
अत्रेः तपोबलप्रकाशः तथा च्यवनस्य सोमाधिकारः (Atri’s Illumination by Tapas; Cyavana and Soma-Entitlement)
Upa-parva: Ṛṣi-karmānukīrtana (Exempla of Sage-Acts: Atri and Cyavana)
This adhyāya is presented as a narrated instruction: after a prompt to “listen” (śṛṇu), the account first depicts devas and dānavas engaged amid oppressive darkness (tamas), with Svarbhānu striking the Moon and Sun, resulting in the devas’ vulnerability. The devas encounter the ascetic Atri in the forest and petition protection; Atri, described as self-controlled and tranquil, generates illumination through tapas, restoring visibility and enabling the devas’ strategic recovery against the opposing host. The discourse then pivots to Cyavana: he insists that the Aśvins be permitted to drink Soma alongside the devas. Indra objects on grounds of exclusion and non-recognition; Cyavana threatens coercive consequence and initiates ritual action. Indra advances with a mountain and vajra but is immobilized by Cyavana’s ascetic potency; Cyavana manifests a formidable ‘Mada’ (intoxicating force) that compels the devas to negotiate. Indra submits; the Aśvins gain Soma-rights. Finally, Cyavana retracts and apportions ‘mada’ into gambling, hunting, drinking, and sexual excess, concluding with an explicit warning that these lead to human ruin and should be avoided. The chapter thus links cosmic order, ritual entitlement, and personal ethics through exemplary jurisprudence and restraint.
Chapter Arc: युधिष्ठिर का प्रश्न उठता है—हव्य-कव्य के प्रतिग्रह और नाना प्रकार के भोज्य पदार्थों के सेवन/ग्रहण में ब्राह्मणों पर जो पाप-छाया पड़ती है, उससे मुक्ति का निश्चित प्रायश्चित्त क्या है? → भीष्म क्रमशः उन पदार्थों की सूची और उनके अनुसार शुद्धि-विधान बताते हैं—कहीं त्रिसंध्या स्नान, कहीं जप-होम, कहीं विशेष शान्ति; और यह भी कि श्राद्ध-अन्न, कृष्णपक्ष, अपराह्न-काल आदि के नियम क्यों नियत हैं। नियमों की सूक्ष्मता बढ़ती जाती है, क्योंकि एक ही ‘भोजन’ अलग संदर्भ में पुण्य भी बन सकता है और दोष भी। → निर्णायक बिंदु यह है कि प्रतिग्रह/भोजन का दोष ‘वस्तु’ से उतना नहीं, जितना ‘संदर्भ’ (कर्ता-जाति, काल, विधि, उद्देश्य) से बनता है—इसीलिए गन्ना-तेल-कुश जैसे प्रतिग्रह पर त्रिकाल स्नान, शूद्र-सहभोजन/अशौच-स्पर्श जैसी स्थितियों पर शान्तिहोम और गायत्री, रैवत-साम, पवित्रेष्टि, कृष्णमाण्ड-अनुवाक, अघमर्षण-जप आदि का विधान आता है; और कुछ दानों/प्रतिग्रहों को सुवर्ण-दान तुल्य प्रायश्चित्त से समतुल्य ठहराया जाता है। → भीष्म प्रायश्चित्त-विधि को ‘व्यवहार-धर्म’ की तरह व्यवस्थित कर देते हैं—कौन-सा प्रतिग्रह/भोजन किस शुद्धि से शुद्ध होता है, श्राद्ध का अपराह्न-नियम किस अर्थ से जुड़ा है, और प्रायश्चित्त के बाद ब्राह्मण कैसे ‘सिद्धि’ पाकर आपत्ति से बचता है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें भोज्याभोज्यान्नकथन नामक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १३५ ॥। षट्त्रिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्षित्त युधिषछ्िर उवाच उक्तास्तु भवता भोज्यास्तथाभोज्याश्व् सर्वश: । अत्र मे प्रश्रसंदेहस्तन्मे वद पितामह,युधिष्ठिने कहा--पितामह! आपने भोज्यान्न और अभोज्यान्न सभी तरहके मनुष्योंका वर्णन किया; किंतु इस विषयमें मुझे पूछनेयोग्य एक संदेह उत्पन्न हो गया। उसका मेरे लिये समाधान कीजिये
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! আপনি ভোজ্য ও অভোজ্য—উভয়ই সম্পূর্ণভাবে বর্ণনা করেছেন; কিন্তু এই বিষয়েই আমার মনে একটি সংশয় জেগেছে। অনুগ্রহ করে তা দূর করুন।
Verse 2
ब्राह्मणानां विशेषेण हव्यकव्यप्रतिग्रहे । नानाविधेषु भोज्येषु प्रायश्चित्तानि शंस मे,प्राय: ब्राह्मणोंको ही हव्य और कव्यका प्रतिग्रह लेना पड़ता है और उन्हें ही नाना प्रकारके अन्न ग्रहण करनेका अवसर आता है। ऐसी दशामें उन्हें पाप लगते हैं, उनका क्या प्रायश्चित्त है? यह मुझे बतावें
যুধিষ্ঠির বললেন—বিশেষ করে ব্রাহ্মণদের দেবার্পিত হব্য ও পিতৃার্পিত কব্য গ্রহণ করতে হয়, এবং নানা প্রকার ভোজ্য গ্রহণের প্রসঙ্গও আসে। এমন অবস্থায় কোন কোন প্রায়শ্চিত্ত বিধান করা হয়েছে? আমাকে বলুন।
Verse 3
भीष्य उवाच हन्त वक्ष्यामि ते राजन् ब्राह्मणानां महात्मनाम् | प्रतिग्रहेषु भोज्ये च मुच्यते येन पाप्मन:,भीष्मजीने कहा--राजन! महात्मा ब्राह्मणोंको प्रतिग्रह लेने और भोजन करनेके पापसे जिस प्रकार छुटकारा मिलता है, वह प्रायश्ित्त मैं बता रहा हूँ, सुनो
ভীষ্ম বললেন—রাজন! মহাত্মা ব্রাহ্মণরা প্রতিগ্রহ গ্রহণ ও ভোজনজনিত পাপ থেকে যে প্রায়শ্চিত্তে মুক্ত হন, তা আমি তোমাকে বলছি; শোনো।
Verse 4
घृतप्रतिग्रहे चैव सावित्री समिदाहुति: । तिलप्रतिग्रहे चैव सममेतद् युधिष्ठिर,युधिष्ठिर! ब्राह्मण यदि घीका दान ले तो गायत्री-मन्त्र पढ़कर अग्निमें समिधाकी आहुति दे। तिलका दान लेनेपर भी यही प्रायश्चित्त करना चाहिये। ये दोनों कार्य समान हैं
হে যুধিষ্ঠির! ব্রাহ্মণ যদি ঘৃত দানরূপে গ্রহণ করে, তবে সাবিত্রী (গায়ত্রী) মন্ত্র জপ করে অগ্নিতে সমিধা আহুতি দেবে। তিল গ্রহণ করলেও একই প্রায়শ্চিত্ত; উভয়ই সমান।
Verse 5
