेजसा वारि विष्ट भ्य सुमहातपा:

নারদের বাক্য শুনে অঙ্গিরার পুত্র উতথ্য ক্রোধে প্রজ্বলিত হয়ে উঠলেন। মহাতপস্বী তিনি তপোবলে জলকে স্তম্ভিত করে নিজের তেজে তা পান করতে লাগলেন।

Verse 24

पीयमाने तु सर्वस्मिंस्तोयेडपि सलिलेश्वर: । सुहृद्धिर्भिक्षमाणो 5पि नैवामुज्चत तां तदा,“जब सारा जल पीया जाने लगा, तब सुहृदोंने जलेश्वर वरुणसे प्रार्थना की तो भी वे भद्राको न छोड़ सके

যখন সমস্ত জল পান করা হচ্ছিল, তখনও জলের অধিপতি বরুণকে সুহৃদগণ বহু অনুনয় করলেও তিনি তখন তাকে (ভদ্রাকে) মুক্ত করলেন না।

Verse 25

तत क्ुद्धो5ब्रवीद्‌ भूमिमुतथ्यो ब्राह्मणोत्तम: । दर्शयस्व स्थलं भद्गरे घट्सहस्रशतह्दम्‌

তখন ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ উতথ্য ক্রুদ্ধ হয়ে পৃথিবীকে বললেন—“ভদ্রে! আমাকে সেই স্থান দেখাও, যেখানে অসংখ্য বিদ্যুৎসম দীপ্তি বিস্তৃত।”

Verse 26

ततस्तदीरिणं जात॑ समुद्रस्थावसर्पत: । तस्माद्‌ देशान्नदीं चैव प्रोवाचासौ द्विजोत्तम:

তারপর সমুদ্র নিজ স্থান থেকে সরে গেলে সেই অঞ্চল বালুময় উজাড় হয়ে গেল। তখন সেই দেশের মধ্য দিয়ে প্রবাহিত নদীকে দ্বিজশ্রেষ্ঠ উতথ্য বললেন—

Verse 27

अदृश्या गच्छ भीरु त्वं सरस्वति मरुन्‌ प्रति । अपुण्य एष भवतु देशस्त्यक्तस्त्वया शुभे

“হে ভীরু সরস্বতী! তুমি অদৃশ্য হয়ে মরুপ্রদেশের দিকে চলে যাও। হে শুভে! তোমার দ্বারা পরিত্যক্ত এই দেশ পুণ্যহীন হোক।”

Verse 28

तस्मिन्‌ संशोषिते देशे भद्रामादाय वारिप: । अददाच्छरणं गत्वा भारयामाड्विरसाय वै,“जब वह सारा प्रदेश सूख गया, तब जलेश्वर वरुण भद्राको साथ लेकर मुनिकी शरणमें आये और उन्होंने आंगिरसको उनकी भार्या दे दी

যখন সেই সমগ্র দেশ শুকিয়ে গেল, তখন জলাধিপ বরুণ ভদ্রাকে সঙ্গে নিয়ে মুনির শরণে এলেন; এবং সেখানে তিনি ভদ্রাকে অঙ্গিরসের পত্নীরূপে অর্পণ করলেন।

Verse 29

प्रतिगृहा तु तां भार्यामुतथ्य: सुमना5भवत्‌ | मुमोच च जगद्‌ दुःखाद्‌ वरुणं चैव हैहय,“हैहयराज! अपनी उस पत्नीको पाकर उतथ्य बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने सम्पूर्ण जगत्‌ तथा वरुणको जलके कष्टसे मुक्त कर दिया

হে হৈহয়রাজ! নিজের সেই পত্নীকে ফিরে পেয়ে উতথ্য পরম প্রসন্ন হলেন; এবং তিনি সমগ্র জগৎ ও বরুণকেও জলজনিত দুঃখ থেকে মুক্ত করলেন।

Verse 30

ततः स लब्ध्वा तां भार्या वरुणं प्राह धर्मवित्‌ । उतथ्य: सुमहातेजा यत्‌ तच्छुणु नराधिप,“नरेश्वर! अपनी उस पत्नीको पाकर महातेजस्वी धर्मज्ञ उतथ्यने वरुणसे जो कुछ कहा, वह सुनो

তারপর নিজের পত্নীকে ফিরে পেয়ে মহাতেজস্বী ধর্মজ্ঞ উতথ্য বরুণকে যা বললেন, হে নরাধিপ, তা শোনো।

Verse 31

मयैषा तपसा प्राप्ता क्रोशतस्ते जलाधिप । इत्युक्त्वा तामुपादाय स्वमेव भवनं ययौ

‘হে জলাধিপ! তুমি আর্তনাদ করলেও আমি তপোবলে এই পত্নীকে লাভ করেছি।’ এ কথা বলে তিনি ভদ্রাকে সঙ্গে নিয়ে নিজের গৃহে ফিরে গেলেন।

Verse 32

एष राजन्नीदृशो वै उतथ्यो ब्राह्मणर्षभ: । ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वमुतथ्यात्‌ क्षत्रियं वरम्‌

হে রাজন! এইরূপই ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ উতথ্য—অতিশয় প্রভাবশালী। আমি এ কথা বলছি; অথবা তুমি বলো—উতথ্যের চেয়ে শ্রেষ্ঠ কোনো ক্ষত্রিয় থাকলে সে কে?

Verse 153

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायुदेवता और कार्तवीर्य अर्जुनका संवादविषयक एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে বায়ুদেবতা ও কার্তবীর্য অর্জুনের সংলাপবিষয়ক একশ তিপ্পান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 154

इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादो नाम चतुष्पज्चाशदधिकशततमो< ध्याय:

ইতি শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে “পবন (বায়ু) ও (কার্তবীর্য) অর্জুনের সংলাপ” নামক একশ চুয়ান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 193

मुज्च भार्यामुतथ्यस्य कस्मात्‌ त्वं हृतवानसि । “वरुण! तुम मेरे कहनेसे मेरी पत्नीको छोड़ दो। तुमने क्यों उसका अपहरण किया है? तुम लोगोंके लिये लोकपाल बनाये गये हो

“উতথ্যের স্ত্রীকে মুক্ত করো। কেন তুমি তাকে হরণ করেছ? তোমরা তো লোকপাল—লোকবিধ্বংসক নও। সোম তাঁর কন্যাকে আমাকে দিয়েছেন; সে আমার ধর্মপত্নী। তবে আজ তুমি কীভাবে তাকে অপহরণ করলে?” উতথ্যের কথামতো নারদ জলাধিপ বরুণকে বললেন—“উতথ্যের স্ত্রীকে ছেড়ে দিন; কেন আপনি তাকে অপহরণ করেছেন?”

Verse 203

ममैषा सुप्रिया भार्या नैनामुत्स्रष्टमुत्सहे । “नारदजीके मुखसे उतथ्यकी यह बात सुनकर वरुणने उनसे कहा--“यह मेरी अत्यन्त प्यारी भार्या है। मैं इसे छोड़ नहीं सकता”

নারদের মুখে উতথ্যের কথা শুনে বরুণ বললেন—“এ আমার অতি প্রিয় পত্নী; আমি তাকে ত্যাগ করতে সাহস করি না।”