
Chapter Arc: दानधर्मपर्व के पवन–अर्जुन संवाद में वायु देवता अर्जुन को झकझोरते हैं—‘हे मूढ़! ब्राह्मणों के कुछ गुण सुन; उनकी महत्ता को समझे बिना दान और यज्ञ का मर्म नहीं खुलता।’ → वायु उदाहरणों और तर्कों से अर्जुन की सामान्य-सी धारणा को चुनौती देते हैं: ब्राह्मण लोक और दिवि—दोनों में अजेय हैं; उनके तेज से तत्व तक वश में होते हैं। कथा-उदाहरण में पृथ्वी/भूमि के ‘नाश’ या डगमगाने का प्रसंग आता है, जिसे कश्यप-ऋषि जैसे ब्राह्मण-तपस्वी ‘व्यस्तम्भयत’—स्थिर कर देते हैं। इससे अर्जुन के भीतर प्रश्न उठता है कि ब्राह्मण-शक्ति केवल सामाजिक नहीं, ब्रह्माण्डीय आधार है। → वायु अर्जुन के यज्ञ-आचरण को उलटकर दिखाते हैं—‘अर्जुन! जिसे तुम नित्य यजते हो, वह अग्नि भी ब्राह्मण ही है; वह समस्त लोक का हव्यवाहन है—क्या तुम उसे नहीं जानते?’ फिर सृष्टि-तत्त्व पर तीखा खंडन आता है: प्रजापति ब्रह्मा अव्यक्त, प्रभु, अव्यय हैं; ‘अण्ड से ब्रह्मा उत्पन्न’ जैसी धारणाएँ ‘अपण्डित’ की हैं। ‘यदि कहो ब्रह्मा आकाश से प्रकट हुए, तो किस आधार पर ठहरते?’—उत्तर में ‘अहंकार’ को सर्व-तेजोगत प्रभु-तत्त्व के रूप में रखा जाता है, और ‘अण्ड’ की वस्तुता पर ही प्रश्नचिह्न लगाकर श्रोता को दार्शनिक विस्मय में डाल दिया जाता है। → अध्याय का निष्कर्ष ब्राह्मण-माहात्म्य की स्थापना है: ब्राह्मण केवल वर्ण-परिचय नहीं, यज्ञ, अग्नि, सृष्टि-व्यवस्था और लोक-धारण के मूल स्तम्भ हैं। अर्जुन के लिए संदेश स्पष्ट होता है—दान/यज्ञ का फल तभी शुद्ध है जब ब्राह्मण-तत्त्व (ज्ञान, तप, संयम, लोक-हित) का आदर और बोध हो। → वायु के ‘अण्ड नहीं है—फिर भी ब्रह्मा हैं’ जैसे वाक्य से जिज्ञासा शेष रहती है कि आगे संवाद में सृष्टि-तत्त्व और ब्राह्मण-तप की सत्ता को किस प्रकार और अधिक निर्णायक रूप से समझाया जाएगा।
Verse 1
अपन बक। है २ >> त्रिपज्चाशर्दाधिकशततमो< ध्याय: वायुद्वारा उदाहरणसहित ब्राद्म॒णोंकी महत्ताका वर्णन वायुरुवाच शृणु मूढ गुणान् कांश्रिद् बाह्मणानां महात्मनाम् | ये त्वया कीर्तिता राजंस्तेभ्यो5थ ब्राह्मणो वर:
বায়ু বললেন—হে মূঢ়, মহাত্মা ব্রাহ্মণদের কয়েকটি গুণ শোনো; আমি তা বর্ণনা করছি। হে রাজন, তুমি যাদের প্রশংসা করেছ, তাদের সকলের তুলনায় ব্রাহ্মণই শ্রেষ্ঠ।
Verse 2
त्वक्त्वा महीत्वं भूमिस्तु स्पर्थयाड्रनूपस्य ह | नाशं जगाम तां विप्रो व्यस्तम्भयत कश्यप:
এক সময় রাজা অঙ্গের সঙ্গে স্পর্ধা (বিরোধ) হওয়ায় পৃথিবীর অধিষ্ঠাত্রী দেবী লোকধর্ম ধারণের শক্তি ত্যাগ করে অদৃশ্য হয়ে গেলেন, যেন বিনাশপ্রাপ্ত হলেন। তখন শ্রেষ্ঠ ঋষি কশ্যপ তপোবলে এই স্থূল পৃথিবীকে স্থির করে ধরে রাখলেন।
Verse 3
अजेया ब्राह्मणा राजन दिवि चेह च नित्यदा । अपिबत् तेजसा हाप: स्वयमेवाज्ञिरा: पुरा
হে রাজন, ব্রাহ্মণরা স্বর্গে ও মর্ত্যে সর্বদাই অজেয়। প্রাচীন কালে মহামনা ঋষি অঙ্গিরা নিজের তেজে জলকে দুধের মতো পান করেছিলেন। পান করেও তাঁর তৃপ্তি হল না; পান করতে করতে তিনি পৃথিবীর সমস্ত জলই শুষে নিলেন। পরে, হে পৃথিবীনাথ, তিনি জলের মহাস্রোত প্রবাহিত করে আবার সমগ্র পৃথিবী পূর্ণ করে দিলেন।
Verse 4
स ता: पिबन् क्षीरमिव नातृप्पत महामना: । अपूरयन्महौघेन महीं सर्वा च पार्थिव