मांसप्रतिग्रहे चैव मधुनो लवणस्य च । आदित्योदयन स्थित्वा पूतो भवति ब्राह्मण:,फलका गुद्दा, मधु और नमकका दान लेनेपर उस समयसे लेकर सूर्योदयतक खड़े रहनेसे ब्राह्मण शुद्ध हो जाता है
মাংস, মধু ও লবণ দানরূপে গ্রহণ করলে ব্রাহ্মণ সেই সময় থেকে সূর্যোদয় পর্যন্ত দাঁড়িয়ে থাকলে শুদ্ধ হয়।
Verse 6
काउ्चनं प्रतिगृह्मयाथ जपमानो गुरुश्रुतिम् । कृष्णायसं च विवृतं धारयन् मुच्यते द्विज:,सुवर्णका दान लेकर गायत्री-मन्त्रका जप करने और खुले तौरपर काले लोहेका दंड धारण करनेसे ब्राह्मण उसके दोषसे छुटकारा पाता है
সুবর্ণ দানরূপে গ্রহণ করে, গুরুর নিকট থেকে শ্রুত গায়ত্রী জপ করতে করতে, এবং প্রকাশ্যে কালো লোহার দণ্ড ধারণ করলে দ্বিজ সেই দোষ থেকে মুক্ত হয়।
Verse 7
एवं प्रतिगृहीते5थ धने वस्त्रे तथा स्त्रियाम् । एवमेव नरश्रेष्ठ सुवर्णस्य प्रतिग्रहे
হে নরশ্রেষ্ঠ! ধন, বস্ত্র এবং স্ত্রীকে প্রতিগ্রহরূপে গ্রহণ করলেও—এবং সুবর্ণ গ্রহণের ক্ষেত্রেও—এই একই বিধান প্রযোজ্য।
Verse 8
इक्षुतैलपवित्राणां त्रिसंध्ये5प्सु निगनज्जनम्,गन्ना, तेल और कुशोंका प्रतिग्रह स्वीकार करनेपर त्रिकाल स्नान करना चाहिये। धान, फूल, फल, जल, पूआ, जौकी लपसी और दही-दूधका दान लेनेपर सौ बार गायत्री-मन्त्रका जप करना चाहिये
ভীষ্ম বললেন—যদি কেউ আখ, তেল বা পবিত্র কুশ (দর্ভ) প্রতিগ্রহ করে, তবে প্রাতঃ, মধ্যাহ্ন ও সায়ং—তিন সন্ধিক্ষণে জলে স্নান করা উচিত। আর যদি ধান, ফুল, ফল, জল, পিষ্টজাত মিষ্টান্ন, যবের লেপসি, দই বা দুধ গ্রহণ করে, তবে গায়ত্রী (সাবিত্রী) মন্ত্র একশোবার জপ করা কর্তব্য।
Verse 9
व्रीहौ पुष्पे फले चैव जले पिष्टमये तथा । यावके दधिदुग्धे च सावित्रीं शतशो5न्विताम्,गन्ना, तेल और कुशोंका प्रतिग्रह स्वीकार करनेपर त्रिकाल स्नान करना चाहिये। धान, फूल, फल, जल, पूआ, जौकी लपसी और दही-दूधका दान लेनेपर सौ बार गायत्री-मन्त्रका जप करना चाहिये
ভীষ্ম বললেন—যদি কেউ ধান, ফুল, ফল, জল, পিষ্টজাত খাদ্য, যবের লেপসি, দই বা দুধ প্রতিগ্রহ করে, তবে সাবিত্রী (গায়ত্রী) মন্ত্র শত শতবার জপসহ তা গ্রহণ করা উচিত।
Verse 10
उपानहौ च च्छत्र॑ च प्रतिगृह्मौर्ध्वदेहिके । जपेच्छतं समायुक्तस्तेन मुच्येत पाप्मना,श्राद्धमें जूता और छाता ग्रहण करनेपर एकाग्रचित्त हो यदि सौ बार गायत्री-मन्त्रका जप करे तो उस प्रतिग्रहके दोषसे छुटकारा मिल जाता है
ভীষ্ম বললেন—শ্রাদ্ধের ঊর্ধ্বদেহিক ক্রিয়ায় যদি কেউ জুতো ও ছাতা প্রতিগ্রহ করে, তবে একাগ্রচিত্তে গায়ত্রী মন্ত্র একশোবার জপ করবে; সেই জপের দ্বারা সে ঐ প্রতিগ্রহজনিত পাপ থেকে মুক্ত হয়।
Verse 11
क्षेत्रप्रतिग्रहे चैव ग्रहसूतकयोस्तथा । त्रीणि रात्राण्युपोषित्वा तेन पापाद् विमुच्यते,>ग्रहणके समय अथवा अशौचमें किसीके दिये हुए खेतका दान स्वीकार करनेपर तीन रात उपवास करनेसे उसके दोषसे छुटकारा मिलता है
ভীষ্ম বললেন—গ্রহণকালে অথবা সূতক (অশৌচ) অবস্থায় যদি কেউ ক্ষেত্রের দান প্রতিগ্রহ করে, তবে তিন রাত্রি উপবাস করবে; সেই উপবাসে সে ঐ পাপ থেকে মুক্ত হয়।
Verse 12
कृष्णपक्षे तु यः श्राद्धं पितृणामश्नुते द्विज: । अन्नमेतदहोरात्रात् पूतो भवति ब्राह्मण:,जो द्विज कृष्णपक्षमें किये हुए पितृश्राद्धका अन्न भोजन करता है, वह एक दिन और एक रात बीत जानेपर शुद्ध होता है
ভীষ্ম বললেন—কৃষ্ণপক্ষে পিতৃদের উদ্দেশ্যে সম্পন্ন শ্রাদ্ধের অন্ন যে দ্বিজ ভোজন করে, সে এক দিন ও এক রাত্রি অতিবাহিত হলে শুদ্ধ হয়।
Verse 13
न च संध्यामुपासीत न च जाप्य॑ प्रवर्तयेत् । न संकिरेत् तदन्नं च ततः पूर्येत ब्राह्मण:,ब्राह्मण जिस दिन श्राद्धका अन्न भोजन करे, उस दिन संध्या, गायत्री-जप और दुबारा भोजन त्याग दे। इससे उसकी शुद्धि होती है
যেদিন ব্রাহ্মণ শ্রাদ্ধের অন্ন গ্রহণ করেন, সেদিন তিনি সন্ধ্যা-উপাসনা করবেন না, গায়ত্রী প্রভৃতি জপ আরম্ভ করবেন না, এবং পুনরায় আহারও করবেন না। এই সংযম পালনে তাঁর শৌচ-শুদ্ধি যথাযথ রক্ষিত হয়।
Verse 14
इत्यर्थमपराह्ले तु पितृणां श्राद्धमुच्यते । यथोक्तानां यदश्नीयुरत्रल्यिणा: पूर्वकीर्तिता:,इसीलिये अपराह्नलकालमें पितरोंके श्राद्धका विधान किया गया है। (जिससे सबेरेकी संध्योपासना हो जाय और शामको पुनर्भोजनकी आवश्यकता ही न पड़े) ब्राह्मणोंको एक दिन पहले श्राद्धका निमन्त्रण देना चाहिये। जिससे वे पूर्वोक्त प्रकारसे विशुद्ध पुरुषोंके यहाँ यथावत् रूपसे भोजन कर सकें
এই কারণেই পিতৃদের শ্রাদ্ধ অপরাহ্ণকালে বিধেয় বলা হয়েছে, যাতে পূর্বে বর্ণিত শুদ্ধাচারী যোগ্য পাত্রগণ বিধিমতো আহার করতে পারেন।
Verse 15
मृतकस्य तृतीयाहे ब्राह्मणो योऊन्नमश्रुते । स त्रिवेलं समुन्मज्ज्य द्वादशाहेन शुध्यति
মৃত ব্যক্তির তৃতীয় দিনে যে ব্রাহ্মণ অন্ন গ্রহণ করে, সে ত্রিকাল স্নান করে দ্বাদশ দিনে শুদ্ধ হয়।
Verse 16
जिसके घर किसीकी मृत्यु हुई हो, उसके यहाँ मरणाशौचके तीसरे दिन अन्न ग्रहण करनेवाला ब्राह्मण बारह दिनोंतक त्रिकाल स्नान करनेसे शुद्ध होता है ।। द्वादशाहे व्यतीते तु कृतशौचो विशेषतः । ब्राह्मणेभ्यो हविर्दत्त्वा मुच्यते तेन पाप्मना,बारह दिनोंतक स्नानका नियम पूर्ण हो जानेपर तेरहवें दिन वह विशेषरूपसे स्नान आदिके द्वारा पवित्र हो ब्राह्मणोंको हविष्य भोजन करावे। तब उस पापसे मुक्त हो सकता है
দ্বাদশ দিন অতিবাহিত হলে, শৌচবিধি সম্পন্ন করে সে বিশেষভাবে পবিত্র হয়। তারপর ব্রাহ্মণদের হবিশ্য প্রদান করলে সে সেই পাপকলুষ থেকে মুক্ত হয়।
Verse 17
मृतस्य दशरात्रेण प्रायश्चित्तानि दापयेत् सावित्री रैवतीमिष्टिं कृूष्माण्डमघमर्षणम्,जो मनुष्य किसीके यहाँ मरणाशौचमें दस दिनतक अन्न खाता है, उसे गायत्री-मन्त्र, रैवत शाम, पवित्रेष्टि कृष्माण्ड अनुवाक् और अघमर्षणका जप करके उस दोषका प्रायश्ित्त करना चाहिये