মহাত্মা ঋষি সেই জলকে দুধের মতো পান করলেন, তবু তৃপ্ত হলেন না। তারপর, হে রাজন, তিনি মহাপ্লাবন প্রবাহিত করে সমগ্র পৃথিবীকে আবার জলে পূর্ণ করলেন।
Verse 5
तस्मिन्नहं च क्रुद्धे वै जगत् त्यक्त्वा ततो गत: । व्यतिष्ठमग्निहोत्रे च चिरमज्धिरसो भयात्
যখন সেই ঋষি আমার প্রতি ক্রুদ্ধ হলেন, তখন আমি এই জগৎ ত্যাগ করে সেখান থেকে চলে গেলাম। অন্ধিরসের ভয়ে আমাকে দীর্ঘকাল অগ্নিহোত্রের অগ্নির মধ্যে অবস্থান করতে হয়েছিল।
Verse 6
अथ शप्तश्न भगवान् गौतमेन पुरन्दर: । अहल्यां कामयानो वै धर्मार्थ च न हिंसित:,महर्षि गौतमने ऐश्वर्यशाली इन्द्रको अहल्यापर आसक्त होनेके कारण शाप दे दिया था। केवल धर्मकी रक्षाके लिये उनके प्राण नहीं लिये
তারপর ভগবান গৌতম পুরন্দর (ইন্দ্র)-কে শাপ দিলেন। অহল্যাকে কামনা করলেও, ধর্মরক্ষার জন্য তাকে বধ করা হয়নি।
Verse 7
तथा समुद्रो नृपते पूर्णो मृष्टस्य वारिण: । ब्राह्मणैरभिशप्तश्व बभूव लवणोदक:,नरेश्वर! समुद्र पहले मीठे जलसे भरा रहता था, परंतु ब्राह्मणोंके शापसे उसका पानी खारा हो गया
তেমনি, হে নৃপতি, সমুদ্র একদা মিষ্টি ও নির্মল জলে পূর্ণ ছিল; কিন্তু ব্রাহ্মণদের শাপে তা লবণজলে পরিণত হল।
Verse 8
सुवर्णवर्णो निर्धूम: सड़तोर्ध्वशिख: कवि: । क्रुद्धेनाड़िरसा शप्तो गुणैरेतैर्विवर्जित:
অগ্নি একদা স্বর্ণবর্ণ, ধোঁয়াহীন এবং সদা ঊর্ধ্বমুখী শিখাযুক্ত ছিল; কিন্তু ক্রুদ্ধ অঙ্গিরা তাকে শাপ দিলে, তাই সে এই গুণগুলি থেকে বঞ্চিত হল।
Verse 9
महतकश्नू्णितान् पश्य ये हासन्त महोदधिम् | सुवर्णधारिणा नित्यमवशप्ता द्विजातिना
অর্জুন বললেন—দেখো, এই মহাবীরেরা এখন ভস্মরাশি; যারা একদিন মহাসমুদ্রকেও তুচ্ছ জ্ঞান করত। স্বর্ণবর্ণধারী, নিত্যতপস্বী দ্বিজ ঋষি কপিলের শাপে এরা দগ্ধ হয়েছে। এরা সগরের পুত্র, যজ্ঞাশ্বের অনুসন্ধানে সমুদ্র পর্যন্ত এসেছিল; এখন এখানে ছাইয়ের স্তূপ হয়ে পড়ে আছে।
Verse 10
समो न वत्वं द्विजातिभ्य: श्रेयो विद्धि नराधिप । गर्भस्थान् ब्राह्मणान् सम्यड़ नमस्यति किल प्रभु:
অর্জুন বললেন—হে নরাধিপ, তুমি কখনোই দ্বিজদের সমান হতে পারবে না। তাদের কাছ থেকে তোমার পরম মঙ্গলের পথ জেনে নাও। শোনা যায়, রাজা গর্ভস্থ ব্রাহ্মণকেও যথাযথভাবে প্রণাম করে।
Verse 11
दण्डकानां महदू राज्यं ब्राह्मणेन विनाशितम् । तालजंघं महाक्षत्रमौर्वेगेकेन नाशितम्
অর্জুন বললেন—দণ্ডকদের মহারাজ্য এক ব্রাহ্মণই ধ্বংস করেছিল; আর তালজঙ্ঘ নামে প্রসিদ্ধ মহাক্ষত্রিয় বংশকে একাই মহাত্মা ঔর্ব সংহার করেছিলেন।
Verse 12
त्वया च विपुलं राज्यं बल॑ धर्म श्रुतं तथा । दत्तात्रेयप्रसादेन प्राप्त परमदुर्लभम्
অর্জুন বললেন—তোমারও যে পরম দুর্লভ বিশাল রাজ্য, বল, ধর্ম এবং শাস্ত্রজ্ঞান লাভ হয়েছে, তা শ্রেষ্ঠ ঋষি দত্তাত্রেয়ের কৃপায়ই সম্ভব হয়েছে।
Verse 13
अन्मनिं त्वं यजसे नित्यं कस्माद् ब्राह्मणमर्जुन । स हि सर्वस्य लोकस्य हव्यवाट् कि न वेत्सि तम्
অর্জুন! তুমি কেন প্রতিদিন অগ্নিকে ব্রাহ্মণের মতো পূজা কর? তুমি কি তাকে চেন না? তিনিই তো সমগ্র লোকের হব্যবাহ—হবিষ্য বহনকারী।
Verse 14
अथवा ब्राह्मणश्रेष्ठमनुभूतानुपालकम् । कर्तारें जीवलोकस्य कस्माज्जानन् विमुहा[से
অথবা—জেনে-শুনেও যে ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ স্বানুভূত জ্ঞানে জীবসমূহের পালনকর্তা এবং যেন এই জীবলোকের নির্মাতা—তুমি কেন মোহে পতিত হও?