মৃত্যুর পর দশরাত্রির অশৌচকালে যদি কেউ অন্যের গৃহে অন্ন গ্রহণ করে, তবে তাকে প্রায়শ্চিত্ত করাতে হবে—সাবিত্রী (গায়ত্রী) জপ, রৈবতী-কর্ম, শুদ্ধ্যর্থ ইষ্টি, কূষ্মাণ্ড অনুবাক্ এবং অঘমর্ষণ পাঠ।
Verse 18
मृतकस्य त्रिरात्रे यः समुद्दिष्टे समश्षुते । सप्त त्रिषवर्णं स्नात्वा पूतो भवति ब्राह्मण:,इसी प्रकार जो मरणाशौचवाले घरमें लगातार तीन रात भोजन करता है, वह ब्राह्मण सात दिनोंतक त्रिकाल स्नान करनेसे शुद्ध होता है
ভীষ্ম বললেন—যে ব্রাহ্মণ মৃতক-সংক্রান্ত অশৌচযুক্ত গৃহে পরপর তিন রাত্রি শ্রাদ্ধ-উদ্দেশ্যে নিবেদিত অন্ন ভোজন করে, সে সাত দিন প্রাতঃ, মধ্যাহ্ন ও সায়ং—তিন সন্ধিক্ষণে স্নান করলে শুদ্ধ হয়।
Verse 19
सिद्धिमाप्रोति विपुलामापदं चैव नाप्रुयात्
সে বিপুল সিদ্ধি লাভ করে এবং কখনও বিপদে পতিত হয় না।
Verse 20
यह प्रायश्रित्त करनेके बाद उसे सिद्धि प्राप्त होती है और वह भारी आपत्तिमें कभी नहीं पड़ता है ।। यस्तु शूद्रे: समश्रीयाद् ब्राह्मणो5प्येक भोजने । अशौचं विधिवत् तस्य शौचमत्र विधीयते
প্রায়শ্চিত্ত সম্পন্ন করলে সে শুদ্ধি ও সিদ্ধি লাভ করে এবং গুরুতর বিপদে পড়ে না। কিন্তু যদি কোনো ব্রাহ্মণও এক ভোজনে শূদ্রদের সঙ্গে সমভাবে এক পংক্তিতে আহার করে, তবে তার জন্য বিধিমতে অশৌচ গণ্য হয়; অতএব এখানে তার শৌচ (শুদ্ধি-বিধান) নির্দিষ্ট করা হলো।
Verse 21
जो ब्राह्मण शूद्रोंके साथ एक पंक्तिमें भोजन कर लेता है, वह अशुद्ध हो जाता है। अतः उनकी शुद्धिके लिये शास्त्रीय विधिके अनुसार यहाँ शौचका विधान है ।। यस्तु वैश्यै: सहाश्रीयाद् ब्राह्मणो5प्येकभोजने । स वैनत्रिरात्रं दीक्षित्वा मुच्यते तेन कर्मणा,जो ब्राह्मण वैश्योंके साथ एक पंक्तिमें भोजन करता है, वह तीन राततक व्रत करनेपर उस कर्मदोषसे मुक्त होता है
যে ব্রাহ্মণ বৈশ্যদের সঙ্গে এক ভোজনে এক পংক্তিতে বসে আহার করে, সে দোষগ্রস্ত হয়। তিন রাত্রি দীক্ষা-ব্রত পালন করলে সে সেই কর্মদোষ থেকে মুক্ত হয়।
Verse 22
क्षत्रिय: सह यो5श्रीयाद ब्राह्मणो5प्येकभोजने । आप्लुत: सह वासोभिस्तेन मुच्येत पाप्मना,जो ब्राह्मण क्षत्रियोंके साथ एक पंक्तिमें भोजन करता है, वह वस्त्रोंसहित स्नान करनेसे पापमुक्त होता है
যে ব্রাহ্মণ ক্ষত্রিয়দের সঙ্গে এক ভোজনে এক পংক্তিতে বসে আহার করে, সে দোষগ্রস্ত হয়; কিন্তু বস্ত্রসহ স্নান করলে সে সেই পাপ থেকে মুক্ত হয়।
Verse 23
शूद्रस्य तु कुलं हन्ति वैश्यस्य पशुबान्धवान् । क्षत्रियस्य श्रियं हन्ति ब्राह्मणस्य सुवर्चसम्,ब्राह्णणफा तेज उसके साथ भोजन करनेवाले शूद्रके कुलका, वैश्यके पशु और बान्धवोंका तथा क्षत्रियकी सम्पत्तिका नाश कर डालता है
এই দোষ শূদ্রের কুলধ্বংস করে, বৈশ্যের গবাদি পশু ও আত্মীয়-বন্ধুদের ক্ষতি করে, ক্ষত্রিয়ের শ্রী-সমৃদ্ধি নষ্ট করে, আর ব্রাহ্মণের সুবর্চস্ (আধ্যাত্মিক তেজ ও সুনাম) বিনষ্ট করে।
Verse 24
प्रायश्षित्तं च शान्तिं च जुहुयात् तेन मुच्यते । सावित्री रैवतीमिष्टिं कृूष्माण्डमघमर्षणम्
প্রায়শ্চিত্ত ও শান্তিহোম করা উচিত—তাতে সে দোষ থেকে মুক্ত হয়। সাবিত্রী ও রৈবতী ইষ্টি, এবং পাপ-মর্দনকারী কূষ্মাণ্ড (অঘমর্ষণ) কর্মও করা উচিত।
Verse 25
इसके लिये प्रायश्रित्त और शान्तिहोम करना चाहिये। गायत्री-मन्त्र, रैवत साम, पवित्रेष्टि, कृष्माण्ड अनुवाक् और अघमर्षण मन्त्रका जप भी आवश्यक है ।। तथोच्छिष्टमथान्योन्यं सम्प्राशेन्नात्र संशय: । रोचना विरजा रात्रिर्मज्नलालम्भनानि च,किसीका जूठा अथवा उसके साथ एक पंक्तिमें भोजन नहीं करना चाहिये। उपर्युक्त प्रायश्चित्तके विषयमें संशय नहीं करना चाहिये। प्रायश्चित्त करनेके अनन्तर गोरोचन, दूर्वा और हल्दी आदि मांगलिक वस्तुओंका स्पर्श करना चाहिये
অন্যের উচ্ছিষ্ট ভক্ষণ করবে না, এবং পরস্পরের জুঠো-সংশ্লিষ্ট হয়ে একসঙ্গে আহারও করবে না—এ বিষয়ে সন্দেহ নেই। উক্ত প্রায়শ্চিত্তের পরে গোরোচনা প্রভৃতি মঙ্গলদ্রব্য স্পর্শ করবে, নির্মল রাত্রি পালন করবে, এবং স্নানাদি শুদ্ধিকর্ম করবে।
Verse 76
अन्नप्रतिग्रहे चैव पायसेक्षुरसे तथा । नरश्रेष्ठ इसी प्रकार धन, वस्त्र, कन्या, अन्न, खीर और ईखके रसका दान ग्रहण करनेपर भी सुवर्ण-दानके समान ही प्रायश्चित्त करे
হে নরশ্রেষ্ঠ! অন্ন, পায়স (ক্ষীর) ও ইক্ষুরস গ্রহণ করলেও—তেমনি ধন, বস্ত্র, কন্যা প্রভৃতি গ্রহণ করলেও—সুবর্ণ-দান গ্রহণের সমানই প্রায়শ্চিত্ত পালন করা উচিত।
Verse 136
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि प्रायश्ित्तविधिनाम षट्त्रिंशयधिकशततमो<्ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে ‘প্রায়শ্চিত্তবিধি’ নামক একশো ছত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
The tension lies between established exclusion (Indra’s refusal of Soma access to the Aśvins) and a dharmic claim to equitable ritual participation, resolved through ascetic authority constrained toward communal order rather than personal gain.
Power—whether royal or ascetic—should be used to restore order and restrain excess; the explicit behavioral guideline is to avoid the four decline-producing channels: gambling, hunting-as-addiction, intoxicating drinking, and uncontrolled sexual indulgence.
No explicit phalaśruti formula appears in this excerpt; instead, the closure functions as normative meta-commentary by stating the inevitable ‘kṣaya’ (ruin) resulting from specified vices and recommending their continual avoidance.