Verse 15
तथा प्रजापतिर्त्रह्मा अव्यक्त: प्रभुरव्यय: । येनेदं निखिल विश्व जनितं स्थावरं चरम्
তদ্রূপ প্রজাপতি ব্রহ্মা—যিনি স্বরূপে অব্যক্ত, প্রভু ও অবিনশ্বর—যাঁর দ্বারা এই সমগ্র স্থাবর-চর বিশ্ব উৎপন্ন হয়েছে, তিনিও ব্রাহ্মণ বলেই গণ্য।
Verse 16
अण्डजातं तु ब्रह्माणं केचिदिच्छन्त्यपण्डिता: । अण्डाद् भिन्नाद् बभु: शैला दिशो5म्भ:पृथिवी दिवम्
কিছু অপণ্ডিত লোক ব্রহ্মাকে অণ্ডজ বলে মানে। তাদের মতে, ভাঙা অণ্ড থেকে পর্বত, দিকসমূহ, জল, পৃথিবী ও স্বর্গ উৎপন্ন হয়েছে।
Verse 17
द्रष्टव्यं नैतदेवं हि कथं जायेदजो हि सः । स्मृतमाकाशमण्डं तु तस्माज्जात: पितामह:
কিন্তু এভাবে আক্ষরিক অর্থে বোঝা উচিত নয়; কারণ যিনি অজ, তিনি কীভাবে জন্ম নেবেন? এখানে ‘অণ্ড’ বলতে মহাকাশকেই বোঝানো হয়েছে; সেখান থেকেই পিতামহ প্রকাশিত—এই অর্থেই তাঁকে ‘অণ্ডজ’ বলা হয়।
Verse 18
तिछेत् कथमिति ब्रूहि न किंचिद्धि तदा भवेत् । अहड्कार इति प्रोक्त: सर्वतेजोगत: प्रभु:
যদি কেউ বলে—“আকাশ থেকে ব্রহ্মা কীভাবে প্রকাশিত হলেন? বলুন; কারণ তখন তো আর কোনো অবলম্বন ছিল না”—তবে উত্তর এই যে, সেখানে ব্রহ্মাকে ‘অহংকার’ বলা হয়েছে—যিনি সর্ব তেজে ব্যাপ্ত, সমর্থ প্রভুতত্ত্ব।
Verse 19
नास्त्यण्डमस्ति तु ब्रह्मा स राजा लोकभावन: । इत्युक्त: स तदा तूष्णीमभूद् वायुस्ततो<5ब्रवीत्
বাস্তবে ‘অণ্ড’ নামে কোনো স্বতন্ত্র বস্তু নেই; তবু ব্রহ্মা আছেন—তিনিই লোকসমূহের রাজস্রষ্টা ও পালনকর্তা। এ কথা শুনে কার্তবীর্য অর্জুন নীরব হলেন; তখন বায়ুদেব আবার তাঁকে বললেন।
Verse 152
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायुदेवता और अजुनिके संवादके प्रसंगमें ब्राह्मणोंका माहात्म्यविषयक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে বায়ুদেব ও অর্জুনের সংলাপ-প্রসঙ্গে ব্রাহ্মণদের মাহাত্ম্যবিষয়ক একশো বাহান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 153
इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे त्रिपण्चाशदधिकशततमो<ध्याय:
ইতি শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে পবন ও অর্জুনের সংলাপ-প্রসঙ্গে একশো তিপ্পান্নতম অধ্যায়।